श्री गुरु-वंदना
जुलाई 2026
॥ दोहा ॥
जून 2026
॥ दोहा ॥
प्राणों में उठती रहे, नाम मन्त्र की गुञ्जार ॥
मई 2026
॥ दोहा ॥
तन-मन-धन अर्पित करुँ, मोहि दीजौ दीदार ॥
अप्रैल 2026
॥ दोहा ॥
मार्च 2026
॥ दोहा ॥
कोटि-कोटि प्रणाम तुम्हें, सन्तन के सिरताज ।
जिनकी कृपा-कटाक्ष से, सवरें जन के काज ॥
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फरवरी 2026
॥ दोहा ॥
मनमती त्याग गुरुमती गहे, आपा भाव मिटाए ।
गुरु प्रसन्नता प्राप्त कर, जीव परम पद पाए ॥
वन्दनीय हैं जगत् के, संतो के सिरमौर ।
श्री परमहंस सद् गुरुदेव सम, नहीं देव कोई और ॥
कृपा दया के पुंज हैं, सद् गुरु बख़्शनहार ।
मेटें अवगुण जीव के, करते दूर विकार ॥
मन, वचन और कर्म से, जो कोई शरणी आए ।
आधि-व्याधि सब ही टले, सब दुख-दर्द नसाए ॥
गुरु की सेवा-भक्ति में, जो लेवे मन रंग ।
सद् गुरु कृपा से मिटें, मन की सकल तरंग ॥
महा पतित हूँ नाथ जी, दोषों से भरपूर ।
अपनी दया से बख़्शिए , अवगुण सभी हुज़ूर ॥
सभी आश्रय छोड़ कर, आया तुम्हरे द्वार ।
अपनी दया से कीजिए, पाप ताप सब क्षार ॥
विनती ‘दासनदास’ की, सद् गुरु दीनानाथ ।
चरण-शरण में राख कर, कीजै मोहि सनाथ ॥
जनवरी 2026
दाता दानी देवता, नहीं गुरु सम कोय ।
ज्ञाता ज्ञानी चतुर नर, गुरु किरपा से होय ॥
भवसागर अति गहर है, सूझै वार न पार ।
गुरु खेवैय्या जब मिलैं, खोइ लगावैं पार ॥
माया-भ्रम और काल-भय, जीव का कबहुँ न जाए ।
बंधन तौ तबही कटैं, जब गुरु होहिं सहाय ॥
जन्म-जन्म कठिनाइयाँ, भोगे बिपत कलेश ।
गुरु ने पकड़ी बाँहि जब, रहा न भव दुख लेश ॥
किस मुख से अस्तुति करूँ, गुरु समरथ दातार ।
तुम्हरी कृपा अपार से, पाई मति बुद्धि सार ॥
ढूंढ-ढूंढ कर थक गए, मिला न ज्ञान विवेक ।
चरण-कमल की छाँव में, मिल गए सुख अनेक ॥
भ्रमि भ्रमि सब भरमत फिरैं, पढ़ि सुनि बाँचि अनेक ।
परमारथ निधि तब मिली, जब पकड़ी गुरु की टेक ॥
गुरु चरणन पर वारियै, देह गेह और शीश ।
गुरु से निशिदिन माँगियै, प्रेम प्रीति बख़्शीश ॥
प्रेम दान प्रभु दीजियै, पद सरोज की धूर ।
सत्त-नाम हिरदय बसै, बाजै अनहद तूर ॥
गुरु चरणन बलि जाईयै, तजियै मान-गुमान ।
गुरु से क्षण-क्षण माँगियै, भाव-भक्ति का दान ॥
गुरु चरणन में अर्पियै, तन-मन-धन और प्राण ।
यही सार का सार है, यही ज्ञान का ज्ञान ॥
अपने सद्गुरुदेव की, महिमा न जाए कही ।
जिनकी किरपा से पाईयै, प्रेम प्रीति भगती ॥
गुरु-सेवन सुमिरण भजन, ‘दास’ सदा चित्त राख ।
परमारथ गुरु-सेव है, गुरु बिन और न भाख ॥
दिसम्बर 2025
॥ दोहा ॥
दीन जनन के हेतु ही, गुरु प्रगटै संसार ।
नाम-जहाज चढ़ाय करि, जीव करें भव-पार ॥
पार लगावैं सबन को, जो कोई शरण पड़ै ।
शरण पड़ै श्रद्धा सहित, नाम-जहाज चढ़ै ॥
सत्संग की महिमा को, गावें शास्त्र-पुराण ।
सत्संग सद्गुरु संग है, ऐसे करैं बखान ॥
बिन गुरु के सत्संग ना, बिन सत्संग न ज्ञान ।
ज्ञान बिना मोह जाल है, सकल अविद्या जान ॥
और आस सब झूठ है, साँची गुरु की आस ।
इनकी ओट जो लीजिए, होए दूर जम-त्रास ॥
मोह महा-अंधकार है, सब जग ब्यापै आए ।
दीपक गुरु-उपदेश है, सब अंधकार मिटाए ॥
भक्ति पंथ सूझै नहीं, बिन सतगुरु उपदेश ।
गुरु बिन मारग जो चलै, कोटिन लहै कलेश ॥
पूरे सद्गुरुदेव का, जाकै सिर पर हाथ ।
ताहि न भय कछु बात कौ, काल नवावै माथ ॥
सब जग के उपदेष्टा, केवल सद्गुरु देव ।
परम परमारथ रूप है, पूरण-गुरु की सेव ॥
हम नहिं धोखे में पड़ैं, धोखे में सब संसार ।
जाके संग पूरण गुरु, क्यों डूबै मंझधार ॥
मेरे मन में कीजिए, सद्गुरु आनि निवास ।
जा ते उपजै चरण-रति, प्रेम-प्रीति-विश्वास ॥
तुम तो सदा दयाल हो, मैं तुमसे भूला ।
मेरी भूल न देखिए, निज-गुण अनुकूला ॥
तुम्हरे द्वारे आए करि, विनय करै यह ‘दास’ ।
भक्ति अभय-पद निर्मला, दीजै सब गुण-तास ॥
॥ दोहा ॥
बन्दौं श्री गुरुदेव जी, नित प्रति बारम्बार ।
मोपर होहु दयाल अब, हे मेरे कर्त्तार ॥
सीस धरौं गुरु चरण में, गुरु मूर्ति मन माहिं ।
पल भर कबहुँ चित्त से, सतगुरु बिसरौ नाहिं ॥
सतगुरु के सुमिरण से, कोटि ब्याधि टल जाए ।
रोग सोग ब्यापै नहिं, सिर से टलें बलाएँ ॥
अधिक समय तक भूल करि, गुरु से हम भटके ।
सतगुरु ने किरपा करी, चरनन राखि लिए ॥
गुरु बिन जीव अनाथ है, ठौर नहिं पावै ।
सरब कुशल कल्याण जब, गुरु चरनन आवै ॥
दाता दानी देवता, गुरु समान नहिं कोय ।
नाम दान जो देत हैं, गुरुमुख पावैं सोय ॥
नज़र निहारैं सतगुरु, कोटि क्लेश टरै ।
जम जालिम की जेवड़ी, सहजे टूट परै ॥
गुरु सुमिरण परताप से, संकट सकल विनाश ।
कोटि जनम की पलक में, पूरी भई अभिलाष ॥
गुरु सेवा बिन और नहिं, उत्तम धरम आचार ।
सेवक को सेवा भली, याही में निस्तार ॥
भूल चूक प्रभु देख करि, चित्त से देउ न डार ।
तुम बिन ठौर न और है, सब माया का पसार ॥
जानि के अपना ‘दास’ अब, कीजिए दया दयाल ।
भक्ति दान प्रभु दीजिए, होवै जीव निहाल ॥
॥ दोहा ॥
नाम रतन धन संचरे, आवागमन नसाय ॥
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अगस्त 2025
॥ दोहा ॥
जुलाई 2025
॥ दोहा ॥
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गुरु वंदना (दोहावली)
जून 2025
॥ दोहा ॥

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