जुलाई 2026
मानव जीवन पर सन्तों के उपकार
श्री परमहंस अद्वैत मत के शाश्वत् ज्योति स्तंभ श्री परमहंस सद्गुरुदेव जी श्री तृतीय पादशाही जी जब पारमार्थिक सिंहासन पर आसीन होकर अपने प्रवचनों की अमृत वर्षा से अनेक जीवों को जागृत करने लगे तब उस सत्संग की गंगा धारा में स्नान करके अनेकों लोग अपने आप को पवित्र करने लगे। आपकी पावन नूरानी छवि के दर्शन करके सब स्वयं को धन्य बना रहे थे। उसी समय एक अनन्य प्रेमी ने आपके उपकारों का वर्णन करते हुए निम्न पद्य में अपने हृदय के भाव प्रकट किए हैं —
संतों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि उनका जीवन अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और समस्त जीवों के कल्याण के लिए समर्पित होता है। वे किसी अपेक्षा या आग्रह से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि अपने सहज स्वभाव से ही परोपकार करते हैं।
जैसे सूर्य अपने तेज से सम्पूर्ण संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही संत अपने ज्ञान और करुणा से मानव जीवन को आलोकित करते हैं। सूर्य यह नहीं देखता कि कौन योग्य है और कौन अयोग्य; उसकी किरणें हर घर, हर दिशा और हर प्राणी पर समान रूप से पड़ती हैं। उसी प्रकार संतों की कृपा और उनकी शिक्षाएँ भी सबके लिए समान रूप से उपलब्ध रहती हैं।
इसी प्रकार बादल भी अपने स्वभाव से ही वर्षा करते हैं। ठीक इसी प्रकार संत महापुरुष भी इस संसार में अवतरित होकर निरंतर जनकल्याण में लगे रहते हैं। वे अपने सुख-दुःख की चिंता किए बिना लोगों को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान की ज्योति की ओर ले जाते हैं। उनका जीवन तप, त्याग और सेवा का जीता-जागता उदाहरण होता है।
संतों का उद्देश्य केवल उपदेश देना नहीं, बल्कि मनुष्यों के हृदय में दिव्य चेतना जगाना होता है। वे इस संसार में उस अनन्त और अनामी लोक की ज्योति लेकर आते हैं, जिससे मानव जीवन को सही दिशा मिल सके। उनके वचन और आचरण दोनों ही लोगों के लिए प्रेरणा बनते हैं।
दृष्टांत—लकड़हारा और पारस पत्थर
एक निर्धन लकड़हारा था जो दिन भर जंगल में लकड़ियाँ काटता और बड़ी मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाता। एक दिन उसकी मेहनत और सरलता देखकर एक सिद्ध संत को उस पर दया आ गई। संत ने उसे एक चमकता हुआ पत्थर देते हुए कहा—वत्स, यह पारस पत्थर है। इसे लोहे से स्पर्श करोगे तो वह सोना बन जाएगा। अब अपनी दरिद्रता दूर करो और शेष जीवन परमात्मा की भक्ति में लगाओ। मैं अगले वर्ष इसे वापस ले लूँगा।
लकड़हारा खुशी-खुशी घर लौटा। उसने सोचा, आज तो बहुत थक गया हूँ, कल बाजार से लोहा ले आऊँगा और उसे सोना बनाऊँगा। अगले दिन उठा तो फिर मन में आलस्य आ गया। इस प्रकार वह भूल गया कि पारस पत्थर से उसे करना क्या है। वह लकड़ियाँ काटता रहा और धीरे-धीरे पूरा वर्ष यूँ ही गँवा दिया। सिद्ध संत ने आकर उस मूर्ख से वह पारस वापस ले लिया। वह लकड़हारा अपनी गरीबी को देख देख कर और उस दुर्लभ पारस पत्थर से काम न लेने की बात सोच-सोच कर पछताने लगा परंतु अब पछाए क्या बने।
यदि मनुष्य इस दुर्लभ अवसर का सदुपयोग करे प्रभु-नाम का स्मरण करे और सेवा-भक्ति की कमाई करे तो वह कमाई सदा-सदा तक इसके साथ रहेगी, इसे सुखी रखेगी और आत्मा को सचखंड में ले जाएगी। इस पर सत्पुरुषों के चेतावनी भरे वचन हैं—
अर्थ—सत्पुरुष संसारी मनुष्यों को चेतावनी दे रहे हैं। हे मनुष्य ! तू मोह और अज्ञान की नींद में क्यों सोया हुआ है ? जाग और समझ कि यह संसार स्थायी घर नहीं है। जिस शरीर को तू अपना मानकर उसके लिए इतना प्रयास करता है, वह भी अंत समय में तेरे साथ नहीं रहने वाला। जिन माता-पिता, पुत्र, भाई-बंधु और प्रियजनों से तूने प्रेम और संबंध जोड़े हैं, वे भी मृत्यु के समय तेरा साथ नहीं देते; जब प्राण शरीर से निकल जाते हैं, तब वही लोग उस शरीर को अग्नि को समर्पित कर देते हैं। संसार का व्यवहार केवल तब तक है जब तक मनुष्य जीवित है—जीवन समाप्त होते ही सब संबंध और व्यवहार समाप्त हो जाते हैं। इसलिए सत्पुरुष गुरु नानक देव जी समझाते हैं कि यह सारा जगत और इसके संबंध स्वप्न के समान क्षणभंगुर हैं; सच्चा और शाश्वत सहारा केवल परमात्मा का नाम और उसके गुणों का स्मरण ही है। अतः मानव जीवन के इस दुर्लभ समय को पाकर इसमें भक्ति की कमाई करलो और अपना परलोक संवार लो।
अपने श्री परमहंस सद्गुरुदेव जी श्री पंचम पादशाही जी की अमर वाणी के वचन हैं—
सामान्यतः मनुष्य जन्म लेते ही परिवार, आजीविका, प्रतिष्ठा और संपत्ति की चिंता में ऐसा उलझ जाता है कि उसे अपने अस्तित्व के मूल प्रश्न—मैं कौन हूँ और मुझे किस उद्देश्य से भेजा गया है? परंतु मनुष्य को विचार करने का अवसर ही नहीं मिलता। वह दिन-रात परिश्रम करता है और धन और साधन जुटाता है। अंततः जब जीवन समाप्त होता है, तो उसे अनुभव होता है कि जिन वस्तुओं के लिए उसने पूरा जीवन लगा दिया, वे सब यहीं रह जाती हैं। इस प्रकार उसका बहुमूल्य जीवन बिना आत्मिक उन्नति के व्यर्थ चला जाता है।
सत्पुरुषों का संदेश है कि मनुष्य को चाहिए कि वह संसार के कर्तव्यों को पूरा करते हुए और उन्हें अच्छी तरह निभाते हुए भी अपने वास्तविक उद्देश्य—ईश्वर की बंदगी, आत्म-चिन्तन और भक्ति को न भुलाए। रोजी-रोटी कमाना आवश्यक है, क्योंकि शरीर के निर्वाह के बिना साधना भी संभव नहीं; परंतु जीवन निर्वाह की चिंता में ही न लगा रहे क्योंकि जिस परमेश्वर ने हमें यह तन और जीवन दिया है वह स्वयं भी चिंता करने वाला है। जो मनुष्य प्रभु-स्मरण में लग जाता है तो निश्चय ही वह प्रभु उसकी चिंता करता है और उस की हर प्रकार से सहायता करता है। गीता में भगवान श्री कृष्ण जी कथन करते हैं —
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता)
भावार्थ—जो भक्त अपनी संपूर्ण शक्ति और चेतना केवल भगवान को समर्पित कर देते हैं, नित्य और निरंतर उनकी पूजा उपासना में संलग्न रहते हैं तो भगवान स्वयं उनकी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों चिंताओं का उत्तरदायित्व खुद ले लेते हैं।
ग्राम सीतापुर में एक वृद्ध ब्राह्मण रहता था — नाम था हरिदास। जीवन अत्यंत साधारण था। मिट्टी की कुटिया, दो जोड़ी वस्त्र और भगवान श्रीकृष्ण की एक छोटी-सी मूर्ति, बस यही उसकी सम्पत्ति थी। हरिदास का एक ही नियम था सुबह से रात तक वह हर कार्य से पहले भगवान का नाम लेता और दिन में कई बार गीता का उक्त श्लोक दोहराता गाँव वाले अक्सर उसका मज़ाक उड़ाते, हरिदास ! केवल भजन से पेट नहीं भरता। कुछ काम-धंधा भी किया करो ! वह मुस्करा देता और कहता, जब वह पालने वाला है, तो हमें कैसी चिंता ?
बहुत समय बीत गया। एक वर्ष ऐसा आया जब गाँव में भयंकर अकाल पड़ गया। खेत सूख गए, कुएँ खाली हो गए। लोग शहरों की ओर पलायन करने लगे। हरिदास के पास तो पहले ही कुछ नहीं था। अब जो थोड़ा-बहुत लोग दे देते थे, वह भी बंद हो गया। कई दिन बीत गए, उसके घर में चूल्हा तक नहीं जला। उसकी देह कमज़ोर हो गई, पर उसकी जिह्वा पर वही श्लोक था—योगक्षेमं वहाम्यहम्।
एक रात वह भूखा ही सो गया। सोते-सोते उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसने मूर्ति के आगे भगवान से कहा, हे प्रभु, मैं आपसे कुछ माँगता नहीं… पर आज शरीर साथ नहीं दे रहा। यदि यह आपकी इच्छा है, तो मैं प्रसन्न हूँ… पर यदि आप चाहें, तो मुझे संभाल लीजिए।
उसी रात गाँव के जमींदार रघुनाथ सिंह को स्वप्न आया। उन्होंने देखा कि एक दिव्य बालक— पीताम्बर पहने, मुरली हाथ में लिए। उनसे कह रहा है—
मेरा एक भक्त भूखा है। तुम सो कैसे सकते हो ? रघुनाथ सिंह घबराकर उठ बैठा। उसका हृदय तेज़ी से धड़क रहा था। सुबह होते ही उसने नौकरों से कहा कि तुरंत अन्न, दाल, घी और फल लेकर हरिदास के घर जाओ। जब नौकर सामान लेकर हरिदास की कुटिया पहुँचे, तो वह तुलसी के पास बैठा जप कर रहा था। सामान देखकर वह चकित रह गया। पूछा, यह सब किसने भेजा ? नौकर ने कहा, जमींदार जी ने भेजा है। उन्होंने कहा है कि यह भगवान का आदेश है। हरिदास की आँखों से आँसू बह निकले। वह मूर्ति के सामने गिर पड़ा और बोला, हे प्रभु ! आपने तो सच में कहा है। योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
जून 2026
(आत्म-साक्षात्कार की अनंत यात्रा)
मनुष्य का जीवन कोई साधारण प्राकृतिक घटना या जैविक संयोग मात्र नहीं है। भारतीय दर्शन और ऋषियों के अनुभव के अनुसार, यह उस अनंत सत्ता की अपार करुणा का वह मूर्त रूप है, जो उसने जीवात्मा को चौरासी लाख योनियों के कठिन प्रयास के बाद प्रदान किया है। इस जीवन का मूल्य इतना अधिक है कि संसार की समस्त संपदाएँ मिलकर भी इसकी एक स्वांस का मोल नहीं चुका सकतीं। जिस प्रकार नेत्रों की महत्ता दर्शन में है और पैरों की सार्थकता चलने में—ठीक उसी प्रकार मानव देह का सर्वोच्च मूल्य उसके उस परम उद्देश्य में निहित है जिसके लिए यह हमें मिला है। वह उद्देश्य है—इस सृष्टि के स्वामी की पहचान करना, उसकी प्राप्ति के लिए सच्चे मन से प्रयास करना और अंततः उसी परमात्मा में विलीन हो जाना।
सत्पुरुषों का उपदेश है कि मनुष्य का यह जीवन बड़े सौभाग्य से मिलता है और यह बार-बार प्राप्त नहीं होता। यदि हम इस अमूल्य समय को व्यर्थ गंवा देंगे, तो अंत में केवल पछतावा ही शेष रहेगा। अतः इस जीवन को सफल बनाने का एकमात्र मार्ग हर स्वांस में ईश्वर का स्मरण (नाम-सुमिरन) करना है। यही भक्ति हमें जन्म-मरण के चक्र (आवागमन) से मुक्त कर मोक्ष की प्राप्ति कराती है
भक्ति का धर्म—अध्यात्म के प्रखर सूर्य संत कबीर साहब जी ने मानव जीवन के लक्ष्य को अत्यंत सूक्ष्मता से समझाते हुए कहा है—
इस संदर्भ में एक कथा प्रचलित है। एक बार एक धनी व्यक्ति ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस से अपनी अशांति का कारण पूछा। तब उन्होंने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “सुनो भाई, एक व्यक्ति के पास बहुमूल्य हीरा था। वह उसे एक पेड़ के नीचे रखकर झाड़-झंखाड़ इकट्ठा करने लगा। जब लौटा तो हीरा गायब था। वह काँटों में हीरा ढूंढता रहा पर हीरा तो चोर ले गए थे। अब समझो, मनुष्य के पास मानव जीवन रूपी हीरा है, पर वह संसार के काँटे-झाड़ (मोह-माया) इकट्ठा करने में लगा है। जबकि परम शान्ति उसके भीतर है। जब तक मनुष्य संसारी रस भोगों के झाड़-झंखाड़ इकट्ठा करने में लगा रहेगा यह हीरा व्यर्थ में काल रूपी चोर चुरा ले जाएगा। परम शान्ति को पाने के लिए तो प्रभु-भक्ति की आंतरिक प्रक्रिया अपनानी है। उस धनी व्यक्ति को बोध हुआ कि वास्तव में प्रभु-भक्ति के द्वारा प्रभु को रिझाकर ही पहले मन की आंतरिक शुद्धि करो तब परम शान्ति की उपलब्धि होगी।
संसार की रचना एक जटिल द्वंद्व है। गोस्वामी तुलसीदास जी ‘श्रीरामायण’ में इस रहस्य को उद्घाटित करते हैं—
परमात्मा ने इस सृष्टि को जड़-चेतन और गुण-दोष के मिश्रण से रचा है, जो दूध और पानी की तरह मिले हुए हैं। यहाँ एक ‘साधक’ की भूमिका उस ‘हंस’ की तरह होनी चाहिए जो अपनी विवेक बुद्धि से केवल दूध (गुण) को ग्रहण करता है और जल (विकार) को त्याग देता है।
ऐसे ही संसार की रचना में गुण दोष भरे पड़े हैं, मनुष्य अज्ञानतावश और नहीं तो एक दूसरे की बुराइयाँ इकट्ठा करने में लग जाते हैं, गुण ग्रहण नहीं करते यदि गुण ग्रहण करें तो पूरा जीवन ही सफल हो जाए। एक बार महान् संत बुद्ध से एक व्यक्ति ने अपने दुष्ट पड़ोसियों की शिकायत की, तो बुद्ध ने उससे पूछा, “क्या तुम बाज़ार की हर दुकान से हर सामान खरीद कर घर ले आते हो ?” व्यक्ति ने कहा, “नहीं, केवल वही जो आवश्यक है।” बुद्ध बोले, “ठीक ऐसा ही समझो, लोगों की बातों के बाज़ार से केवल वही ग्रहण करो जो कल्याणकारी हो—अच्छी सीख और प्रेरणा हो। बाकी सब छोड़ दो।” यही ‘हंस-वृत्ति’ मनुष्य को द्वंद्वों से बचाकर शांति के मार्ग पर प्रशस्त करती है।
इस संसार की रचना में दूसरा ग्रहण करने का आत्म-तत्व है। यह आत्म-बोध इस जड़ शरीर से परे की रचना में विद्यमान आत्म-तत्व को ग्रहण करने का है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने वचनों में कथन किया है—
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि स्थूल शरीर से श्रेष्ठ इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों से सूक्ष्म मन है और मन से भी ऊँची शक्ति बुद्धि है। किंतु, जो इस बुद्धि से भी परे सबका साक्षी है—वही आत्मा है।
यदि हम प्रकृति का अवलोकन करें, तो पाते हैं कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है। जैसे अंधकार केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है। प्रकाश हो जाने पर अंधकार नष्ट हो जाता है। इस असत्य और मिथ्या संसार में केवल प्रभु-नाम ही सत्य है, अतः इसी सार पदार्थ को ग्रहण करना ही सब से बड़ा विवेक है। अंत में सन्तजन अपनी वाणी में इसी सत्य नाम को ग्रहण करने का उपदेश करते हैं। उनकी सरल वाणी में यही कथन किया गया है—
मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसकी मुट्ठी बंद होती है, मानो सब कुछ अपने साथ लेकर आया हो; परंतु जब वह इस संसार से जाता है तो उसके हाथ खाली होते हैं। इसका अर्थ यह है कि इस पृथ्वी का कोई भी पदार्थ हमारे साथ नहीं जा सकता। जब तक यह दुनिया है, काम कभी खत्म नहीं होगा। हमेशा कुछ न कुछ व्यस्तता बनी ही रहेगी। इसलिए जीवन में से कुछ समय निकालकर परमात्मा से प्रेम और जुड़ाव भी ज़रूरी है। दुनिया में रहो, लेकिन दुनिया को अपने भीतर मत रहने दो। अपना जीवन सहज रूप से जीते रहो पर परमात्मा के स्मरण-भजन में कभी लापरवाही न हो।
मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा कर्तव्य यह है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानें।
यदि हम प्रकृति का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें तो पाएँगे कि इस संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है। ऋतुएँ बदलती हैं, दिन के बाद रात आती है और जन्म के बाद मृत्यु। यहाँ तक कि हमारा शरीर भी निरंतर बदलता रहता है। बाल्यावस्था से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य का रूप ही बदल जाता है। इसी प्रकार अंधकार का अस्तित्व भी स्वतंत्र नहीं है; वह केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है। जैसे ही दीपक जलता है, अंधकार स्वयं नष्ट हो जाता है। यही उदाहरण हमें जीवन का एक बड़ा सत्य समझाता है—अज्ञान का अंधकार केवल ज्ञान के प्रकाश से मिटता है।
संतजन इसी तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि यह संसार अस्थायी है। धन, पद, प्रतिष्ठा, संबंध—ये सब समय के साथ बदल जाते हैं। जो आज हमारा है, वह कल किसी और का हो सकता है। इसलिए संत हमें एक संतुलित जीवन जीने की शिक्षा देते हैं—
संसार के कर्तव्यों को पूरा करते हुए और परिवार, समाज और कार्य-क्षेत्र में अपने दायित्व निभाते हुए भी मन को संसार के मोह में इतना न बाँधें कि हम अपने परम लक्ष्य—ईश्वर स्मरण को भूल जाएँ।
जैसे कमल का फूल जल में रहते हुए भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही मनुष्य को संसार में रहते हुए प्रभु-स्मरण में स्थित रहना चाहिए। जीवन की व्यस्तताओं में से थोड़ी-सी फुर्सत निकालकर नाम-स्मरण, ध्यान और भजन करना जीवन को सार्थक बना देता है। अंततः यही प्रभु-नाम ही वह अमर सत्य है जो इस नश्वर संसार में भी हमें शाश्वत शांति का अनुभव कराता है।
मई 2026
(संतों का उपकार–मोह से मुक्ति की ओर)
अर्थ और व्याख्या—भगवान (गोविंद) द्वारा दी गई स्वतंत्र रचना के कारण जीव अपने कर्मों के अनुसार अधोगति को प्राप्त हो जाता है; परंतु गुरु के उपदेश से वह जन्म मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाता है। ईश्वर ने मनुष्य को कर्म करने की स्वतंत्रता प्रदान की है, जिससे वह उचित या अनुचित मार्ग चुन सकता है। दुष्कर्मों का परिणाम दुःख है, किंतु गुरु का उपदेश मनुष्य को सही दिशा देकर उसे इस दुःखद परिणाम से बचाता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। भगवान की रचना में जीव अपने कर्मों के अधीन रहता है, परंतु गुरु की कृपा से वह कर्म-बंधन से मुक्त होकर स्वतंत्र हो जाता है। सामान्यतः मनुष्य अपने कर्मों के फलस्वरूप सुख-दुःख के चक्र में बँधा रहता है। गुरु ज्ञान प्रदान करके उसे कर्मबंधन से ऊपर उठाते हैं। भक्ति के माध्यम से वह ईश्वर से जुड़कर आनंद की अवस्था को प्राप्त करता है। संसार रूपी भवसागर में जीव निरंतर डूब रहा है; कवि ‘सुन्दर’ कहते हैं कि गुरु उसे इस दुःख से बाहर निकाल लेते हैं। जन्म-मृत्यु और मोह-माया से भरा यह संसार एक अथाह सागर है। गुरु ही कृपालु नाविक हैं, जो ज्ञान और भक्ति की नौका से जीव को पार उतारते हैं। गुरु की महिमा का पूर्ण वर्णन संभव नहीं; साधक के लिए गुरु का महत्व ईश्वर से भी अधिक है। गुरु ही वह माध्यम हैं जो ईश्वर से मिलाते हैं। जैसे सूर्य को देखने के लिए नेत्र आवश्यक हैं, वैसे ही ईश्वर के साक्षात्कार हेतु गुरु रूपी दिव्य दृष्टि आवश्यक है।
संत-महात्मा इस संसार में परमार्थ और परोपकार के लिए अवतरित होते हैं। उनका उद्देश्य जीवों को मोह-माया के दल-दल से निकालकर भक्ति और प्रेम का अमृत प्रदान करना होता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के प्रभाव से मनुष्य अपने आत्मिक धन को खो देता है और चिंता व अशांति में घिर जाता है।
रेशम के कीड़े का दृष्टांत—रेशम का कीड़ा अपने मुख से धागा निकालकर स्वयं अपने चारों ओर कोकून बना लेता है और उसी में कैद होकर मर जाता है। इसी प्रकार मनुष्य भी धन, परिवार और मोह के बंधन स्वयं रचता है और उनमें उलझकर आत्मिक विकास से वंचित रह जाता है। इसीलिए कहा गया है—
अर्थात् मोह ही सभी बीमारियों/उपद्रव की जड़ है, जिससे अनेकों दु:ख उत्पन्न होते हैं। यहाँ मोह को सभी दुःखों का मूल कारण कहा है। अब इस मोह-मुक्ति का अनूठा उपाय एक संत और सेठ की कथा में वर्णन किया जाता है।
एक नगर में एक सेठ अपने व्यापार में अत्यधिक व्यस्त होकर परिवार के मोह में पूर्णतः फँसा हुआ था। एक दिन एक महात्मा उसकी दुकान पर आए और राम-राम कहा, परंतु सेठ ने ध्यान नहीं दिया। कई बार राम-राम पुकारने पर भी जब सेठ ने उपेक्षा की, तो महात्मा मौन होकर चले गए। फिर भी स्मरण रहे—
साधूनां दर्शनं पुण्यं तीर्थभूता हि साधवः।
तीर्थं फलति कालेन सद्यः साधू समागमः॥
अर्थ—संतों का दर्शन तत्काल पुण्यप्रद और तीर्थ रूप होता है। इतना ही नहीं तीर्थ तो समय पर ही फलीभूत होते हैं, संत समागम तो तत्काल फलदायी होता है।
संत के हृदय में दया उमड़ आई अतः वे सेठ के कल्याण हेतु उपाय सोचने लगे। सोच विचार कर महात्मा ने योग शक्ति से उसी का रूप धारण किया। प्रातः जब सेठ सैर करने गए तब उन्होंने सेठ का ही रूप धारण कर लिया और उसके घर जाकर परिवार को सावधान किया कि मैंने एक बहरूपिया देखा है जिसने मेरा ही रूप वेष बना रखा है। यदि वह व्यक्ति घर आए तो उसे घर में प्रवेश न करने दें। यह कहकर वे महात्मा सेठ के रूप में उनके स्थान पर बैठ गए। जब वास्तविक सेठ घर लौटा तो उसे बहरूपिया समझकर घर वालों ने घर से निकाल दिया गया। बहुत चीखने चिल्लाने पर भी किसी ने उसकी एक न सुनी। अंत में न्यायालय की शरण में गया वहाँ भी महात्मा ने घर का पूरा विवरण बताकर स्वयं को असली सेठ सिद्ध कर दिया। असली सेठ निराश होकर और सब कुछ खोकर नदी किनारे जा बैठा। शोक की अग्नि में उसका अहंकार और मोह नष्ट हो गया। महात्मा जी द्वारा पुकारा गया नाम ही उसका संगी रह गया। निराश सेठ के लिए अब ईश्वर की शरण के अतिरिक्त कुछ न था। उसी का नाम जपने लगा। संतों के वचन उसे याद आने लगे।
सन्तों की सब क्रिया तो दूसरों की भलाई के लिए ही थी अगले दिन महात्मा वास्तविक रूप में प्रकट हुए —
महात्मा बोले—सेठ जी, राम राम। सेठ ने उठकर तुरंत चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और अपने ऊपर आए संकट से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना की। महात्मा ने कहा—छुटकारा संकट से हम दिला देंगे, परंतु क्या भविष्य में आप हमारा उपदेश मानोगे। सेठ ने तुरंत कहा महाराज जी, मैं आपका उपदेश पूरा-पूरा मानूँगा। मुझ पर आप दया करें। संतों ने कृपा करके उसे नाम दीक्षा दी और कहा कि देखो हमने तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के लिए ही यह रचना रची थी। तुम सब का कल्याण इसी में है सत्संग में आया करो, अपने धन का कुछ अंश परमार्थ में लगाओ। सत्य-नाम का सुमिरण करते रहो। अब अपने घर जाओ, तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा।
डूबत रहा भवसिंधु में, लोभ मोह की धार ।
दरिया गुरु तैरू मिला, कर दिया पैले पार ॥
भावार्थ—जीवात्मा इस संसार रूपी अथाह समुद्र में निरन्तर डूबती-उतराती रहती है। लोभ (लालच) और मोह (माया, आसक्ति) की प्रबल धारा उसे बहाए ले जाती है। वह अपने बल पर इससे निकल नहीं पाती। परन्तु जब संत दरिया साहिब कहते हैं कि इस संसार के सागर में दरिया के समान उदार और करुणामय गुरु मिल जाते हैं, तब वही गुरु उसे इस भवसागर से पार उतार देते हैं। गुरु तैराक की भाँति होते हैं जो स्वयं भी तैरना जानते हैं और दूसरों को भी डूबने से बचाकर सुरक्षित किनारे तक पहुँचा देते हैं। यह काम वे सत्य-नाम के सुमिरन में जीव को लगाकर करते हैं।
यह उपदेश सुनकर सेठ ने सत्संग, सेवा और सुमिरन में अपना जीवन लगा दिया और संतों की कृपा से सेठ ने अपना व अपने परिवार का उद्धार कर लिया। वास्तव में संत ही जीव के सच्चे उद्धारक होते हैं।
नश्वर देह में स्वयं की खोज
वैराग्य से आत्म-बोध की यात्रा—संसार की ‘मृग-तृष्णा’ और मानव मन आज के भौतिकवादी युग में एक ऐसी दौड़ का हिस्सा बन गया है जिसकी कोई समाप्ति नहीं है। हम हर सुख देने वाली वस्तुओं को इकट्ठा करने को ही ‘जीवन’ मान बैठे हैं। किंतु इतिहास साक्षी है कि समय की रेत पर न बड़े-बड़े महलों के निशान बचे, न रावण जैसे बलशाली की सोने की लंका और न ही सिकंदर जैसे विजेताओं की हुकूमत। इस लेख का उद्देश्य उन महापुरुषों की वाणी के प्रकाश में जीवन के वास्तविक अर्थ को समझना है, जिन्होंने संसार की क्षणभंगुरता को पहचान लिया था।
संत सहजोबाई जी ने अपनी वाणी में कथन किया है—
विचार कीजिए, एक बुलबुला पानी की सतह पर उठता है, क्षण भर के लिए सूर्य की किरणों को परिवर्तित कर इंद्रधनुष के रंगों से चमकता है और अगले ही पल फूटकर वापस जल में समा जाता है। हमारा शरीर भी पंच तत्वों का एक ऐसा ही बुलबुला है। हम इसे सजाने-संवारने में अपना सारा जीवन लगा देते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि इसकी ‘एक्सपायरी डेट’ हर पल नज़दीक आ रही है। सहजोबाई जी कहती हैं कि अज्ञान की नींद में मत सोओ। जब तक स्वांस चल रही है, उस ‘पीव’ (परमात्मा) से मिलने का संकल्प कर लो।
आपन ही कूँ खोज मिलैं जब राम सनेही ।
हम सुख को बाहर की वस्तुओं में खोजते हैं, जबकि वह हमारे भीतर ‘राम’ (चेतना) के रूप में स्थित है। जैसे कस्तूरी मृग अपनी ही नाभि की सुगंध को जंगल में खोजता फिरता है, वैसे ही मनुष्य अपने भीतर के आनंद को गाड़ियों, बंगलों और पदों में खोज रहा है। अंत में सहजोबाई जी कहती हैं कि हरि परमेश्वर को जो भूल कर बाहर फिर रहे हैं उनका जीवन व्यर्थ चला जा रहा है। यह याद रखो कि सुख केवल प्रभु-सुमिरण से ही मिल सकता है अन्य किसी उपाय से नहीं।
महाराज भर्तृहरि, जिन्होंने सत्ता के शिखर और भोग की पराकाष्ठा को देखा था, उन्हें सुख शान्ति नहीं मिली। तब गुरु शरण में आए योग साधना की, भजन अभ्यास किया तब उन्हें जो अनुभव हुआ वह अपने ‘वैराग्य शतक’ में लिखते हैं—
न संसारोत्पन्नं चरितमनुपश्यामि कुशलं विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः ।
महद्भिः पुण्यौघैश्चिरपरिगृहीताश्च विषया भवन्तो भीष्मन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ॥
(वैराग्य शतकम्)
अर्थात् मैं इस संसार में ऐसा कोई भी कार्य या सुख नहीं देख पाता जो वास्तव में कल्याणकारी हो। जब मैं गहराई से विचार करता हूँ, तो मुझे अपने पुण्यों के फल से भी डर लगने लगता है क्योंकि बहुत अधिक पुण्यों के संचय से प्राप्त होने वाले ये सांसारिक भोग, अंत में भोगियों को भारी विपत्ति देने के लिए उसी प्रकार डराते हैं जैसे कोई भयानक शत्रु सामने खड़ा हो।
जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति को नमक का पानी पिलाया जाए, तो उसकी प्यास बुझने के बजाय और बढ़ जाती है, वैसे ही इंद्रिय-सुख तृप्ति नहीं देते, बल्कि वासना की आग को और भड़काते हैं। आज के संपन्न समाज को देखें—जिनके पास अपार लक्ष्मी, मोटर-गाड़ियाँ और बंगले हैं, जिन्हें समाज ‘सर्वसुख संपन्न’ कहता है, वे भीतर से ‘जर्जर’ हैं। वे तनाव (Stress), अवसाद (Depression) और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। उन्हें ‘दुख का घुन’ भीतर ही भीतर खा रहा है। यह सिद्ध करता है कि बाहरी वैभव मन की शांति की गारंटी नहीं है।
जैसे एक छोटी सी बूंद जब तक अपनी स्वतंत्र पहचान (अहंकार) बनाए रखती है, वह तपती धूप में सूख सकती है, लेकिन जैसे ही वह समुद्र में समा जाती है, वह स्वयं समुद्र बन जाती है। भक्ति मार्ग में ‘स्व’ को खोना ही ‘सर्व’ को पाना है।
हम एक किराए के मकान में रहते हुए उसे सजाते तो हैं, पर यह जानते हैं कि एक दिन इसे खाली करना होगा। वैसे ही यह संसार भी एक ‘सराय’ है। यहाँ संपत्ति का संग्रह करना ऐसा ही है जैसे कोई मुसाफिर स्टेशन के बेंच को अपना पलंग समझकर उस पर कब्ज़ा करने की कोशिश करे।
भोग ऐश्वेर्यों के इच्छुक,
हैं केवल अज्ञानी ही ।
सार वेदों-शास्त्रों का,
वे बताते बस यही ॥
लक्ष्य है जीवन का केवल,
भोग सुख पाना अपार ।
इससे बढ़कर अन्य कोई,
जग में नहीं ज्ञान का सार ॥
(आनन्द गीता)
वे लोग जो केवल भोग-विलास और ऐश्वर्य (धन-सम्पत्ति) की इच्छा रखते हैं, वास्तव में ज्ञान से रहित यानी अज्ञानी हैं। वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य (आत्मा का कल्याण) को नहीं पहचान पाते। ऐसे अल्पज्ञानी लोग वेदों के केवल उन्हीं हिस्सों (कर्मकाण्ड) पर ध्यान देते हैं जो स्वर्ग की प्राप्ति या सांसारिक लाभ का वादा करते हैं। वे वेदों के परम लक्ष्य (परमात्मा) को छोड़कर केवल सतही लाभ की प्रशंसा करते हैं।
उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ‘अपार भोग और सुख’ पाना होता है। वे मानते हैं कि इसके अलावा संसार में कोई सत्य नहीं है और न ही इससे बढ़कर कोई ज्ञान है।
राजा भर्तृहरि की परीक्षा
राजा भर्तृहरि के योग-मार्ग में प्रविष्ट होने के पश्चात् उनके गुरु गोरखनाथ ने उनकी आंतरिक दृढ़ता, वैराग्य और अहंकार-त्याग की परीक्षा लेने का निश्चय किया। गुरु भली-भांति जानते थे कि राजपाट, धन और वैभव का बाहरी त्याग करना अपेक्षाकृत सरल है, किंतु मन में छिपा अभिमान, प्रतिष्ठा और ‘मैं’ का भाव समाप्त करना अत्यंत कठिन होता है। वास्तव में गुरुमुख का कर्तव्य तो यह है—
गुरु के घर में अर्थात् गुरु दरबार में यदि सेवक रहता है अथवा उनकी शरणागति में आकर भक्ति का लाभ उठाना चाहता है तो उसे भी यही उपदेश है कि गुरु की आज्ञा को मन से स्वीकार करे। गुरु की मौज में खुशी से रहे। क्योंकि मन के अवगुणों पर चोट पड़ेगी तभी अवगुण दूर होंगे। गुर की आज्ञा चाहे कैसी भी हो, चाहे कितनी भी कड़वी क्यों ना मन को लगे, उसे बर्दाश्त करता जाए। इसी में उसका कल्याण है। इसके साथ ही कभी अपने आप को बहुत बड़ा न समझे। अपने आप को ज्ञानवान समझने या दूसरों पर प्रभाव डालने की कोशिश न करे। यहाँ सेवक को उसकी अवस्था के बारे में बताते हुए सलाह दी जा रही है कि वह अपने आप को दूसरों के आगे झुका कर चले। प्राप्त किए हुए ज्ञान में कहीं अहंकार का अंश न आ जाए।
गुरु गोरखनाथ जी ने अपने शिष्य राजा योगी बने भर्तृहरि की परीक्षा के लिए एक आदेश दिया—यदि तुम सच्चे योगी बनना चाहते हो, तो अपने ही महल में जाकर भिक्षा माँग कर लाओ।
गुरुदेव का यह आदेश सुनकर भर्तृहरि के अंतःकरण में एक क्षण के लिए हलचल उत्पन्न हुई। जो कभी विशाल साम्राज्य के स्वामी थे, जिनके आदेश से राज्य की व्यवस्था चलती थी, जिन्हें प्रजा इन्द्रतुल्य सम्मान देती थी, उन्हें अब उसी महल के द्वार पर एक साधारण भिक्षुक बनकर खड़ा होना था। यह केवल भिक्षा माँगना नहीं, बल्कि अपने राजसी अहंकार को पूर्णतः त्याग देने की परीक्षा थी। परंतु गुरु की आज्ञा उनके लिए सर्वोपरि थी। उन्होंने बिना किसी तर्क-वितर्क के राजसी वस्त्र उतार कर, साधारण योगी वेष के वस्त्र धारण किए तथा शांत और स्थिर मन से अपने महल की ओर चल पड़े।
महल के द्वार पर पहुँचकर उन्होंने विनम्र स्वर में पुकारा—अलख निरंजन, भिक्षां देहि माते। उनकी वाणी में न कोई संकोच था, न कोई अभिमान। वे पूर्ण समर्पण और सरलता के साथ भिक्षा की याचना कर रहे थे। महल के प्रहरी और सेवक उन्हें पहचान न सके। कुछ ने उन्हें तुच्छ समझकर उपेक्षा की, कुछ ने कठोर शब्द कहे, तो कुछ ने तिरस्कार भरी दृष्टि से देखा। किंतु भर्तृहरि का मन इन सब परिस्थितियों में अचल और निर्विकार बना रहा। अपमान और अवमानना की अग्नि में भी उनका चित्त शांत और समभाव में स्थित रहा।
दूर से गुरु गोरखनाथ अपने शिष्य की इस परीक्षा को देख रहे थे। जब उन्होंने देखा कि भर्तृहरि ने बिना किसी विकार के अपमान सह लिया है और उनके भीतर का राजसी अहंकार पूर्णतः गल चुका है, तब वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अनुभव किया कि उनके शिष्य के अंतःकरण में सच्चे वैराग्य का उदय हो चुका है।
इस प्रकार भर्तृहरि की यह पहली परीक्षा उनके आध्यात्मिक जीवन की महान् विजय सिद्ध हुई और उनके भीतर एक सच्चे योगी का जन्म हुआ। गुरुदेव ने उन पर कृपा करते हुए उन्हें कृतार्थ कर दिया।
संत दरिया साहिब जी कहते हैं कि जिस दिन मेरी भेंट मेरे सद्गुरु से हुई, उसी दिन मेरा यह मनुष्य जन्म सफल और ‘सनाथ’ हो गया। इससे पहले मैं उस अनाथ की तरह था जो संसार की मोह-माया में भटक रहा था, लेकिन गुरु के मिलते ही मुझे मेरा सच्चा स्वामी और रक्षक मिल गया। गुरु ने मेरे मस्तक पर हाथ रखकर मेरे कानों में उपदेशामृत भर दिया। यह सब कुछ मेरे गुरु का मुझ पर उपकार हुआ है।
अगस्त 2025
विभिन्न ग्रंथों का सार
( समर्पण भाव )
श्रीमद्भगवद् गीता में समर्पण का महत्व—
श्रीमद्भगवद् गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है और धर्म, कर्म, भक्ति, ज्ञान, योग सभी मार्गों का समन्वय प्रस्तुत करता है। गीता के अंत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सार-उपदेश देते हैं—
इसका अर्थ है—भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि सभी धर्मों (कर्तव्यों, कर्म बंधनों, संकल्पों) का परित्याग करके, तुम मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें तुम्हारे सारे पापों से मुक्ति दिला दूँगा, तुम शोक मत करो। गीता की यह शिक्षा ठीक उसी ‘सर्वस्व समर्पण’ की बात कह रही है कि अपने अहंकार, संदेह व स्वार्थ को त्याग कर प्रभु की शरण लेनी चाहिए।
गीता में भक्ति योग (अध्याय 12) में भी कहा गया है कि जो साधक अनन्य भाव से ईश्वर का भजन करता है, उसे परमात्मा बड़ी सरलता से मिल जाते हैं। ‘अनन्य भाव’ का अर्थ यह है कि मनुष्य का कोई अन्य आश्रय न हो; बस एक परमात्मा का ही आसरा हो। यही समर्पण वाली मनोवृत्ति है—जहाँ हम अपनी समस्त इच्छाएँ, संकल्प, विकल्प, भोग-वासना, सब कुछ त्यागकर सिर्फ ईश्वर को ही ध्येय बना लें।
कर्म योग और समर्पण—
गीता के अनुसार केवल कर्म न करना या सब त्यागकर भाग जाना समाधान नहीं है। मनुष्य को कर्तव्य करते हुए, फल की आसक्ति छोड़कर, ईश्वर में समर्पित भाव से कर्म करना चाहिए। तब कर्म बंधन का कारण नहीं बनता, वरन् मुक्तिदायी हो जाता है। जब हम अपने कर्मों के प्रति भी अहं का भाव नहीं रखते—अर्थात् मैं कर रहा हूँ, यह भावना त्याग देते हैं तथा सभी क्रियाओं को ईश्वर को अर्पित करते हैं, तब भक्ति योग पूरा होता है।
भक्ति योग का सापेक्ष भाव—
गीता में अनेक स्थानों पर भगवान साकार भक्ति की महिमा बताते हैं। वे फ़रमाते हैं कि जो प्रेमपूर्वक मुझमें मन लगाता है, मुझमें ही अपना जीवन अर्पण कर देता है, मैं उसका उद्धार निश्चित रूप से कर देता हूँ। गीता में इसका एक और सुंदर उदाहरण उस समय सामने आता है, जब अर्जुन विराट् रूप के दर्शन करके भयभीत हो जाता है। वह समझ जाता है कि प्रभु की महिमा अनंत है और उसकी अपनी सामर्थ्य बहुत सीमित है। तब वह पूर्ण समर्पण के भाव से कहता है—हे देव ! मैं आपका भेद नहीं जान सकता, आप अनंत हैं।
श्री रामचरित मानस विश्लेषण—
श्रीराम जी के प्रति भक्त-समर्पण—
संत तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस में हमें प्रभु की शरणागति और भक्तों के समर्पण के सुंदर उदाहरण देखने को मिलते हैं। भगवद्गीता की तरह ही यह पावन ग्रन्थ भी मानवता को प्रेम, भक्ति, सेवा, मर्यादा और समर्पण सिखाती है। यहाँ भी बार-बार वर्णन आया है कि जो भगवान राम की शरण में जाता है, वह पार हो जाता है—जैसे शबरी, सुग्रीव, विभीषण इत्यादि।
भक्त विभीषण शरणागति—
भक्त विभीषण, जो रावण का भाई था, उसने जब देखा कि रावण अत्याचार के मार्ग पर चल पड़ा है और राम के सम्मुख पराजय निश्चित है, तब उसने रावण को समझाने का बहुत प्रयास किया। जब रावण नहीं माना, तो विभीषण ने अपना सब कुछ (राजपाट, कुल, रिश्ते इत्यादि) त्याग कर भगवान श्रीराम की शरण ली। हालाँकि वानर सेना के कुछ लोग और यहाँ तक कि सुग्रीव भी भ्रमित थे कि विभीषण वास्तविक भक्त है या नहीं। मगर भगवान राम ने सबकी आशंकाओं को दूर करते हुए कहा कि जो मेरी शरण में आता है, उसका मैं कभी त्याग नहीं करता।
विभीषण का यह शरणागत भाव स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अपना सर्वस्व (अपना कुल, सत्ता, ऐश्वर्य) त्याग करके श्री राम जी की शरण में आने का साहस किया और अंततः प्रभु की कृपा से वह लंका का राज्याधिकारी बना। भगवान् की कृपा से उन्हें सब कुछ मिला, प्रभु की भक्ति मिली और साथ ही राज्य भी।
शबरी की भक्ति—
शबरी एक भीलनी थी, जिसे समाज में निचले स्तर का माना जाता था। उसके गुरु मतंग ऋषि ने उसके निर्मल हृदय को देखकर उसे बताया कि एक दिन श्रीराम इस आश्रम में आएँगे। शबरी ने अपना पूरा जीवन श्री राम जी के स्मरण और उनकी प्रतीक्षा में लगा दिया कि कब भगवान आएँगे। इस स्मरण ध्यान से उसकी आत्मा पूर्णतः श्री राममय हो गई। शबरी ने अपने मन के समस्त भाव, जीवन का पूरा समय, सब कुछ श्रीराम की भक्ति में न्योछावर कर दिया। प्रतिदिन वह अपने आश्रम को बुहारती, फूलों से सजाती और कन्द-मूल-फल का स्वाद चख-चखकर रखती कि जब श्रीराम आएँगे तो उन्हें सबसे मीठे फल ही खिलाऊँगी।
शबरी की भक्ति में भी हम देखते हैं कि ‘सिर सांटना’ का अर्थ केवल शरीर का त्याग नहीं, बल्कि (जीवन का समर्पण) है। शबरी की यह भक्ति, जिसमें उन्होंने अपने अहं को त्याग कर पूरे हृदय को प्रभु-प्रेम से भर दिया, इसी समर्पण का प्रतिफल यह हुआ कि श्रीराम ने उनके झूठे बेर भी स्वीकार किए। यह घटना बताती है कि जो भी सच्चे हृदय से पूर्ण समर्पण करता है, ईश्वर उसे सहज स्वीकार कर लेते हैं।
संत वाणी में ‘सिर सांटना’ का संदेश—
संतों की वाणी, विशेषकर परमसंत कबीर साहिब जी, रविदास जी, तुलसी दास जी, सूरदास जी, मीराबाई जी आदि की रचनाओं में बार-बार समर्पण, त्याग, भक्ति, प्रेम और ईश्वर की महिमा का बखान मिलता है। ‘जे सिर सांटे हरि मिले’ वाला भाव संतों की वाणियों में भरा हुआ है। आइए कुछ अन्य संत वाणी के दोहे/पंक्तियाँ देखते हैं, जो इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं—
श्री कबीर साहिब जी—
‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।’
इस दोहे में श्री कबीर साहिब जी कहते हैं कि जब तक मैं (अहंकार) बना रहा, तब तक भगवान का साक्षात्कार न हो सका। जैसे ही मैंने स्वयं को मिटा दिया, तब सिर्फ भगवान ही रह गए। यह वही ‘सिर सांटना’ है—अहं त्याग।
‘ढाई आखर प्रेम का, पड़े सो पंडित होय ॥’
यहाँ श्री कबीर साहिब जी समझाते हैं कि ज्ञान पुस्तकों से नहीं, बल्कि प्रेम से मिलता है। प्रेम ही समर्पण का उच्चतम रूप है, जहाँ हम प्रभु को अपनाकर बाकी सब छोड़ देते हैं।
संत रविदास जी—
‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ संत रविदास जी कहते हैं—हे प्रभु ! तुम चंदन जैसे शुभ सुगंधित हो और मैं पानी के समान हूँ। चंदन की सुगंध ही मुझे सुगंधित कर रही है। मेरे अंग-अंग में आप समा गए हैं। ऐसा मानकर मैं अपने-आपको पूर्ण रूप से आपको समर्पित करता हूँ। रविदास जी के भजनों में बार-बार हमें तो ‘बस तुम्हारा नाम चाहिए’ वाला भाव ही दिखता है, जो पूर्ण त्याग और समर्पण का प्रतिरूप है।
संत तुलसीदास जी—
‘तुलसी भरोसे राम के, निर्भय होके सोय।’
संत तुलसीदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा बताता है कि जो पूर्ण समर्पण करके राम पर भरोसा करता है, उसे जीवन में किसी बात का भय नहीं रहता।
इसी प्रकार ही पूरी रामचरितमानस भी इसी शिक्षा पर आधारित है कि जब भक्त राम के अतिरिक्त अन्य सब का आश्रय त्याग कर ईश्वर का आश्रय लेता है, तो वह पूर्ण आनंदित रहता है और अंत में अपने राम में ही समा जाता है।
संत सूरदास जी—
प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो ।
समदरसी है नाम तिहारो, चाहे तो पार करो ॥
संत सूरदास जी परम समर्पण भाव से विनय करते हैं कि प्रभु ! मेरे अवगुणों पर ध्यान मत दो, आप समदर्शी कहलाते हैं, आपके नाम में सब शक्तियाँ हैं, आपको ही मुझे पार लगाना है। इसका अर्थ है कि मैं पूर्ण रूप से आपके चरणों में समर्पित हूँ, आप समर्थ हैं। भक्त का यह दृढ़ भाव ही मुक्ति का द्वार खोलता है।
भक्त मीराबाई जी—
मैं तो गिरधर के घर जाऊँ ।
चाहे लोंके कुछ भी कहे ॥
मीरा बाई ने राजसी वैभव त्यागकर अपना सम्पूर्ण जीवन श्री कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया। ‘सिर सांटना’ का जीता-जागता उदाहरण जहाँ परिवार, समाज, लोक-लाज, सब त्यागकर वे कृष्ण की डगर पर चल पड़ीं।
इन सभी संत वाणियों का सार है—पूर्ण भक्ति, पूर्ण समर्पण, जहाँ हम अपने सुख-दुःख, लाभ-हानि की गणना न करके, परमात्मा को ही अपना एकमात्र आश्रय मान लें। जे सिर सांटे हरि मिले, तो हरि लीजै दौर। यही भक्ति की परिकाष्ठा है।
( संगच्छध्वं—साथ-साथ चलो। )
सबके मन में उत्तम मति अथवा परस्पर सद् भाव के विचार और निकृष्ट मति अथवा दुर्भाव के विचार रहते हैं। जहाँ अच्छी मति अथवा अच्छे विचार होंगे वहाँ अनेक समृद्धियाँ आएँगी और जहाँ दुर्भाव पूर्ण विचार होंगे वहाँ अनेक विपत्तियाँ आना निश्चित है। अच्छे विचार या सकारात्मक दृष्टिकोण हो तो मन निर्मल और तनाव मुक्त रहता है और इस प्रकार का व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और सुख समृद्धि प्राप्त कर पाने में सफल होता है। इसीलिए कहा गया है कि जहाँ सुमति तहाँ संपत्ति नाना—
ऋग्वेद मंत्र—
अर्थ—
· संगच्छध्वं — साथ-साथ चलो ।
· संवदध्वं—साथ-साथ वार्त्ता करो (आपस में मिल-जुल कर संवाद करो)।
· सं वो मनांसि जानताम्—आपके मन भी एक समान हों अर्थात् सभी की सोच एक दिशा में हो।
· देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते—जैसे पुराने समय के देवता अपने हिस्से को आपस में बाँटकर एक साथ उपासना करते थे, वैसे ही तुम भी करो।
सरल व्याख्या—
ऋग्वेद का यह मंत्र हमें सिखाता है कि हमें मिल-जुल कर, एक साथ रहना चाहिए। इसका मतलब है कि हम सभी में एकता होनी चाहिए। हमारे विचार, हमारे काम या हमारे मन की बात सभी एक जैसे हों। जब हम मिलकर काम करते हैं, एक-दूसरे की बातें समझते हैं और साथ चलते हैं, तो हम किसी भी मुश्किल को आसानी से पार कर सकते हैं।
इस वेदमंत्र में ‘देवताओं’ का उल्लेख भी किया गया है, जो कि एक रूपक है, जिसका मतलब है कि पुराने समय में लोग मिलकर काम करते थे, अपने हिस्से की चीज़ों को एक साथ बाँटते थे और किसी बड़े लक्ष्य के लिए एक साथ उपासना करते थे। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए—मिलकर काम करना चाहिए, एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए और सामूहिक रूप में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहिए। अतः स्पष्ट है कि—
· यह ऋग्वेद मंत्र हमें एकता और सामंजस्य की महत्ता भी सिखाता है।
· इस मंत्र को अपनाकर हम समूह में काम करना, एक-दूसरे की बात सुनना, समझना और मिल-जुल कर समस्याओं का समाधान करना सीख सकते हैं।
यह मंत्र सामूहिक जीवन के मूल्यों जैसे कि सहयोग, समझदारी और एकजुटता को भी बढ़ावा देता है।
यह शिक्षा छात्रों को जीवन में सहयोग, समझदारी और सामूहिक प्रयास की महत्वपूर्णता को समझने में मदद करती है, जो कि उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इस वेदमंत्र की शिक्षा हमें यह दर्शाती है कि जब हम मिलकर विचार करते हैं, जब हम मिलकर काम करते हैं और जब हम मिलकर आगे बढ़ते हैं तो हम अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और कोई भी बाधा हमारे मार्ग को नहीं रोक पाती।
यहाँ ईश्वर स्वयं हमें समझाते हुए सम्मति को धारण करने की प्रेरणा दे रहे हैं। इन शिक्षाओं को सुगमता से समझने के लिए हम कुछ सरल और रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े दृष्टांतों का उपयोग कर रहे हैं—
दृष्टांत 1—मिलकर काम करने की शक्ति
कहानी—एक गाँव में एक किसान के तीन बेटे थे, जो हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। किसान ने उन्हें सिखाने के लिए एक योजना बनाई। उसने अपने तीनों बेटों को एक-एक लकड़ी दी और कहा कि इसे तोड़ो। उन्होंने आसानी से लकड़ी को तोड़ दिया। फिर किसान ने तीन लकड़ियों का एक बंडल बनाया और उन्हें दिया, लेकिन इस बार वे उसे तोड़ नहीं पाए। किसान ने समझाया, “जब तुम अलग-अलग हो, तो तुम कमज़ोर हो और आसानी से हार सकते हो। लेकिन जब तुम एक साथ होते हो, तो कोई तुम्हें नहीं हरा सकता।” अतः सब मिलकर काम करते रहो।
इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि जब हम एक टीम के रूप में एक साथ काम करते हैं, तो हम बड़ी शक्ति को एकत्र कर लेते हैं और अच्छे परिणाम प्राप्त करते हैं।
भाव यह कि उक्त वेदमंत्र हमें यही सिखाता है कि हमें मिलकर वार्त्ता और विचार करना चाहिए तथा मिलकर काम करना चाहिए और अपने मन व विचारों को एक समान दिशा में रखना चाहिए।
इस तरह निश्चित है कि सामूहिक प्रयास में बल और बुद्धि दोनों बहुत बढ़ जाते हैं, जिससे कठिन से कठिन काम आसानी से किया जा सकता है। सामंजस्य से काम करने पर परिणाम सुंदर और सफल होता है। अतः हमें सांसारिक अथवा सेवा-भक्ति के पारमार्थिक सभी कार्यों में अपने विचार और मन को एक समान स्थिती में रखना चाहिए।
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