श्री अमर ज्योति दर्शन
जनवरी 2025
श्री सद्गुरुदेव जी महाराज (श्री पंचम पादशाही जी) ने कई महात्माजनो एवं भक्तजनो (जो अभी साधु नहीं बने थे) को यथायोग्य सेवा प्रदान की। महात्मा पूर्ण भक्तानन्द जी को वर्कशॉप ट्रस्ट प्रबंधक एवं अपने पास अन्दर की सेवा प्रदान की। महात्मा अनमोल विवेकानन्द जी को प्रबन्धक बनाया और कई महात्मा व भक्तजनों को सत्संग की सेवा प्रदान की। आपने तब श्री वचन फ़रमाए—
“सद्गुरु तथा सेवक का नाता आदि जुगादि से चला आ रहा है। यह नाता क्योंकि विशुद्ध पारमार्थिक है, अतएव सेवक की हार्दिक अभिलाषा और उसका हर प्रयत्न सद्गुरु की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए होता है। सद्गुरु की प्रसन्नता प्राप्त करने का सबसे सुगम साधन उनकी निष्काम सेवा है। संसार में जैसे माता-पिता को प्रसन्नता उस पुत्र पर अधिक होती है जो आज्ञा में रहकर उनकी सेवा करता है, उसी प्रकार जीव के आध्यात्मिक माता-पिता सद्गुरु की प्रसन्नता और कृपा उस सेवक पर अधिक होती है, जो आज्ञानुसार निष्काम भाव और हित चित्त से उनकी सेवा करता है। यही कारण है कि अपने इष्टदेव की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सेवक सेवा को ही जीवन का आधार समझता है। इष्टदेव की आज्ञानुसार सेवा करना ही वास्तव में सच्ची सेवा है। भगवान श्री राम चन्द्र जी फ़रमाते हैं—
॥ चौपाई ॥
अग्या सम न सुसाहिब सेवा ।
सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
(श्रीरामचरितमानस)
जो सेवक श्री आज्ञा मौज अनुसार सेवा करने में हर समय तत्पर रहता है, वही सन्त सद्गुरु की कृपा एवं प्रसन्नता का पात्र बनता है। सेवक के जीवन का आभूषण ही सेवा है, तभी तो महापुरुषों ने फ़रमाया है—
॥ दोहा ॥
सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय ।
कहै कबीर सेवा बिना, सेवक कबहुँ न होय ॥
(परमसन्त श्री कबीर साहिब जी)
सेवा के महत्व को समझने वाले सेवक मालिक की मौज को समझकर तन-मन से सेवा में जुट जाते हैं। ऐसे सौभाग्यशाली सेवक जानते हैं कि सन्त- सद्गुरु की मौज ही कुल मालिक की मौज है, क्योंकि सन्त सद्गुरु और कुल मालिक में कोई भेद नहीं। सत्पुरुष फ़रमाते हैं—
नानक सोधे सिम्रिति बेद ।
पारब्रह्म गुरु नाही भेद ॥
गुरुवाणी
सद्गुरु जब भी अपनी मौज से किसी सेवक को कोई आज्ञा प्रदान करते हैं और सेवक उस आज्ञा को शिरोधार्य कर उस कार्य में जुट जाता है तो सद्गुरु की कृपा और आशीर्वाद से कुदरत की समस्त शक्तियाँ सेवक की सहायता में संलग्न हो जाती हैं। यदि सेवक यह समझे कि अमुक कार्य उसकी सामर्थ्य से हो रहा है और यह सोचकर उसके मन में अहंकार आ जाए तो यह उसकी सरासर भूल है। सच्चे सेवक को अहंकार से बचना चाहिए। अहंकार दीमक की न्याई है जो अन्तर्मानस में घुसकर उसकी भक्ति की सम्पदा को हानि पहुँचाता है। जैसा कि कथन है—
जब लगु जानै मुझ ते कछु होइ ॥
तब इस कउ सुखु नाही कोइ ॥
जब इह जानै मै किछु करता ॥
तब लगु गरभ जोनि महि फिरता ॥
गुरुवाणी
जब तक मनुष्य यह समझता है कि मुझसे कुछ हो सकता है तब तक इसे कोई सुख नहीं होता। जब तक इसमें अहंकार का भाव रहता है तब तक यह योनियों में भटकता रहता है। इसके विपरीत जो सेवक नम्रता एवं दीनतापूर्वक सद्गुरु की आज्ञा और मौज अनुसार निष्काम भाव से सेवा करता है, वही अपने इष्टदेव की कृपा और प्रसन्नता का अधिकारी बनता है। सत्पुरुष अपनी वाणी में वर्णन करते हैं—
गुर कै ग्रिहि सेवकु जो रहै ॥
गुर की आगिआ मन महि सहै ॥
आपस कउ करि कछु न जनावै ॥
हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ॥
मनु बेचै सतिगुर कै पासि ।
तिसु सेवक के कारज रासि ॥
सेवा करत होइ निहकामी ॥
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
गुरुवाणी
जो सेवक सद्गुरु की चरण-शरण ग्रहण कर सद्गुरु की आज्ञा को अपने हृदय में धारण करता है और उसी के अनुसार कार्यवाही करता है, अपने अस्तित्व को मिटाकर हृदय से सदा प्रभु के नाम का स्मरण करता रहता है, अपना मन सद्गुरु के हवाले कर देता है, उस सेवक के सारे कारज संवर जाते हैं। जो निष्काम भावना से सेवा करता है, मन में किसी प्रकार के फल की इच्छा नहीं रखता, उसको इष्टदेव की प्राप्ति हो जाती है।
सेवक सेवा करते हुए अपने आपको धन्य समझे और पल-पल सद्गुरु का आभारी बना रहे। स्वयं को मिटाकर निःस्वार्थ सेवा करता हुआ वह एक दिन मालिक की प्रसन्नता का पात्र बनकर अपना लोक और परलोक दोनों सुहेला कर लेता है।
इस प्रकार सभी सेवकों को सेवक धर्म और सेवा का महत्व समझाकर आपने उन्हें भक्ति पथ पर सुदृढ़ता से चलने की शिक्षा प्रदान की। इन सारगर्भित वचनों में छिपे भक्ति के गूढ़ रहस्यों को जानकर प्रत्येक गुरुमुख का जीवन धन्य-धन्य हो उठा और सब मन चित्त से श्री दरबार की सेवा में जुट गए।
॥ स्तुति ॥
पारब्रह्म गुरु सुख की खान ।
पर उपकारी पुरुष महान ॥1॥
वेद न पावें पारावार ॥
गुरु समरथ गुरु कर्णधार ।
सुनत आनन्द रस पावे प्राणी ।।
गुरु का वचन मेटे अज्ञान ।
बख़्शे नाम रतन धन खान ॥ 3॥
मन अन्तर के मिटें क्लेश ॥
जीव ब्रह्म का भेद बतावें ।
सुरत शबद का मेल करावें ॥ 4॥
गुरु ऊपर जाइये कुर्बान ॥
सब तीरथ गुरु चरणन माहीं ।
चरण परस कलि मल धुल जाहीं ॥5॥
हिरदै माहिं होए उजियार ॥
भाग बड़े गुरु दर्शन पाये ।
जन्म मरण के त्रास मिटाये ॥ 6॥
कलह क्लेश सभी मिट जावे ॥
सेवक पावे दरगह मान ॥ 7॥
तिस सेवक को दूख न होई ॥
जप तप संयम करे अनेक ।
गुरु सम दूजा और न मान ॥
जिस पर होयँ गुरु दयाल ।
चरण कमल पे सद बलिहार ॥
‘दासनदास’ की एह अरदास ।
बोलो जयकारा बोल मेरे श्री गुरु महाराज की जय ॥
श्री परमहंस अद्वैत मंदिर एवं श्री आनन्द शांति भवन में श्री आरति-पूजा श्री सद्गुरुदेव जी महाराज (श्री चतुर्थ पादशाही जी) के समय में श्री आनन्दपुर में आरम्भ हुई थी। उन्होंने दोनों समय प्रातः एवं सायं श्री आरति-पूजा को पूजा का आवश्यक अंग बताया। भजनाभ्यास के लिए श्री सद्गुरुदेव जी महाराज श्री तृतीय पादशाही जी ने एक घंटा नित्यप्रति आवश्यक फ़रमाते हुए स्वयं इसका जाप करवाया। सेवा, सत्संग और सुमिरण-ध्यान के नियम श्री परमहंस दाता दयाल जी एवं श्री द्वितीय पादशाही जी महाराज के समय से ही चलते आ रहे थे। श्री सद्गुरुदेव जी महाराज (श्री पंचम पादशाही जी) ने इनको एक सूत्र में बांध दिया। यह है महान् उपलब्धि !
॥ दोहा ॥
श्रद्धा सहित सेवन करें, निश्चय हो कल्याण ॥
आज कलियुग की महामाया में सुरति को एकाग्र करना अति कठिन है। इसके लिए ये पाँच सरल सुगम साधन हैं। इसमें कठिन साधना की आवश्यकता नहीं। जो भी गुरुमुख नित्यप्रति इन पाँचों नियमों की श्रद्धा और प्रेम से पालना करता है, उसका कल्याण निश्चित है—ऐसा वरदान प्रदान कर आपने महान् उपकार किया। प्रेमी श्रद्धालु इन पाँच नियमों में सरलता से सुरति को एकाग्र करते हैं और आत्मिक आनन्द को पाकर कृतार्थ होते हैं।
गुप्त रहस्य का उद्घाटन
महापुरुष किस रहस्य का उद्घाटन कब करते हैं और कब उसे प्रकट करना है—यह वे स्वयं जानते हैं। भविष्य द्रष्टा, युग प्रवर्तक श्री श्री 108 श्री पंचम पादशाही जी महाराज श्री आनन्दपुर में तीव्रता से सब ओर विकास करवा रहे थे। निर्माण कार्यों के अतिरिक्त उनके लिए एक अन्य महान् कार्य का गुप्त रूप से उद्घाटन करना शेष था। वह कार्य था— स्वात्म-स्वरूप, ध्येय पूरक श्री स्वामी विचार पूर्ण आनन्द जी महाराज को विशेष स्थान देते हुए उनकी प्रमुखता दर्शाना। उस समय श्री सद्गुरुदेव जी महाराज श्री द्वितीय पादशाही जी तथा श्री सद्गुरुदेव जी महाराज श्री तृतीय पादशाही जी के समय में मुख्य प्रबन्धक एवं महात्माजन श्री आनन्दपुर में तन-प्राण से गुरु महिमा के प्रचार प्रसार में योगदान कर रहे थे।
श्री स्वामी विचार पूर्ण आनन्द जी, श्री तृतीय पादशाही जी महाराज की आज्ञानुसार उस समय महात्मा पूर्ण भक्तानन्द जी तथा अन्य महात्माजनों के साथ कोटा, औरंगाबाद और बैंगलोर के आसपास सेवा करने में संलग्न थे।
श्री सद्गुरुदेव जी महाराज श्री चतुर्थ पादशाही जी ने इन्हें अपने समय में बाहर की समस्त सेवा व कार्यों को समाप्त कर शीघ्र ही श्री आनन्दपुर में रहने की श्री आज्ञा फ़रमाई। आप श्री आज्ञा को शिरोधार्य कर सब सेवा को पूर्ण कर श्री आनन्दपुर आ गए।
श्री सद्गुरुदेव जी महाराज (श्री पंचम पादशाही जी) ने गुप्त रूप से तत्वदर्शी दृष्टि से इन्हें (श्री स्वामी विचार पूर्ण आनन्द जी महाराज) पहचान कर फ़रमाया कि अब आपने श्री आनन्दपुर में रहकर श्री आनन्दपुर के प्रबन्ध एवं अन्य जो भी सेवाएँ दी जाएँगी, उन्हें पूर्ण करना है। आप श्री आज्ञानुसार पूर्ण निष्ठा से सेवा करने लगे। धीरे-धीरे सभी वर्कशॉप, चक व आसपास अशोकनगर, ललितपुर, गुना, ब्यावरा, शिवपुरी और ग्वालियर—में स्थित सभी आश्रमों के प्रबन्ध का कार्य भी आपको सौंपा गया और आप भी पूर्ण योग्यता व प्राणपन से इन सबका संचालन करते रहे।
श्री सदगुरुदेव जी महाराज (श्री पंचम पादशाही जी) स्वयं कई बार सेवकों में तथा प्रबन्धक समिति में फ़रमाते थे—“(श्री स्वामी जी श्री छठी पादशाही जी) श्री आज्ञा पालन में तत्पर हैं। ये हमें प्रिय लगते हैं। सब काम सच्चाई, नम्रता व दिलोजान से करते हैं।”
श्री सद्गुरुदेव जी महाराज की विशेष कृपा दृष्टि एवं रूहानी रहस्य को जानते हुए ये सबके साथ मधुर, प्रिय, विनम्रता पूर्वक व्यवहार करते हुए सब बुज़ुर्गों एवं प्रबन्धकों को सम्मान देते। यह रहस्य आज सब गुरुमुखों को विदित है। शेष विवरण आगे जीवन चरित्र में आएगा।
यह समागम श्री आनन्दपुर में हर्षोल्लास से वैशाख के पर्व तक चलता रहा। वैशाखी पर्व सन् 1972 में प्रथम संस्करण छपकर तैयार हुआ। सत्संगी, प्रेमी व जिज्ञासु सब इसे पाकर भाव विभोर थे। प्रेमीजन खुशी से श्री तृतीय पादशाही जी के श्री सिंहासन पर नित्य प्रति प्रसाद एवं भण्डारे करवाने लगे। हर्षोल्लास एवं परम आनन्द की अनुभूति व सेवा-भक्ति की लगन से परिपूर्ण, श्री आनन्दपुर में यह एक महान् महोत्सव का ही रूप बन गया।
‘अमर ज्योति’ ग्रन्थ का प्रथम संस्करण सन् 1972 में छपा। अब इसका विवरण एक ही स्थान पर दिया जा रहा है। सन् 1972 में प्रथम संस्करण की बढ़ती मांग के अनुसार सन् 1974 में इसे पुनः प्रकाशित किया गया। अब जैसे-जैसे महान् कार्यों का उद्घाटन करते हुए श्री पंचम पादशाही जी महाराज पारमार्थिक कार्य उन्नतिशील कर रहे थे, वैसे-वैसे ही उनका अंश मात्र संकलन करवाते जा रहे थे। इस प्रकार सन् 1995 तक पाँच बार इसमें प्रवचन एवं पावन लीलाओं का समावेश किया गया। आपने कितना विस्तार एवं परमार्थ का कार्य किया, लेखनी उसे वर्णन करने में अशक्त है। आप अपने द्वारा किए गए पारमार्थिक विकास एवं महामहिमा को ग्रन्थ में सम्पूर्ण विवरण नहीं देने देते थे, उनका केवल अंशमात्र ही लिखा गया है।
महान् उपलब्धि
श्री परमहंस दयाल जी श्री प्रथम पादशाही जी ने आरति, स्तोत्र एवं छन्द की रचना करवाकर इन्हें मान्यता दी। सन् 1978 में आपने (श्री पंचम पादशाही जी महाराज) श्री परमहंस अद्वैत मत को प्रातः व सायं ‘पूजा के फूल’ में गायन किए जाने वाले स्तुति-पद, आराधन ! विनती ! स्तुति ! जोकि अन्य वाणियों में लिखे हुए थे, उन्हें अपनी वाणी में प्रकट कर प्रेमियों को अमूल्य उपहार दिया। अब सब प्रेमी श्रद्धालु एवं गुरुमुख इन स्तुति पदों से नित्य प्रति आरति-पूजन करते हैं। वह इस प्रकार है—
॥ आराधन ॥
टेक—अमृत वेले गुरु दर्शन पाइये,
अपने गुरु जी पै बलि बलि जाइये ॥
1- परम पुरुष पूरण गुरु मेरे,
जिनके सिमरत सूख घनेरे;
स्वाँस स्वाँस में नाम ध्याइये ।
अमृत वेले..... ॥
2- गुरु मूरत का करिये ध्यान,
गुरु से माँगिये भक्ति दान;
गुरु चरणों में प्रेम बढ़ाइये ।
अमृत वेले..... ॥
3- अमृतमयी सतगुरु की वाणी,
आनन्द दायक सुख की खानी;
गुरु जी की वाणी हिरदय बसाइये ।
अमृत वेले..... ॥
4- सेवक बन गुरु सेवा करिये,
जन्म-मरण के दुख सब हरिये;
सेवा कर अपने भाग्य मनाइये ।
अमृत वेले..... ॥
5- गुरु बिन कोई मीत न भाई,
लोक परलोक में संग सहाई;
गुरु आज्ञा में मन चित्त लाइये ।
अमृत वेले..... ॥
6- सतगुरु महिमा अगम अनन्त,
जिस का कोई न पावे अन्त;
निशिदिन गुरु जी की महिमा गाइये ।
अमृत वेले..... ॥
7- परमहंस सतगुरु अवतार,
‘दासनदास’ की यह ही पुकार;
पल पल साचा नाम जपाइये ।
अमृत वेले..... ॥
॥ विनती ॥
श्री परमहंस दयाल जी, पूरण सुख के धाम ।
बार बार दण्डवत करूँ, कोटिन कोटि प्रणाम ॥1॥
हाथ जोड़ विनती करूँ, सतगुरु कृपानिधान ।
सेवा अपनी दीजिये, और भक्ति का दान ॥2॥
सुखदाता दुखभंजना, सतगुरु तुम्हरो नाम ।
नाम अमोलक दीजिये, भक्ति करूँ निष्काम ॥3॥
नाव बनाई शब्द की, बहुत किया उपकार ।
भवसागर में डूबते, लीन्हे जीव उबार ॥4॥
तुम बिन कोई मीत नहीं, स्वारथ का संसार ।
बिन स्वारथ सतगुरु करें, निशिदिन पर उपकार ॥5॥
मैं निर्बल अति दीन हूँ, तुम समरथ बलवान ।
सब विधि मम रक्षा करो, दीनबन्धु भगवान ॥6॥
बिरद सम्भारो नाथ जी, शरणागत प्रतिपाल ।
बाँह गहे की लाज है, मेरी करो सम्भाल ॥7॥
समरथ सतगुरुदेव जी, लीन्ही तुमरी ओट ।
तुमरी कृपा से मिटत हैं, जन्म जन्म के खोट ॥8॥
मैं अपराधी जीव हूँ, नख शिख भरा विकार ।
अपनी दया से सतगुरु, कीजै भव से पार ॥9॥
भटक भटक कर आइया, पर्या तुम्हरे द्वार ।
चरण-शरण में रख लो, अपनी किरपा धार ॥10॥
तुझसा मुझको है नहीं, मुझसे तुम्हें अनेक ।
राखो चरणन छाँव में, गही तुम्हारी टेक ॥11॥
टेक एक प्रभु आपकी, नहीं भरोसा आन ।
तुम्हरी किरपा दृष्टि से, पाइये पद निर्वाण ॥12॥
अनिक जन्म भरमत रहियो, पायो न बिसराम ।
आया हूँ तव शरण में, कृपा सिन्धु सुखधाम ॥13॥
लिव श्री चरणन में लगे, जैसे चन्द चकोर ।
रैन दिवस निरखत रहूँ, गुरु मूरत की ओर ॥14॥
श्री गुरु चरण सरोज में, राखूँ अपना शीश ।
चाहूँ तुझसे मैं सदा, प्रेम भक्ति बख़्शीश ॥15॥
पत राखो मेरे साईयाँ, दयासिन्धु दातार ।
बार बार विनती करूँ, सतगुरु तव चरणार ॥16॥
पारब्रह्म सतगुरु मेरे, पूरण सच्चिदानन्द ।
नमस्कार प्रभु आपको, भक्तन के सुखकन्द ॥17॥
श्री मात-पिता सतगुरु मेरे, शरण गहूँ किसकी ।
गुरु बिन और न दूसरा, आस करूँ जिसकी ॥18॥
॥ जयकारा, निस्तारा, धर्म का द्वारा, झूलेगी ध्वजा, बजेगा नक्कारा, सुनकर बोलेगा, सो निहाल होगा,
बोल साचे दरबार की जय ॥
श्रीमान जी ने कृपा-पत्र पढ़कर सुनाया और प्रैस में सेवा करने वाले गुरुमुखों को सब सेवा कार्य विभाजित करके सौंप दिया। भक्तों की तरफ छपाई की सेवा होने लगी और भक्तानियाँ कम्पोज़िंग व प्रूफ रीडिंग की सेवा करने लगीं। सब उत्साहपूर्वक अपनी-अपनी सेवा में यह सोचकर जुट गए कि श्री सद् गुरु देव दाता दयाल जी की प्रसन्नता को पाने के लिए इसे पूर्ण करना ही करना है।
श्रीमान जी ने दो प्रेमियों को दिल्ली अक्षर फाउंडरी में भेजा। वे दिल्ली के ही अन्य दो भक्तों के साथ फाउंडरी में पहुँचे। फाउंडरी के मालिक ने कहा कि इतना अक्षर तो एक मास क्या, छः मास तक भी मिलना नामुमकिन है। गुरुमुखों ने उत्तर दिया— “हमारे पास तो केवल एक सप्ताह का ही समय है। हम छपाई के अक्षर तैयार करने के लिए अपनी ओर से पूर्ण सहयोग देंगे।” फाउंडरी के मालिक की अन्तः प्रेरणा में एक दिव्य ज्योति ने उत्साह भरा। उसने अपने मज़दूरों को अधिक समय देने के लिए कहा। वे चारों भक्त भी दिन-रात एक करके अक्षरों की सफाई में जुट गए और सात दिन में ही कार्य पूरा करवाकर श्री आनन्दपुर में पहुँच गए।
फाउंडरी के मालिक ने प्रसन्न होकर कहा— “वाह ! श्री आनन्दपुर की निष्काम सेवा में संलग्न सेवक ! सप्ताह भर विश्राम न करने पर भी कितने आत्म आनन्द में लीन व प्रसन्न हैं। हमारे मज़दूर चौगुनी आय लेकर भी ऐसा न कर पाते जो इन भक्तों ने कर दिखाया है।”
अक्षरों का प्रबन्ध हो जाने पर श्रीमान जी ने सभी गुरुमुखों को कहा कि श्री आनन्दपुर में श्री गुरु महाराज जी की कृपा से इस महान् सेवा का अवसर मिला है। सभी गुरुमुख इस दुर्लभ संयोग से लाभ उठाएँ। खुशी से भरपूर जीवन में आनन्द पाएँ। उन्होंने प्रबन्धक बाई जी (बाई प्रेम सागरानन्द जी) से कहा कि फ़र्मा छपते ही आपने दो हज़ार की संख्या तक प्रत्येक फ़र्मे को मुड़वाने की सेवा करनी है। बाई जी ने अपनी तरफ के सभी गुरुमुखों को श्री आज्ञा सुनाते हुए कहा कि अपनी-अपनी सेवा के अतिरिक्त सभी ने इस सेवा को भी सहर्ष करना है।
सेवा का अद्भुत नज़ारा ! सबके दिल में उमंग, उत्साह ! समस्त श्री आनन्दपुर निवासी गुरुमुखों और प्रबन्धकों में मानो दिव्य शक्ति एवं प्रभु-प्रेम की निराली मस्ती का संचार हुआ। यह केवल कोरी कल्पना नहीं, वास्तविक सत्य है। महाप्रभु श्री प्रयागधाम में विराजमान थे। वहाँ से ही आशीर्वाद की कृपा बरसाते थे। श्री आनन्दपुर में देखो तो प्रत्येक प्रेमी की ज़ुबाँ पर यही था कि हर समय उन्हें कभी श्री तृतीय पादशाही जी, कभी श्री चतुर्थ पादशाही जी और कभी श्री पंचम पादशाही जी, कभी स्वप्न और कभी साकार रूप में, अपनी दिव्य झलकियों से आनन्दित कर रहे थे। सबके मुख से हर्ष आनन्द एवं मस्ती भरे गीत ही निकलते थे। आकाश से मानो देवगण भी इस सेवा में सम्मिलित होने के लिए विनय कर रहे थे। रात्रि एवं दिन भर सेवा करने में सभी अहोभाग्य मना रहे थे। सर्दी की शीत लहर और दिन-रात का किसी को पता नहीं, कैसे बीत रहे थे।
महात्मा योगात्मानन्द जी प्रैस के प्रबन्धक थे। उन्होंने प्रैस के गुरुमुखों के लिए भोजन आदि का प्रबन्ध भी करवा दिया। सब एक दूसरे से बढ़कर इस सेवा कार्य में भाग ले रहे थे।
5 मार्च को श्री गुरु महाराज जी ने श्री आनन्दपुर में कृपा फ़रमाई। बाहर से मुख्य महात्माजनो को श्री आनन्दपुर में बुलवा लिया। श्री आनन्दपुर में सेवा में रत, अदम्य साहस एवं प्रभु-प्रेम में यशोगान करते गुरुमुखों को देखकर स्वयं श्री प्रभु जी भी भाव-विभोर हो गए।
आपने सभी महात्माजनो—महात्मा योग आत्मानन्द जी, महात्मा सद् गुरु सेवानन्द जी, महात्मा गुरु दर्शनानन्द जी, महात्मा आत्म दर्शनानन्द जी, महात्मा शान्तात्मानन्द जी, महात्मा परम विवेकानन्द जी, महात्मा सत् शान्तानन्द जी एवं प्रेस के गुरुमुखों को बुलाया और फ़रमाया—“आप गुरुमुखों की सेवा रंग लाई है। अब इस महान् कार्य की पूर्णता शीघ्र ही होगी और युग-युगान्तरों तक यह अमर शाश्वत महान् विभूतियों का जयघोष एवं यशोगान करते हुए विश्व में सुख, शान्ति और आनन्द को पाने का सर्वोत्तम साधन बना रहेगा। यह श्री परमहंस अद्वैत मत की गौरव-गरिमा का अमर कीर्तिस्तंभ है। इस प्रकार आज इसका शुभ नामकरण ‘अमर ज्योति’ ग्रन्थ किया जा रहा है। यह श्री परमहंस अद्वैत मत के महापुरुषों का युग-युगान्तरों तक पावन गुणगान करता रहेगा। सब इसे पढ़ सुनकर आत्मिक सम्पदा से मालामाल होंगे।”
महात्मा परम विवेकानन्द जी (सिन्धी श्रीमान जी) ने सब गुरुमुखों एवं महात्माजनो को कहा— “अन्तरात्मा में झाँको। आसमान पर दिव्य दर्शन के नज़ारे को देखो। देखो ! देखो ! युगों की तपस्या पर भी ये दर्शन असम्भव हैं।” काफी महात्माजन एवं गुरुमुखों ने ऊपर की ओर निहारा। आँखें उत्सुकतावश देखती ही रह गईं। क्या कि श्री परमहंस दयाल जी (श्री प्रथम पादशाही जी), श्री परमहंस महाराज जी ( श्री द्वितीय पादशाही जी), श्री परमहंस अवतार जी (श्री तृतीय पादशाही जी), श्री परमहंस दीन दयाल जी (श्री चतुर्थ पादशाही जी)—आकाश में स्वर्णिम विमानों पर हज़ारों लाखों सूर्यों के तेज की किरणें बिखरा रहे हैं। उन महान् विभूतियों के मध्य में श्री परमहंस दाता दयाल जी श्री पंचम पादशाही जी पर वे किरणें पड़ रही हैं। श्री पंचम पादशाही जी के स्वरूप में सब किरणें एकत्र होकर श्री आनन्दपुर में श्री दर्शन की आभा बिखरा रही हैं। एक झलक को पाते ही सब में नई स्फूर्ति एवं भक्ति का नव स्रोत हिलोरें लेने लगा। यह था श्री परमहंस महापुरुषों के पावन जीवन चरित्र का प्रथम दर्शन !!
अतः आपने श्रीमान जी की विनय पर फ़रमाया—“हमारी मौज भी यही है कि आप श्री प्रयागधाम में एक मास रहें। हमने महापुरुषों के पावन चरित्र का संकलन किया एवं करवाया है। आप उसे अब पढ़ें और उसमें कुछ संशोधन करना चाहें तो वह भी कर दें। महात्मा योग रोशनानन्द जी आपके पास आएँगे, उन्हें सब समझा देना। आप श्री द्वितीय पादशाही जी के समय से महापुरुषों के सान्निध्य में हैं, यदि कुछ और लिखवाना चाहें, तो लिखवा सकते हैं।”
श्रीमान जी के पास महात्मा जी प्रथम दिन गए और उन्होंने श्री परमहंस महान् विभूतियों के पावन चरित्र आरम्भ करने से पहले के शीर्षक पढ़ने आरम्भ किए। श्रीमान जी ने कहा—“महात्मा जी ! सच ही तो है कि कुदरत की ओर से जिस कार्य को सम्पन्न करने का श्रेय जिसे दिया जाता है, समस्त दैवी शक्तियाँ उसकी सहयोगी बन जाती हैं। अब हमें भी इस सेवा का सौभाग्य मिला है, हमारे अहोभाग्य !”
इस प्रकार एक मास तक नित्यप्रति उत्साहपूर्वक महापुरुषों के प्रवचन एवं लीला श्रवण कर श्री आज्ञा का पालन किया। उस समय उनके मन में अथाह भाव उमड़-घुमड़ कर आते, जो उन्होंने श्री आनन्दपुर में आकर सब प्रबन्धकों के सामने प्रकट किए।
दिसम्बर सन् 1971 में श्री गुरु महाराज जी ने श्री सन्तनगर से श्री आनन्दपुर में कृपा फ़रमाई। अब तक श्री चतुर्थ पादशाही जी महाराज का पावन चरित्र लगभग पूरा लिखा जा चुका था। श्री पंचम पादशाही जी महाराज के अन्तर्मानस में मौजों का अथाह सागर उमंगें भर रहा था। उनकी यह प्रबल मौज थी कि इसका स्वरूप शीघ्र ही सबके सम्मुख प्रकट किया जाए। माघी के पर्व पर सत्संगी महात्माजन श्री दर्शन के लिए आ चुके थे। मोती बाग में अभी कच्चे कमरे का निर्माण हुआ था।
आपने महात्मा योग आत्मानन्द जी, महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी, महात्मा गुरु दर्शनानन्द जी, महात्मा आत्म दर्शनानन्द जी, महात्मा परम विवेकानन्द जी, महात्मा अखण्ड प्रकाशानन्द जी, महात्मा धर्म श्रद्धानन्द जी, महात्मा रोशनानन्द जी, महात्मा योग प्रकाशानन्द जी व अन्य प्रमुख महात्माजनों को बुलवाकर वचन फ़रमाए—“हमने श्री परमहंस दयाल जी की श्री मौज अनुसार श्री परमहंस अद्वैत मत के शाश्वत ज्योतिस्स्तम्भ महान् विभूतियों का पावन चरित्र लिपिबद्ध किया है। अब आपके सहयोग से यह कार्य पूर्ण होना है। आप सब मिलकर मोती बाग के कमरे में इसको सुनें और जो कमियाँ हों, उन्हें ठीक करवा दें। यह कार्य अति शीघ्र करना है ताकि यह वैशाखी तक छपकर सबके सामने प्रकट हो सके।”
“विलक्षण ! विलक्षण ! अद्भुत ! महान् आश्चर्य ! श्री परमहंस अद्वैत मत श्री आनन्दपुर सत्संग केन्द्र की ऐतिहासिक गौरवशाली स्वर्णिम उपलब्धि ! इसकी महिमा के लिए कोई शब्द ही नहीं जिसे जिह्वा कहकर सुना सके। श्री सद्गुरुदेव जी महाराज ! आपके इस दिव्य अलौकिक कार्य की सम्पन्नता पर सभी महापुरुषों, हम सेवकों एवं श्री परमहंस अद्वैत मत की संस्था को गर्व है”—ऐसा कहकर श्रीमान जी ने सभी महात्माजन सहित दण्डवत् प्रणाम किया। बाकी महात्माजनों यह सोचकर हैरान थे कि ऐसी क्या महान् उपलब्धि है; अभी कुछ सामने प्रकट तो हुआ नहीं। श्रीमान जी चूँकि इसका अध्ययन कर चुके थे, अतः उनके हार्दिक एवं आन्तरिक उद्गारों ने सबके सामने इस रहस्य को दर्शा दिया।
श्री आज्ञा अनुसार सभी महात्माजनों ने पावन चरित्र को सुनने का कार्य आरम्भ किया। प्रत्येक दिन श्रीमान जी एवं महात्मा योग प्रकाशानन्द जी श्री प्रभु जी के चरणों में जाते और गुणावली का बखान करते। श्री वचन हुए कि इस संस्करण में उपयुक्त स्थान पर इस महिमा को लिख देते हैं, शेष पर पुन: विचार किया जाएगा। इस प्रकार आरम्भ से लेकर श्री चतुर्थ पादशाही जी महाराज तक लेखन कार्य पूर्ण हो चुका था। शेष श्री सद्गुरुदेव जी महाराज ने रेखांकित कर समझा दिए। आपने श्रीमान जी और महात्मा धर्म श्रद्धानन्द जी को फ़रमाया कि “आप कुछ दिन यहाँ रहकर इसके शेष भाग की रचनाओं को सुनें और उनका उचित स्थान पर समावेश करें। इसे अब आपने पूरा करना है।” पुनः श्रीमान जी को सम्बोधित करते हुए फ़रमाया कि “आपको यहाँ कुछ अधिक समय तक रहकर इसे छपवाना भी होगा।”
श्री सद् गुरुदेव जी महाराज ने सभी महात्माजनों को बुलाकर उन्हें इस महान् कार्य को मार्च तक पूर्ण करने का आशीर्वाद दिया और फ़रमाया—“यह कार्य गुरुमुखों के अदम्य साहस एवं हार्दिक लगन से पूर्ण होगा। इसे हित-चित् से करके अपने जीवन को खुशियों से भरपूर करें और महापुरुषों की प्रसन्नता को प्राप्त करें।”
29 जनवरी सन् 1972 को श्री गुरु महाराज जी ने श्री प्रयागधाम के लिए प्रस्थान किया। प्रथम कोटा में महात्मा सुख सागरानन्द जी के सत्संग आश्रम पर श्री दर्शन एवं उद्घाटन का कार्यक्रम था। उधर प्रात: दस बजे के लगभग जब श्रीमान जी एवं महात्माजन लिपिबद्ध की गई रचनाओं को श्रवण करने के लिए आए तो सम्पूर्ण ग्रंथ को छपवाने सहित देखकर कहने लगे—“इतना बड़ा काम इतनी छोटी-सी अवधि में कैसे पूरा हो सकता है ? यह हमारी सामर्थ्य से बाहर है। इतना बड़ा काम तभी सम्पन्न हो सकता है, जब स्वयं श्री गुरु महाराज जी यहाँ रहें वरन् यह कार्य तो एक वर्ष में भी हो पाना कठिन है। ग्रन्थ की छपाई के लिए अक्षर आनन्द-सन्देश से बड़ा होना चाहिए जो अभी उपलब्ध ही नहीं है।”
श्रीमान जी ने दो गुरुमुखों को कोटा भेजकर अक्षर आदि के लिए सब विनय भेज दी। इधर लेखक के मन में यह विचार आया कि क्या श्री गुरु महाराज जी की मौज अब पूर्ण नहीं हो पाएगी ? उसने अपनी विनय पत्रिका श्री चरणों में भिजवा दी। गुरुमुखों को जब श्री दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो उन्होंने विनय पत्रिका भेंट कर श्रीमान जी द्वारा पसन्द किए गए अक्षर इत्यादि दिखाए। श्री वचन हुए कि आप आशीर्वाद पत्र ले जाएँ और श्रीमान जी को सौंप दें ।
श्रीमान जी के कृपा पत्र में लिखा—“श्रीमान जी ! हमने आपसे पूरा छपा हुआ ग्रन्थ लेना है। फिर आप जैसे और जिस प्रकार के अक्षर भी प्रयोग करें, पूर्ण व्यवस्था कर इस सेवा के कार्य की पूर्ति करनी है। सब प्रेस से सेवा करने वाले गुरुमुखों एवं श्री आनन्दपुर निवासी गुरुमुखों को आशीर्वाद।”
दूसरी ओर लेखक को भी कर कमलों से कृपा पत्र लिखकर आशीर्वाद फ़रमाया। श्री वचन लिखे— “आप तसल्ली रखें और अपना कार्य उत्साहपूर्वक करते जाएँ। किसी प्रकार से घबराने की ज़रूरत नहीं है। सब काम श्री गुरु महाराज जी की कृपा से ठीक हो जाएगा।
Trust in God and do the right.
God helps those who help themselves.”
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अगस्त 2025
आप स्वयं इन अमृत-कुण्डों के निर्माण के समय यहाँ आकर विराजमान होते। साथ में कुछ महात्माजन एवं भक्तजन भी आते। आप प्रायः महापुरुषों के उपकारों का वर्णन करते हुए भाव विभोर हो जाते। इस महान् स्थान की महिमा का गायन करते हुए इसकी रूप रेखा एवं भव्य भवन का चित्र सबके सम्मुख प्रकट करते। श्री चरणों में खड़े हुए महात्माजन आश्चर्यचकित होकर यही कहते कि सचमुच धुरधाम के वासी धुर के संदेश को लेकर अवतार धारण करते हैं, परन्तु सदैव इस रहस्य को गुप्त रखते हैं। उस समय श्री स्वामी विचार पूर्णानन्द जी ने श्री चरणों में विनय की कि प्रभो ! इन अमृत-कुण्डों का निर्माण कार्य तो पूर्ण हो गया है, अब इनका चरणामृत पान करवाकर शुभ मुहूर्त निज कर कमलों से करने की कृपा करें। श्री प्रभु जी ने आपकी और संकेत करते हुए गहन भाव से फ़रमाया कि “शुभ मुहूर्त के इस कार्य को समय आने पर आप स्वयं पूरा कर लेना।”
त्रिकालदर्शी महापुरुषों के रहस्य गुप्त रूप से भविष्य निधि बनकर रह जाते हैं। ज्योतिर्मय उपासना स्थल को भव्य रूप प्रदान करने के साथ-साथ आपने श्री परिसर के सारे फ़र्श पर संगमरमर लगवाया। दिवाकर और सुधाकर भी अपने-अपने समय पर उदय होकर इस स्थान को निर्मल ज्योत्सना से परिपूर्ण कर अपने भाग्य मनाते हैं।
सारांश यह है कि ये सब स्थान—श्री परमहंस अद्वैत मन्दिर, श्री आनन्द शांति भवन, श्री आनन्द शांति धाम, श्री आनन्द अमृत कुण्ड; जो श्री आनन्दसर के अन्तर्गत हैं, ये सब ज्योतिर्मय उपासना स्थल हैं। श्री आनन्दसर इन स्थानों की सीमा बना हुआ है। अपनी लहरों से प्रमुदित कर श्री आनन्दपुर को तीर्थधाम बनाने के श्रेय को चरितार्थ कर रहा है। यहाँ श्रद्धालु प्रेमिजन पावन दर्शन, तीर्थ-स्नान, सत्संग तथा अध्यात्म-विद्या को प्राप्त करने की दृष्टि से आते हैं और अपने जीवन का सच्चा लाभ उठाते हैं।
इस महान् उपलब्धि में सर्वप्रथम श्री परमहंस विभूतियों के पावन चरित्र को श्रेय दिया गया। श्री परमहंस महान् विभूतियों के श्री प्रवचन, मधुर लीलाएँ एवं भक्ति परमार्थ पर चलने के लिए सहनशीलता, विनम्रता, अदम्य साहस के सजीव प्रमाण उनकी जीवन झलकियों में आत्म-आनन्द की अनुभूति कराते हैं। प्रेमी जिज्ञासु प्रेरणा पाकर निर्विघ्न आत्मिक उन्नति के पथ पर बढ़ते जाते हैं। मानव-जन्म के लक्ष्य की प्राप्ति कर जीवन को सरस एवं धन्य बनाते है।
सृष्टि नियन्ता के अद् भुत विधानानुसार, कार्य की रूप रेखा के अनुसार उपयुक्त समय के लिए सभी साधन भी जुटा लिए जाते हैं। सन्त महापुरुषों की अनुकम्पा एवं परम्परा स्वयं में सर्वगुण सम्पन्न एवं अद्वितीय है, जो जीव बुद्धि से परे है। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ इनके श्री चरणों की चेरी बन सेवा के लिए तत्पर रहती हैं। ये अपने लक्ष्य की ओर पर उत्तरोत्तर बढ़ते जाते हैं तथा मानव जन्म के लक्ष्य की प्राप्ति कर जीवन को सरस एवं धन्य बनाते हैं।
श्री परमहंस अद्वैत मत के उन्नायक श्री परमहंस दयाल जी श्री प्रथम पादशाही जी एवं सभी महान् विभूतियों के पावन चरित्र का एक-एक शब्द भक्ति के मुक्ताकणों की आभा से ओत-प्रोत है। अमर ज्योति (ग्रन्थ) को खोलते ही आत्म-आनन्द की अनुभूति होती है एवं सुरति सच्चे सुख में लीन होकर मस्ती के नज़ारों में झूम जाती है। जब भी कभी जीवन में बाधाएँ, कठिनाइयाँ अथवा अवसाद के क्षण आएँ, महापुरुषों के जीवन चरित्र का अध्ययन एवं मनन ज्योतिस्स्तम्भ बन अपने आलोक द्वारा पथ-प्रदर्शन करता है। इसमें निहित ज्ञान की प्रखर किरणों से अज्ञान तिमिर लुप्त हो जाता है और जीव सरलता से उन परिस्थितियों में सुख-शान्ति का मार्ग पा लेता है।
युग-युगान्तरों तक स्वर्णाक्षरों में महापुरुषों के पावन चरित्र का संकलन करने के लिए आपने अगस्त सन् 1970 में ही गुप्त रूप से इसका शुभ आरम्भ श्री आनन्दपुर में किया। ‘श्री परमहंस अद्वैत मत’ पचास पृष्ठों में छपा हुआ था। इसमें अधिकतर श्री आनन्दपुर की रचना को प्रमुखता दी गई थी। अब इसके माधुर्य और सौन्दर्य को विस्तार देना था। आपने आन्तरिक दृष्टि से कृपा करते हुए सेविका को बुलाया और फ़रमाया—“हमें इस छोटी पुस्तक को ग्रन्थ के रूप में बढ़ाना है। यह कार्य अभी गुप्त रूप में करना है। महापुरुषों की महिमा अगम है, इसके कुछ अंश को समय आने पर प्रकट करेंगे।”
सेविका ने श्री आज्ञा को शिरोधार्य कर विनय की “प्रभो ! इसे कैसे करना होगा ? गुरुवाणी, रामायण एवं अन्य किसी भी सन्त वाणी का मुझे कोई ज्ञान नहीं।” श्री वचन हुए—“श्री परमहंस दयाल जी की शक्ति से सब कार्य पूर्ण होगा।” अगस्त सन् 1970 से दिसम्बर सन् 1971 तक परमार्थ को विकास रूप देते हुए एवं श्री प्रयागधाम, श्री सन्तनगर तथा श्री आनन्दपुर में निर्माण कार्य करवाते हुए लेखन के लिए अधिकाधिक समय देते। श्री मुख से प्रवचन फ़रमाते एवं परमहंसों के जीवन चरित्र की झाँकियों का वर्णन करते हुए स्वयं उनमें खो जाते। पुनः दूसरे दिन एक-एक शब्द को सुनते और उसमें सुधार करवाते। एक साधारण सेविका को लेखक का नाम देकर अनुगृहीत किया। लेखक की समझ में न आता कि कैसे सब प्रवचन एक-एक करके याद रहते हैं और कैसे रात्रि में आँखें बन्द कर सब वाणियों सहित संकलित हो जाते हैं। ऐसे महान् प्रभु का वरद् हस्त छत्र-छाया किए हुए था कि हर समय एक निराली मस्ती में लीन सुरति अपूर्व आनन्द की धुन में मग्न रहती। बस ! इतना ही पता चलता कि सेवा (लेखन) आरम्भ करते समय सूर्य की किरणें चहुँ ओर से आलोकित होकर लेखनी का कार्य पूर्ण कर जाती थीं।
इस प्रकार नवम्बर सन् 1971 ईo में श्री चतुर्थ पादशाही जी महाराज का पावन चरित्र लिखना आरम्भ हुआ था। महात्मा सद् गुरु सेवानन्द जी को एक मास के लिए श्री प्रयागधाम में सेवा के लिए अन्तःप्रेरणा हुई। ये सत्संग कार्य भी करते थे एवं श्री आनन्दपुर में मुख्य प्रबन्धक भी थे। श्री सद् गुरुदेव जी महाराज (श्री पंचम पादशाही जी) की आन्तरिक मौज अब महापुरुषों के पावन चरित्र, जितने लिखे जा चुके थे, उन्हें प्रकट करने की थी।
जुलाई 2025
महाप्रभु जी ने अपनी दिव्य वाणी में फ़रमाया—
“संसार में काल और माया का ऐसा चक्र चल रहा है कि जीव गफ़लत की निद्रा में सोकर अपने लक्ष्य को भूल गए हैं, जिसकी वजह से जन्म-जन्मांतरों से पीड़ित होते चले आ रहे हैं। जिनके पूर्बले संस्कार होते हैं, जिनमें अभिलाषा उत्कण्ठा होती है, वे अपनी निजी वस्तु को प्राप्त कर लेते हैं। वे अपनी खोई हुई वस्तु को पाकर जन्म सकारथ कर लेते हैं।
ऐसी पुण्य संस्कारी रूहों के लिए कुदरत की ओर से प्रबन्ध होता है। उन्हें सत् पथ दर्शाने के लिए समय-समय पर सत्पुरुषों का अवतरण होता है। सत्पुरुषों का अवतरण महज इसी काम के लिए होता है। वे जिज्ञासु संस्कारी रूहों को निज घर पहुँचाने के लिए आते हैं ताकि आत्मा जो कुल मालिक से बिछुड़ गई है, उसे सच्चा सुख मिल सके।
श्री आनन्दपुर दरबार में केवल नाम-भक्ति की दौलत ही बाँटी जा रही है। गुरुमुखजन अपनी श्रद्धा अनुसार यहाँ से अपनी झोलियाँ भर रहे हैं। जब से श्री आनन्दपुर दरबार की रचना हुई है, आप सब देख ही रहे हैं कि यह दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। श्री मंदिर, श्री आनन्द शान्ति भवन, श्री आनन्द शान्ति धाम—ये सब स्थान गुरुमुखों के लिए भक्ति प्राप्त करने के द्वार हैं। श्री शान्ति भवन इसलिए बना है ताकि गुरुमुख भजनाभ्यास से सुरति को मालिक से मिलाएँ जोकि विषय विकारों में फँसी है। जो नाम की माला को अपनी सुरति में धारण करेंगे, वे अपने मन को माया के गलबे से हटाकर मालिक के चरणों में सुरक्षित हो जाएँगे।
आप गुरुमुखों के अहोभाग्य हैं जो ऐसा सुअवसर मिला है। गुरुमुख सेवा, दर्शन व सत्संग से जीवन का कल्याण कर लेते हैं। गुरुमुखों के उद्धार के लिए ही इन सब स्थानों का निर्माण किया जाता है। इसलिए सबका कर्तव्य हो जाता है कि अधिकाधिक समय देकर भजन-ध्यान करें ताकि अधिकाधिक लाभ प्राप्त हो। चाहे कोई श्री आनन्दपुर में रहने वाला है या कोई बाहर रहने वाला है, एक घण्टा भजनाभ्यास हर गुरुमुख के लिए अनिवार्य है। चौबीस घण्टों में से एक घण्टा अवश्य निकालें, इसमें गुरुमुखों की बेहतरी है और जीवात्मा का कल्याण है। महापुरुषों का भी यही
पावन श्री वचन श्रवण कर सबका हृदय रोमांचित हो गया। सबने गुरु महिमा के गीत गाते हुए श्री प्रभु जी का कोटि-कोटि आभार प्रकट किया। प्रसाद वितरण हुआ। शुभ मुहूर्त संपन्न होने के पश्चात् आप स्वयं भी यहाँ विराजमान रहे और सब गुरुमुखों को एक घंटा भजन करने की श्री आज्ञा फ़रमाई। सबने श्री दर्शन-ध्यान करते हुए तेजोमयी प्रभा को अन्तर्मानस में भरते हुए शान्त एकान्त समय में उस आत्म-आनंद को पाया जिसे हज़ारों वर्षों की तपस्या करने पर भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।
श्री आज्ञानुसार यहाँ पर प्रातः सायं नियुक्त सेवादार बाईयाँ श्री आरति-पूजा करती हैं। श्री परमहंस अद्वैत मन्दिर में श्री आरति पूजा की मधुरिम ध्वनि का सम्बन्ध यहाँ पर जुड़ा हुआ है, जिससे यहाँ पर बैठे हुए सभी प्रेमी तन्मय होकर हृदय में उल्लास भरते हैं। वे प्रेमी हैं—बुज़ुर्ग माता अथवा लाचार-बीमार जो श्री मन्दिर में नहीं पहुँच पाते, यहाँ आकर श्री आरति-पूजा का लाभ उठाते हैं। इस शान्ति भवन का निर्माण हो जाने से गुरुमुख अधिकाधिक समय भजन-ध्यान में व्यतीत कर अपनी आत्मा का कल्याण करने लगे। ये महापुरुषों के जीवों पर अनन्त-अनन्त उपकार हैं। गुरुमुखजन यहाँ आकर अपनी सुरति को एकाग्र कर भजनाभ्यास का आनन्द लेते है।
श्री आनन्द अमृत कुण्ड
श्री श्री 108 श्री सद् गुरुदेव जी महाराज श्री तृतीय पादशाही जी ने श्री प्रवचन फ़रमाए थे कि श्री परमहंस अद्वैत मन्दिर के चारों कोनों पर श्री आनन्द अमृत कुण्ड होंगे। इन श्री आनन्द अमृत कुण्डों में से सब लोग चरणामृत लेंगे और श्रद्धा एवं भक्ति से पूर्ण हो अपने जीवन का कल्याण करेंगे।
इन पावन प्रवचनों को साकार रूप प्रदान करने के लिए श्री श्री 108 श्री सद् गुरु दाता दयाल जी श्री पंचम पादशाही जी महाराज ने इन श्री आनन्द अमृत कुण्डों की 16 अक्टूबर सन् 1990 को पावन कर कमलों से नींव रखते हुए अमृत तुल्य श्री वचनों में फ़रमाया—
“महापुरुषों की यह धुर दरगाही मौज थी कि श्री आनन्दसर के परिसर में श्री अमृत-कुण्डों का निर्माण किया जाए। आज उस मौज को पूर्ण करने के लिए इनकी नींव का मुहूर्त किया जा रहा है। थोड़े दिनों में ही इनका निर्माण कार्य पूर्ण हो जाएगा। बाईयों-भक्तानियों की ओर भी ये अति शीघ्र बनकर तैयार हो जाएँगे। इन अमृत-कुण्डों से लोग चरणामृत
श्री तृतीय पादशाही जी महाराज जो-जो सेवा फ़रमा गए हैं, यह समझो कि वह सेवा गुरुमुखों के कल्याण एवं उन्नति के लिए है। सही मायनों में ये सच्चा सुख और सच्चा आनन्द प्राप्त करने के साधन हैं। महापुरुष समयानुसार इस धराधाम पर आकर परमार्थ व भक्ति का पथ दर्शाते हैं और गुरुमुखों को सदा-सदा के लिए सेवा की सच्ची दात को प्राप्त करने के साधन जुटाते हैं। गुरुमुख जन इस सेवा में अपना दिल लगाकर अपनी जीवात्मा का कल्याण कर लेते हैं, यही इस मानुष जन्म का लक्ष्य है। जो साधन बने हुए हैं, गुरुमुखजन इससे पूरा-पूरा लाभ उठाते हैं।”
जून 2025
श्री शान्ति भवन कुछ वर्षो पश्चात् संगमरमर की शिलाओं से निर्मित हुआ। चारों ओर की गैलरी, बरामदे तथा प्रांगण व अन्य सभी आवश्यक स्थान भी भव्य नव्य रूप में रूपांतरित हो गए। एकान्त, प्रशान्त, सुरभित वायु युक्त वातावरण प्रेमी गुरुमुखों के हृदय में भजनाभ्यास के लिए उत्सुकता भरता है। यहाँ पहुँचते ही शान्ति एवं प्रफुल्लता अनुभव होने लगती है। दिव्य अलौकिक तेजपुंज मूर्तिमान श्री परमहंस दयाल जी की श्री छवि का ध्यान करते ही अन्तरात्मा परमात्मा में विलय होने का आभास देती है। जीव वास्तविक खुशियों को पाकर गदगद हो जाता है। भजनाभ्यास की संजीवनी से भव दुखों से त्राण मिलता है और काल-व्याल के भय से विमुक्त हो परम लक्ष्य को पाने में सफल हो जाता है। यह भवसागर का जहाज है। जो भी जीव श्रद्धा एवं निष्ठा से यहाँ बैठकर भजनाभ्यास एवं ध्यान करते हैं, उनके अन्तर के कपाट खुल जाते हैं और सुरति उच्च लोकों में विचरण करने लगती है।
श्री सद् गुरुदेव जी महाराज की श्री आज्ञानुसार प्रत्येक पर्व पर यहाँ सत्संग के कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। उस निश्चित समय में संयुक्त रूप से सभी गुरुमुखजन सत्संग का लाभ उठाते हैं। महात्माजन एवं भक्तजन यहाँ बैठकर भजनाभ्यास करते हैं।
आपने अपनी श्री मौज से महात्मा संतोषानन्द जी को अपने समीप बुलाकर पावन वचनों में फ़रमाया—“महात्मा जी ! हमारे परम आराध्यदेव श्री तृतीय पादशाही जी महाराज को श्री श्री 108 श्री द्वितीय पादशाही जी महाराज ने अपनी दिव्य वाणी में फ़रमाया था कि “आप श्री आनन्दपुर का निर्माण एवं विकास करो। महापुरुषों की जन्मस्थली और कर्मस्थली यहीं पर है। जो श्री आनन्दपुर आएगा, उसे सारे तीर्थों का फल स्वयमेव ही प्राप्त हो जाएगा। उसे कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं।” आज श्री शान्ति भवन में श्री परमहंस दयाल जी को विराजमान किया गया है, तो समझो कि यही उनका पावन जन्म-स्थल है। परमार्थ भक्ति के जाज्वल्यमान् भास्कर श्री परमहंस दयाल जी इस धरा पर अवतरित हुए, उसी दिन ही श्री परमहंस अद्वैत मत की नींव रखी गई। यही महापुरुषों के गुप्त सन्देश होते हैं। हमने आपकी हार्दिक अभिलाषा को पूर्ण कर दिया है।”
महात्मा जी इन श्री प्रवचनों को श्रवण कर नतमस्तक हो गए और हृदय से प्रभु जी का कोटि-कोटि आभार प्रकट करने लगे।
श्री शान्ति भवन जीवन के अति उच्च ध्येय का पूरक, जन्मों से बिछुड़ी हुई आत्मा को परमात्मा से मिलाने का साधन बन निराली सुषमा से शोभायमान है। प्रेमी गुरुमुख श्री वचनानुसार भजनाभ्यास करके अपूर्व आनन्द को प्राप्त कर जीवन को खुशियों से भर लेते हैं और लक्ष्य को पाने में सफल हो जाते हैं।
श्री शान्ति भवन (अभ्यास स्थल)
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