विश्वास कीजिए

 विश्वास कीजिए....

   

जनवरी 2025

· कि प्रेम ही आत्मा का मूल स्वभाव है। जिस हृदय में प्रेम बसता है वहाँ द्वेष, ईर्ष्या और क्लेश टिक नहीं सकते।

· कि प्रेम स्वार्थ रहित होता है और जब वह ईश्वर की ओर प्रवाहित होता है, तो भक्ति बन जाता है।

· कि प्रेम में सहिष्णुता और क्षमा के भाव स्वतः प्रकट होते हैं, जिससे संबंधों में मधुरता आती है।

· कि जिसने प्रेम को पा लिया, उसने परमात्मा को पा लिया, क्योंकि परमात्मा स्वयं प्रेम स्वरूप हैं।

· कि जीवन में प्रेम बोइए, वाणी में कोमलता रखिए और व्यवहार में विनम्रता—यही सच्चा धर्म है।

 


दिसम्बर 2025

· कि संतोष ही सच्ची समृद्धि है। जिसने संतोष को अपना लिया, वह भीतर से धनी हो गया।

· कि भौतिक उपलब्धियाँ सीमित सुख दे सकती हैं, पर संतोष असीम शांति देता है।

· कि संतोष कामना रहित होकर आगे की ओर बढ़ता है।

· कि प्रयास किए बिना भी आगे बढ़ना संभव नहीं। अतः निरंतर प्रयास जारी रखिए।

· कि हम जो भी करें, उसे समर्पण भाव से ईश्वर की इच्छा को स्वीकारते हुए प्रसन्न रहें।

 

 


नवम्बर 2025

¨ कि अनुशासन सफलता का मौन सूत्र है। बिना अनुशासन के कोई भी लक्ष्य केवल कल्पना बनकर रह जाता है। अनुशासन वह पुल है जो संकल्प को परिणाम तक पहुँचाता है।
¨ कि अनुशासित व्यक्ति समय का सदुपयोग करता है, अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहता है और विपरीत परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखता है।
¨ कि जीवन में अनुशासन विकसित करते रहने पर मन स्वतः नियंत्रित होने लगता है।
¨ कि उत्तम दिनचर्या बनाने से जीवन में अनुशासन विकसित कर सकते हैं।

 


अक्टूबर 2025

· कि आत्म-विश्वास हर संघर्ष को जीतने की पहली सीढ़ी है। जब आप स्वयं पर विश्वास रखते हैं, तब दुनिया की कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती। आत्म-विश्वास वह आंतरिक शक्ति है जो मनुष्य को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, चाहे रास्ता कितना ही कठिन क्यों न हो। संदेह और भय आत्म-विश्वास के शत्रु हैं। इनसे ऊपर उठकर ही जीवन में स्थायी सफलता प्राप्त की जा सकती है।
आत्म-विश्वास कैसे बढ़ाएँ ?
·   अपने अनुभवों से सीखें, अपनी क्षमताओं को पहचानें।
·   हर छोटे कार्य में भी पूर्णता लाने का प्रयास करें।
·   नकारात्मक विचारों को सकारात्मक दृष्टिकोण से बदलें।
·   ऐसे लोगों के साथ रहें जो आपका उत्साह बढ़ाते हैं।

 


सितम्बर 2025

· कि सफलता केवल बाहरी परिश्रम का परिणाम नहीं है; यह आपके भीतर की मानसिकता और विचारों से भी तय होती है।

· मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही वह बन जाता है। सकारात्मक सोच सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है।

· हर असफलता में सीखने का अवसर छिपा होता है। इस पर विचार करने से मनुष्य आगे बढ़ने की शक्ति प्राप्त करता है।

सफलता के मार्ग पर कैसे बढ़ें ?

· अतः अपने उद्देश्य को स्पष्ट और दृढ़ बनाएँ—

Þ आत्म-विश्वास को बनाए रखें और असफलताओं से न डरें।

Þ प्रेरणादायक व्यक्तित्वों और घटनाओं से प्रेरणा लें।

Þ नियमित रूप से आत्म-मंथन करें और अपने विचारों को सकारात्मक दिशा में ले जाएँ।

 

 

अगस्त 2025

· कि मनुष्य का व्यक्तित्व उसके विचारों का प्रतिबिंब है। यदि आप महान बनना चाहते हैं, तो महान् विचारों को अपनाइए।

· कि हर विचार में निर्माण और विनाश दोनों शक्तिया होती हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप अपने विचारों को किस दिशा में ले जाते हैं।

· कि श्रेष्ठ विचार मनुष्य की मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक स्थिति सभी को प्रभावित करते हैं।

· कि अपने विचारों को श्रेष्ठ बनाकर आप अपने जीवन को सुखद, समृद्ध और सफल बना सकते हैं।

· कि विचार श्रेष्ठ बनाने के लिए अपने उद्देश्य को स्पष्ट करें, नकारात्मक सोच से बचें और सफलता के उदाहरणों से प्रेरणा लें।


जुलाई 2025

· कि समय जीवन की सबसे बड़ी धरोहर है और इसका एक-एक क्षण अनमोल रत्नों से भी अधिक कीमती है। यदि एक पल निकल गया तो वह कभी लौटकर नहीं आता; इसलिए हर पल को जागरूक होकर जिएँ।

· कि भूतकाल—जो बीत चुका है—अब मात्र स्मृति है और वह हमें अनुभव प्रदान करता है। अतः भूतकाल की उपलब्धियों या असफलताओं पर अत्यधिक गर्व या पछतावा न करें।

· कि वर्तमान ही आपका वास्तविक समय है, जहाँ आप अपने सभी गुणों और शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं। वर्तमान ही वह क्षण है, जिसमें आप कर्म कर सकते हैं और अपने भविष्य का प्रारूप गढ़ सकते हैं। अतः इस बहुमूल्य वर्तमान को बिल्कुल व्यर्थ न करें

   


जून 2025

¨ कि आपकी काया में ही एक महान् धर्म युद्ध करने के लिए कुरुक्षेत्र रूपी धर्म क्षेत्र है।

¨ कि आपकी काया में ही कौरव और पांडवों की दोनों सेनाएँ इस धर्म युद्ध को लड़ने के लिए तैयार खड़ी हैं।

¨ कि जैसे पांडव सेना अर्जुन के रथ पर विराजित भगवान श्रीकृष्ण जी को अपना पथ प्रदर्शक बनाकर विजय पाती है, वैसे ही सच्चे गुरुमुख सेवक अपनी काया रूपी युद्ध क्षेत्र में मन में स्थित अहंकार आदि विकारों की सेना के विरुद्ध अपने सद् गुरु को अपना सहायक रथवान् बना कर विजय पा लेते हैं।

¨ कि सद् गुरु की कृपा से ही हमें विजय प्राप्त होगी। अतः मन व माया के विकारों की सेना को परास्त करने के लिए निरंतर साधना रूपी संघर्ष जारी रहे।    

 


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