कल्याण मार्ग

कल्याण मार्ग 

 

जनवरी 2025

(सहजो नन्हा हूजिए)

 

धन छोटापन सुख महा, धिरग बड़ाई ख़्वार ।

सहजो नन्हा हूजिए, गुरु के बचन सम्हार

सहजो तारे सब सुखी, उगहैं चन्द और सूर

साधू चाहै दीनता, चहै बड़ाई कूर

अभिमानी नाहर बड़ो, भरमत फिरत उजाड़ ।

सहजो नन्ही बाकरी, प्यार करै संसार

 

विनम्रता की शक्ति—एक ऐतिहासिक कथा

  इन दोहों की गहराई को समझने के लिए एक ऐतिहासिक कथा बहुत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है। यह कथा है राजा वीरसेन और संत आत्माराम की।

  बहुत समय पहले की बात है। एक वीरसेन  नाम का राजा था। वीरसेन बलशाली था, राज्य समृद्ध था और प्रजा भी सुखी थी। परंतु राजा को अपनी शक्ति और वैभव का बड़ा गर्व था। वह सोचता था कि सब कुछ उसकी बुद्धि और पराक्रम से ही संभव हुआ है। धीरे-धीरे वह इतना अभिमानी हो गया कि वह साधुओं और संतों को भी तुच्छ समझने लगा।

  एक दिन नगर में यह समाचार फैला कि एक महान् संत स्वामी आत्माराम जी नगर में पधारे हैं। वह तपस्वी संत थे, जिनकी वाणी में शांति थी और व्यवहार में अद् भुत सरलता। नगरवासी उनके वचन सुनने जाते, पर राजा ने उनका अपमान करते हुए कहा,  राजा के दरबार में आए बिना संत कैसा ?

  राजा ने संत आत्माराम को दरबार में बुलवाया, लेकिन संत ने कहा—मैं वहाँ नहीं जाता जहाँ अहंकार का सिंहासन ऊँचा हो और विनम्रता का आसन खाली हो।

  राजा क्रोधित हुआ, पर कुछ बुद्धिमानों की सलाह पर वह स्वयं साधु के पास आ गया। उसने देखा कि संत आत्माराम जी एक पेड़ के नीचे बैठे हैं और उनके पास जन समूह श्रद्धा से बैठा है। राजा ने जाकर कहा, आप मेरे निमंत्रण को ठुकरा कैसे सकते हैं ? क्या आपको मालूम नहीं, मैं कौन हूँ ? संत मुस्कराए और बोले—

  राजन् ! यही प्रश्न यदि आप स्वयं से पूछें ‘मैं कौन हूँ ?’ तो बहुत अच्छा होगा। आप शरीर नहीं, पद नहीं, नाम नहीं; आप आत्मा हैं और आत्मा को कभी अभिमान नहीं होता। यह शरीर और शरीर का बल वैभव बिल्कुल क्षणभंगुर है और आत्मा का बल वैभव स्थिर और स्थायी है। यह आत्मिक बल वैभव निरहंकार होकर प्रभु-भक्ति करने पर ही बढ़ता है।

  राजा संत की विनम्र और गूढ़ वाणी सुनकर बड़ा चकित हुआ। पहली बार उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। संत ने फिर कहा—

  शेर जंगल का राजा होता है, पर सब उससे डरते हैं। वह अकेला रहता है। वहीं एक गाय जो  सरल और निःस्वार्थ होती है, उसे सब पालते हैं, प्यार करते हैं। सोचो, तुम क्या बनना चाहते हो ?

  संत के वचन श्रवण कर राजा के हृदय से अहंकार का अंधकार दूर हो गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने झुककर संत के चरण छुए और कहा—महाराज जी, आज आपने मेरा अभिमान हर लिया। अब मैं विनम्र बनकर राज धर्म निभाऊँगा। संत आत्माराम जी ने आशीर्वाद दिया—राजन् राज धर्म निभाओ और जन सेवा करो तथा प्रभु-भक्ति में भी मन लगाओ ताकि अहंकार का अंधकार न आने पाए।

  जो स्वयं को छोटा मानता है, वही बड़ा बनता है। विनम्रता वह दीप है जो आत्मा को प्रकाशित करता है और संसार में सच्चा प्रेम और सम्मान दिलाता है।

  अब सोचिए—सच्ची विजय किसमें है ? शक्ति दिखाने में या सेवा-भक्ति करने में। 

  मानव जीवन की सबसे बड़ी उलझनों में से एक है यह चयन करना कि मुझे किस मार्ग पर चलना चाहिए ? क्या वह मार्ग जो शक्तिशाली, प्रभावशाली और सबको भयभीत करने वाला है या फिर वह पथ जो कोमल, सेवाभावी और सबके हृदय में स्थान बनाने वाला है ? शेर और गाय का यह उदाहरण हमें इसी मूलभूत प्रश्न का उत्तर देने के लिए एक दर्पण दिखाता है।

  बलशाली शेर निर्विवाद रूप से शक्ति का प्रभाव रखता है। उसके पास सामर्थ्य है, वह जंगल का राजा है, परन्तु उसका सिंहासन भय के स्तंभों पर टिका है। उसके आस-पास कोई नहीं फटकता। उसकी शक्ति उसे एकान्त की ऐसी गहरी खाई में धकेल देती है, जहाँ स्नेह का एक कण भी नहीं पनप सकता। दूसरी ओर, गाय है। उसके पास सिंह जैसी शारीरिक शक्ति नहीं है, परन्तु उसके पास एक ऐसा हृदय है जो निःस्वार्थ प्रेम देने की भावना और सेवा से परिपूर्ण है। वह सबको दूध देती है, सबकी देखभाल करती है और बदले में उसे सभी का स्नेह, देखभाल और आशीर्वाद प्राप्त होता है। वह अकेली नहीं है; वह पूरे समुदाय का एक अभिन्न अंग है।

  संतों के वचन हमें सिखाते हैं कि अपनी शक्ति का अहंकार मनुष्य को एक अंधेरी कोठरी में कैद कर देता है। वहाँ सच्चा प्रेम और सम्मान कभी प्रवेश नहीं कर सकता। सच्चा राजपाट भी केवल भय से नहीं, बल्कि प्रजा के हृदय में राजा के लिए उपजे सम्मान और प्रेम से चलता है।

  अब इस विषय पर कुछ प्रेरक सुविचार सुनिए—

· अहंकार एक ऐसा अंधकार है जो सूर्य के प्रकाश को भी हृदय में प्रवेश नहीं करने देता।

· प्रेम और निःस्वार्थता वे शस्त्र हैं जो बिना लड़े हर युद्ध जीत लेते हैं।

· वह शक्तिशाली नहीं है जिसके सामने सब झुकते हैं, बल्कि शक्तिशाली वह है जो दूसरों को उठाने के लिए स्वयं झुक जाता है।

     



 दिसम्बर 2025

(संसार की उलझनों से परे)

शांति और भक्ति का मार्ग—

मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक सुख और शांति की खोज में लगा रहता है, लेकिन यह शांति उसे संसार की भौतिक वस्तुओं में नहीं मिलती। यह सत्य कई ग्रंथों, संतों की वाणियों, उपनिषदों और गीता में स्पष्ट रूप से बताया गया है। यदि हम सांसारिक  मोह-माया में उलझे रहेंगे, तो अशांति का अनुभव करेंगे, परंतु यदि हम अपने जीवन का केंद्र ईश्वर-भजन को बनाएँगे, तो अनंत शांति और आनंद की प्राप्ति होगी। इस विषय को समझने के लिए हम संत महापुरुषों के वचन उपदेशों के माध्यम से इसकी गहराई में जाते हैं।

ईश्वर-भक्ति ही शांति का स्रोत—

श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है—

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्

अर्थात मैं प्रकाश स्वरूप होकर भी अपनी योग माया से घिरा हुआ दिखाई देता हूँ। अतः सभी के लिए प्रकट नहीं होता। अज्ञानी लोग मुझे जन्म-मरण से परे नहीं समझ पाते और वे संसार के भ्रम में फँसे रहते हैं। संसारी भ्रम यही है कि अज्ञानी जीव भौतिकता में सुख ढूंढते हैं।

जब तक व्यक्ति संसार की नश्वर वस्तुओं में सुख खोजता रहेगा, तब तक वह शांति से वंचित रहेगा। केवल ईश्वर-भजन के द्वारा ही चित्त को शांति प्राप्त होती है।

उपनिषदों का दृष्टिकोण—

आत्मा की पहचान ही मोक्ष का द्वार है। उपनिषदों में भी बताया गया है कि आत्मा ही सत्य है और जो इसे पहचान लेता है, वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।

असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय,
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
(बृहदारण्यक)

अर्थात् हे प्रभु ! हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर एवं मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलो।

जो व्यक्ति आत्म-ज्ञान प्राप्त करता है, वह संसार के मोह से ऊपर उठकर ईश्वर में लीन हो जाता है और वहीं उसे शांति मिलती है।

इसका अर्थ वास्तव में यही है कि यह संसार क्षणभंगुर है और जो लोग भौतिक वस्तुओं के पीछे भागते हैं, वे अंत में खाली हाथ ही रह जाते हैं। इसीलिए, यदि व्यक्ति शांति चाहता है, तो उसे हरि-भजन में लीन होना चाहिए जो प्रकाश रूप है।

भक्ति से ही मिलेगा परम सुख—

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में भक्ति की महिमा इस प्रकार गाई है—

सुमिरि पवनसुत पावन नामू ।
अपने बस करि राखे रामू

अर्थात् जो व्यक्ति प्रभु का स्मरण करता है, वह स्वयं प्रभु के समीप पहुँच जाता है और उसे परम आनंद की प्राप्ति होती है।

लघु कथा—व्यापारी और साधु

एक धनी व्यापारी था, जो बहुत अधिक धन-संपन्न होते हुए भी सदा चिंतित और अशांत रहता था। उसने कई चिकित्सकों से परामर्श लिया, परंतु कोई समाधान नहीं मिला।

एक दिन उसने एक साधु को देखा, जो अत्यंत प्रसन्नचित था। व्यापारी ने पूछा, महाराज, आपके पास धन नहीं, कोई सांसारिक सुख नहीं, फिर भी आप इतने शांत और संतुष्ट कैसे रहते हैं ?

साधु मुस्कुराए और बोले—मैंने अपने जीवन का केंद्र ईश्वर को बनाया है। संसार के विषयों से दूर रहकर, जो प्रभु का भजन करता है, वह सच्चा सुख प्राप्त करता है।

व्यापारी ने साधु के कहे अनुसार कुछ समय तक ईश्वर-भजन किया और कुछ ही दिनों में उसने अनुभव किया कि उसकी चिंताएँ समाप्त हो गईं और मन को अद्भुत शांति मिलने लगी।

भक्ति ही शांति का परम स्रोत—

यदि हम संसार की बातों में उलझे रहेंगे, तो हमें कभी शांति नहीं मिलेगी। हमारी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं और वे हमें सदा बेचैन बनाए रखती हैं। लेकिन यदि हम अपने मन को ईश्वर-भजन में स्थिर कर लें, तो हमें वास्तविक सुख और शांति प्राप्त होगी।

यदि सच्ची शांति चाहते हैं, तो सांसारिक भटकाव से हटकर ईश्वर-भजन में मन लगाएँ। यही मोक्ष और आनंद का सच्चा मार्ग है।

जीवन की सच्ची राह—

मनुष्य सदा सुख और शांति की खोज में भटकता है। वह धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करके संतुष्टि पाना चाहता है, किंतु इन सांसारिक वस्तुओं में वास्तविक शांति नहीं मिलती। शास्त्रों में कहा गया है कि सच्ची शांति केवल भक्ति और आत्म-साक्षात्कार में ही निहित है। यदि हम संसार की जटिलताओं में उलझे रहेंगे, तो हमारे मन को कभी चैन नहीं मिलेगा, लेकिन यदि हम अपने जीवन को ईश्वर की भक्ति में समर्पित कर देंगे, तो आत्मिक संतोष और शाश्वत आनंद की प्राप्ति होगी।

गीता का संदेश—अनन्य भक्ति से ही शांति संभव

भगवान श्रीकृष्ण गीता में स्पष्ट रूप से कहते हैं—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्

जो भक्त अनन्य भाव से मेरी शरण में आते हैं, उनके योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा) का दायित्व मैं स्वयं लेता हूँ।

संत एकनाथ की कथा—

श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, मैं उनका कल्याण करता हूँ।

इसका एक अनुपम उदाहरण संत एकनाथ जी की जीवन गाथा में मिलता है।

संत एकनाथ, महाराष्ट्र के महान् संतों में माने जाते हैं। वे एक बार काशी में गंगा स्नान कर लौट रहे थे। मार्ग में उन्हें एक भूखा-प्यासा दलित बालक मिला, जो अत्यंत दीन अवस्था में था। संत का हृदय द्रवित हो उठा। उनके पास प्रसाद स्वरूप जो थोड़ा-सा भोजन था, वह उन्होंने उस दलित बालक को दे दिया। साथियों ने उन्हें रोका कि यह प्रसाद अपवित्र जीव को देना अनुचित है। किंतु एकनाथ जी ने उत्तर दिया— मुझे तो इस दलित बालक में भी आत्म रूप भगवान के दर्शन हो रहे हैं, अब इसे प्रसाद देने में संकोच कैसा ?

इस घटना के बाद उनके साथियों ने जाति भ्रम में पड़कर संत एकनाथ जी का तिरस्कार किया और भ्रमवश यही कहा कि देखो अब इनको घर में भी भोजन नहीं मिलेगा; परंतु वे फिर भी निश्चिंत थे, क्योंकि उन्हें श्रीकृष्ण की उस प्रतिज्ञा पर पूर्ण विश्वास था—योगक्षेमं वहाम्यहम्।

जब वे घर पहुँचे, तो आश्चर्य हुआ—उनका परिवार पहले ही भोजन कर चुका था और कहा कि स्वयं एकनाथ जी ने थोड़ी देर पहले ही आकर भोजन कराया ! यह सुनकर सब स्तब्ध रह गए। तब सब समझे—यह भगवान श्रीकृष्ण की लीला थी, जिन्होंने उनके स्थान पर जाकर उनकी प्रतिष्ठा और कर्तव्य की रक्षा की।

यह कथा सिद्ध करती है कि अनन्य भक्ति करने वाले की हर आवश्यकता स्वयं भगवान पूर्ण करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि जो भक्त एकनिष्ठ होकर केवल मेरी ही भावना में लीन रहते हैं, मैं उनके योग’ (जो अभी प्राप्त नहीं हुआ, उसे प्राप्त कराना) और ‘क्षेम’ (जो प्राप्त है, उसकी रक्षा करना) दोनों का उत्तरदायित्व स्वयं लेता हूँ।

यह वचन केवल वादा नहीं, एक दिव्य आश्वासन है। जैसे एक माँ अपने शिशु की हर आवश्यकता को बिना कहे समझ जाती है, वैसे ही भगवान अपने भक्त की आवश्यकताओं को जानकर उनकी पूर्ति करते हैं।

उदाहरण के लिए, जैसे सूर्य स्वयं किसी से कहे बिना प्रकाश देता है, वैसे ही अनन्य भक्ति रूपी प्रेम के प्रति भगवान स्वतः आकर्षित होते हैं। भक्त को प्रयास करने की आवश्यकता नहीं, केवल निष्ठा और समर्पण चाहिए।

यहाँ अनन्य’ का अर्थ है—ऐसा मन जो अन्य किसी वस्तु या इच्छा की ओर न जाए। जैसे चकोर केवल चन्द्रमा को ही देखता है, वैसे ही अनन्य भक्त केवल भगवान को ही अपना सर्वस्व मानता है।

 


नवम्बर 2025

 

(परम शान्ति का पथ)

एक बार एक राजा के मन में एक संत के दर्शन करके उनके प्रति बड़ी श्रद्धा उत्पन्न हुई। उसने उन महान् संत से पूछा, महाराज ! मुझे वह सब कुछ प्राप्त है जो संसार में सबके पास नहीं होता परंतु फिर भी मेरे मन में शांति नहीं ? मेरे पास धन, महल, सेना और ऐश्वर्य सब कुछ है, फिर भी मेरा मन अशांत रहता है। आप कुछ उपाय बताइए।

संत मुसकुराए और बोले, राजन् ! मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूँगा। लेकिन पहले तुम मेरे लिए यह कटोरी दूध भरकर एक बार पूरे महल का एक चक्कर लगा आओ। ध्यान रहे, दूध की एक भी बूँद गिरनी नहीं चाहिए।

राजा ने सोचा कि छोटी सी तो बात है, संत का आदेश मान लेता हूँ, संभवतः मेरे प्रश्न का सही उत्तर मिल जा। उसने कटोरी ली और सावधानी से महल का चक्कर लगाने लगा। जब वह वापस लौटा तो संत ने पूछा, बताओ, रास्ते में तुमने क्या क्या देखा ?

राजा बोला—मैंने कुछ नहीं देखा, मैं केवल इस बात पर ध्यान दे रहा था कि दूध की एक भी बूँद न गिरे।

संत मुसकुराए और बोले, राजन् ! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है यदि तुम संसार में इस भांति रहोगे कि जीवन का लक्ष्य—परम शांति की प्राप्ति ही है। इसके अतिरिक्त संसार में मेरा अन्य कोई लक्ष्य नहीं है। जीवन में परम शांति देने वाले एकमात्र प्रभु परमेश्वर हैं। उन्हीं का सुमिरण-ध्यान ऐसे ही करते रहना है, जैसे महल का चक्कर लगाते हुए तुमने दूध के कटोरे पर ही ध्यान रखा। तो फिर अन्य काम करते हुए भी तुम उनसे निर्लिप्त रहोगे। यदि तुम अपने लक्ष्य अर्थात् ईश्वर-भजन पर ध्यान केंद्रित करोगे, तो मन स्वतः शांत हो जाएगा।

राजा ने इस शिक्षा को अपने जीवन में उतार लिया और सांसारिक मोह को छोड़कर भजन-भक्ति में लीन होकर रहने लगे। परिणामस्वरूप, उसने थोड़े ही समय में सच्चे सुख और शांति को प्राप्त कर लिया।

संसार में उलझन और ईश्वर-भजन की महत्ता—

मनुष्य का जीवन अनवरत संघर्ष और चुनौतियों से भरा हुआ है। संसार की नित नई इच्छाएँ, तृष्णाएँ और मोह-माया मनुष्य को उलझन में डाल देती हैं। इन उलझनों में फंसा व्यक्ति हमेशा अशांत रहता है, क्योंकि उसकी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। जब एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी जन्म ले लेती है। यही कारण है कि संसार के पीछे भागने वाला व्यक्ति कभी भी संतोष और शांति प्राप्त नहीं कर सकता। लेकिन यदि हम अपने लक्ष्य, अर्थात ईश्वर-भजन पर ध्यान केंद्रित करें, तो हमें सच्ची शांति प्राप्त हो सकती है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को फ़रमाते हैं—

अशांतस्य कुतः सुखम् ।

अर्थात् जिसका मन अशांत है, उसे सुख कहाँ से मिलेगा ? जब तक मनुष्य संसार की वस्तुओं में उलझा रहेगा, तब तक उसे शांति प्राप्त नहीं हो सकती। गीता में श्रीकृष्ण बार-बार यही समझाते हैं कि मनुष्य को अपने चित्त को स्थिर कर ईश्वर के भजन में लगाना चाहिए। यही वास्तविक योग और ध्यान का मार्ग है। जो मनुष्य विषय-वासनाओं से ऊपर उठकर भगवान की भक्ति करता है, वही परम शांति का अनुभव करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में आगे कहा गया है—

योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।

अर्थात योग में स्थित होकर कर्म करो और फल की चिंता छोड़ दो। जब मनुष्य फल की चिंता करता है, तब वह संसार में उलझ जाता है और अशांति का शिकार हो जाता है। लेकिन जब वह ईश्वर में लीन होकर कर्म करता है, तो शांति का अनुभव करता है।

रामायण में एक महत्वपूर्ण प्रसंग आता है, जब माता कैकेयी अपनी दासी मंथरा की बातों में आकर मोह-माया के जाल में उलझ जाती हैं। मंथरा के बहकावे में आकर वह राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत को राजगद्दी दिलाने के लिए श्रीराम को वनवास भेजने की माँग करती हैं। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि जब मनुष्य संसार की बातों में अधिक उलझ जाता है, तो उसका विवेक नष्ट हो जाता है और अशांति फैलती है। इसके विपरीत, हनुमान जी का उदाहरण लें—जो सदैव भगवान श्रीराम के भजन में लीन रहते हैं। उनकी स्थिति ‘सर्वथा शांत’ रहती है।

राम काज कीन्हें बिना, मोहि कहां विश्राम ।

हनुमान जी राम-कार्य में संलग्न रहते हैं और उनके मन में कभी भी कोई अशांति नहीं आती। यह इस बात का प्रमाण है कि जो व्यक्ति ईश्वर-भजन में ध्यान लगाता है, उसका चित्त स्थिर और शांत रहता है।

संत कबीरदास जी भी फ़रमाते हैं—

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।

जो मन को विषय-वासनाओं से मुक्त कर लेता है, वही सच्चे अर्थों में विजयी होता है।

विभिन्न उपमाओं में समझिए—

1. समुद्र और नौका—संसार एक विशाल समुद्र के समान है और मनुष्य की बुद्धि एक नौका है। यदि हम नौका को लहरों के भरोसे छोड़ देंगे, तो वह डगमगाएगी। लेकिन यदि हम उसे ईश्वर के नाम की पतवार से चलाएँगे, तो वह शांत भाव से किनारे तक पहुँच जाएगी।

2. दीपक और हवा—यदि दीपक को तेज हवा में रख दिया जाए, तो वह बुझ सकता है। लेकिन यदि उसे किसी शांत स्थान पर रखकर सुरक्षित किया जाए, तो वह निरंतर प्रकाश देता रहेगा। ठीक उसी प्रकार, संसार की विषय-वासनाएँ हमारे मन को विचलित करती हैं और ईश्वर-भजन उसे स्थिर बनाता है।

श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के जीवन से प्रेरणा—

दीपक और हवा का यह प्रतीकात्मक उदाहरण गहरी आध्यात्मिक शिक्षा देता है। यदि दीपक को तेज हवा के झोंकों में रखा जाए, तो वह बुझ सकता है, लेकिन यदि उसे किसी शांत स्थान पर रखा जाए, तो वह स्थिर रूप से प्रकाश देता रहेगा। इसी प्रकार, हमारा मन भी संसार की विषय-वासनाओं और सांसारिक आकर्षणों से प्रभावित होकर विचलित हो जाता है। लेकिन यदि उसे ईश्वर-भजन और साधना के माध्यम से स्थिर किया जाए, तो वह निरंतर आध्यात्मिक प्रकाश से आलोकित रह सकता है। इस संदर्भ में, श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के जीवन हमें गहरी प्रेरणा देते हैं।

श्री रामकृष्ण परमहंस—साधना से स्थिरता की प्राप्ति

श्री रामकृष्ण परमहंस का जीवन एक जलते हुए दीपक के समान था, जो सांसारिक प्रलोभनों की हवाओं से कभी बुझा नहीं। वे बाल्यकाल से ही  ईश्वर-प्रेम में लीन थे। जब वे दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी बने, तब भी वे सांसारिक इच्छाओं और विषय-वासनाओं से दूर रहकर केवल मां काली के ध्यान में मग्न रहते थे।

एक बार, कुछ लोग उन्हें सांसारिक सुखों में लाने का प्रयास कर रहे थे। वे चाहते थे कि श्री रामकृष्ण भी सामान्य मनुष्यों की भांति सांसारिक सुखों का अनुभव करें। लेकिन उन्होंने अपनी साधना को बनाए रखा और ईश्वर-भक्ति के मार्ग पर अडिग रहे। उनके अनुसार, मन को यदि ध्यान और भजन में लगाया जाए, तो वह संसार की चंचल हवाओं से विचलित नहीं होता।

स्वामी विवेकानन्द—संसार की हवा में भी दीपक को जलाए रखना

स्वामी विवेकानन्द ने अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस से जो शिक्षा प्राप्त की, उसे पूरे विश्व में फैलाया। वे अपने गुरु के इस विचार को आगे बढ़ाते थे कि मन को एकाग्र और स्थिर रखना आवश्यक है, ताकि सांसारिक प्रलोभन उसे विचलित न कर सकें।

स्वामी विवेकानन्द के जीवन में भी कई अवसर आए जब वे सांसारिक संघर्षों और कठिनाइयों से गुज़रे। विशेष रूप से जब वे अमेरिका गए, तो उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन वे अपने उद्देश्य में अडिग रहे। उन्होंने कहा था—यदि तुम संसार में सफलता चाहते हो, तो अपने मन को स्थिर बनाओ। उसे एकाग्र करो और अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दो।

उन्होंने इस जीवन को ईश्वर की साधना और मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया। उनके अनुसार, यदि दीपक की लौ को हवा से बचाना है, तो उसे काँच के भीतर रखना पड़ता है। उसी प्रकार, यदि मन को संसार के प्रलोभनों से बचाना है, तो उसे साधना और ध्यान में स्थिर रखना होगा।

 

अक्टूबर 2025

(भज गोविंदा)

चंदन सीस लगावै टीका
आखिर राम भजन बिन फीका
चाबै पान सुपारी लवंगा
गल्लो गल्ली फिरै बेढंगा
बाजै ठंड बनाया दगला
ऊपर काल फिरत है बगला
ओढ़ै शाल दुशाला पट्टू
इसमें क्या भूला रे शट्टू
नया हाली पलंग पर सोवै ।
उसके खातिर जीवन खोवै
अमृत कहै सब झूठा धंधा
भज ले राम कृष्ण गोविंदा
    (संत अमृत जी, औरंगाबाद)

भक्ति के बिना जीवन नीरस—

यह छंद सांसारिक मोह-माया और भौतिक सुखों की क्षण-भंगुरता को उजागर करता है। इनका सार यही है कि मनुष्य यदि बाहरी आडंबरों में उलझा रहता है और ईश्वर-भक्ति से दूर रहता है, तो उसका जीवन नीरस और अर्थहीन हो जाता है।

चंदन  सीस  लगावै  टीका ।
आखिर राम भजन बिन फीका

माथे पर चंदन का तिलक लगाने का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है, परंतु यदि मनुष्य अपने जीवन में भगवान का भजन नहीं करता, तो उसका सारा श्रृंगार व्यर्थ हो जाता है। यह वैसा ही है जैसे एक वृक्ष बाहरी रूप से हरा-भरा दिखे, परंतु भीतर से खोखला हो जाए।

दृष्टांत—एक व्यापारी प्रतिदिन मंदिर जाता था, माथे पर तिलक लगाता और धार्मिक अनुष्ठान करता था। लेकिन उसका स्वभाव कटु और अहंकारी था। एक दिन एक संत ने उससे पूछा, तुम्हारे सिर पर तो तिलक है, परंतु क्या हृदय में भगवान बसे हैं ? इस प्रश्न ने उसे झकझोर कर रख दिया और उसने सच्ची भक्ति की राह अपनाई।

भौतिक सुखों की मृग-तृष्णा—

चाबै पान सुपारी लवंगा ।
गल्लो गल्ली फिरै बेढंगा

मनुष्य स्वाद और ऐश्वर्य में लिप्त रहता है, लेकिन यदि उसका आचरण अनुशासनहीन और अनैतिक हो, तो ये सारी विलासिताएँ व्यर्थ हैं। समाज में आज भी हम ऐसे अनेक उदाहरण देखते हैं, जहाँ बाहरी दिखावे को अधिक महत्व दिया जाता है, लेकिन नैतिकता और आध्यात्मिकता की उपेक्षा की जाती है।

दृष्टांत—राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक व्यक्ति प्रतिदिन बहुमूल्य वस्त्र पहनकर आता था और श्रेष्ठ व्यक्ति होने का दिखावा करता था। राजा ने एक दिन उसे साधारण वस्त्र पहनकर आने को कहा। जब वह साधारण कपड़ों में आया, तो दरबारी उसे पहचान न सके। तब राजा ने कहा, व्यक्ति की पहचान उसके वस्त्रों से नहीं, बल्कि उसके आचरण से अधिक होती है। उसका अच्छा आचरण ही उसकी श्रेष्ठता की पहचान है, वस्त्र नहीं।

मृत्यु का अटल सत्य—

बाजै ठंड बनाया डगला
ऊपर काल फिरत है बगला

मनुष्य चाहे जितने भी साधन जुटा ले, आरामदायक वस्त्र पहन ले, परंतु उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि मृत्यु उसके सिर पर सदैव मंडरा रही है। यह शाश्वत सत्य है कि जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक सुखों का उपभोग करना नहीं, बल्कि आत्म-कल्याण की ओर अग्रसर होना है।

जिस प्रकार जल में खड़ा कमल जल से अलग रहकर खिला रहता है, उसी प्रकार मनुष्य को संसार में रहते हुए भी भक्ति मार्ग पर अग्रसर रहना चाहिए।

आडंबर से मोक्ष नहीं—

ओढ़ै शाल दुशाला पट्टू
इसमें क्या भूला रे शट्टू

जो मनुष्य महंगे वस्त्र धारण करता है और बड़ा होने का अहंकार करता है तो यह उसकी आत्मा की उन्नति में बाधक है। सच्चा वैभव आंतरिक शुद्धता में है, बाहरी चमक-दमक में नहीं।

दृष्टांत—एक बार एक राजा एक संत के पास गया और बोला, महाराज, मैं रोज़ मंदिर में महंगे चांदी के दीपक जलवाता हूँ, पूजा-पाठ करवाता हूँ।
फिर भी मुझे आंतरिक शांति नहीं मिलती। क्यों
?

संत ने मुस्कराकर एक मिट्टी का दीपक मंगवाया और उसे तेल-बाती से जलाया। फिर एक चांदी का दीपक मंगवाया जो बहुत सुंदर और चमकदार था, लेकिन उसमें न तो तेल था, न बाती।

संत ने कहा, हे राजन ! यह देखो—मिट्टी का दीपक जल रहा है, क्योंकि उसमें तेल और बाती है और यह चाँदी का दीपक, जो दिखने में बहुत भव्य है, लेकिन भीतर खाली है—यह नहीं जल सकता।
तुम्हारी पूजा-पाठ, दान-दक्षिणा—सब बाहरी चांदी के दीपक की तरह हैं। लेकिन जब तक भीतर प्रेम, भक्ति और विनम्रता का तेल नहीं होगा, तब तक तुम ईश्वर तक नहीं पहुँच सकते।

भौतिक सुखों की अस्थिरता—

नया हाली पलंग पर सोवै ।
उसके खातिर जीवन खोवै

आज के युग में लोग ऐश्वर्य और भौतिक सुखों के पीछे अपने जीवन की सारी ऊर्जा नष्ट कर देते हैं। नए-नए सुख-साधनों की लालसा कभी समाप्त नहीं होती, परंतु यह सब अंततः अस्थायी हैं।

दृष्टांत—एक राजा ने एक महल बनवाया और सोचा कि अब वह सदा सुखी रहेगा। लेकिन उस महल में रहकर भी वह सुखी नहीं रहा, वह उसी प्रकार दुखी बना रहा। कुछ समय पश्चात् उसने एक दिन एक संत के मुख से सत्संग के वचन सुने जिसमें वे कथन कर रहे थे कि इस संसार की समस्त रचना असत्य और मिथ्या है मनुष्य को एक दिन इसे छोड़कर जाना पड़ता है। तब एक दिन उसके मन में विचार आया कि ऐसे तो यह महल भी एक दिन नष्ट हो जाएगा। यह सोचते हुए राजा संत के पास गया और उनसे पूछा, महाराज, क्या कोई चीज़ अमर भी है ? संत ने उत्तर दिया, केवल ईश्वर की भक्ति और नाम ही सत्य और अमर है।

सच्चा सुख–ईश्वर भक्ति

अमृत कहै सब झूठा धंधा ।
भज ले राम कृष्ण गोविंदा

संत अमृत जी कहते हैं कि सांसारिक सुख क्षणिक हैं। जो मनुष्य ईश्वर-भक्ति में लीन रहता है, वही सच्चा आनंद और शांति प्राप्त करता है। सच्चा सुख किसी भौतिक वस्तु में नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धता और भक्ति में है।

दृष्टांत—एक बार नारद मुनि ने भगवान विष्णु से पूछा, प्रभु, संसार में सबसे अधिक सुखी कौन है? भगवान ने उत्तर दिया, जो मुझे प्रेम से भजता है, वही सबसे अधिक सुखी है। सुख पाने का एकमात्र साधन भजन-भक्ति ही है। अतः भक्त ही इस संसार में सबसे सुखी हैं, शेष सब तो झूठे सुख को ही सुख मान रहे हैं।

भक्ति ही शाश्वत सुख का स्रोत—

संसार में जो भी वस्तुएँ हैं, वे नश्वर और क्षणभंगुर हैं। धन, ऐश्वर्य, मान-सम्मान और भौतिक सुख-सुविधाएँ देखने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन ये सदा के लिए नहीं टिकतीं। मनुष्य इन्हें प्राप्त करने के लिए दिन-रात परिश्रम करता है, लेकिन अंततः उसे खाली हाथ जाना पड़ता है। इसके विपरीत, ईश्वर भजन और भक्ति सदा के लिए आनंद प्रदान करने वाली हैं, यही सत्य पदार्थ सदा उसके संग साथ रहता है। इस संसार में मानव जीवन पाकर जो भजन और भक्ति में मन लगाते हैं, वही वास्तव में बुद्धिमान होते हैं।

भौतिक सुखों की अस्थिरता—

जिस प्रकार जल में बुलबुले उठते हैं और कुछ ही क्षण में विलीन हो जाते हैं, वैसे ही सांसारिक सुख भी आते और चले जाते हैं। आज जो धनवान है, कल निर्धन हो सकता है। एक राजा, जो आज अपने महल में चैन की नींद ले रहा है, हो सकता है कि कल वह युद्ध में पराजित होकर वन में भटक रहा हो। इसलिए, जो भी नाशवान है, उस पर अधिक आसक्ति रखना उचित नहीं।

निष्कर्षमनुष्य को चाहिए कि वह भौतिक सुखों की मृग-तृष्णा में न उलझे, बल्कि अपने जीवन को ईश्वर-भक्ति और आत्म-उन्नति की ओर मोड़े। यह संसार एक यात्रा है, जहाँ सच्ची मंज़िल परमात्मा का सान्निध्य है। इस सत्य को जो जान लेता है, वही वास्तव में आनंद को प्राप्त करता है।

इसलिए, हमें अपने जीवन को सत्संग, भक्ति और आध्यात्मिकता की ओर मोड़ना चाहिए, जिससे हम सच्चे सुख और शांति का अनुभव कर सकें।



सितम्बर 2025

( आगे का धन )

 

कबीर सो धन संचिए, जो आगे को होय ।
सीस चढ़ाए गाठड़ी, जात न देखा कोय
आध्यात्मिक धन का महत्व—

परमसंत श्री कबीर साहिब जी का यह दोहा जीवन के एक गहरे सत्य को उजागर करता है। इस दोहे में श्री कबीर साहिब जी हमें उस धन के संचय का महत्व समझाते हैं, जो इस नश्वर संसार के बाद भी हमारे साथ जाता है। सांसारिक धन-संपत्ति, वस्त्र, मकान या अन्य भौतिक वस्तुएँ मृत्यु के बाद हमारे किसी काम नहीं आतीं। इसलिए हमें ऐसे धन का संग्रह करना चाहिए जो आत्मा को उन्नति की ओर ले जाए और मृत्यु के बाद भी हमारे साथ रहे।

सांसारिक जीवन में धन-संपत्ति का महत्व तो है, लेकिन यह केवल भौतिक सुख-सुविधाओं तक सीमित है। परमसंत श्री कबीर साहिब जी यहाँ ‘धन’ को प्रतीकात्मक रूप में उपयोग करते हुए हमें चिताते हैं कि हमें परोपकार, सच्चाई, प्रेम और ईश्वर भक्ति का संचय करना चाहिए। यही ऐसा धन है, जो मृत्यु के बाद भी आत्मा को शुद्ध रखता है और ऊँचा दर्ज़ा दिलाता है।

इस बात को समझाने के लिए कई दृष्टांत दिए जाते हैं। एक किसान खेत में बीज बोता है। अगर वह केवल सूखी और बंजर भूमि में बीज बोएगा, तो फसल नहीं उगेगी। लेकिन यदि वह उपजाऊ भूमि में बीज बोएगा, तो वह आने वाले समय में अत्यधिक फसल का आनंद लेगा। ठीक इसी प्रकार, अगर हम अपने जीवन में केवल भौतिक वस्तुओं के पीछे भागते हैं, तो यह उसी बंजर भूमि में बीज बोने जैसा है। लेकिन यदि हम दया, धर्म और भक्ति के बीज बोते हैं, तो यह हमारे जीवन के बाद भी हमें आत्मिक संतोष प्रदान करेगा।

इस विषय में स्वयं परमसंत श्री कबीर साहिब जी का जीवन इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने अपने जीवन में धन-संपत्ति का संचय नहीं किया, बल्कि सत्य, प्रेम, दया, धर्म, अहिंसा और परोपकार का मार्ग अपनाया। आज उनकी शिक्षा और विचार दुनिया भर में लोगों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। उनका ‘धन’ वह नहीं था जो बैंक में जमा था, बल्कि वह  आदर्श थे, जो आज भी हमारे लिए पूरी तरह प्रासंगिक हैं।

परमसंत श्री कबीर जी यहाँ यह नहीं कहते कि भौतिक धन की पूर्ण रूप से अवहेलना की जाए। जीवन में भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन की ज़रूरत होती है, लेकिन इसे ही जीवन का अंतिम उद्देश्य मान लेना भूल है। हमें भौतिक धन के साथ-साथ आध्यात्मिक धन का भी संचय करना चाहिए।

इस वाणी का संदेश हमें यह सिखाता है कि अपने जीवन में ऐसी सच्ची वस्तु का भी संचय करें, जो हमारे अपने चरित्र, आत्मा और दूसरों के लिए भी मूल्यवान हों। हमें अपने विचार, कर्म और व्यवहार में सच्चाई, करुणा और दया का समावेश रखना चाहिए।

सन्तों की वाणी हमें जीवन का गूढ़ सत्य समझाती है। यह उपदेश हमें सतर्क करता है कि हम अपने जीवन का मूल्यांकन करें और यह देखें कि हम किस प्रकार का धन संचय कर रहे हैं। यदि हमारा ध्यान केवल भौतिक सुखों की ओर है, तो हमें इसे बदलने की आवश्यकता है। जीवन में वह धन संचय करें जो हमें न केवल इस संसार में, बल्कि परलोक में भी आनंद प्रदान करे। परलोक में तो केवल प्रभु भक्ति का धन ही साथ जाता है।

सीस चढ़ाए गाँठड़ी का प्रतीक—

संसार से विदा होते समय भौतिक वस्तुओं को ले जाना असंभव है। मनुष्य का जन्म और मृत्यु इसका प्रमाण हैं। मृत्यु होने पर सब कुछ यहीं का यहीं पड़ा रह जाता है। इसलिए अपने जीवन में सुमिरण-ध्यान और सत्संग का धन संग्रह करना अति आवश्यक है।

सेठ धन्ना लाल की कथा—

एक गाँव में धन्ना लाल नाम का एक व्यापारी रहता था। वह अत्यंत धनी था और उसका गाँव में बड़ा सम्मान था। लेकिन उसको अपने धन और प्रतिष्ठा पर बहुत अभिमान था। उसका पूरा जीवन धन-संपत्ति को बढ़ाने में ही लगा हुआ था। धन के अभिमान में वह किसी को कुछ नहीं समझता था और न ही किसी का वह सम्मान करता था। उसी गाँव में एक साधु महाराज भी रहते थे, जिनका नाम था नवनाथ। वे सादा जीवन जीते और हमेशा संतुष्ट रहकर भक्ति और सेवा में रमे रहते थे।

सेठ धन्नालाल को साधु नवनाथ महाराज की सादगी और उनकी बातों पर हँसी आती थी। एक दिन मार्ग में चलते हुए उनकी साधु महाराज से वार्त्ता होने लग गई। सेठ धन्ना लाल ने कहा, आपका यह फटेहाल जीवन देखकर मुझे आश्चर्य होता है। धन कमाना और भौतिक सुखों का आनंद लेना ही जीवन का असली उद्देश्य है। मैं आपसे ज़्यादा सुखी हूँ क्योंकि मेरे पास सब कुछ है। साधु मुसकराए और बोले, धन्ना लाल, जीवन का असली धन वह है जो मृत्यु के बाद भी तुम्हारे साथ जाए। क्या तुम्हारा सारा धन तुम्हारे साथ जाएगा ?

धन्ना लाल इस बात पर हँसते हुए बोला, महाराज, आपकी बातें कल्पना लगती हैं। लेकिन ठीक है, मैं इसे समझने की कोशिश करूँगा। साधु महाराज ने उसे जवाब दिया, समय तुम्हें खुद सिखाएगा।

जीवन के सब दिन एक समान नहीं रहते। कुछ समय बाद, धन्ना लाल के व्यापार में घाटा होने लगा। घाटे की नौबत यहाँ तक पहुँच गई कि उसे अपने परिवार की रक्षा के लिए अपनी संपत्ति भी बेचनी पड़ गई। इस प्रकार धीरे-धीरे सब कुछ खत्म हो गया। जब धन्ना लाल के पास कुछ भी नहीं बचा, तो उसके मित्र और रिश्तेदार भी उससे दूर हो गए। अब उसे समझ में आने लगा कि धन और भौतिक सुख स्थायी नहीं होते।

अब जब मस्तिष्क से धन का नशा उतर गया तो उसे साधु महाराज की बातें याद आने लगी। एक दिन वह साधु महाराज के पास गया और बोला, महाराज, मैं हार चुका हूँ। मेरे पास अब कुछ भी नहीं है। अब मुझे बताइए, मेरा असली धन क्या है और कहाँ है ?

साधु महाराज ने मुसकराते हुए कहा, धन्ना लाल, असली धन वह है जो आत्मा को शुद्ध करे और तुम्हें सच्चे आनंद की ओर ले जाए। यह धन सत्य, प्रेम, करुणा, भक्ति और परोपकार के रूप में होता है। जो दूसरों की मदद करता है। जो ईश्वर की शरण में रहता है, वही वास्तव में धनी है।

धन्नालाल ने साधु महाराज की बातों को ध्यान से सुना और उनका अनुसरण करने का निश्चय किया। उसने अपने जीवन को बदलना शुरू किया। अब उसने परिश्रम करना शुरू किया और जो कुछ धन उसे मिलता उससे वह अपना भरण-पोषण करके ज़रूरतमंदों की मदद भी करने लगा और सच्चाई व  ईश्वर भक्ति के मार्ग पर चलने लगा। धीरे-धीरे, धन्नालाल को आत्मिक शांति और आनंद मिलने लगा।

कुछ वर्षों में ही धन्नालाल पूरी तरह बदल गया, प्रभु-भक्ति करते हुए वह सन्त महात्माओं की सेवा करने लगा। गाँव के लोग भी उसके इस बदले हुए रूप को देखकर बड़े प्रसन्न हुए और प्रभावित होकर उसका सम्मान करने लगे। वे अब उसे भक्ति और सेवा के प्रतीक के रूप में जानने लग गए। उसने साधु महाराज के वचनों को अपना जीवन-मार्ग बना लिया। जब उसकी मृत्यु हुई, तो लोग उसे याद करते हुए कहने लगे, धन्ना लाल ने वह धन कमाया, जो हमेशा उसके साथ रहेगा। सत्य ही है—

कबीर सो धन संचिए, जो आगे को होय ।’

 

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अगस्त 2025

ईश्वर का मूल्य

           मनुष्य के जीवन में ऐसे अवसर प्रायः कम ही आते हैं, जब उसे कोई अनमोल वस्तु अत्यंत सुलभ मूल्य पर मिलती दिखती है। किंतु यदि वह मनुष्य उस अवसर का लाभ उठाने में विलंब कर दे, तो वह वस्तु किसी अन्य को मिल जाती है। संतों की वाणी में संसार के इन छोटे-छोटे व्यावहारिक अनुभवों को आध्यात्मिक विमर्श से जोड़ते हुए, बार-बार यह समझाया गया है कि परमात्मा को प्राप्त करना हमारा परम कर्तव्य है और यदि इसके लिए किसी भी प्रकार का त्याग करना पड़े तो उसे तत्काल कर देना चाहिए। इसी संदर्भ में संतों द्वारा कही गई एक वाणी बहुत प्रसिद्ध है–

जे सिर सांटे हरि मिले, तो हरि लीजै दौर ।
नारायण’ या देर में, मत गाहक आवै और ॥

इस पंक्ति में निहित है कि यदि भगवान को पाने के लिए अपना सिर भी अर्पित करना पड़े, तो झटपट अर्पित कर देना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि हम देर कर दें और कोई दूसरा भक्त उस सौदे का लाभ उठा ले। आध्यात्मिक रूप से यह सिर अर्पित करने का अर्थ है पूर्ण समर्पण, अहं का त्याग और अपने तन-मन-धन की बाज़ी लगाकर प्रभु को पा लेना। यह वचन मनुष्य को चेतावनी देता है कि विलंब उचित नहीं है; इतना अनमोल सौदा कहीं और  नहीं मिलेगा।

इस वचन का उचित और विस्तृत विश्लेषण करते हुए हम इसे गीता, रामायण, संत वाणी और कुछ दृष्टांतों के प्रकाश में समझने का प्रयास करेंगे। साथ ही हम देखेंगे कि भक्ति, समर्पण व त्याग की भावना हमें किन-किन आयामों में लाभ पहुँचाती है

वचन का मूल भाव और अर्थ

 

जे सिर सांटे हरि मिले—इस अंश में ‘सिर सांटना’ यानी अपना सिर बलिदान कर देना या अपनी समस्त पहचान, अहंकार, सीमित सोच, और सांसारिक मोह त्याग देने की बात की गई है। सिर मनुष्य के अस्तित्व, ज्ञान और अहं का प्रतीक है। जब किसी बात के लिए हम कहते हैं कि हम सिर कटा सकते हैं, पर पीछे नहीं हटेंगे, तो उसका भाव यह होता है कि हम उसके लिए अपना सर्वस्व देने को तैयार हैं। संत वाणी में ‘सिर सांटना’ का आशय भी इसी भाव से है, परंतु यहाँ भाव दैहिक रूप से सिर काटकर चढ़ा देने भर का नहीं, बल्कि—अपने सारे सांसारिक अहम, इच्छाएँ और उलझनों को त्याग कर, परमात्मा के प्रति पूरे समर्पण की स्थिति को प्राप्त करने का है।

‘तो हरि लीजै दौर’—दूसरी पंक्ति में कहा गया है कि अगर इस त्याग से भगवान प्राप्त होते हैं, तो भगवान को झटपट पकड़ लो, उसमें विलंब मत करो। यहाँ हरि लीजै दौर का अर्थ है—द्रुत गति से, बिना देर किए, प्रभु को अंगीकार कर लेना। ‘हरि’ यहाँ ईश्वर का द्योतक है—वह ईश्वर जो संसार से हटाकर हमें अपने भीतर आनंद और परम शांति का अनुभव कराता है।

‘नारायण’ या देर में, मत गाहक आवै और तीसरी पंक्ति में ‘नारायण’ सम्बोधन के साथ यह हिदायत दी गई है कि कहीं ऐसा न हो कि देर करने पर कोई और भगवद्-भक्त इस अवसर का लाभ उठा ले और हम पीछे रह जाएँ। यहाँ ‘गाहक’ शब्द का उपयोग एक ग्राहक के अर्थ में किया गया है, जो अनमोल ‘वस्तु’ अर्थात् ईश्वर को पाने के लिए तत्पर है।

संत कवियों की शैली में यह व्यंग्यपूर्ण, लेकिन गहरा आध्यात्मिक संकेत है कि ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष के लि आरक्षित नहीं है; जो भी सच्चे हृदय से पुकारता है, समर्पण करता है, उसे ईश्वर प्राप्त होते हैं।

इस पूरे वचन का सार यह है कि भगवान को पाने के लिए यदि पूर्ण त्याग भी करना पड़े तो भी वह सौदा सस्ता ही है। कोई भी सांसारिक उपलब्धि परमात्मा की प्राप्ति से बढ़कर नहीं हो सकती। यह बात हमारे भीतर उत्साह और तत्परता जगाती है कि हम अपने जीवन की प्राथमिकताओं का पुनरावलोकन करें और ईश्वर-प्राप्ति के लिए हर संभव प्रयास करें।

आध्यात्मिक पृष्ठभूमि—क्यों आवश्यक है समर्पण ?

 

कई भक्तों और साधकों के मन में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर इतना पूर्ण समर्पण क्यों आवश्यक है ? क्या ईश्वर हमसे कोई सौदा करना चाहते हैं ? क्या परमात्मा स्वार्थी हैं जो हमारे त्याग पर निर्भर हों ? ऐसे प्रश्न मन में आना स्वाभाविक है। वास्तव में त्याग या समर्पण से ईश्वर को न तो कोई भौतिक लाभ होता है, न ही वे किसी के त्याग के भूखे होते हैं।

· समर्पण का प्रथम उद्देश्य है—मनुष्य के भीतर की अहं-ग्रंथि का विलीन हो जाना। अहंकार मनुष्य को ईश्वर से दूर करता है। जब मनुष्य सोचता है कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, मैं सब कर सकता हूँ, तब उसे परमात्मा की महानता और अनंतता का भान नहीं रह जाता। वह अपनी सीमित मन-बुद्धि में उलझा रह जाता है।

· दूसरा उद्देश्य है—प्रीति और श्रद्धा का पोषण। जब हम पूरे समर्पण के साथ ईश्वर को सबसे प्रिय मानते हैं, तो हमारे भीतर उनके प्रति श्रद्धा, प्रेम और भक्ति का उदय होता है। ऐसा प्रेम ही जीवन में आनंद और शांति का स्रोत बनता है।

· तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है—अपने वास्तविक स्वरूप की खोज। शास्त्रों और संतों के अनुसार वास्तविकता में, जीवात्मा परमात्मा का अंश है। हमारा सच्चा स्वरूप तो वही दिव्य चेतना है, किन्तु मन और इंद्रियों के दासत्व में फँसकर हम स्वयं को सीमित समझ लेते हैं। समर्पण से यह सीमितता टूटती है और हमें अपनी वास्तविक दिव्य क्षमता का अनुभव होने लगता है।

 जुलाई 2025

जीवन की विषमताओं में भक्ति की महिमा

 

            जीवन एक ऐसा महासागर है, जिसमें प्रतिक्षण हम सुख-दुःख की लहरों से टकराते रहते हैं। इन  उतार-चढ़ावों का मूल कारण हमारे ही कर्म और प्रारब्ध होते हैं। उपनिषद हमें सिखाते हैं—

असतो मा सद् गमय,
तमसो मा ज्योतिर्गमय,
मृत्योर्मामृतं गमय ॥
      (बृहदारण्यक उपनिषद)

अर्थात्—हे प्रभु ! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु के भय से अमृत तत्व की ओर ले चलो।

जब हम नाम-सुमिरण और सत्संग के प्रकाश में अपने मन को स्थापित कर लेते हैं, तब जीवन की कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो, हमें मार्ग मिल ही जाता है।

1. एक भक्त की व्यथा और गुरुदेव की शिक्षा—

            एक साधक भक्त ने अपने गुरुदेव से प्रार्थना की—महाराज जी ! मेरे जीवन में अनेक विपत्तियों का अंबार लगा है। शरीर रोगों से ग्रस्त है, पुत्र नहीं है, एक बेटी थी जो अब इस संसार से विदा हो गई। पत्नी भी बीमार रहती है। आपका उपदेश है कि नाम-सुमिरण करो, पर मन की अस्थिरता के कारण वह भी सुचारू रूप से नहीं हो पाता। इन परिस्थितियों में अपने चित्त को कैसे स्थिर रखूँ ?

गुरुदेव ने बड़े प्रेम से समझाया—प्यारे भक्त, हमें जो भी परिस्थितियाँ मिलती हैं, वे हमारे ही कर्मों का परिणाम हैं। अच्छा-बुरा, सुख-दुःख—सब कर्म के अनुसार भोगना ही पड़ता है।

श्रीमद् भगवद् गीता में भी श्री भगवान फ़रमाते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

अर्थात्—मनुष्य को केवल कर्म करने का ही अधिकार है, किन्तु फल पर नहीं। अतः फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करते रहना ही श्रेयस्कर है। इसलिए जो भी कर्म के फल प्राप्त हो रहे हैं, उन्हें ईश्वरीय प्रसाद मानकर भोगो और साथ ही नाम-सुमिरण को कभी न छोड़ो।

2. कर्म का सिद्धांत और विवेकपूर्ण भोग—

कर्म के अपरिहार्य सिद्धांत को संतों ने सदैव समझाया है। शरीर धारण किए हुए प्रत्येक प्राणी को अपने पूर्वकृत कर्मों का फल भोगना पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास जी का एक प्रसिद्ध दोहा है—

देह धरे का दंड है, सब काहू को हो
ज्ञानी काटे ज्ञान से, अज्ञानी काटे रोए ॥

अर्थात्—देह का धारण करना ही अपने आप में एक दंड है। इस संसार में जन्म लिया है तो कर्मों का फल भोगना ही पड़ेगा। परंतु ज्ञानीजन इन कष्टों को ज्ञान-विवेक के सहारे बड़े शांत भाव से काटते हैं, जबकि अज्ञानीजन रोते और झींकते हुए समय गुज़ारते हैं।

इसलिए यदि जीवन में बहुत-सी कठिनाइयाँ आ रही हैं, तो यह समझना चाहिए कि ये हमारे कर्मों के परिणाम स्वरूप ही हैं। हमारा लक्ष्य होना चाहिए—इन कर्मों के फल को सहन करते हुए आत्म-उत्थान के लिए साधना करते रहना। बिना साधना के कर्मयोग अधूरा है। यही वह साधनायुक्त कर्म-योग है, जिसके बारे में गीता में कथन है—

योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

            अर्थात्—हे धनंजय ! आसक्ति को त्यागकर सम भाव में स्थित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करो। सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखना ही योग कहलाता है।

3. भक्ति में दृढ़ता और नाम-सुमिरण का महत्व—

जीवन के संघर्षों से जूझते समय मन की चंचलता और दु:ख की प्रचंडता हमें व्याकुल करती है। किन्तु भक्ति का सहारा मिल जाए तो मनुष्य की दृढ़ता बढ़ जाती है। कठोपनिषद् में उल्लेख मिलता है—

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।

अर्थात्—‘उठो, जागो और उत्तम पुरुषों के संग में उत्तम मार्ग पर चलो।’ भक्ति और सत्संग का मार्ग ही ऐसा है जो हमें सत्य का बोध कराता है। इस मार्ग पर चलते हुए प्रभु-नाम का निरंतर स्मरण मन को शांति और धैर्य प्रदान करता है। संसार में रमे हुए मनुष्य इस सत् के मार्ग पर न चलकर मन माने मार्ग पर चल पड़ते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वे आत्मा का रुख अधोगति की ओर मोड़ देते हैं —

जैसा कि श्री कबीर साहिब जी ने कहा है—

साधो देखो जग बौराना,
सत्य बात कोई न पहचाना ।

सत्य बात संतन पहचाना ॥

यह सत्य बात क्या है ? इस मिथ्या जगत् में केवल प्रभु नाम-सुमिरण ही सत्य है, अन्य सब मिथ्या है। श्री कबीर साहिब जी की दृष्टि में, जो व्यक्ति सत्य को जानना चाहता है, उसे जगत् के अस्थिर भोगों से मन को हटाकर नाम-सुमिरण का सहारा लेना चाहिए। यही सत्य का मार्ग है, जो अंततः हमें परमात्म-तत्व से जोड़ता है।

4. ज्ञानी व अज्ञानी की भिन्न दृष्टि—

गुरुदेव ने समझाया कि शरीरधारी सभी को कर्मफल भोगना है, परंतु फल भोगने में ज्ञानी और अज्ञानी दोनों का भाव भिन्न-भिन्न होता है। ज्ञानी जन तो जीवन के हर प्रसंग को प्रभु की लीला समझते हुए उसमें सम-भाव रखते हैं। वे न तो सुख में उछलते हैं, न दुःख में टूटते हैं। अज्ञानी या सत्संग-ज्ञान से वंचित व्यक्ति, सदा समय को कोसता रहता है और विपरीत परिस्थितियों में निराश और दुखी रहता है। ज्ञानी पुरुष अपने सम-भाव के कारण सभी जीवों में एक पारब्रह्म को देखते हुए मोहित नहीं होता। 

श्रीमद् भगवद् गीता में कहा गया है—

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥

            अर्थात्—जिस प्रकार ज्ञानवान व्यक्ति ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते या चांडाल में कोई भेद नहीं करता; वह सब में एक ही परमात्म-तत्व का दर्शन करता है। उसी प्रकार ज्ञानीजन जीवन की हर परिस्थिति में ईश्वर की ही मौज को देखते हुए समदृष्टि रखते हैं।

5. सत्संग द्वारा आत्मनिरीक्षण—

गुरु भक्ति में दृढ़ता लाने के लिए सत्संग-श्रवण द्वारा आत्म निरीक्षण करते रहना आवश्यक है। सत्संग रूपी गुरु प्रकाश में हम अपने दोषों को देख पाते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास भी कर सकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है—

बिनु सत्संग विवेक न होई
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥

सत्संग के बिना हृदय में विवेक का उदय नहीं होता और प्रभु की कृपा के बिना सत्संग भी दुर्लभ है। सत्संग में जाकर हम संतों-महापुरुषों के अनुभव सुनते हैं, उनके बताए आदर्शों को जीवन में उतारते हैं और अपने विचारों को परिष्कृत कर पाते हैं।

आत्म निरीक्षण का अर्थ है अपने दैनिक कर्मों, भावनाओं और विचारों पर ध्यान देना। यदि किसी दिन क्रोध अधिक बढ़ गया, लोभ या ईर्ष्या जैसे विकार हावी हुए, तो समझ लें कि हमें प्रभु-नाम और गुरु-मंत्र के अभ्यास को और मज़बूत करना है। धीरे-धीरे हमारा आत्म-बल बढ़ता जाएगा और फिर विकारों का प्रभाव स्वतः कम होने लगेगा।

6. गुरु-मंत्र और प्रभु-कृपा का आधार—

गुरु-मंत्र का स्मरण हमारे अंतर्मन को स्थिर करता है। जिस तरह एक कुशल वैद्य रोगों का निदान करने के लिए औषधि देता है, उसी तरह सद् गुरु हमारी आंतरिक दुर्बलताओं का निदान करने के लिए नाम-जप, ध्यान और सेवा का मार्ग दिखाते हैं। यदि हम गुरु वचनों पर विश्वास करते हुए उनका आचरण करें, तो हमारे भीतर की नकारात्मक वृत्तियाँ दूर होने लगती हैं और भक्ति में गहरी रुचि जागृत होती है।

   श्रीमद् भगवद् गीता में भगवान कथन करते हैं—

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥

अर्थात्—‘तत्वदर्शी ज्ञानवान गुरु के पास विनम्रता और सेवा-भाव से जाओ, उन से श्रद्धापूर्वक प्रश्न करो; वे तुम्हें परम ज्ञान प्रदान करेंगे।’ गुरुदेव के उपदेश के अनुरूप यदि हम अनुशासित जीवन जीते हैं तो कठिनाइयों के बीच भी मन स्थिर और आनंदित रह सकता है।

7. कठिनाइयों को आत्म-विकास का अवसर मानना—

            जीवन की हर प्रतिकूलता, हर विपरीत स्थिति, वास्तव में हमें परिपक्व बनाती है। मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है—

भिद्यते  हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते  सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्
दृष्टे परावरे ॥

अर्थात्—पारब्रह्म का साक्षात्कार होने पर हृदय के सभी बंधन टूट जाते हैं, संदेह दूर हो जाते हैं और कर्म क्षीण होने लगते हैं।’ यद्यपि सामान्य सांसारिक अवस्था में परमात्म तत्व का प्रत्यक्ष साक्षात्कार पूर्ण रूप से न भी हो पाए, किन्तु नाम-सुमिरण और गुरु-कृपा से हम अपने भ्रमों से मुक्ति पाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं। विपरीत परिस्थितियाँ हमारे भीतर छिपे धैर्य, साहस और समर्पण को उभारती हैं, बशर्ते हम उन्हें आत्म-विकास का साधन बनाने का संकल्प लें।

8. निष्कर्ष—प्रभु-नाम की शरण ही वास्तविक बल—

जीवन में किसी भी प्रकार की अस्थिरता या विपत्ति आने पर, उसका सबसे सशक्त समाधान है—प्रभु-नाम का आश्रय। यही वह सत्य है, जिसका उल्लेख संत-कवियों से लेकर उपनिषदों एवं गीता ने सर्वत्र किया है। जितना-जितना हम नाम-सुमिरण की गहराई में जाते हैं, उतना ही मन की चंचलता समाप्त होती जाती है और हम अहंकार, मोह व भ्रम से मुक्त होने लगते हैं। संत तुलसीदास जी ने कहा है—

राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरी द्वार ।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजियार ॥

अर्थात्—यदि तुम अपने अंदर और बाहर दोनों जगह प्रकाश चाहते हो, तो जीभ रूपी देहरी पर राम-नाम का दीपक जलाए रखो। वास्तव में यही मंत्र हमें अंदर और बाहर का घोर अंधकार मिटाने की शक्ति देता है।


     जून 2025

 

कल्याण मार्ग

( भ्रम का निवारण )

 

            जैसे वृक्ष फल के बिना सूना लगता है, वैसे ही प्रभु की लगन एवं प्रेम के बिना मनुष्य सूना है। जैसे दही के बिना दूध में से मक्खन नहीं निकलता, वैसे ही सच्ची व तीव्र लगन के बिना मनुष्य को तत्व ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। जैसे तेल के बिना मशाल नहीं जल सकती और प्रकाश नहीं होता, वैसे ही अखंड नाम जाप के बिना हृदय में आंतरिक ज्योति का प्रकाश नहीं होता।

गुरु अष्टावक्र जी राजा जनक जी को उपदेश कर रहे हैं—

एको विशुद्ध बोधोऽहं इति निश्चय वह्निना ।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव

             (अष्टावक्र गीता )
 

अर्थ—हे राजन् ! मैं एक विशुद्ध आत्म-ज्ञान अथवा बोध प्राप्त हूँ, इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान के वन को जला दें, इस प्रकार शोकरहित होकर सुखी हो जाएँ।

अभिप्राय यह कि व्यक्ति के अज्ञान और भ्रम के कारण जगत् में समस्त शोक और दु:ख व्याप्त हो रहे हैं। हृदय में छा अज्ञान और भ्रम के अंधेरे में जीव भटक रहा है।

 यह संसार और इसके सुखभोगों की रचना एक बाज़ीगर द्वारा रचाई गई बाज़ी की तरह हैं जो वास्तव में न होते हुए भी दिखाई देती है। इसी तरह हमें प्रभु ने इस संसार रूपी बाज़ार में सच्चे नाम रूपी सामान लेने के लिए यह मनुष्य शरीर दिया है। जो व्यक्ति समझदार होते हैं, वे तो बाज़ीगर के इस खेल में नहीं फँसते बल्कि नाम-सुमिरण की कमाई में लगकर स्वयं को बचा लेते हैं। जो अज्ञानी जीव इस शरीर को सांसारिक झूठे-धंधों में गंवाकर प्रभु के हुक्म को भुला देते हैं, वे अनेक योनियों में भटकते हैं। इसलिए तनिक भी प्रमाद न करो, नहीं तो ऐसा हाल होगा जैसा कि एक गीदड़ का हुआ था।

कथा है—एक गीदड़ सर्दी की रात में जंगल से भागकर एक गाँव में किसी हलवाई के चूल्हे की गर्म राख में आकर बैठ गया और बहुत आनन्द अनुभव करने लगा। रात्रि बीती तो भोर का उजाला फैलने लगा। आलस्य के मारे वह गीदड़ सोचने लगा कि अभी थोड़ी देर और आनन्द ले लूँ, फिर उठ जाता हूँ। ऐसा सोच ही रहा था कि हलवाई भट्ठी गर्म करने आ गया। आकर उसने देखा कि वहाँ गीदड़ बैठा है तो एकदम डंडा उठाकर उसके सिर पर मारना शुरु कर दिया। गीदड़ चीखता हुआ भट्ठी से बाहर निकला। अभी वह दौड़ने ही लगा था कि गाँव के कुत्तों ने उसे घेर लिया और उन्होंने उसे चीर-फाड़ कर मार डाला। आलस्य करने के कारण वह अपने प्राणों से हाथ धो बैठा।

ऐसे ही जो जीव इस संसार में थोड़े व मिथ्या क्षणिक सुखों को आनन्द का स्रोत समझकर उनमें सुरति फँसा लेते हैं और भजन करने में आलस्य करते हैं, उन्हें भी यम के डंडे सिर में लगते हैं अर्थात् जन्म-जन्म तक वे काल के शिकार बन जाते हैं।

इस अज्ञानता के अंधेरे को केवल ग्रंथ-शास्त्रों के अध्ययन मात्र से दूर नहीं किया जा सकता। यह यकीन हो जाना कि मैं विशुद्ध ज्ञान हूँ का बोध केवल गुरु उपदेश से संभव है। गुरु शब्द के अभ्यास से वह आंतरिक ज्ञान प्रकट होता है। इसके लिए तीव्र जिज्ञासा और लगन की आवश्यकता होती है।

किसी व्यक्ति को यदि भूख नहीं हो तो उसे स्वादिष्ट व्यंजन भी फीके लगते हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति ने किसी डॉक्टर के पास जाकर कहा कि मैं बीमार हूँ, आप मुझे दवा देने की कृपा करें। डॉक्टर ने पूछा कि आपको कौन-सी बीमारी है ? उसने कहा कि मुझे भूख ही नहीं लगती। जैसे भूख का न लगना शारीरिक बीमारी है और यह बीमारी ऐसी है कि भूख न लगने से भोजन नहीं खाया जाएगा, भोजन न खाया तो शरीर में रक्त नहीं बनेगा। रक्त न बना तो शक्ति क्षीण हो जाएगी और अन्तत: शरीर नष्ट हो जाएगा। ऐसे ही जिसे भक्ति-मार्ग की ओर अग्रसर होने की लगन नहीं है, वह सत्संग में नहीं जाएगा। सत्संग में न जाने से उसका अज्ञान दूर नहीं होगा। सत्संगति न मिलने के कारण कुसंगति का प्रभाव उसे विकारों की ओर ले जाएगा। विकारों का दबाव बढ़ने से उसकी आत्मा निर्बल हो जाएगी और उसे भ्रम तथा अज्ञानवश महान् दु:ख भोगना पड़ेगा।

जैसे डॉक्टर दवाइयों के द्वारा पाचन शक्ति को बढ़ाता है, वैसे ही महापुरुष; जो वास्तव में आध्यात्मिक वैद्य हैं, सेवक की लगन को बढ़ाने के लिए सत्संग के स्थान बनवाते हैं। वहाँ पर विवेक वचनों का अमृत प्रवाह करके और सेवा का सुअवसर प्रदान करके उन्हें प्रोत्साहित करते हैं, जिससे नाम- सुमिरण की भूख लगनी आरम्भ हो जाती है। उसे फिर सभी भक्ति के साधन अच्छे लगने लगते हैं।

पारब्रह्म की जिसु मनि भूख
नानक तिसहि न लागहि दूख

             
(गुरुवाणी)

जिसके मन में ईश्वर परमात्मा के दर्शन करने की भूख है, श्री गुरु नानक देव जी वर्णन करते हैं कि उसे कोई दु:ख व कष्ट स्पर्श नहीं कर सकता।

सत्संग में जाने से जीव को जागृति मिलती है और सत्पुरुषों के चरणों में प्रेम उपजता है। ऐसे अलौकिक व दिव्य प्रेम का झरना विस्फुटित हो जाता है कि सद् गुरु के दर्शन के बिना उसे सब नीरस लगने लगता है। अतः गुरुमुख को सदैव संसार में द्गुरु  के बताए हुए उपाए के अनुसार ही चलना चाहिए तभी उसका जीवन सुख पूर्वक व्यतीत होगा एवं परलोक भी संवर जाएगा। द्गुरु की महिमा अनन्त है, वेद शास्त्र व शेष शारदा भी इसका पारावार नहीं पा सके। इनकी कृपा की एक दृष्टि ही रंक को राजा बना देती है। 

 


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