गुरु वंदना (दोहावली)


श्री गुरु-वंदना


 

जनवरी 2025 

॥ दोहा 

दाता दानी देवता, नहीं गुरु सम कोय

ज्ञाता ज्ञानी चतुर नर, गुरु किरपा से होय

भवसागर अति गहर है, सूझै वार न पार ।

गुरु खेवैय्या जब मिलैं, खोइ लगावैं पार

माया-भ्रम और काल-भय, जीव का कबहुँ न जाए

बंधन तौ तबही कटैं, जब गुरु होहिं सहाय

जन्म-जन्म कठिनाइयाँ, भोगे बिपत कलेश

गुरु ने पकड़ी बाँहि जब, रहा न भव दुख लेश

किस मुख से अस्तुति करूँ, गुरु समरथ दातार ।

तुम्हरी कृपा अपार से, पाई मति बुद्धि सार

ढूंढ-ढूंढ कर थक गए, मिला न ज्ञान विवेक ।

चरण-कमल की छाँव में, मिल गए सुख अनेक

भ्रमि भ्रमि सब भरमत फिरैं, पढ़ि सुनि बाँचि अनेक

परमारथ निधि तब मिली, जब पकड़ी गुरु की टेक

गुरु चरणन पर वारियै, देह गेह और शीश ।

गुरु से निशिदिन माँगियै, प्रेम प्रीति बख़्शीश

प्रेम दान प्रभु दीजियै, पद सरोज की धूर ।

सत्त-नाम हिरदय बसै, बाजै अनहद तूर

गुरु चरणन बलि जाईयै, तजियै मान-गुमान ।

गुरु से क्षण-क्षण माँगियै, भाव-भक्ति का दान

गुरु चरणन में अर्पियै, तन-मन-धन और प्राण ।

यही सार का सार है, यही ज्ञान का ज्ञान

अपने सद्गुरुदेव की, महिमा न जाए कही

जिनकी किरपा से पाईयै, प्रेम प्रीति भगती

गुरु-सेवन सुमिरण भजन, दास’ सदा चित्त राख ।

परमारथ गुरु-सेव है, गुरु बिन और न भाख

 



दिसम्बर 2025 

॥ दोहा

दीन जनन के हेतु ही, गुरु प्रगटै संसार ।

नाम-जहाज चढ़ाय करि, जीव करें भव-पार

पार लगावैं सबन को, जो कोई शरण पड़ै ।

शरण पड़ै श्रद्धा सहित, नाम-जहाज चढ़ै

सत्संग की महिमा को, गावें शास्त्र-पुराण ।

सत्संग सद्गुरु संग है, ऐसे करैं बखान

बिन गुरु के सत्संग ना, बिन सत्संग न ज्ञान ।

ज्ञान बिना मोह जाल है, सकल अविद्या जान

और आस सब झूठ है, साँची गुरु की आस ।

नकी ओट जो लीजिए, होए दूर जम-त्रास

मोह महा-अंधकार है, सब जग ब्यापै आए ।

दीपक गुरु-उपदेश है, सब अंधकार मिटाए

भक्ति पंथ सूझै नहीं, बिन सतगुरु पदेश ।

गुरु बिन मारग जो चलै, कोटिन लहै कलेश

पूरे सद्गुरुदेव का, जाकै सिर पर हाथ

ताहि न भय कछु बात कौ, काल नवावै माथ

सब जग के उपदेष्टा, केवल सद्गुरु देव ।

परम परमारथ रूप है, पूरण-गुरु की सेव

हम नहिं धोखे में पड़ैं, धोखे में सब संसार ।

जाके संग पूरण गुरु, क्यों डूबै मंझधार

मेरे मन में कीजिए, सद्गुरु आनि निवास ।

जा ते उपजै चरण-रति, प्रेम-प्रीति-विश्वास

तुम तो सदा दयाल हो, मैं तुमसे भूला ।

मेरी भूल न देखिए, निज-गुण अनुकूला

तुम्हरे द्वारे आ करि, विनय करै यह दास’

भक्ति अभय-पद निर्मला, दीजै सब गुण-तास  



दोहा

बन्दौं श्री गुरुदेव जी, नित प्रति बारम्बार

मोपर होहु दयाल अब, हे मेरे कर्त्तार  

सीस धरौं गुरु चरण में, गुरु मूर्ति मन माहिं ।

पल भर कबहुँ चित्त से, सतगुरु बिसरौ नाहिं ॥

सतगुरु अलख अभेव हैं, समरथ पुरुष अपार ।
गुरु के रूप अनूप पर, कोटि रूप बलिहार

सतगुरु के सुमिरण से, कोटि ब्याधि टल जाए ।

रोग सोग ब्यापै नहिं, सिर से टलें बलाएँ

अधिक समय तक भूल करि, गुरु से हम भटके ।

सतगुरु ने किरपा करी, चरनन राखि लिए

गुरु बिन जीव अनाथ है, ठौर नहिं पावै ।

सरब कुशल कल्याण जब, गुरु चरनन आवै ॥

दाता दानी देवता, गुरु समान नहिं कोय ।

नाम दान जो देत हैं, गुरुमुख पावैं सोय

नज़र निहारैं सतगुरु, कोटि क्लेश टरै

जम जालिम की जेवड़ी, सहजे टूट परै

गुरु सुमिरण परताप से, संकट सकल विनाश ।

कोटि जनम की पलक में, पूरी भई अभिलाष ॥

गुरु सेवा बिन और नहिं, उत्तम धरम आचार ।

सेवक को सेवा भली, याही में निस्तार

भूल चूक प्रभु देख करि, चित्त से देउ न डार ।

तुम बिन ठौर न और है, सब माया का पसार

जानि के अपना दास’ अब, कीजिए दया दयाल

भक्ति दान प्रभु दीजिए, होवै जीव निहाल



दोहा

श्री परमहंस ज्योति प्रकट, करती है जग उज्ज्वल ।
जिनकी वाणी सुनते ही, मिटता हर संशय दल

चरण-शरण में बैठ कर, पाया आनन्द अपार ।
जिनके चरणन का रहे, सदा मन में आधार

गुरु का नाम सुमिरते, मिलता है हर सुख ।
उनकी कृपा-दृष्टि से, मिटते सबहि दुख

गुरु मूरत के ध्यान में, मन पाता विश्राम ।
जिनके सुमिरन से मिले, सच्चा आत्म-ज्ञान

सतगुरु की ममता से, जीवन पा जाए गति
जिनके चरणन की धूलि से, मिट जाए मनमति

तन मन धन सब अर्पण कर, जो सेवक बन जाए ।

नाम रतन धन संचरे, आवागमन नसाय

चरण-कमल के आसरे, तोड़ जगत् की रीत ।
मन श्री चरणन में लगा, कर सतगुरु से प्रीत

वर माँगूं हर पल यही , मेरे प्राण आधार
अपनी सेवा दीजिए, चरण कमल का प्यार

गुरु चरणन की सरिता में, मन हो गया साफ ।
छत्र-छाया को पाए कर, कर्म हुए सब माफ

सतगुरु की कृपा से, सब संशय हुए दूर ।
पूजा सेवा करते ही, पाया सुख भरपूर

गुरु के ध्यान में बैठ कर, मन को शांति मिली ।
सुमिरन करते-करते ही, जीवन की हर बाधा टली

गुरु के बिना जीवन है, जैसे रात बिना चाँद ।
नाम जपो और सेवा करो, यही एक समाधान


                                                                                                          सितम्बर 2025

दोहा  
 
गुरु चरण की महिमा अपार, कहाँ तक करूँ बखान
सद् गुरु ही हैं जगत् के, सच्चिदानन्द भगवान

जग के सारे दु:ख हरे, गुरु नाम की ओट ।
गुरु बिना संसार में, जीवन है बस चोट

गुरु की शरण में जो आए, उसे मिले विश्राम ।
गुरु की दृष्टि अमृत समान, जीवन बने सुखधाम ॥


गुरु की महिमा गाएँ सब, शास्त्र और पुराण ।
गुरु के बिना संसार में, नहीं कोई सुल्तान

गुरु कृपा से मिल गया, सच्चे नाम का दान ।
श्रद्धा से जो भी जपे, पाए मन विश्राम

गुरु ही हैं सच्चे स्वामी, जो करते सबका उद्धार ।
उनके चरणों में मिले, जीवन का आधार

श्रद्धा और विश्वास से, जो गुरु को अपनाए ।
उसके जीवन में कभी, दु:ख ना पास आए

गुरु की शरण में रहो, हो जाएगा कल्याण ।
द्गुरु ही देते सदा, सच्चे मार्ग का ज्ञान


गुरु की महिमा अपार है, कोई कर न सके बखान
गुरु कृपा से ही मिलें, सच्चिदानंद भगवान


जो भी गुरु सेवा करे, उसे मिले करतार
द्गुरु भक्ति के बिना, जीवन है बेकार


गुरु के चरणों में रहो, यही है सच्चा धर्म ।
गुरु कृपा से ही मिले, हर संकट का मर्म


गुरुमत ही इक सच्चा पथ, जो ले जाए पार ।
गुरु आज्ञा पर ही चलो, यही जीवन का सार ॥

गुरु के बिना जगत् में, जीवन है अंधकार ।
गुरु कृपा से ही मिले, जीवन को उजियार


गुरु चरणों में ही है, सच्चे सुख की खान ।
गुरु भक्ति से हो, सब दु:खों का निदान


गुरु का नाम अनमोल है, शाश्वत सत्य समान ।
जो भी उसका जाप करे, होवे वही महान्


;

 

अगस्त 2025

॥ दोहा ॥

परमहंस  गुरुदेव  जी,  वंदन  बारम्बार 
सद् गुण सकल मोहि दीजिए, उपजै बुद्धि उदार ॥


झुकते ही गुरु चरण में, मस्तक भाग्य खुलै ।
बहु जन्म के विकार सब, क्षण इक माहिं कटै ॥


चरण-कमल के तेज से, नाशे मोह अन्धकार ।
मन अंतर प्रकाश होए, प्रगटे ज्योति अपार

मन जब लग राता नहीं, गुरु चरणन के माहिं ।
तब लग चित्त विश्राम नहिं, सुख भी सपने नाहिं ।


सतगुरु सुख की ठौर हैं, दुःख सागर से पार ।
गूढ़ भेद सन्तन कहा, समझे समझनहार


सुख सागर गुरुदेव के, रहिए चरणन लाग ।
प्रेम गुरू का ऊपज, कोई पूर्ले भाग

जग रचना जंजाल है, मन-मति भ्रम का जाल ।
जीव फँसाकर जाल में, नित खा रहे यम काल ॥
यम की करड़ी चोट से, गुरु बचावनहार
युग-युग में खुद ही बने, सेवक के रखवार

सेवक का मन नित रहै, चरण-कमल के माहिं ।
चिन्ता निकट न आ सकै, भव-भय व्यापै नाहिं ॥
 

जब लग सद्गुरु के चरण, हृदय नाहिं बसाए ।
भटक-भटक कर जगत् में, जीव सदा दुःख पाए ॥

 

भवसागर ति विषम है, जा में गोता खाए ।
सतगुरु चरण जहाज में, जो जीव चढ़े तर जाए ॥

जन्मों की बिगड़ी जो दशा, गुरु सँवारने आए ।
ताते जग अभिमान तज, गुरु ही को ध्याए ॥
 

मन-मति के अभिमान में, डूबे जीव अनेक
सेवक क्षण में तर गए, गुरु चरणन की टेक ॥

ताते सब सन्तन कहा, जग में रहो सचेत
मोह भ्रम सब त्याग कर, कीजै गुरु से हेत ॥

आसा मनसा सकल तज, आत्म में कर बास ।
सतगुरु आत्म देव हैं, हम चरणन के दास’

***
                       

जुलाई 2025

दोहा

 

दीनबंधु करुणासदन, मेरे सतगुरु सुजान
श्री परमहंस बन आ गए, भक्तों के भगवान ॥


करबद्ध वंदन करूँ, सतगुरु के चरणार
पावन ध्यान हिए में धरूँ, कीजै भव से पार ॥

गुरु कृपा से सब मिले, मन-वांछित वरदान ।
जीवन के हर मार्ग पर, होए सत्य पहचान

गुरु बिना इस जगत में, नहीं सच्चा प्रकाश । 
पावन चरणों में सदा, जीवन का विकास

चरण-रज से दूर हो, मन की सब उलझन ।
जब चरण-रज मस्तक लगे, पावन हो तन-मन

गुरु सुदृष्टि पाए करि, मिटे सभी संताप
गुरू बिना संसार में, करि न सके कोई जाप ॥

सत् पथ पर चलते रहो, सत्य की होए पहचान ।
गुरु बिना इस जगत् में, नहीं होगा कल्याण
अमृत सम गुरु के वचन, सुनि कर मिटें विकार ।
मन मंदिर में बस जाएँ, छूटे मोह संसार

शरण गुरु की लेय करि, सहज हुए भव पार ।
जीवन सफल हो गया, दरगाह हुए स्वीकार

जीवन अधूरा गुरु बिना, चाँद बिना ज्यों रात ।
मन में होए गुरु शब्द से, ज्ञान भानु प्रभात

सतगुरु महिमा है अपार, दुखों का करें निदान ।
उनके चरणों में सदा, जीवन का कल्याण

सतगुरु स्मरण करते रहो, मिटें सकल संताप ।
जन्म-मरण भी न रहे, रहे न कुछ परिताप

सतगुरु चरणन में रहूँ, यही मेरी अरदास ।
सेवा करूँ भक्ति करूँ, यही पूँजी हो पास ॥

ऐसा कौन है जगत् में, जो गुरु महिमा करे बखान ।
पारब्रह्म हैं सतगुरु, आदि पुरुष सुजान

गुरु के बिना ज्ञान नहीं, न हो सके उद्धार ।
सत्य-नाम जो उनसे मिला, जीवन का आधार ॥
                     

***


 गुरु वंदना (दोहावली)

जून 2025

॥ दोहा 

  

रमहंस द्गुरु मेरे, करुणामय भगवान
सादर पद-वन्दन करूँ, वारू तन-मन-प्रान  

मुद  मंगलमय   सद् गुरु,  वन्दौं  तव  चरणार
तन-मन-धन अर्पित करूँ, मो को दीजै तार

अग-जग त्राता आप हैं, सकल भुवन भर्तार ।
गुरु चरणन का ध्यान ही, बस मेरो आधार


विधि-हरि-हर कर बाँधकर, निशदिन करत जुहार
इन्द्रादिक सब देवता, ठाढे करें गुहार

नील गगन के थाल में, शब्द ही दीपक बाल ।
चन्द्रहिं चँवर बना कर, करत आरती था

सागर चरण पखारते, रवि शशि जाके नैन ।
व्योम ही जाको शीश है, चारों वेद हैं बैन


अंतरिक्ष मस्तक भाल है, धरणी जाके पाँव ।
हियतल जाका विश्व है, सो मोहि राखे छाँव

जिन के अधरों पर रहे, मादक मृदु मुस्कान ।
सुधा झरत वचनावली, सो सद् गुरु मम जान

चरण-रेणु धरि सीस पै, विनवत साँझ सवेर
सद् गुरु-आशिष पा कर, भवनिधि तरत होए देर


छ: ऋतु सुषमा भर रही, जाका नाहिं अन्त ।
ग्रीष्म, शरद, वर्षा, शिशिर, यही सन्त हेमन्त

अमित तेज के पुञ्ज हैं, सो सद् गुरु दातार ।
कोटि भानु नतशिर हुए, निरखत तेज अपार

गुरु चरणन की भक्ति बिनु, कोइ न भक्ति पा
गुरु सेवा ही भक्ति है, वेदन कहा सुना  

रैन दिवस इस जीव को, ग्रसै काल विकराल ।
सोई बचा राखें जिसे, सतगुरु परम कृपाल

अचल भक्ति मोहि दीजि, निज चरणन का प्यार ।
निशि-वासर रहू मगन मैं, विसरै यह संसार

दासनदास’ विनवै यही, कृपासिंधु गुरुदेव
छत्रछाया निज चरण में, बख़्शो अपनी सेव

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें