श्री गुरु-वंदना
॥ दोहा ॥
दाता दानी देवता, नहीं गुरु सम कोय ।
ज्ञाता ज्ञानी चतुर नर, गुरु किरपा से होय ॥
भवसागर अति गहर है, सूझै वार न पार ।
गुरु खेवैय्या जब मिलैं, खोइ लगावैं पार ॥
माया-भ्रम और काल-भय, जीव का कबहुँ न जाए ।
बंधन तौ तबही कटैं, जब गुरु होहिं सहाय ॥
जन्म-जन्म कठिनाइयाँ, भोगे बिपत कलेश ।
गुरु ने पकड़ी बाँहि जब, रहा न भव दुख लेश ॥
किस मुख से अस्तुति करूँ, गुरु समरथ दातार ।
तुम्हरी कृपा अपार से, पाई मति बुद्धि सार ॥
ढूंढ-ढूंढ कर थक गए, मिला न ज्ञान विवेक ।
चरण-कमल की छाँव में, मिल गए सुख अनेक ॥
भ्रमि भ्रमि सब भरमत फिरैं, पढ़ि सुनि बाँचि अनेक ।
परमारथ निधि तब मिली, जब पकड़ी गुरु की टेक ॥
गुरु चरणन पर वारियै, देह गेह और शीश ।
गुरु से निशिदिन माँगियै, प्रेम प्रीति बख़्शीश ॥
प्रेम दान प्रभु दीजियै, पद सरोज की धूर ।
सत्त-नाम हिरदय बसै, बाजै अनहद तूर ॥
गुरु चरणन बलि जाईयै, तजियै मान-गुमान ।
गुरु से क्षण-क्षण माँगियै, भाव-भक्ति का दान ॥
गुरु चरणन में अर्पियै, तन-मन-धन और प्राण ।
यही सार का सार है, यही ज्ञान का ज्ञान ॥
अपने सद्गुरुदेव की, महिमा न जाए कही ।
जिनकी किरपा से पाईयै, प्रेम प्रीति भगती ॥
गुरु-सेवन सुमिरण भजन, ‘दास’ सदा चित्त राख ।
परमारथ गुरु-सेव है, गुरु बिन और न भाख ॥
॥ दोहा ॥
दीन जनन के हेतु ही, गुरु प्रगटै संसार ।
नाम-जहाज चढ़ाय करि, जीव करें भव-पार ॥
पार लगावैं सबन को, जो कोई शरण पड़ै ।
शरण पड़ै श्रद्धा सहित, नाम-जहाज चढ़ै ॥
सत्संग की महिमा को, गावें शास्त्र-पुराण ।
सत्संग सद्गुरु संग है, ऐसे करैं बखान ॥
बिन गुरु के सत्संग ना, बिन सत्संग न ज्ञान ।
ज्ञान बिना मोह जाल है, सकल अविद्या जान ॥
और आस सब झूठ है, साँची गुरु की आस ।
इनकी ओट जो लीजिए, होए दूर जम-त्रास ॥
मोह महा-अंधकार है, सब जग ब्यापै आए ।
दीपक गुरु-उपदेश है, सब अंधकार मिटाए ॥
भक्ति पंथ सूझै नहीं, बिन सतगुरु उपदेश ।
गुरु बिन मारग जो चलै, कोटिन लहै कलेश ॥
पूरे सद्गुरुदेव का, जाकै सिर पर हाथ ।
ताहि न भय कछु बात कौ, काल नवावै माथ ॥
सब जग के उपदेष्टा, केवल सद्गुरु देव ।
परम परमारथ रूप है, पूरण-गुरु की सेव ॥
हम नहिं धोखे में पड़ैं, धोखे में सब संसार ।
जाके संग पूरण गुरु, क्यों डूबै मंझधार ॥
मेरे मन में कीजिए, सद्गुरु आनि निवास ।
जा ते उपजै चरण-रति, प्रेम-प्रीति-विश्वास ॥
तुम तो सदा दयाल हो, मैं तुमसे भूला ।
मेरी भूल न देखिए, निज-गुण अनुकूला ॥
तुम्हरे द्वारे आए करि, विनय करै यह ‘दास’ ।
भक्ति अभय-पद निर्मला, दीजै सब गुण-तास ॥
॥ दोहा ॥
बन्दौं श्री गुरुदेव जी, नित प्रति बारम्बार ।
मोपर होहु दयाल अब, हे मेरे कर्त्तार ॥
सीस धरौं गुरु चरण में, गुरु मूर्ति मन माहिं ।
पल भर कबहुँ चित्त से, सतगुरु बिसरौ नाहिं ॥
सतगुरु अलख अभेव हैं, समरथ पुरुष अपार ।
गुरु के रूप अनूप पर, कोटि रूप बलिहार ॥
सतगुरु के सुमिरण से, कोटि ब्याधि टल जाए ।
रोग सोग ब्यापै नहिं, सिर से टलें बलाएँ ॥
अधिक समय तक भूल करि, गुरु से हम भटके ।
सतगुरु ने किरपा करी, चरनन राखि लिए ॥
गुरु बिन जीव अनाथ है, ठौर नहिं पावै ।
सरब कुशल कल्याण जब, गुरु चरनन आवै ॥
दाता दानी देवता, गुरु समान नहिं कोय ।
नाम दान जो देत हैं, गुरुमुख पावैं सोय ॥
नज़र निहारैं सतगुरु, कोटि क्लेश टरै ।
जम जालिम की जेवड़ी, सहजे टूट परै ॥
गुरु सुमिरण परताप से, संकट सकल विनाश ।
कोटि जनम की पलक में, पूरी भई अभिलाष ॥
गुरु सेवा बिन और नहिं, उत्तम धरम आचार ।
सेवक को सेवा भली, याही में निस्तार ॥
भूल चूक प्रभु देख करि, चित्त से देउ न डार ।
तुम बिन ठौर न और है, सब माया का पसार ॥
जानि के अपना ‘दास’ अब, कीजिए दया दयाल ।
भक्ति दान प्रभु दीजिए, होवै जीव निहाल ॥
॥ दोहा ॥
श्री परमहंस ज्योति प्रकट, करती है जग उज्ज्वल ।
जिनकी वाणी सुनते ही, मिटता हर संशय दल ॥
चरण-शरण में बैठ कर, पाया आनन्द अपार ।
जिनके चरणन का रहे, सदा मन में आधार ॥
गुरु का नाम सुमिरते, मिलता है हर सुख ।
उनकी कृपा-दृष्टि से, मिटते सबहि दुख ॥
गुरु मूरत के ध्यान में, मन पाता विश्राम ।
जिनके सुमिरन से मिले, सच्चा आत्म-ज्ञान ॥
सतगुरु की ममता से, जीवन पा जाए गति ।
जिनके चरणन की धूलि से, मिट जाए मनमति ॥
तन मन धन सब अर्पण कर, जो सेवक बन जाए ।
नाम रतन धन संचरे, आवागमन नसाय ॥
चरण-कमल के आसरे, तोड़ जगत् की रीत ।
मन श्री चरणन में लगा, कर सतगुरु से प्रीत ॥
वर माँगूं हर पल यही , मेरे प्राण आधार ।
अपनी सेवा दीजिए, चरण कमल का प्यार ॥
गुरु चरणन की सरिता में, मन हो गया साफ ।
छत्र-छाया को पाए कर, कर्म हुए सब माफ ॥
सतगुरु की कृपा से, सब संशय हुए दूर ।
पूजा सेवा करते ही, पाया सुख भरपूर ॥
गुरु के ध्यान में बैठ कर, मन को शांति मिली ।
सुमिरन करते-करते ही, जीवन की हर बाधा टली ॥
गुरु के बिना जीवन है, जैसे रात बिना चाँद ।
नाम जपो और सेवा करो, यही एक समाधान ॥
सितम्बर 2025
॥ दोहा ॥
गुरु चरण की महिमा अपार, कहाँ तक करूँ बखान ।
सद् गुरु ही हैं जगत् के, सच्चिदानन्द भगवान ॥
जग के सारे दु:ख हरे, गुरु नाम की ओट ।
गुरु बिना संसार में, जीवन है बस चोट ॥
गुरु की शरण में जो आए, उसे मिले विश्राम ।
गुरु की दृष्टि अमृत समान, जीवन बने सुखधाम ॥
गुरु की महिमा गाएँ सब, शास्त्र और पुराण ।
गुरु के बिना संसार में, नहीं कोई सुल्तान ॥
गुरु कृपा से मिल गया, सच्चे नाम का दान ।
श्रद्धा से जो भी जपे, पाए मन विश्राम ॥
गुरु ही हैं सच्चे स्वामी, जो करते सबका उद्धार ।
उनके चरणों में मिले, जीवन का आधार ॥
श्रद्धा और विश्वास से, जो गुरु को अपनाए ।
उसके जीवन में कभी, दु:ख ना पास आए ॥
गुरु की शरण में रहो, हो जाएगा कल्याण ।
सद्गुरु ही देते सदा, सच्चे मार्ग का ज्ञान ॥
गुरु की महिमा अपार है, कोई कर न सके बखान ।
गुरु कृपा से ही मिलें, सच्चिदानंद भगवान ॥
जो भी गुरु सेवा करे, उसे मिले करतार ।
सद्गुरु भक्ति के बिना, जीवन है बेकार ॥
गुरु के चरणों में रहो, यही है सच्चा धर्म ।
गुरु कृपा से ही मिले, हर संकट का मर्म ॥
गुरुमत ही इक सच्चा पथ, जो ले जाए पार ।
गुरु आज्ञा पर ही चलो, यही जीवन का सार ॥
गुरु के बिना जगत् में, जीवन है अंधकार ।
गुरु कृपा से ही मिले, जीवन को उजियार ॥
गुरु चरणों में ही है, सच्चे सुख की खान ।
गुरु भक्ति से हो, सब दु:खों का निदान ॥
गुरु का नाम अनमोल है, शाश्वत सत्य समान ।
जो भी उसका जाप करे, होवे वही महान् ॥
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अगस्त 2025
॥ दोहा ॥
परमहंस गुरुदेव जी, वंदन बारम्बार ।
सद् गुण सकल मोहि दीजिए, उपजै बुद्धि उदार ॥
झुकते ही गुरु चरण में, मस्तक भाग्य खुलै ।
बहु जन्म के विकार सब, क्षण इक माहिं कटै ॥
चरण-कमल के तेज से, नाशे मोह अन्धकार ।
मन अंतर प्रकाश होए, प्रगटे ज्योति अपार ॥
मन जब लग राता नहीं, गुरु चरणन के माहिं ।
तब लग चित्त विश्राम नहिं, सुख भी सपने नाहिं ।
सतगुरु सुख की ठौर हैं, दुःख सागर से पार ।
गूढ़ भेद सन्तन कहा, समझे समझनहार ॥
सुख सागर गुरुदेव के, रहिए चरणन लाग ।
प्रेम गुरू का ऊपजै, कोई पूर्वले भाग ॥
जग रचना जंजाल है, मन-मति भ्रम का जाल ।
जीव फँसाकर जाल में, नित खा रहे यम काल ॥
यम की करड़ी चोट से, गुरु बचावनहार ।
युग-युग में खुद ही बने, सेवक के रखवार ॥
सेवक का मन नित रहै, चरण-कमल के माहिं ।
चिन्ता निकट न आ सकै, भव-भय व्यापै नाहिं ॥
जब लग सद्गुरु के चरण, हृदय नाहिं बसाए ।
भटक-भटक कर जगत् में, जीव सदा दुःख पाए ॥
भवसागर अति विषम है, जा में गोता खाए ।
सतगुरु चरण जहाज में, जो जीव चढ़े तर जाए ॥
जन्मों की बिगड़ी जो दशा, गुरु सँवारने आए ।
ताते जग अभिमान तज, गुरु ही को ध्याए ॥
मन-मति के अभिमान में, डूबे जीव अनेक ।
सेवक क्षण में तर गए, गुरु चरणन की टेक ॥
ताते सब सन्तन कहा, जग में रहो सचेत ।
मोह भ्रम सब त्याग कर, कीजै गुरु से हेत ॥
आसा मनसा सकल तज, आत्म में कर बास ।
सतगुरु आत्म देव हैं, हम चरणन के ‘दास’ ॥
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जुलाई 2025
॥ दोहा ॥
दीनबंधु करुणासदन, मेरे सतगुरु सुजान ।
श्री परमहंस बन आ गए, भक्तों के भगवान ॥
करबद्ध वंदन करूँ, सतगुरु के चरणार ।
पावन ध्यान हिए में धरूँ, कीजै भव से पार ॥
गुरु कृपा से सब मिले, मन-वांछित वरदान ।
जीवन के हर मार्ग पर, होए सत्य पहचान ॥
गुरु बिना इस जगत में, नहीं सच्चा प्रकाश ।
पावन चरणों में सदा, जीवन का विकास ॥
चरण-रज से दूर हो, मन की सब उलझन ।
जब चरण-रज मस्तक लगे, पावन हो तन-मन ॥
गुरु सुदृष्टि पाए करि, मिटे सभी संताप ।
गुरू बिना संसार में, करि न सके कोई जाप ॥
सत् पथ पर चलते रहो, सत्य की होए पहचान ।
गुरु बिना इस जगत् में, नहीं होगा कल्याण ॥
अमृत सम गुरु के वचन, सुनि कर मिटें विकार ।
मन मंदिर में बस जाएँ, छूटे मोह संसार ॥
शरण गुरु की लेय करि, सहज हुए भव पार ।
जीवन सफल हो गया, दरगाह हुए स्वीकार ॥
जीवन अधूरा गुरु बिना, चाँद बिना ज्यों रात ।
मन में होए गुरु शब्द से, ज्ञान भानु प्रभात ॥
सतगुरु महिमा है अपार, दुखों का करें निदान ।
उनके चरणों में सदा, जीवन का कल्याण ॥
सतगुरु स्मरण करते रहो, मिटें सकल संताप ।
जन्म-मरण भी न रहे, रहे न कुछ परिताप ॥
सतगुरु चरणन में रहूँ, यही मेरी अरदास ।
सेवा करूँ भक्ति करूँ, यही पूँजी हो पास ॥
ऐसा कौन है जगत् में, जो गुरु महिमा करे बखान ।
पारब्रह्म हैं सतगुरु, आदि पुरुष सुजान ॥
गुरु के बिना ज्ञान नहीं, न हो सके उद्धार ।
सत्य-नाम जो उनसे मिला, जीवन का आधार ॥
***
गुरु वंदना (दोहावली)
जून 2025
॥ दोहा ॥
परमहंस सद्गुरु मेरे, करुणामय भगवान ।
सादर पद-वन्दन करूँ, वारूँ तन-मन-प्रान ॥
मुद मंगलमय सद् गुरु, वन्दौं तव चरणार ।
तन-मन-धन अर्पित करूँ, मो को दीजै तार ॥
अग-जग त्राता आप हैं, सकल भुवन भर्तार ।
गुरु चरणन का ध्यान ही, बस मेरो आधार ॥
विधि-हरि-हर कर बाँधकर, निशदिन करत जुहार ।
इन्द्रादिक सब देवता, ठाढे़ करें गुहार ॥
नील गगन के थाल में, शब्द ही दीपक बाल ।
चन्द्रहिं चँवर बनाए कर, करत आरती थाल ॥
सागर चरण पखारते, रवि शशि जाके नैन ।
व्योम ही जाको शीश है, चारों वेद हैं बैन ॥
अंतरिक्ष मस्तक भाल है, धरणी जाके पाँव ।
हियतल जाका विश्व है, सो मोहि राखे छाँव ॥
जिन के अधरों पर रहे, मादक मृदु मुस्कान ।
सुधा झरत वचनावली, सो सद् गुरु मम जान ॥
चरण-रेणु धरि सीस पै, विनवत साँझ सवेर ।
सद् गुरु-आशिष पाए कर, भवनिधि तरत होए न देर ॥
छ: ऋतु सुषमा भर रही, जाका नाहिं अन्त ।
ग्रीष्म, शरद, वर्षा, शिशिर, यही वसन्त हेमन्त ॥
अमित तेज के पुञ्ज हैं, सो सद् गुरु दातार ।
कोटि भानु नतशिर हुए, निरखत तेज अपार ॥
गुरु चरणन की भक्ति बिनु, कोइ न भक्ति पाए ।
गुरु सेवा ही भक्ति है, वेदन कहा सुनाए ॥
रैन दिवस इस जीव को, ग्रसै काल विकराल ।
सोई बचा राखें जिसे, सतगुरु परम कृपाल ॥
अचल भक्ति मोहि दीजिए, निज चरणन का प्यार ।
निशि-वासर रहूँ मगन मैं, विसरै यह संसार ॥
‘दासनदास’ विनवै यही, कृपासिंधु गुरुदेव ।
छत्रछाया निज चरण में, बख़्शो अपनी सेव ॥
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