कविता


जनवरी 2025
मन की सोच
हुई कुदरत की यह दया जीवन में सतगुरु आए,
इस मन रूपी बालक को लिया गोद उठाए।
दिया अद्वैत उपदेश कि तुम हो रूप हमारा,
है एक ही परम पुरुष जिसका है खेल ये सारा।
मन मंदिर है भगवान का अगर देखना चाहो,
कर लो निरंतर सुमिरन और खुदी को भुलाओ।
बनो एकरूप उस रब से और पुरुषार्थ कर लो,
श्री आज्ञा माथे रखकर अपना अहंकार तुम हर लो।
अब मन ये सुन सोचे, करते गुरु लीला न्यारी,
इनकी ही कृपा से मिलती है, विवेक दृष्टि सारी।
हैं दृष्टि विवेक की देकर, सच्चा काम करवाते,
सुरत पतन में जाती को, गगन मंडल में चढ़ाते।
ये खेल है माया का त्रिगुणात्मक रूप बनाया,
इसमें है उलझा जीव जन्म-जन्म भरमाया।
भव पार लगाने को श्री परमहंस दयाल जी आए,
आकर के जगत् में भक्ति का दिया पंथ चलाए।
किया अथक परिश्रम और श्री दरबार रचाया,
श्री परमहंस अद्वैत मत आनन्दपुर धाम कहाया।
यहाँ भक्ति के साधन सरल और सुगम बनाए,
श्रद्धा से करे सेवन जो निश्चय कल्याण हो जाए।
अब सेवन की जो बात यहाँ पर गौर से सुनना,
है नित्यप्रति की यह क्रिया संतो का यह कहना।
जन्मों जन्मों से मैला मन शुद्ध होता जाए,
फिर इस शुद्ध मन में मालिक का ही नूर प्रकटाए।
बने भाग्यशाली गुरुमुख जो श्री दरबार में आए,
जन्मों से बिछड़ी रूह को गुरु, मालिक संग मिलाएँ।

भजन कमा लो
तन-मन की सुध हरदम रहे,
पर भजन का ध्यान न आए ।
जब तक संतों का संग न हो,
सत् मारग कौन दिखाए ॥
पूरे सतगुरु की शरण बिना,
काल के पंजे से छूटें कैसे ?
अंत समय जब निकट आए,
तब पछतावे मनुष्य वैसे ॥
हे जीव ! अभी भी समय है,
भक्ति से जीवन संवार ले ।
सतगुरु चरणों में मन लगाकर,
आत्मा को तू अमर कर ले ॥
क्षीर सागर कहो, कामधेनु कहो,
चाहे बैकुंठ का पारिजात कहो ।
सुख और आनंद का भंडार कहो,
या अमृत की वर्षा की धार कहो ॥
गुरु शब्द की महिमा अनंत है,
इसका वर्णन कोई कर न पाए ।
रत्ती भर भी मन में बस जाए,
तो दास का जीवन सफल हो जाए ॥
और क्या चाहिए उस ‘दास’ को,
जिसे नाम का धन मिल जाए ॥
नवम्बर 2025
सतगुरु संग मिलन का महत्व
(कविता)
बिगड़ी तभी सुधरती है, जब हो मालिक की पहचान ।
संत-सतगुरु हैं रूप उन्हीं का, सृष्टि का जो देते ज्ञान ॥
जिस दिन कृपा दृष्टि पड़े, पहचान तब हो जाए ।
सतगुरु से हो जब नाता, जन्मों के दुख मिट जाएँ ॥
संत-सद्गुरु का संग पाकर, भ्रम का पर्दा हट गया ।
अज्ञान का जो पर्दा था, वह भी दूर हो गया ॥
भजन कर, नाम जप, सब सुख तेरे पास होगा ।
मानव जन्म अनमोल है, इसमें ही सारा प्रकाश होगा ॥
रात सोते, दिन धंधों में बीते, कभी न ध्यान भगवंत का ।
नाम बिना सब झूठे बंधन, बीते समय पर पछतावा होगा ॥
अज्ञान का पर्दा गहरा पड़ा है, मनुष्य के चित्त के ऊपर ।
अंधकार से घिरा हुआ है, आत्मा की जोत न दिखे अंदर ॥
ज्योति अनंत है भीतर, सद्गुरु के नाम से राह मिलेगी ।
भटकती आत्मा को शांति, उनके चरणों में मिलेगी ॥
सच्चा प्रेम सद्गुरु करें, मुक्त करें हर बंधन से ।
नाम जपते ही मिट जाएँ, जीवन की सभी उलझनें ॥
कृपा बरसे जब उनकी, हृदय में उजाला हो जाए ।
माया के बंधन कट जाएँ, प्रेम का दीपक जल जाए ॥
ज्ञान का अमृत पान कर, हिरदे का सागर भर जाए ।
संत सद्गुरु का संग पाकर, जीवन प्रकाश से भर जाए ॥
सद्गुरु नाम से बढ़कर कुछ नहीं, यही सत्य की पहचान ।
जो इस पथ पर बढ़ चले, पा ले वो अटल निर्वाण ॥
अक्टूबर 2025
सच्चे गुरु की सच्ची चाल
(कविता)
सद्गुरु चरणों में श्रद्धा सहित,
जीवन सफल बनाएँ हम ॥
गुरु कृपा से किनारा वो पाता ॥
सच्ची राह पर उसे चलाता ॥
भवसागर से पार लगाने ॥
ऐसे सच्चे सतगुरु को, बारम्बार नमस्कार ।
शीश झुकाएँ हम ।
सद्गुरु की आज्ञा में चलकर,
झूठे जग को त्याग कर,
छोड़ें इसका मोह-जाल ।
मन को दो अब सतगुरु जी
प्रेमाभक्ति का सच्चा आधार ॥
सतगुरु का नाम जो जपे श्रद्धा से,
भवसागर से पार वो होता ।
अपने जीवन की नैया का,
आदि जुगादि वही है सच्चा,
जो है पालनहार जगत् का ।
जिससे जीवन अस्तित्व में आया,
जो उद्धार करता सब जीवों का ॥
मोह के बंधन में फँसकर,
जीव जब सत् मार्ग भूल जाता ।
परम पिता तब सतगुरु बनकर
दु:खी जीवों को सुख पहुँचाने,
बिछुड़ी रूहों को संग मिलाने ।
स्वयं प्रकट होते गुरु जग में,
भवसागर से पार लगाने ॥
ऐसे सच्चे सतगुरु को, बारम्बार नमस्कार ।
सितम्बर 2025
नाम सत् जग झूठ है
(कविता)
हीरा बेशकीमती है, जन्म इंसान का,
वचन शास्त्रों का प्रमाण है ज्ञान का ।
जो ऐसा श्रेष्ठ रत्न मिट्टी में मिलाए,
वह जीव अनजान है, दु:ख ही अपनाए ॥
सच्चा नाम है एक श्रेष्ठ जग में,
भंडार सच्चा सुख देने वाला ।
मोह इस जगत् का यह जो है,
वह तो है दु:खों की खान वाला ॥
बार-बार यह भोला जीव अज्ञानी,
दु:खों की ओर ही दौड़ता है ।
देख-देख कर दास हुआ हैरान,
रुख़ सुखों की तरफ नहीं मोड़ता है ॥
सभी ग्रंथों का संदेश है यह,
मानव जन्म नहीं बार-बार मिलता ।
ऐसा जन्म बहुत ही अनमोल है,
भाग्य बिना हरगिज़ यह नहीं मिलता ॥
भगवान के भजन बिना, ऐ मित्र प्यारे,
लाख खोजो, सुख-सार नहीं मिलता ।
संसार की आस तृष्णा त्यागे बिना,
भक्ति का सच्चा आधार नहीं मिलता ॥
संत सतगुरु परमात्मा का रूप हैं,
और किसी रूप में करतार नहीं मिलता ।
सतगुरु के ध्यान बिना ‘दासनदास’,
सच्चे मालिक का दीदार नहीं मिलता ॥
B
अगस्त 2025
दुनिया है जंजाल (कविता)
भटक रहा क्यों जग में बंदे, सुरत अपनी संभाल साथी ।
मत मान जग को अपना, यह सब है जंजाल साथी ॥
पल-पल बीत रही उमरिया, लौटे न बीता इक पल भी ।
आज ही चेत जा रे मानव, कल का भरोसा कुछ भी नहीं ॥
नेकी की राह पर चल, स्वाँस-स्वाँस जप प्रभु का नाम ।
बिन नाम जीवन व्यर्थ, बिन भजन न बीते एक शाम ॥
तृष्णा विष में डुबो न मन, कर गुण का विचार अभी ।
परमार्थ की पूंजी संग्रह कर, मिलेगा भक्ति नूर तभी ॥
संतों के वचन हैं अमृत, जो पी ले वो तर जाएगा ।
जल रहा माया अग्नि में, जप कर नाम शीतल हो पाएगा ॥
जन्म-जन्म की गाँठें खोल, मन का संशय दूर कर डाल ।
अज्ञान का पर्दा हटा, परख सच्चा या कच्चा माल ॥
मत कर अभिमान ऐ बन्दे, तेरा अपना कुछ भी नहीं ।
दौलत कीर्ति क्षणिक, बस नाम ही सदा सही ॥
जब काल आएगा सिर पर, तब न संगी न कोई मीत ।
प्रभु-नाम में जो रंगा मन, वही बनेगा सुख का गीत ॥
अज्ञान अंधेरे में डूब मत, ज्ञान ज्योति अंगीकार कर ।
गुरु-मूरत बसा मन में, भीतर के भ्रम का सुधार कर ॥
कर संग्रह भजन की पूँजी, हर स्वाँस कर प्रभु के अर्पण ।
साहिब की रहमत होगी, कटेगा भय का सब बंधन ॥
जुलाई 2025
सच्ची राह (कविता)
सच्ची राह पर चलो, भटको नहीं गलत राह पर,
कहाँ गुम हो गए, तुम सच्चे मार्ग से ।
ऐ पथिक ! तुम्हें खोजना है खुद को,
सच्चे रास्ते पर लौट आओ फिर से ॥
माया की मृगतृष्णा में खो गए,
संसार के झूठे रंगों में रंग गए ।
गुरु के चरणों में चित्त को लगाओ,
खुद को समझो, रास्ता उज्ज्वल बनाओ ॥
दुनिया की चमक से आँखें चुरा लो,
सच्चे सुख का रास्ता अपना लो ।
खोज असली जीवन का स्वर्ण-पथ सकोगे,
गुरु की कृपा से मुक्ति को पाओगे ॥
धंधों की दल-दल में खो गया है मन,
आत्म ज्ञान का भान नहीं कर पाए तुम ।
रात दिन की चकाचौंध में क्यों भटके हो तुम,
आखिर खुद से इतनी दूरी बनाई है क्यों ?
शरीर की सेवा में व्यस्त हो तुम,
सच्चे गुरु का नाम क्यों नहीं लेते तुम ।
अंधकार में सत् पथ की खोज क्यों नहीं करते तुम,
गुरु के शब्दों में उजाला साफ है ॥
झूठी दुनिया में खोया है जीवन,
असली मार्ग पर चलो अब ऐ सज्जन ।
सच्चे नियमों का कभी करो न उल्लंघन,
गुरु की सेवा से मिलेगा परमशांति का जीवन ॥
जून 2025
अज्ञानता की जंजीर तोड़ो
मोह अज्ञान की पड़ी जंजीर भारी,
जीव जकड़ा हुआ सदा परेशान होवे
जीव जकड़ा हुआ सदा परेशान होवे ॥
गुरु शब्द की लगे कुठार ऐसी,
कट जाए मोह जंजीर तब कल्याण होवे ॥
अज्ञान की नींद सोया जीव गाफ़िल,
गुरु ज्ञान के द्वारा सावधान होवे ॥
पहचान पावे अपने आप को और जगत् को,
बुद्धिहीन भी सत्संग में बुद्धिमान होवे ॥
गुरु पूरे का ऐसा प्रताप है जी,
सब ताप सन्ताप का नास होवे ॥
कोई दु:ख कलेश न रहे बाकी,
सन्त सतगुरु साहिब का जब दास होवे
सन्त सतगुरु साहिब का जब दास होवे ॥
नहीं यह हैरत की बात है बिल्कुल,
जो मूर्ख वह बने ज्ञानी सत्संग करके ॥
मलिन जीव को गुरु बनाएँ निर्मल,
ममता मोह अज्ञान की मैल हर कर
ममता मोह अज्ञान की मैल हर कर ॥
नित काल के वश जीव दु:ख पावे,
बार बार जन्मे और बार बार मर कर
बार बार जन्मे और बार बार मर कर ॥
होवे अमर यह गुरु का शब्द जप के,
दु:ख रूप जो सागर संसार तर कर ॥
ग्रन्थों शास्त्रों में महिमा सतगुरु की,
बार बार बेअन्त और बेअन्त आई ॥
गुरु बिना नहीं हुआ हिय में प्रकाश,
‘दासा’ गुरु बिना नहीं किसी ने मोक्ष पदवी पाई ॥
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