गुरु वंदना (दोहावली)


श्री गुरु-वंदना


 

 जुलाई 2026

॥ दोहा ॥

 

सद्गुरु  मोरे  प्राणधन,  सद्गुरु  मेरी  टेक ।
कोटि-कोटि वंदन करूँ, उघड़हिं नयन-विवेक ॥

गुरु-पदनलिन ही करत है, त्रिविध ताप-परिहार ।
जिन के मृदुरज परस से, तरी अहिल्या नार ॥

पुण्य-पुञ्ज से गुरु मिले, जागे मेरे भाग ।
हृदय-कमल विकसित भया, चरणन के अनुराग ॥

शुभ प्रेम की ज्योति जगी, जिस क्षण जा घट माहीं ।
ताके जीवन-पटल से, ताप-तिमिर बिनसाहीं ॥

प्राणन तें अति प्रिय सदा, मोरे श्री गुरुदेव ।
अन्तर माहिं छुपाय लूँ, कर चरणन की सेव ॥


सद्गुरु-महिमा  अगम  है,  केहि  विधि  पाऊँ  पार ।
शेष शारदा ऋषि मुनि, गा-गा थाके हार ॥
माटी    का   था   पुतला,  करुणा   भई   अपार ।
सत्य नाम   का   दीप   दे,  दूर  कियो   अँधकार ॥

काज करत सब आप ही, पुनि प्रेरक हो आप ।
विश्व-चक्र है घूमता, आप हि के प्रताप ॥

 

नैनन सूं नित पेखिहौं, सद्गुरु ! रूप तिहार ।
दिन-दिन बाढ़ै प्रीति मम, मृदुल युगल चरणार ॥


श्री गुरु पद नख की छवि, ज्यों चन्दा की रेख ।

मनहर मोद विधायिनी, जाकी गति अलेख ॥

सुख चाहूँ सपने नहीं, दीजो विमल विवेक ।
चरण  कमल  में  चित  रहै,  बनी  रहे  तव  टेक ॥

ऋद्धि-सिद्धि  जाचूँ   नहीं,  चाहूँ   तुम्हरो   प्यार ।
स्वांस-स्वांस  सुमिरन  करे, रसना  ‘नाम’  तुम्हार ॥

 


 जून 2026

 

॥ दोहा ॥


गुरु-चरणन  में  करत  हूँ,  सविनय  यही  गुहार ।

प्राणों  में  उठती  रहे,   नाम  मन्त्र   की   गुञ्जार ॥

 

श्री  आज्ञा  गुरुदेव  की,   करै  भक्त  का त्राण ।
हृदय-पटल में जो धरे, पावै ध्रुव कल्याण ॥


मणि-मुक्ता से श्रेष्ठतर, सद्गुरु-वचन अमोल ।
पल-पल लेत सँभाल जो, उर की गाँठ टटोल ॥


सद्गुरु-शरण  जाए  कर,  भक्ति  करै  चित  लाए ।
जन्म-मरण  ते  छूट  कर, अजर  अमर  पद पाए ॥

 

चरण-रेणु    धरि  सीस  पै,  विनवत  साँझ  सवेर ।
सद्गुरु-आशिष पाए कर, भवनिधि तरत अवेर ॥

 

जिन  की  सुष्मा  भर  रही, छ:  ऋतुएँ  नहिं  अन्त ।
ग्रीष्म  शरद  वर्षा   शिशिर, यह   बसन्त   हेमन्त ॥

अमित तेज के पुञ्ज हैं, सो सद्गुरु दातार ।
कोटि भानु नतशिर हुए, निरखत तेज अपार ॥

 

सद्गुरु चरण सरोरुह, मन मिलिन्द है मोर ।
पान करे मकरन्द का, मगन रहे निशिभोर ॥

 

ऐसो  धन गुरु-नाम  का,  अहनिस  बढ़ता जाए ।
खर्चन  तें  घटता  नहीं,  चोर न सके चुराए ॥


सत्त-नाम  की  नाव  है,  स्वांस  दोऊ  पतवार ।
कुशल  खेवैया  सद्गुरु, चढ़ै  सो  उतरै  पार ॥


मूल  मन्त्र  सद्गुरु-वचन,  हिरदै-पोट  संभाल ।
मिटत  अविद्या-तम  सकल,  अन्तर  होत  उजाल  ॥

नाम सत्य जग झूठ है, सार वचन उर राख ।
चार वेद षट् शास्त्र की, सब ग्रन्थन की साख ॥

 




 मई 2026 

॥ दोहा ॥

सत्य  वस्तु  संसार  में,  केवल  गुरु  का  नाम ।
शेष  निखिल प्रतिबिम्ब है, आवत केही काम ॥


सद् गुरु तुम्हारे नाम की, जिन-जिन लीन्हीं ओट ।
सोवत  हैं  सुख-नींद  में,  डारि  भर्म  की  पोट ॥

निशिवासर जग जरत है, काम क्रोध की आग ।
आवै  जो  गुरु-शरण  में,   ताके  उत्तम  भाग ॥

दया   करी   गुरुदेव   जी,  दीन्हों  अपनी   नाँव ।
दीन-हीन को रख लिया, चरण-कँवल की छाँव ॥

 

पूर्ण धनी सद् गुरु मेरे, करुणामय श्री भगवान् ।
सादर पद-वन्दन करूँ, वारूँ तन-मन-प्रान ॥

मुद  मंगलमय   सद् गुरु,  वन्दौ  तव  चरणार ।

तन-मन-धन  अर्पित  करुँ, मोहि दीजौ  दीदार ॥

अग-जगत्राता  आप   हैं,  सकल   भुवन   भर्तार ।
श्री  चरणन  का  ध्यान  ही,  बस  मेरो  आधार ॥
विधि-हरि-हर कर बाँधकर, निशदिन करत जुहार ।
इन्द्रादिक    सब    देवता,    ठाढे   करें    गुहार ॥

 

निज  सर्वस  गुरुदेव  पै,  जो  देवत  हैं  वार ।
कृपा  कृपानिधि की सदा,  तिन पै होत अपार ॥


सद् गुरु पल-पल   लेत   हैं,  अपने  जन  की  सार ।
भव-निधि   डूबत   राखते,    देकर   हाथ   सहार ॥


नर  भूला  जग-जाल  में,  सद् गुरु-टेक बिसार ।
पावत सदा  अशान्ति  ही,  नर तन  देवै  हार ॥


जब  जब  बाढ्यो  जगत्  में, महातिमिर अग्यान ।
सचखण्डवासी सद् गुरु,  करते  अग-जग-त्रान ॥

 

पुण्य-जन्म   तोहे   मिला,   अरु   समर्थ    गुरुदेव ।
कर ले ‘दासा’ रात-दिन,  चरण-कमल  की  सेव ॥



अप्रैल 2026 

 

॥ दोहा ॥

 

वन्दौं श्री गुरु पद कमल, होए भाव सूं दीन ।
तीन लोक के जो धनी, भक्तन के आधीन ॥

पद-सरोज गुरुदेव के, सकल सुखन की नींव ।
जो सेवैं  अति  नेह  सों, मुक्त होत वह जीव ॥

गुरु-चरणन कूं नित भजै, अहनिस करि-करि ध्यान ।
ते नर भव सूं ऊबरै, पावैं पद निर्वाण ॥

गुरु का नाम ही सार है, सकल जगत् नि:सार ।
नाम-दीप की ज्वाला ही, हरत अखिल अँधियार ॥ 

सागर चरण पखारते,  रवि  शशि  जाके  नैन ।
व्योम   ही  जाको  शीश  है,  चारों  वेद  हैं  बैन ॥

श्रवण-युगल  दिग्जाल  है,  धरणी   जाके  पाँव ।
हिय तल  जाका  विश्व  है, सो मोहि राखे छाँव ॥

जिन  के  अधरों  पर  रहे,  मादक  मृदु  मुस्कान ।
सुधा  झरत  वचनावली,  सो  सद् गुरु  मम  जान ॥

सत्य-स्नेही सद्गुरु, स्वार्थ भरा यह संसार ।
प्रीति करूँ तिन के चरण, भ्रम संशय सब जार ॥ 

कहँ अनन्त गुरु-गुण-विमल, कहँ मोरि मति थोरि ।
चर्ममयी  रसना  मम,  छिमहु  डिठाई  मोरि ॥ 

परम अभय पद मिलत है, सद् गुरु के चरणार ।
जीव फिरे निर्भय हो, पिए अमिय की धार ॥

मंगलकारी   सद् गुरु,  मञ्जुल   रूप   अपार ।
बार-बार दंड्वत वन्दन करे, ‘दासनदास’ तुम्हार ॥ 

सद् गुरु की चितवन पड़ी, सकल काज पूरे होए ।
भव-बन्धन पल में कटे, आँच न लागै कोए ॥

सद् गुरु-चरण अमोघ हैं, अनुपम ताकी चरण-धूरि ।
श्रद्धा से जन लेत हैं, पाते जीवन मूरि ॥

प्रातः सायं भक्त जो, करते गुरु का ध्यान ।
माया-काल न छू सके, पाते पद-निर्वान ॥

कोटि-कोटि मुख माँग लूं , निशदिन महिमा गाऊँ ।
फिर भी जी भरता नहीं, मन ही मन सकुचाऊँ ॥

विश्व मोहिनी श्री छवि, बसै हृदय महँ आन ।
नयन-कपाट लपेट लूं , करूँ निशदिन ध्यान ॥

चरण-कमल की छाँह मिली, मिटी सकल भव-पीर ।
अब न बिसारो नाथ मोहि, तुम पीरों के पीर ॥

द्वार  तुम्हारा  छोड़  कर, कहीं  न  जाऊँ  नाथ ।
अपराधी  इस ‘दास’ की, आन  आप  के  हाथ ॥

 


मार्च 2026 

॥ दोहा ॥

 

नमन करूँ गुरुदेव को, सत्-चित्-आनन्द रूप ।
परमात्म पूर्ण धनी, करुणा सिन्धु अनूप ॥

 

कोटि-कोटि प्रणाम तुम्हें, सन्तन के सिरताज ।

जिनकी कृपा-कटाक्ष से, सवरें जन के काज ॥

 

सब गुणदाता सतगुरु, चरण-कमल मम टेक ।
भव भयहारी पारब्रह्म, आदि अन्त मध्य एक ॥

 

पर उपकारी सतगुरु, शरणागत प्रतिपाल ।
अखुट भण्डारी प्रेम के, दाता दीन दयाल ॥

 

गुरु चरणन के ध्यान से, गति मति पलटी जात ।
गुरु कृपा कर देत हैं, भक्ति अमोलक दात ॥

कर गुरु सेवा पाइए, उत्तम शान्ति अनूप ।
स्वांस रमें गुरु नाम में, लगे न यम की धूप ॥

गुरु पूर्ण गुरु पारब्रह्म, गुरु अमृत की खान ।
महिमा गुरु की अनन्त है, कहते वेद पुरान ॥

 

महिमा सुन गुरुदेव की, आन पड़ा चरणार ।
‘दासनदास’ को बख़्शिए, कीजिए पर उपकार ॥

 

महिमा सतगुरु नाम की, मुख से कही न जाए ।
बड़भागी वह जीव जो, गुरु पूरे से पाए ॥

 

मैं अनाथ तुम नाथ हो, मैं हूँ दीन तुम देव ।
अपनी कृपा-कटाक्ष से, दीजिए आतम भेव ॥

 

आगे ये अरदास है, दीजिए अपना ध्यान ।
अवगुण चित न धारिए, सद्गुरु पूर्ण भगवान ॥

 

महिमा सुनकर आपकी, आन लगा चरणार ।
‘दासनदास’ को दीजिए, चरण-कमल आधार ॥

 

 

d

 

फरवरी 2026 

॥ दोहा ॥

 

परमहंस गुरुदेव जी, अखिल विश्व आधार ।
श्री चरणन में शीश धर, बारम्बार जुहार ॥

 

निर्गुण से सर्गुण भए, जग तारण के हेत ।
चरण-कमल में वन्दना, श्रद्धा भाव समेत ॥

 

श्री चरणन के ध्यान से, घट में होत उजास ।
मोह भ्रम अज्ञान का, अंधकार हो नास ॥

 

मनमती त्याग गुरुमती गहे, आपा भाव मिटाए ।

गुरु प्रसन्नता प्राप्त कर, जीव परम पद पाए ॥

 

वन्दनीय हैं जगत् के, संतो के सिरमौर ।

श्री परमहंस सद् गुरुदेव सम, नहीं देव कोई और ॥

 

कृपा दया के पुंज हैं, सद् गुरु बख़्शनहार ।

मेटें अवगुण जीव के, करते दूर विकार ॥

मन, वचन और कर्म से, जो कोई शरणी आए ।

आधि-व्याधि सब ही टले, सब दुख-दर्द नसाए ॥

 

गुरु की सेवा-भक्ति में, जो लेवे मन रंग ।

सद् गुरु कृपा से मिटें, मन की सकल तरंग ॥

 

महा पतित हूँ नाथ जी, दोषों से भरपूर ।

अपनी दया से बख़्शिए , अवगुण सभी हुज़ूर ॥

 

सभी आश्रय छोड़ कर, आया तुम्हरे द्वार ।

अपनी दया से कीजिए, पाप ताप सब क्षार ॥

 

विनती ‘दासनदास’ की, सद् गुरु दीनानाथ ।

चरण-शरण में राख कर, कीजै मोहि सनाथ ॥ 



 

जनवरी 2026

॥ दोहा ॥

दाता दानी देवता, नहीं गुरु सम कोय ।

ज्ञाता ज्ञानी चतुर नर, गुरु किरपा से होय ॥

भवसागर अति गहर है, सूझै वार न पार ।

गुरु खेवैय्या जब मिलैं, खोइ लगावैं पार ॥

माया-भ्रम और काल-भय, जीव का कबहुँ न जाए ।

बंधन तौ तबही कटैं, जब गुरु होहिं सहाय ॥

जन्म-जन्म कठिनाइयाँ, भोगे बिपत कलेश ।

गुरु ने पकड़ी बाँहि जब, रहा न भव दुख लेश ॥

किस मुख से अस्तुति करूँ, गुरु समरथ दातार ।

तुम्हरी कृपा अपार से, पाई मति बुद्धि सार ॥

ढूंढ-ढूंढ कर थक गए, मिला न ज्ञान विवेक ।

चरण-कमल की छाँव में, मिल गए सुख अनेक ॥

भ्रमि भ्रमि सब भरमत फिरैं, पढ़ि सुनि बाँचि अनेक ।

परमारथ निधि तब मिली, जब पकड़ी गुरु की टेक ॥

गुरु चरणन पर वारियै, देह गेह और शीश ।

गुरु से निशिदिन माँगियै, प्रेम प्रीति बख़्शीश ॥

प्रेम दान प्रभु दीजियै, पद सरोज की धूर ।

सत्त-नाम हिरदय बसै, बाजै अनहद तूर ॥

गुरु चरणन बलि जाईयै, तजियै मान-गुमान ।

गुरु से क्षण-क्षण माँगियै, भाव-भक्ति का दान ॥

गुरु चरणन में अर्पियै, तन-मन-धन और प्राण ।

यही सार का सार है, यही ज्ञान का ज्ञान ॥

अपने सद्गुरुदेव की, महिमा न जाए कही ।

जिनकी किरपा से पाईयै, प्रेम प्रीति भगती ॥

गुरु-सेवन सुमिरण भजन, ‘दास’ सदा चित्त राख ।

परमारथ गुरु-सेव है, गुरु बिन और न भाख ॥

 



दिसम्बर 2025 

॥ दोहा ॥

दीन जनन के हेतु ही, गुरु प्रगटै संसार ।

नाम-जहाज चढ़ाय करि, जीव करें भव-पार ॥

पार लगावैं सबन को, जो कोई शरण पड़ै ।

शरण पड़ै श्रद्धा सहित, नाम-जहाज चढ़ै ॥

सत्संग की महिमा को, गावें शास्त्र-पुराण ।

सत्संग सद्गुरु संग है, ऐसे करैं बखान ॥

बिन गुरु के सत्संग ना, बिन सत्संग न ज्ञान ।

ज्ञान बिना मोह जाल है, सकल अविद्या जान ॥

और आस सब झूठ है, साँची गुरु की आस ।

इनकी ओट जो लीजिए, होए दूर जम-त्रास ॥

मोह महा-अंधकार है, सब जग ब्यापै आए ।

दीपक गुरु-उपदेश है, सब अंधकार मिटाए ॥

भक्ति पंथ सूझै नहीं, बिन सतगुरु उपदेश ।

गुरु बिन मारग जो चलै, कोटिन लहै कलेश ॥

पूरे सद्गुरुदेव का, जाकै सिर पर हाथ ।

ताहि न भय कछु बात कौ, काल नवावै माथ ॥

सब जग के उपदेष्टा, केवल सद्गुरु देव ।

परम परमारथ रूप है, पूरण-गुरु की सेव ॥

हम नहिं धोखे में पड़ैं, धोखे में सब संसार ।

जाके संग पूरण गुरु, क्यों डूबै मंझधार ॥

मेरे मन में कीजिए, सद्गुरु आनि निवास ।

जा ते उपजै चरण-रति, प्रेम-प्रीति-विश्वास ॥

तुम तो सदा दयाल हो, मैं तुमसे भूला ।

मेरी भूल न देखिए, निज-गुण अनुकूला ॥

तुम्हरे द्वारे आए करि, विनय करै यह ‘दास’ ।

भक्ति अभय-पद निर्मला, दीजै सब गुण-तास ॥ 



॥ दोहा ॥

बन्दौं श्री गुरुदेव जी, नित प्रति बारम्बार ।

मोपर होहु दयाल अब, हे मेरे कर्त्तार ॥ 

सीस धरौं गुरु चरण में, गुरु मूर्ति मन माहिं ।

पल भर कबहुँ चित्त से, सतगुरु बिसरौ नाहिं ॥

सतगुरु अलख अभेव हैं, समरथ पुरुष अपार ।
गुरु के रूप अनूप पर, कोटि रूप बलिहार ॥

सतगुरु के सुमिरण से, कोटि ब्याधि टल जाए ।

रोग सोग ब्यापै नहिं, सिर से टलें बलाएँ ॥

अधिक समय तक भूल करि, गुरु से हम भटके ।

सतगुरु ने किरपा करी, चरनन राखि लिए ॥

गुरु बिन जीव अनाथ है, ठौर नहिं पावै ।

सरब कुशल कल्याण जब, गुरु चरनन आवै ॥

दाता दानी देवता, गुरु समान नहिं कोय ।

नाम दान जो देत हैं, गुरुमुख पावैं सोय ॥

नज़र निहारैं सतगुरु, कोटि क्लेश टरै ।

जम जालिम की जेवड़ी, सहजे टूट परै ॥

गुरु सुमिरण परताप से, संकट सकल विनाश ।

कोटि जनम की पलक में, पूरी भई अभिलाष ॥

गुरु सेवा बिन और नहिं, उत्तम धरम आचार ।

सेवक को सेवा भली, याही में निस्तार ॥

भूल चूक प्रभु देख करि, चित्त से देउ न डार ।

तुम बिन ठौर न और है, सब माया का पसार ॥

जानि के अपना ‘दास’ अब, कीजिए दया दयाल ।

भक्ति दान प्रभु दीजिए, होवै जीव निहाल ॥



॥ दोहा ॥

श्री परमहंस ज्योति प्रकट, करती है जग उज्ज्वल ।
जिनकी वाणी सुनते ही, मिटता हर संशय दल ॥

चरण-शरण में बैठ कर, पाया आनन्द अपार ।
जिनके चरणन का रहे, सदा मन में आधार ॥

गुरु का नाम सुमिरते, मिलता है हर सुख ।
उनकी कृपा-दृष्टि से, मिटते सबहि दुख ॥

गुरु मूरत के ध्यान में, मन पाता विश्राम ।
जिनके सुमिरन से मिले, सच्चा आत्म-ज्ञान ॥

सतगुरु की ममता से, जीवन पा जाए गति ।
जिनके चरणन की धूलि से, मिट जाए मनमति ॥

तन मन धन सब अर्पण कर, जो सेवक बन जाए ।

नाम रतन धन संचरे, आवागमन नसाय ॥

चरण-कमल के आसरे, तोड़ जगत् की रीत ।
मन श्री चरणन में लगा, कर सतगुरु से प्रीत ॥

वर माँगूं हर पल यही , मेरे प्राण आधार ।
अपनी सेवा दीजिए, चरण कमल का प्यार ॥

गुरु चरणन की सरिता में, मन हो गया साफ ।
छत्र-छाया को पाए कर, कर्म हुए सब माफ ॥

सतगुरु की कृपा से, सब संशय हुए दूर ।
पूजा सेवा करते ही, पाया सुख भरपूर ॥

गुरु के ध्यान में बैठ कर, मन को शांति मिली ।
सुमिरन करते-करते ही, जीवन की हर बाधा टली ॥

गुरु के बिना जीवन है, जैसे रात बिना चाँद ।
नाम जपो और सेवा करो, यही एक समाधान ॥


                                                                                                          सितम्बर 2025

॥ दोहा ॥ 
 
गुरु चरण की महिमा अपार, कहाँ तक करूँ बखान ।
सद् गुरु ही हैं जगत् के, सच्चिदानन्द भगवान ॥

जग के सारे दु:ख हरे, गुरु नाम की ओट ।
गुरु बिना संसार में, जीवन है बस चोट ॥

गुरु की शरण में जो आए, उसे मिले विश्राम ।
गुरु की दृष्टि अमृत समान, जीवन बने सुखधाम ॥


गुरु की महिमा गाएँ सब, शास्त्र और पुराण ।
गुरु के बिना संसार में, नहीं कोई सुल्तान ॥

गुरु कृपा से मिल गया, सच्चे नाम का दान ।
श्रद्धा से जो भी जपे, पाए मन विश्राम ॥

गुरु ही हैं सच्चे स्वामी, जो करते सबका उद्धार ।
उनके चरणों में मिले, जीवन का आधार ॥

श्रद्धा और विश्वास से, जो गुरु को अपनाए ।
उसके जीवन में कभी, दु:ख ना पास आए ॥

गुरु की शरण में रहो, हो जाएगा कल्याण ।
सद्गुरु ही देते सदा, सच्चे मार्ग का ज्ञान ॥


गुरु की महिमा अपार है, कोई कर न सके बखान ।
गुरु कृपा से ही मिलें, सच्चिदानंद भगवान ॥


जो भी गुरु सेवा करे, उसे मिले करतार ।
सद्गुरु भक्ति के बिना, जीवन है बेकार ॥


गुरु के चरणों में रहो, यही है सच्चा धर्म ।
गुरु कृपा से ही मिले, हर संकट का मर्म ॥


गुरुमत ही इक सच्चा पथ, जो ले जाए पार ।
गुरु आज्ञा पर ही चलो, यही जीवन का सार ॥

गुरु के बिना जगत् में, जीवन है अंधकार ।
गुरु कृपा से ही मिले, जीवन को उजियार ॥


गुरु चरणों में ही है, सच्चे सुख की खान ।
गुरु भक्ति से हो, सब दु:खों का निदान ॥


गुरु का नाम अनमोल है, शाश्वत सत्य समान ।
जो भी उसका जाप करे, होवे वही महान् ॥


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अगस्त 2025

॥ दोहा ॥

परमहंस  गुरुदेव  जी,  वंदन  बारम्बार ।
सद् गुण सकल मोहि दीजिए, उपजै बुद्धि उदार ॥


झुकते ही गुरु चरण में, मस्तक भाग्य खुलै ।
बहु जन्म के विकार सब, क्षण इक माहिं कटै ॥


चरण-कमल के तेज से, नाशे मोह अन्धकार ।
मन अंतर प्रकाश होए, प्रगटे ज्योति अपार ॥

मन जब लग राता नहीं, गुरु चरणन के माहिं ।
तब लग चित्त विश्राम नहिं, सुख भी सपने नाहिं ।


सतगुरु सुख की ठौर हैं, दुःख सागर से पार ।
गूढ़ भेद सन्तन कहा, समझे समझनहार ॥


सुख सागर गुरुदेव के, रहिए चरणन लाग ।
प्रेम गुरू का ऊपजै, कोई पूर्वले भाग ॥

जग रचना जंजाल है, मन-मति भ्रम का जाल ।
जीव फँसाकर जाल में, नित खा रहे यम काल ॥
यम की करड़ी चोट से, गुरु बचावनहार ।
युग-युग में खुद ही बने, सेवक के रखवार ॥

सेवक का मन नित रहै, चरण-कमल के माहिं ।
चिन्ता निकट न आ सकै, भव-भय व्यापै नाहिं ॥
 

जब लग सद्गुरु के चरण, हृदय नाहिं बसाए ।
भटक-भटक कर जगत् में, जीव सदा दुःख पाए ॥

 

भवसागर अति विषम है, जा में गोता खाए ।
सतगुरु चरण जहाज में, जो जीव चढ़े तर जाए ॥

जन्मों की बिगड़ी जो दशा, गुरु सँवारने आए ।
ताते जग अभिमान तज, गुरु ही को ध्याए ॥
 

मन-मति के अभिमान में, डूबे जीव अनेक ।
सेवक क्षण में तर गए, गुरु चरणन की टेक ॥

ताते सब सन्तन कहा, जग में रहो सचेत ।
मोह भ्रम सब त्याग कर, कीजै गुरु से हेत ॥

आसा मनसा सकल तज, आत्म में कर बास ।
सतगुरु आत्म देव हैं, हम चरणन के ‘दास’ ॥

***
                       

जुलाई 2025

॥ दोहा ॥

 

दीनबंधु करुणासदन, मेरे सतगुरु सुजान ।
श्री परमहंस बन आ गए, भक्तों के भगवान ॥


करबद्ध वंदन करूँ, सतगुरु के चरणार ।
पावन ध्यान हिए में धरूँ, कीजै भव से पार ॥

गुरु कृपा से सब मिले, मन-वांछित वरदान ।
जीवन के हर मार्ग पर, होए सत्य पहचान ॥

गुरु बिना इस जगत में, नहीं सच्चा प्रकाश । 
पावन चरणों में सदा, जीवन का विकास ॥

चरण-रज से दूर हो, मन की सब उलझन ।
जब चरण-रज मस्तक लगे, पावन हो तन-मन ॥

गुरु सुदृष्टि पाए करि, मिटे सभी संताप ।
गुरू बिना संसार में, करि न सके कोई जाप ॥

सत् पथ पर चलते रहो, सत्य की होए पहचान ।
गुरु बिना इस जगत् में, नहीं होगा कल्याण ॥
अमृत सम गुरु के वचन, सुनि कर मिटें विकार ।
मन मंदिर में बस जाएँ, छूटे मोह संसार ॥

शरण गुरु की लेय करि, सहज हुए भव पार ।
जीवन सफल हो गया, दरगाह हुए स्वीकार ॥

जीवन अधूरा गुरु बिना, चाँद बिना ज्यों रात ।
मन में होए गुरु शब्द से, ज्ञान भानु प्रभात ॥

सतगुरु महिमा है अपार, दुखों का करें निदान ।
उनके चरणों में सदा, जीवन का कल्याण ॥

सतगुरु स्मरण करते रहो, मिटें सकल संताप ।
जन्म-मरण भी न रहे, रहे न कुछ परिताप ॥

सतगुरु चरणन में रहूँ, यही मेरी अरदास ।
सेवा करूँ भक्ति करूँ, यही पूँजी हो पास ॥

ऐसा कौन है जगत् में, जो गुरु महिमा करे बखान ।
पारब्रह्म हैं सतगुरु, आदि पुरुष सुजान ॥

गुरु के बिना ज्ञान नहीं, न हो सके उद्धार ।
सत्य-नाम जो उनसे मिला, जीवन का आधार ॥
                     

***


 गुरु वंदना (दोहावली)

जून 2025

॥ दोहा ॥

  

परमहंस सद्गुरु मेरे, करुणामय भगवान ।
सादर पद-वन्दन करूँ, वारूँ तन-मन-प्रान ॥ 

मुद  मंगलमय   सद् गुरु,  वन्दौं  तव  चरणार ।
तन-मन-धन अर्पित करूँ, मो को दीजै तार ॥

अग-जग त्राता आप हैं, सकल भुवन भर्तार ।
गुरु चरणन का ध्यान ही, बस मेरो आधार ॥


विधि-हरि-हर कर बाँधकर, निशदिन करत जुहार ।
इन्द्रादिक सब देवता, ठाढे़ करें गुहार ॥

नील गगन के थाल में, शब्द ही दीपक बाल ।
चन्द्रहिं चँवर बनाए कर, करत आरती थाल ॥

सागर चरण पखारते, रवि शशि जाके नैन ।
व्योम ही जाको शीश है, चारों वेद हैं बैन ॥


अंतरिक्ष मस्तक भाल है, धरणी जाके पाँव ।
हियतल जाका विश्व है, सो मोहि राखे छाँव ॥

जिन के अधरों पर रहे, मादक मृदु मुस्कान ।
सुधा झरत वचनावली, सो सद् गुरु मम जान ॥

चरण-रेणु धरि सीस पै, विनवत साँझ सवेर ।
सद् गुरु-आशिष पाए कर, भवनिधि तरत होए न देर ॥


छ: ऋतु सुषमा भर रही, जाका नाहिं अन्त ।
ग्रीष्म, शरद, वर्षा, शिशिर, यही वसन्त हेमन्त ॥

अमित तेज के पुञ्ज हैं, सो सद् गुरु दातार ।
कोटि भानु नतशिर हुए, निरखत तेज अपार ॥

गुरु चरणन की भक्ति बिनु, कोइ न भक्ति पाए ।
गुरु सेवा ही भक्ति है, वेदन कहा सुनाए ॥ 

रैन दिवस इस जीव को, ग्रसै काल विकराल ।
सोई बचा राखें जिसे, सतगुरु परम कृपाल ॥

अचल भक्ति मोहि दीजिए, निज चरणन का प्यार ।
निशि-वासर रहूँ मगन मैं, विसरै यह संसार ॥

‘दासनदास’ विनवै यही, कृपासिंधु गुरुदेव ।
छत्रछाया निज चरण में, बख़्शो अपनी सेव ॥

 

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