सोचिए और विचारिए

 सोचिए और विचारिए

   

जनवरी 2025

प्रभुताई कूँ चहत हैं, प्रभु को चहै न कोए ।
अभिमानी घट नीच है, सहजो ऊँच न होए
अभिमानी मींजे गए, लूट लिए धन वाम ।
निर अभिमानी हो चले, पहुँचे हरि के धाम

              यह दोहा संत सहजोबाई का गहरा आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है। इसमें वे कहती हैं कि संसार के प्राणी प्रभुत्व, अधिकार और प्रतिष्ठा की इच्छा रखते हैं—हर कोई चाहता है कि लोग उसे सम्मान दें, उसकी सेवा करें, वह श्रेष्ठ कहलाए। परंतु जो सच्चा प्रभु है, वह किसी की प्रभुताई या अहंकार को नहीं चाहता। ईश्वर केवल विनम्र और निष्कलंक हृदय में ही वास करते हैं।

  सहजोबाई जी कहती हैं कि अभिमान से भरा हृदय नीच होता है, चाहे वह बाहर से कितना भी बड़ा या विद्वान क्यों न दिखे। ऐसा मनुष्य प्रभु से दूर हो जाता है एवं संसार में कष्ट झेलता है। दूसरी ओर, जो विनम्र है, निर्मल है, वही सच्चे अर्थों में ऊँचा होता है, क्योंकि उसी के भीतर प्रभु का निवास संभव है।

  इस दोहे का मूल संदेश है—नम्रता ही प्रभु प्राप्ति का प्रथम सोपान है। जब तक हृदय में अहंकार है, तब तक आत्मा सत्य के दर्शन नहीं कर सकती। यह दोहा आध्यात्मिक साधकों के लिए एक अत्यंत मूल्यवान मार्गदर्शन है।

 

दिसम्बर 2025

दादू नूरी दिल अरवाह का, तहाँ बसै माबूदं
हाँ बंदे की बंदगी, जहाँ रहै मौजूदं
       संत दादू दयाल जी यहाँ यह गूढ़ रहस्य उद्घृत कर रहे हैं कि ईश्वर किसी बाह्य स्थान या मन्दिर-मस्जिद में सीमित नहीं है, वह तो प्रत्येक आत्मा के अंतरतम नूरी दिल’ में विद्यमान है। ‘नूरी दिल अरवाह’ का तात्पर्य है आत्मा का वह आंतरिक भाव लोक, जहाँ केवल शुद्धता, प्रेम और प्रकाश का निवास होता है।
दूसरी पंक्ति में संत दादू दयाल जी स्पष्ट करते हैं कि बंदगी वही सफल होती है, जहाँ ईश्वर स्वयं मौजूद हो और वह ईश्वर हमारी आत्मा में मौजूद है, वह नूरी दिल में है—न ज़मीन पर, न आसमान में, बल्कि हमारे अंतर में। अतः मनुष्य को चाहि कि वह अपने मन को शुद्ध व नूरी बनाए और ईश्वर से मिलकर एक हो जा

 

नवम्बर 2025

सहजो धौले आइया, झड़ने लागे दांत
तन गुंझल पड़ने लगी, सूखन लागी आंत
तन गुंझल पड़ने लगी, सूखन लागी आंत
                                              (सहजो वाणी)
           संत सहजोबाई जी वृद्धावस्था के लक्षणों के माध्यम से मानव जीवन की क्षणभंगुरता और नश्वरता की ओर संकेत करती हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर में शारीरिक परिवर्तन आने लगते हैं—बाल सफेद हो जाते हैं, दांत गिरने लगते हैं, त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और शरीर की शक्ति क्षीण होने लगती है। ये सभी संकेत हैं कि मृत्यु निकट आ रही है।
संत सहजोबाई जी यह कहना चाहती हैं कि जब जीवन का संध्या काल आ गया है, तब सांसारिक मोह-माया, कामनाएँ और अहंकार त्यागकर ईश्वर की शरण में जाना ही बुद्धिमानी है।
यह दोहा एक आत्म-मंथन है, जो प्रत्येक मनुष्य को सावधान करता है—अब भी समय है, चेत जा ! यही इसकी आध्यात्मिक गूढ़ता है।

 


सितम्बर 2025

हरिया जानै रूखड़ा, ज्यों पानी का नेह ।
सूखा काठ न जानई, केतहु बूड़ा मेह
                                                     (कबीर वाणी)

हरा वृक्ष पानी का स्नेह (प्रभाव) जानता है अर्थात् वह पानी को पाकर खूब फलता-फूलता है। सूखे काठ पर कितना ही पानी बरसे वह उसके प्रभाव और गुण को ग्रहण नहीं कर सकता। ऐसे ही श्रद्धा-भाव युक्त पुरुष सत्संग के गुण से प्रभावित होकर उन्नति करता है। श्रद्धा-हीन व्यक्ति पर सत्संग का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता।

हरा वृक्ष जब पानी को पाकर फलता-फूलता है, तो वह जीवन के अनुकूल और समृद्धि का प्रतीक बन जाता है। यह इस बात का उदाहरण है कि सही माहौल और सही सहयोग मिल जाने पर व्यक्ति किस तरह से अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सकता है।


अगस्त 2025

ज्यों नैनों में पूतरी, यों खालिक घट माहीं ।
अज्ञानी नहिं जानहीं, बाहर ढूँढन जाहीं
                                           (कबीर वाणी)

आंतरिक ईश्वर का सत्य—उक्त शब्द का अर्थ है कि जैसे आँखों की पुतली हमारी दृष्टि का माध्यम है, वैसे ही ईश्वर हमारे भीतर आत्मा के रूप में विद्यमान है। अज्ञानी व्यक्ति इसे समझने में असमर्थ होते हैं और बाहरी दुनिया में ईश्वर की खोज करते हैं।

बाहरी खोज का भ्रम—हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा में अक्सर बाहरी साधनों और स्थलों में ईश्वर की तलाश करते हैं, लेकिन असली ईश्वर तो हमारे अंतर्मन में मौजूद हैं।

अज्ञान का निवारण—सन्तजन ऐसे अज्ञान का निवारण करते हैं। वे जानते हैं कि ईश्वर उनके भीतर है, वहीं खोज करनी चाहिए।

आत्मा में ईश्वर का वास—सार यह है कि ईश्वर को बाहर ढूँढने की बजाए ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। आत्मा में ही ईश्वर का वास है, जो ध्यान में प्रकट होगा।


जुलाई 2025

    कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जान ।    टांकी लागी शबद की,निकसी कंचन खान

                              (कबीर वाणी)

            ऐ जिज्ञासु ! मैं अब अच्छी प्रकार जान गया हूँ, मन महा पाषाण है। इसमें जब शद की चोट लगती है, तभी कंचन की खान प्रकट होती है।

इस दोहे में मन को कठोर पहाड़ (महा पाषाण) बताया गया है। सत्संग में आकर गुरु के शबद की ‘टांकी’ अर्थात् चोट पड़ने पर भीतर छिपी कंचन-खान प्रकट होती है। जैसे शिला को छेनी से तराशा जाए, वैसे ही मन को शबद की धार से गढ़ा जाना चाहिए। जब हम अंदर छिपे स्वर्ण जैसे सद्गुणों को प्रकट कर लेते हैं, तब जीवन में प्रकाश भरता है। ऐसा रूपांतरण भक्त के हृदय में प्रेम, सेवा और समर्पण को जन्म देता है। साधक शबद साधना के द्वारा ही कठोर मन में दिव्यता भरता है, बस उसे जगाने की ज़रूरत है।

 


जून 2025

जोगी हुआ धुन लगी, मिट गई ऐंचतान ।
उलटि समाना आप में, हुआ ब्रह्म समान
                                                     (कबीर वाणी)

भावार्थ—जिज्ञासु ने संसार की आसक्ति त्याग दी और सच्चा योगी बन गया। ध्यान में ऐसी धुन लगी कि मन के संकल्प-विकल्प, भ्रम, संदेह और मोह सभी मिट गए। इस अद् भुत अवस्था में ध्यानी की सुरति जो नीचे पिंड देश में रमी हुई थी, वह उलट गई और भृकुटी के मध्य में ब्रह्मांड के ऊपरी मंडल में जा समाई। बस जीव स्वयं ब्रह्म समान हो गया।

अभिप्राय यह है कि एक जिज्ञासु तभी ब्रह्म समान सच्चा योगी बन सकता है जब वह अपने मन के संकल्प-विकल्पों को अपने आप में समाहित कर ले और सुरति को ध्यान में एकाग्र कर ले।

  

 


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