नश्वर देह में स्वयं की खोज
वैराग्य से आत्म-बोध की यात्रा—संसार की ‘मृग-तृष्णा’ और मानव मन आज के भौतिकवादी युग में एक ऐसी दौड़ का हिस्सा बन गया है जिसकी कोई समाप्ति नहीं है। हम हर सुख देने वाली वस्तुओं को इकट्ठा करने को ही ‘जीवन’ मान बैठे हैं। किंतु इतिहास साक्षी है कि समय की रेत पर न बड़े-बड़े महलों के निशान बचे, न रावण जैसे बलशाली की सोने की लंका और न ही सिकंदर जैसे विजेताओं की हुकूमत। इस लेख का उद्देश्य उन महापुरुषों की वाणी के प्रकाश में जीवन के वास्तविक अर्थ को समझना है, जिन्होंने संसार की क्षणभंगुरता को पहचान लिया था।
संत सहजोबाई जी ने अपनी वाणी में कथन किया है—
विचार कीजिए, एक बुलबुला पानी की सतह पर उठता है, क्षण भर के लिए सूर्य की किरणों को परिवर्तित कर इंद्रधनुष के रंगों से चमकता है और अगले ही पल फूटकर वापस जल में समा जाता है। हमारा शरीर भी पंच तत्वों का एक ऐसा ही बुलबुला है। हम इसे सजाने-संवारने में अपना सारा जीवन लगा देते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि इसकी ‘एक्सपायरी डेट’ हर पल नज़दीक आ रही है। सहजोबाई जी कहती हैं कि अज्ञान की नींद में मत सोओ। जब तक स्वांस चल रही है, उस ‘पीव’ (परमात्मा) से मिलने का संकल्प कर लो।
आपन ही कूँ खोज मिलैं जब राम सनेही ।
हम सुख को बाहर की वस्तुओं में खोजते हैं, जबकि वह हमारे भीतर ‘राम’ (चेतना) के रूप में स्थित है। जैसे कस्तूरी मृग अपनी ही नाभि की सुगंध को जंगल में खोजता फिरता है, वैसे ही मनुष्य अपने भीतर के आनंद को गाड़ियों, बंगलों और पदों में खोज रहा है। अंत में सहजोबाई जी कहती हैं कि हरि परमेश्वर को जो भूल कर बाहर फिर रहे हैं उनका जीवन व्यर्थ चला जा रहा है। यह याद रखो कि सुख केवल प्रभु-सुमिरण से ही मिल सकता है अन्य किसी उपाय से नहीं।
महाराज भर्तृहरि, जिन्होंने सत्ता के शिखर और भोग की पराकाष्ठा को देखा था, उन्हें सुख शान्ति नहीं मिली। तब गुरु शरण में आए योग साधना की, भजन अभ्यास किया तब उन्हें जो अनुभव हुआ वह अपने ‘वैराग्य शतक’ में लिखते हैं—
न संसारोत्पन्नं चरितमनुपश्यामि कुशलं विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः ।
महद्भिः पुण्यौघैश्चिरपरिगृहीताश्च विषया भवन्तो भीष्मन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ॥
(वैराग्य शतकम्)
अर्थात् मैं इस संसार में ऐसा कोई भी कार्य या सुख नहीं देख पाता जो वास्तव में कल्याणकारी हो। जब मैं गहराई से विचार करता हूँ, तो मुझे अपने पुण्यों के फल से भी डर लगने लगता है क्योंकि बहुत अधिक पुण्यों के संचय से प्राप्त होने वाले ये सांसारिक भोग, अंत में भोगियों को भारी विपत्ति देने के लिए उसी प्रकार डराते हैं जैसे कोई भयानक शत्रु सामने खड़ा हो।
जिस प्रकार एक प्यासे व्यक्ति को नमक का पानी पिलाया जाए, तो उसकी प्यास बुझने के बजाय और बढ़ जाती है, वैसे ही इंद्रिय-सुख तृप्ति नहीं देते, बल्कि वासना की आग को और भड़काते हैं। आज के संपन्न समाज को देखें—जिनके पास अपार लक्ष्मी, मोटर-गाड़ियाँ और बंगले हैं, जिन्हें समाज ‘सर्वसुख संपन्न’ कहता है, वे भीतर से ‘जर्जर’ हैं। वे तनाव (Stress), अवसाद (Depression) और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। उन्हें ‘दुख का घुन’ भीतर ही भीतर खा रहा है। यह सिद्ध करता है कि बाहरी वैभव मन की शांति की गारंटी नहीं है।
जैसे एक छोटी सी बूंद जब तक अपनी स्वतंत्र पहचान (अहंकार) बनाए रखती है, वह तपती धूप में सूख सकती है, लेकिन जैसे ही वह समुद्र में समा जाती है, वह स्वयं समुद्र बन जाती है। भक्ति मार्ग में ‘स्व’ को खोना ही ‘सर्व’ को पाना है।
हम एक किराए के मकान में रहते हुए उसे सजाते तो हैं, पर यह जानते हैं कि एक दिन इसे खाली करना होगा। वैसे ही यह संसार भी एक ‘सराय’ है। यहाँ संपत्ति का संग्रह करना ऐसा ही है जैसे कोई मुसाफिर स्टेशन के बेंच को अपना पलंग समझकर उस पर कब्ज़ा करने की कोशिश करे।
भोग ऐश्वेर्यों के इच्छुक,
हैं केवल अज्ञानी ही ।
सार वेदों-शास्त्रों का,
वे बताते बस यही ॥
लक्ष्य है जीवन का केवल,
भोग सुख पाना अपार ।
इससे बढ़कर अन्य कोई,
जग में नहीं ज्ञान का सार ॥
(आनन्द गीता)
वे लोग जो केवल भोग-विलास और ऐश्वर्य (धन-सम्पत्ति) की इच्छा रखते हैं, वास्तव में ज्ञान से रहित यानी अज्ञानी हैं। वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य (आत्मा का कल्याण) को नहीं पहचान पाते। ऐसे अल्पज्ञानी लोग वेदों के केवल उन्हीं हिस्सों (कर्मकाण्ड) पर ध्यान देते हैं जो स्वर्ग की प्राप्ति या सांसारिक लाभ का वादा करते हैं। वे वेदों के परम लक्ष्य (परमात्मा) को छोड़कर केवल सतही लाभ की प्रशंसा करते हैं।
उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ‘अपार भोग और सुख’ पाना होता है। वे मानते हैं कि इसके अलावा संसार में कोई सत्य नहीं है और न ही इससे बढ़कर कोई ज्ञान है।
राजा भर्तृहरि की परीक्षा
राजा भर्तृहरि के योग-मार्ग में प्रविष्ट होने के पश्चात् उनके गुरु गोरखनाथ ने उनकी आंतरिक दृढ़ता, वैराग्य और अहंकार-त्याग की परीक्षा लेने का निश्चय किया। गुरु भली-भांति जानते थे कि राजपाट, धन और वैभव का बाहरी त्याग करना अपेक्षाकृत सरल है, किंतु मन में छिपा अभिमान, प्रतिष्ठा और ‘मैं’ का भाव समाप्त करना अत्यंत कठिन होता है। वास्तव में गुरुमुख का कर्तव्य तो यह है—
गुरु के घर में अर्थात् गुरु दरबार में यदि सेवक रहता है अथवा उनकी शरणागति में आकर भक्ति का लाभ उठाना चाहता है तो उसे भी यही उपदेश है कि गुरु की आज्ञा को मन से स्वीकार करे। गुरु की मौज में खुशी से रहे। क्योंकि मन के अवगुणों पर चोट पड़ेगी तभी अवगुण दूर होंगे। गुर की आज्ञा चाहे कैसी भी हो, चाहे कितनी भी कड़वी क्यों ना मन को लगे, उसे बर्दाश्त करता जाए। इसी में उसका कल्याण है। इसके साथ ही कभी अपने आप को बहुत बड़ा न समझे। अपने आप को ज्ञानवान समझने या दूसरों पर प्रभाव डालने की कोशिश न करे। यहाँ सेवक को उसकी अवस्था के बारे में बताते हुए सलाह दी जा रही है कि वह अपने आप को दूसरों के आगे झुका कर चले। प्राप्त किए हुए ज्ञान में कहीं अहंकार का अंश न आ जाए।
गुरु गोरखनाथ जी ने अपने शिष्य राजा योगी बने भर्तृहरि की परीक्षा के लिए एक आदेश दिया—यदि तुम सच्चे योगी बनना चाहते हो, तो अपने ही महल में जाकर भिक्षा माँग कर लाओ।
गुरुदेव का यह आदेश सुनकर भर्तृहरि के अंतःकरण में एक क्षण के लिए हलचल उत्पन्न हुई। जो कभी विशाल साम्राज्य के स्वामी थे, जिनके आदेश से राज्य की व्यवस्था चलती थी, जिन्हें प्रजा इन्द्रतुल्य सम्मान देती थी, उन्हें अब उसी महल के द्वार पर एक साधारण भिक्षुक बनकर खड़ा होना था। यह केवल भिक्षा माँगना नहीं, बल्कि अपने राजसी अहंकार को पूर्णतः त्याग देने की परीक्षा थी। परंतु गुरु की आज्ञा उनके लिए सर्वोपरि थी। उन्होंने बिना किसी तर्क-वितर्क के राजसी वस्त्र उतार कर, साधारण योगी वेष के वस्त्र धारण किए तथा शांत और स्थिर मन से अपने महल की ओर चल पड़े।
महल के द्वार पर पहुँचकर उन्होंने विनम्र स्वर में पुकारा—अलख निरंजन, भिक्षां देहि माते। उनकी वाणी में न कोई संकोच था, न कोई अभिमान। वे पूर्ण समर्पण और सरलता के साथ भिक्षा की याचना कर रहे थे। महल के प्रहरी और सेवक उन्हें पहचान न सके। कुछ ने उन्हें तुच्छ समझकर उपेक्षा की, कुछ ने कठोर शब्द कहे, तो कुछ ने तिरस्कार भरी दृष्टि से देखा। किंतु भर्तृहरि का मन इन सब परिस्थितियों में अचल और निर्विकार बना रहा। अपमान और अवमानना की अग्नि में भी उनका चित्त शांत और समभाव में स्थित रहा।
दूर से गुरु गोरखनाथ अपने शिष्य की इस परीक्षा को देख रहे थे। जब उन्होंने देखा कि भर्तृहरि ने बिना किसी विकार के अपमान सह लिया है और उनके भीतर का राजसी अहंकार पूर्णतः गल चुका है, तब वे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अनुभव किया कि उनके शिष्य के अंतःकरण में सच्चे वैराग्य का उदय हो चुका है।
इस प्रकार भर्तृहरि की यह पहली परीक्षा उनके आध्यात्मिक जीवन की महान् विजय सिद्ध हुई और उनके भीतर एक सच्चे योगी का जन्म हुआ। गुरुदेव ने उन पर कृपा करते हुए उन्हें कृतार्थ कर दिया।
संत दरिया साहिब जी कहते हैं कि जिस दिन मेरी भेंट मेरे सद्गुरु से हुई, उसी दिन मेरा यह मनुष्य जन्म सफल और ‘सनाथ’ हो गया। इससे पहले मैं उस अनाथ की तरह था जो संसार की मोह-माया में भटक रहा था, लेकिन गुरु के मिलते ही मुझे मेरा सच्चा स्वामी और रक्षक मिल गया। गुरु ने मेरे मस्तक पर हाथ रखकर मेरे कानों में उपदेशामृत भर दिया। यह सब कुछ मेरे गुरु का मुझ पर उपकार हुआ है।
अगस्त 2025
विभिन्न ग्रंथों का सार
( समर्पण भाव )
श्रीमद्भगवद् गीता में समर्पण का महत्व—
श्रीमद्भगवद् गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है और धर्म, कर्म, भक्ति, ज्ञान, योग सभी मार्गों का समन्वय प्रस्तुत करता है। गीता के अंत में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सार-उपदेश देते हैं—
इसका अर्थ है—भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि सभी धर्मों (कर्तव्यों, कर्म बंधनों, संकल्पों) का परित्याग करके, तुम मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें तुम्हारे सारे पापों से मुक्ति दिला दूँगा, तुम शोक मत करो। गीता की यह शिक्षा ठीक उसी ‘सर्वस्व समर्पण’ की बात कह रही है कि अपने अहंकार, संदेह व स्वार्थ को त्याग कर प्रभु की शरण लेनी चाहिए।
गीता में भक्ति योग (अध्याय 12) में भी कहा गया है कि जो साधक अनन्य भाव से ईश्वर का भजन करता है, उसे परमात्मा बड़ी सरलता से मिल जाते हैं। ‘अनन्य भाव’ का अर्थ यह है कि मनुष्य का कोई अन्य आश्रय न हो; बस एक परमात्मा का ही आसरा हो। यही समर्पण वाली मनोवृत्ति है—जहाँ हम अपनी समस्त इच्छाएँ, संकल्प, विकल्प, भोग-वासना, सब कुछ त्यागकर सिर्फ ईश्वर को ही ध्येय बना लें।
कर्म योग और समर्पण—
गीता के अनुसार केवल कर्म न करना या सब त्यागकर भाग जाना समाधान नहीं है। मनुष्य को कर्तव्य करते हुए, फल की आसक्ति छोड़कर, ईश्वर में समर्पित भाव से कर्म करना चाहिए। तब कर्म बंधन का कारण नहीं बनता, वरन् मुक्तिदायी हो जाता है। जब हम अपने कर्मों के प्रति भी अहं का भाव नहीं रखते—अर्थात् मैं कर रहा हूँ, यह भावना त्याग देते हैं तथा सभी क्रियाओं को ईश्वर को अर्पित करते हैं, तब भक्ति योग पूरा होता है।
भक्ति योग का सापेक्ष भाव—
गीता में अनेक स्थानों पर भगवान साकार भक्ति की महिमा बताते हैं। वे फ़रमाते हैं कि जो प्रेमपूर्वक मुझमें मन लगाता है, मुझमें ही अपना जीवन अर्पण कर देता है, मैं उसका उद्धार निश्चित रूप से कर देता हूँ। गीता में इसका एक और सुंदर उदाहरण उस समय सामने आता है, जब अर्जुन विराट् रूप के दर्शन करके भयभीत हो जाता है। वह समझ जाता है कि प्रभु की महिमा अनंत है और उसकी अपनी सामर्थ्य बहुत सीमित है। तब वह पूर्ण समर्पण के भाव से कहता है—हे देव ! मैं आपका भेद नहीं जान सकता, आप अनंत हैं।
श्री रामचरित मानस विश्लेषण—
श्रीराम जी के प्रति भक्त-समर्पण—
संत तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस में हमें प्रभु की शरणागति और भक्तों के समर्पण के सुंदर उदाहरण देखने को मिलते हैं। भगवद्गीता की तरह ही यह पावन ग्रन्थ भी मानवता को प्रेम, भक्ति, सेवा, मर्यादा और समर्पण सिखाती है। यहाँ भी बार-बार वर्णन आया है कि जो भगवान राम की शरण में जाता है, वह पार हो जाता है—जैसे शबरी, सुग्रीव, विभीषण इत्यादि।
भक्त विभीषण शरणागति—
भक्त विभीषण, जो रावण का भाई था, उसने जब देखा कि रावण अत्याचार के मार्ग पर चल पड़ा है और राम के सम्मुख पराजय निश्चित है, तब उसने रावण को समझाने का बहुत प्रयास किया। जब रावण नहीं माना, तो विभीषण ने अपना सब कुछ (राजपाट, कुल, रिश्ते इत्यादि) त्याग कर भगवान श्रीराम की शरण ली। हालाँकि वानर सेना के कुछ लोग और यहाँ तक कि सुग्रीव भी भ्रमित थे कि विभीषण वास्तविक भक्त है या नहीं। मगर भगवान राम ने सबकी आशंकाओं को दूर करते हुए कहा कि जो मेरी शरण में आता है, उसका मैं कभी त्याग नहीं करता।
विभीषण का यह शरणागत भाव स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अपना सर्वस्व (अपना कुल, सत्ता, ऐश्वर्य) त्याग करके श्री राम जी की शरण में आने का साहस किया और अंततः प्रभु की कृपा से वह लंका का राज्याधिकारी बना। भगवान् की कृपा से उन्हें सब कुछ मिला, प्रभु की भक्ति मिली और साथ ही राज्य भी।
शबरी की भक्ति—
शबरी एक भीलनी थी, जिसे समाज में निचले स्तर का माना जाता था। उसके गुरु मतंग ऋषि ने उसके निर्मल हृदय को देखकर उसे बताया कि एक दिन श्रीराम इस आश्रम में आएँगे। शबरी ने अपना पूरा जीवन श्री राम जी के स्मरण और उनकी प्रतीक्षा में लगा दिया कि कब भगवान आएँगे। इस स्मरण ध्यान से उसकी आत्मा पूर्णतः श्री राममय हो गई। शबरी ने अपने मन के समस्त भाव, जीवन का पूरा समय, सब कुछ श्रीराम की भक्ति में न्योछावर कर दिया। प्रतिदिन वह अपने आश्रम को बुहारती, फूलों से सजाती और कन्द-मूल-फल का स्वाद चख-चखकर रखती कि जब श्रीराम आएँगे तो उन्हें सबसे मीठे फल ही खिलाऊँगी।
शबरी की भक्ति में भी हम देखते हैं कि ‘सिर सांटना’ का अर्थ केवल शरीर का त्याग नहीं, बल्कि (जीवन का समर्पण) है। शबरी की यह भक्ति, जिसमें उन्होंने अपने अहं को त्याग कर पूरे हृदय को प्रभु-प्रेम से भर दिया, इसी समर्पण का प्रतिफल यह हुआ कि श्रीराम ने उनके झूठे बेर भी स्वीकार किए। यह घटना बताती है कि जो भी सच्चे हृदय से पूर्ण समर्पण करता है, ईश्वर उसे सहज स्वीकार कर लेते हैं।
संत वाणी में ‘सिर सांटना’ का संदेश—
संतों की वाणी, विशेषकर परमसंत कबीर साहिब जी, रविदास जी, तुलसी दास जी, सूरदास जी, मीराबाई जी आदि की रचनाओं में बार-बार समर्पण, त्याग, भक्ति, प्रेम और ईश्वर की महिमा का बखान मिलता है। ‘जे सिर सांटे हरि मिले’ वाला भाव संतों की वाणियों में भरा हुआ है। आइए कुछ अन्य संत वाणी के दोहे/पंक्तियाँ देखते हैं, जो इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हैं—
श्री कबीर साहिब जी—
‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।’
इस दोहे में श्री कबीर साहिब जी कहते हैं कि जब तक मैं (अहंकार) बना रहा, तब तक भगवान का साक्षात्कार न हो सका। जैसे ही मैंने स्वयं को मिटा दिया, तब सिर्फ भगवान ही रह गए। यह वही ‘सिर सांटना’ है—अहं त्याग।
‘ढाई आखर प्रेम का, पड़े सो पंडित होय ॥’
यहाँ श्री कबीर साहिब जी समझाते हैं कि ज्ञान पुस्तकों से नहीं, बल्कि प्रेम से मिलता है। प्रेम ही समर्पण का उच्चतम रूप है, जहाँ हम प्रभु को अपनाकर बाकी सब छोड़ देते हैं।
संत रविदास जी—
‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ संत रविदास जी कहते हैं—हे प्रभु ! तुम चंदन जैसे शुभ सुगंधित हो और मैं पानी के समान हूँ। चंदन की सुगंध ही मुझे सुगंधित कर रही है। मेरे अंग-अंग में आप समा गए हैं। ऐसा मानकर मैं अपने-आपको पूर्ण रूप से आपको समर्पित करता हूँ। रविदास जी के भजनों में बार-बार हमें तो ‘बस तुम्हारा नाम चाहिए’ वाला भाव ही दिखता है, जो पूर्ण त्याग और समर्पण का प्रतिरूप है।
संत तुलसीदास जी—
‘तुलसी भरोसे राम के, निर्भय होके सोय।’
संत तुलसीदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा बताता है कि जो पूर्ण समर्पण करके राम पर भरोसा करता है, उसे जीवन में किसी बात का भय नहीं रहता।
इसी प्रकार ही पूरी रामचरितमानस भी इसी शिक्षा पर आधारित है कि जब भक्त राम के अतिरिक्त अन्य सब का आश्रय त्याग कर ईश्वर का आश्रय लेता है, तो वह पूर्ण आनंदित रहता है और अंत में अपने राम में ही समा जाता है।
संत सूरदास जी—
प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो ।
समदरसी है नाम तिहारो, चाहे तो पार करो ॥
संत सूरदास जी परम समर्पण भाव से विनय करते हैं कि प्रभु ! मेरे अवगुणों पर ध्यान मत दो, आप समदर्शी कहलाते हैं, आपके नाम में सब शक्तियाँ हैं, आपको ही मुझे पार लगाना है। इसका अर्थ है कि मैं पूर्ण रूप से आपके चरणों में समर्पित हूँ, आप समर्थ हैं। भक्त का यह दृढ़ भाव ही मुक्ति का द्वार खोलता है।
भक्त मीराबाई जी—
मैं तो गिरधर के घर जाऊँ ।
चाहे लोंके कुछ भी कहे ॥
मीरा बाई ने राजसी वैभव त्यागकर अपना सम्पूर्ण जीवन श्री कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया। ‘सिर सांटना’ का जीता-जागता उदाहरण जहाँ परिवार, समाज, लोक-लाज, सब त्यागकर वे कृष्ण की डगर पर चल पड़ीं।
इन सभी संत वाणियों का सार है—पूर्ण भक्ति, पूर्ण समर्पण, जहाँ हम अपने सुख-दुःख, लाभ-हानि की गणना न करके, परमात्मा को ही अपना एकमात्र आश्रय मान लें। जे सिर सांटे हरि मिले, तो हरि लीजै दौर। यही भक्ति की परिकाष्ठा है।
( संगच्छध्वं—साथ-साथ चलो। )
सबके मन में उत्तम मति अथवा परस्पर सद् भाव के विचार और निकृष्ट मति अथवा दुर्भाव के विचार रहते हैं। जहाँ अच्छी मति अथवा अच्छे विचार होंगे वहाँ अनेक समृद्धियाँ आएँगी और जहाँ दुर्भाव पूर्ण विचार होंगे वहाँ अनेक विपत्तियाँ आना निश्चित है। अच्छे विचार या सकारात्मक दृष्टिकोण हो तो मन निर्मल और तनाव मुक्त रहता है और इस प्रकार का व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और सुख समृद्धि प्राप्त कर पाने में सफल होता है। इसीलिए कहा गया है कि जहाँ सुमति तहाँ संपत्ति नाना—
ऋग्वेद मंत्र—
अर्थ—
· संगच्छध्वं — साथ-साथ चलो ।
· संवदध्वं—साथ-साथ वार्त्ता करो (आपस में मिल-जुल कर संवाद करो)।
· सं वो मनांसि जानताम्—आपके मन भी एक समान हों अर्थात् सभी की सोच एक दिशा में हो।
· देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते—जैसे पुराने समय के देवता अपने हिस्से को आपस में बाँटकर एक साथ उपासना करते थे, वैसे ही तुम भी करो।
सरल व्याख्या—
ऋग्वेद का यह मंत्र हमें सिखाता है कि हमें मिल-जुल कर, एक साथ रहना चाहिए। इसका मतलब है कि हम सभी में एकता होनी चाहिए। हमारे विचार, हमारे काम या हमारे मन की बात सभी एक जैसे हों। जब हम मिलकर काम करते हैं, एक-दूसरे की बातें समझते हैं और साथ चलते हैं, तो हम किसी भी मुश्किल को आसानी से पार कर सकते हैं।
इस वेदमंत्र में ‘देवताओं’ का उल्लेख भी किया गया है, जो कि एक रूपक है, जिसका मतलब है कि पुराने समय में लोग मिलकर काम करते थे, अपने हिस्से की चीज़ों को एक साथ बाँटते थे और किसी बड़े लक्ष्य के लिए एक साथ उपासना करते थे। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए—मिलकर काम करना चाहिए, एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए और सामूहिक रूप में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहिए। अतः स्पष्ट है कि—
· यह ऋग्वेद मंत्र हमें एकता और सामंजस्य की महत्ता भी सिखाता है।
· इस मंत्र को अपनाकर हम समूह में काम करना, एक-दूसरे की बात सुनना, समझना और मिल-जुल कर समस्याओं का समाधान करना सीख सकते हैं।
यह मंत्र सामूहिक जीवन के मूल्यों जैसे कि सहयोग, समझदारी और एकजुटता को भी बढ़ावा देता है।
यह शिक्षा छात्रों को जीवन में सहयोग, समझदारी और सामूहिक प्रयास की महत्वपूर्णता को समझने में मदद करती है, जो कि उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इस वेदमंत्र की शिक्षा हमें यह दर्शाती है कि जब हम मिलकर विचार करते हैं, जब हम मिलकर काम करते हैं और जब हम मिलकर आगे बढ़ते हैं तो हम अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और कोई भी बाधा हमारे मार्ग को नहीं रोक पाती।
यहाँ ईश्वर स्वयं हमें समझाते हुए सम्मति को धारण करने की प्रेरणा दे रहे हैं। इन शिक्षाओं को सुगमता से समझने के लिए हम कुछ सरल और रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े दृष्टांतों का उपयोग कर रहे हैं—
दृष्टांत 1—मिलकर काम करने की शक्ति
कहानी—एक गाँव में एक किसान के तीन बेटे थे, जो हमेशा आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। किसान ने उन्हें सिखाने के लिए एक योजना बनाई। उसने अपने तीनों बेटों को एक-एक लकड़ी दी और कहा कि इसे तोड़ो। उन्होंने आसानी से लकड़ी को तोड़ दिया। फिर किसान ने तीन लकड़ियों का एक बंडल बनाया और उन्हें दिया, लेकिन इस बार वे उसे तोड़ नहीं पाए। किसान ने समझाया, “जब तुम अलग-अलग हो, तो तुम कमज़ोर हो और आसानी से हार सकते हो। लेकिन जब तुम एक साथ होते हो, तो कोई तुम्हें नहीं हरा सकता।” अतः सब मिलकर काम करते रहो।
इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि जब हम एक टीम के रूप में एक साथ काम करते हैं, तो हम बड़ी शक्ति को एकत्र कर लेते हैं और अच्छे परिणाम प्राप्त करते हैं।
भाव यह कि उक्त वेदमंत्र हमें यही सिखाता है कि हमें मिलकर वार्त्ता और विचार करना चाहिए तथा मिलकर काम करना चाहिए और अपने मन व विचारों को एक समान दिशा में रखना चाहिए।
इस तरह निश्चित है कि सामूहिक प्रयास में बल और बुद्धि दोनों बहुत बढ़ जाते हैं, जिससे कठिन से कठिन काम आसानी से किया जा सकता है। सामंजस्य से काम करने पर परिणाम सुंदर और सफल होता है। अतः हमें सांसारिक अथवा सेवा-भक्ति के पारमार्थिक सभी कार्यों में अपने विचार और मन को एक समान स्थिती में रखना चाहिए।
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