श्री रामायण मंथन
जनवरी 2025
भावार्थ—विधाता जब इस प्रकार का (हंस का सा) विवेक देते हैं, तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है। काल स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु) भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं॥
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं ।
भावार्थ—भगवान के भक्त जैसे उस गल्ती को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश प्राप्त करते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं, परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता।
विवेक, स्वभाव और कर्म की शक्ति—एक व्याख्यान
मानव जीवन में विवेक का महत्व अत्यंत गहरा है। विवेक वह दिव्य दृष्टि है जो मनुष्य को सही-गलत, उचित-अनुचित का निर्णय करने की क्षमता प्रदान करता है। तुलसीदास जी ने यहाँ कहा है कि जब विधाता (ईश्वर) मनुष्य को विवेक प्रदान करते हैं, तब वह दोषों को त्यागकर गुणों की ओर आकर्षित होता है। लेकिन काल, स्वभाव और कर्म की प्रबलता के कारण कभी-कभी भले लोग भी भलाई से चूक जाते हैं। वहीं, दुष्ट भी अच्छी संगति पाकर कुछ समय के लिए भले कर्म करते हैं, पर उनका मूल दूषित स्वभाव नहीं बदलता।
इस सूक्ति को समझने के लिए हम कुछ कथाओं, दृष्टांतों और अन्य ग्रंथों के संदर्भों का सहारा लेंगे।
विवेक—ईश्वर का वरदान
विवेक वह दीपक है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का मार्ग दिखाता है। गीता में भगवान कृष्ण का कथन है—
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
जो भक्त निरंतर मुझ में लीन रहते हैं, उन्हें मैं बुद्धि-योग प्रदान करता हूँ, जिससे वे मुझ तक पहुँचते हैं।
यहाँ ‘बुद्धि योग’ अर्थात् विवेक ही है, जो मनुष्य को भटकने से बचाता है।
कथा—राजा भर्तृहरि का विवेक
राजा भर्तृहरि सुख-वैभव में डूबे हुए थे, लेकिन जब उन्हें अपनी पत्नी के विश्वासघात का पता चला, तो उनका मोह भंग हुआ। विवेक जागृत हुआ और उन्होंने संसार का त्याग कर दिया। उनकी रचना ‘वैराग्य शतक’ इसी विवेक का परिणाम है।
“जब आँख खुलती है, तो सोया हुआ जाग उठता है। जब विवेक जागता है, तो अज्ञानी भी ज्ञानी बन जाता है।”
काल, स्वभाव और कर्म की प्रबलता
तुलसीदास जी का कथन है कि कभी-कभी भले लोग भी प्रकृति के वशीभूत होकर भलाई से चूक जाते हैं। यह काल (समय), स्वभाव और कर्म के प्रभाव के कारण होता है।
दृष्टांत—महाभारत में युधिष्ठिर का जुआ
युधिष्ठिर धर्मराज थे, फिर भी दुर्योधन के छल और काल के प्रभाव से जुए में अपना सब कुछ हार बैठे। यहाँ काल (समय की विषमता) और स्वभाव (धृतराष्ट्र का पुत्र मोह) ने धर्म का पलड़ा झुका दिया।
इसीलिए तुलसीदास जी का कथन है कि भले लोग भी कभी-कभी प्रकृति के वश में होकर भटक जाते हैं।
संगति का प्रभाव—खल भी बन सकते हैं सज्जन
तुलसीदास जी का कथन है कि—
दुष्ट भी अच्छी संगति पाकर कुछ समय के लिए अच्छे कर्म करते हैं, लेकिन उनका मूल दूषित स्वभाव नहीं बदलता।
रामचरितमानस का उदाहरण—रावण और विभीषण
रावण और विभीषण एक ही परिवार के थे, लेकिन संगति ने उनके मार्ग अलग कर दिए। रावण अहंकार में डूबा रहा, जबकि विभीषण ने श्रीराम की शरण ली।
भक्ति—स्वभाव परिवर्तन का सर्वोत्तम साधन
तुलसीदास जी का कथन है कि—
भक्त अपनी गल्ती को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश प्राप्त करते हैं।
भक्त प्रह्लाद का उदाहरण
हिरण्यकशिपु के अत्याचारों के बावजूद प्रह्लाद ने हरि-भक्ति नहीं छोड़ी। अंत में भगवान ने नरसिंह अवतार लेकर उनकी रक्षा की। भक्त का स्वभाव निर्मल होता है, वह किसी से द्वेष नहीं रखता।
विवेक, स्वभाव और कर्म—ये तीनों मनुष्य के जीवन को निर्धारित करते हैं। अच्छी संगति और भक्ति से मनुष्य अपने दोषों को सुधार सकता है, लेकिन दुष्टों का मूल स्वभाव बदलना कठिन होता है। इसलिए हमें सदैव सत्संग और ईश्वर-भक्ति में रहकर अपने विवेक को जागृत रखना चाहिए।
“जब तक विवेक है, तब तक जीवन है। जब विवेक चला जाता है, तो मनुष्य पशु समान हो जाता है।”
इस प्रकार, तुलसीदास जी का यह उपदेश हमें जीवन में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। विवेक के बिना मनुष्य केवल अपनी इंद्रियों की इच्छाओं से प्रेरित होता है, जैसे कोई पशु। उदाहरण के लिए, एक भूखा जानवर बिना सोचे-समझे किसी भी चीज़ पर झपट सकता है, भले ही वह उसके लिए हानिकारक हो। इसी तरह, जब मनुष्य का विवेक चला जाता है, तो वह अपने क्रोध, लालच या अहंकार के वश में होकर ऐसे काम करता है जो न केवल उसके लिए बल्कि समाज के लिए भी हानिकारक होते हैं।
दूसरी ओर यह बात भी सत्य है कि विवेक होने पर ही मनुष्य अपनी आत्मा के उद्धार हेतु नाम-सुमिरण और भजन-भक्ति की ओर अग्रसर होता है।
(गुण-दोष विवेक और संत स्वभाव)
संसार जड़ और चेतन तत्वों से निर्मित एक अद्भुत रचना है, जिसमें गुण और दोष दोनों ही समाहित हैं। तुलसीदास जी द्वारा रचित उपर्युक्त दोहे एवं चौपाइयों में इसी तत्व का विवेचन किया गया है। ईश्वर ने सृष्टि को ऐसा बनाया है कि प्रत्येक वस्तु में गुण और दोष दोनों होते हैं, किंतु संतजन केवल गुण ग्रहण करते हैं और दोषों को छोड़ देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हंस दूध में मिले जल को छोड़कर केवल दूध को ही ग्रहण करता है।
गुण ग्रहण की महत्ता—
मनुष्य का स्वभाव उसके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यदि उसकी दृष्टि निर्मल और विवेकपूर्ण हो, तो वह संसार में व्याप्त दोषों से बचते हुए श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हो सकता है। एक उदाहरण के रूप में मधुमक्खी और मक्खी का स्वभाव देखें। मधुमक्खी सैकड़ों फूलों में केवल मधुरस (शहद) एकत्र करती है, जबकि मक्खी सुंदर से सुंदर वस्तु को छोड़कर गंदगी पर ही बैठती है। यही अंतर संत और असंत के दृष्टिकोण में होता है।
विवेक प्राप्ति और गुणों में अनुरक्ति—
नीचे दी गई चौपाई में कहा गया है कि जब ईश्वर किसी को सही विवेक प्रदान करते हैं, तभी वह दोषों को छोड़कर गुणों में अनुरक्त होता है—
अर्थात् जब मनुष्य में सही विवेक उत्पन्न होता है, तब वह संसार के दोषों को त्यागकर उसके गुणों को ग्रहण करता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे सोने को अग्नि में तपाकर उसकी अशुद्धियाँ दूर की जाती हैं, जिससे वह और अधिक मूल्यवान बन जाता है। इसी प्रकार, जब मनुष्य अपने मन को संतों के सत्संग और शास्त्रों के अध्ययन से शुद्ध करता है, तब उसमें सही और गलत में भेद करने की शक्ति उत्पन्न होती है। सही और गलत का निर्णय कर लेने वाली विवेचन शक्ति को ही हंस वाला विवेक कहा जाता है।
माया और काल के प्रभाव से पथ-भ्रष्ट होना—
कभी-कभी श्रेष्ठतम व्यक्ति भी माया और काल के प्रभाव में आकर विचलित हो जाते हैं। यह एक सत्य है कि मनुष्य का स्वभाव उसके कर्मों, संगति और परिस्थितियों से प्रभावित होता है—
इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जहाँ महान् संतों और विद्वानों को भी कभी-कभी मोह-माया का आघात सहना पड़ा। राजा हरिश्चंद्र, जिन्हें सत्य का प्रतीक माना जाता है, वे भी समय और परिस्थितियों के प्रभाव में आकर कठिन परीक्षाओं से गुज़रे। इसी प्रकार, अर्जुन जैसे पराक्रमी योद्धा भी महाभारत के युद्ध के समय मोह से ग्रस्त हो गए, किंतु श्रीकृष्ण के उपदेशों से उन्हें पुनः सत्य का बोध हुआ।
सुधार की संभावना और संतों की कृपा—
जब कोई सज्जन भूल कर बैठता है, तो संतों की संगति उसे सुधारने का अवसर देती है—
यह संत स्वभाव ही है कि वे किसी भी व्यक्ति के दोषों को मिटाकर उसे निर्मल यश प्रदान करते हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे सूर्य अपनी किरणों से कमल को प्रस्फुटित कर देता है और जल को स्वच्छ कर देता है। यदि व्यक्ति संतों की संगति प्राप्त कर ले, तो वह अपने दोषों से मुक्त होकर पुनः गुणों में अनुरक्त हो सकता है। इसका एक सुंदर दृष्टांत भगवान वाल्मीकि का जीवन है। वे भी संत नारद जी के उपदेशों के द्वारा सच्चे ज्ञान और भक्ति की ओर मुड़े। सत्संग के प्रभाव से ही उन्हें वह नाम साधना मिली जिससे वे दिव्य दृष्टि युक्त ब्रह्मर्षि मुनि वाल्मीकि बनकर रामायण जैसे महान् ग्रंथ के रचयिता बने।
दुष्ट स्वभाव और उसका अपरिवर्तनशील होना—
कई बार संतों की संगति से जहाँ कुछ लोगों में सुधार आ जाता है, वहीं दुष्ट प्रवृत्ति के लोग कभी-कभी सत्संग के प्रभाव में आकर क्षणिक रूप से अच्छा कार्य कर सकते हैं, परंतु उनका मूल स्वभाव आसानी से नहीं बदलता—
यह एक कठोर सत्य है कि बुरे स्वभाव वाले व्यक्ति यदि सत्संग के प्रभाव से कुछ अच्छे कार्य कर भी लें, तो भी उनका स्वभाव पूरी तरह से परिवर्तित नहीं होता। उदाहरण स्वरूप, रावण ने शिव की भक्ति की और अत्यंत विद्वान् भी बन गया था, किंतु उसका अहंकार और दुराचारी स्वभाव दूर नहीं हुआ। अंततः वह विनाश को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार, दुर्योधन ने भी कई बार श्रेष्ठ पुरुषों की बातें सुनीं, किंतु उसकी दुष्ट बुद्धि कभी परिवर्तित नहीं हुई। यह वैसा ही है जैसे कोयल और कौआ दोनों काले रंग के होते हैं, किंतु कोयल का स्वर मधुर होता है और कौए की आवाज़ कर्कश।
यह ठीक है कि दुष्टजन का स्वभाव सहज नहीं बदलता फिर भी सत्संग अपना प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहता। संतों के वचन उपदेश अंतर्मन में संस्कार रूप में विद्यमान रहते हैं और जन्म-जन्मांतर तक उसके साथ रहते हैं। किसी न किसी जन्म में वे अवसर पाकर अवश्य फलीभूत हो जाते हैं और जीवात्मा को फिर से जागृत कर देते हैं और उसे सत्संग की ओर खींच लाते हैं।
व्याख्यान सार—
तुलसीदास जी ने इस संसार को गुण-दोषमय बताया है, जहाँ संतजनों की प्रवृत्ति हंस के समान होती है, जो केवल गुणों को ग्रहण कर दोषों को त्याग देते हैं। व्यक्ति का दृष्टिकोण ही यह निर्धारित करता है कि वह गुणों को अपनाएगा या दोषों में उलझेगा। विवेकवान व्यक्ति संसार में व्याप्त अच्छाइयों को चुनता है, जैसे मधुमक्खी फूलों से केवल मधुरस एकत्र करती है, जबकि अविवेकी व्यक्ति मक्खी की भांति दोषों पर केंद्रित रहता है। इस तथ्य को समझ कर विवेकशील पुरुष को अपना जीवन सदैव उन्नत बनाते रहना चाहिए, ताकि आत्मिक शुद्धता और ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त हो सके।
भावार्थ—अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वंदना करता हूँ, दोनों ही दुःख देने वाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अंतर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) जब मिलते हैं, तब दारुण दुःख देते हैं। (अर्थात् संतों का बिछुड़ना मरने के समान दुःखदायी होता है और असंतों का तो मिलना ही दु:खद पीड़ा देता है।
भावार्थ—दोनों (संत और असंत) जगत् में एक साथ पैदा होते हैं, पर (एक साथ पैदा होने वाले) कमल और जोंक की तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। (कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है, किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।) साधु अमृत के समान (मृत्यु रूपी संसार से उबारने वाला) और असाधु मदिरा के समान (मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाला) है, दोनों को उत्पन्न करने वाला जगत् रूपी अगाध समुद्र एक ही है। (शास्त्रों में समुद्र मन्थन से ही अमृत और विष दोनों की उत्पत्ति बताई गई है।
भावार्थ—भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुंदर यश और अपयश की सम्पत्ति पाते हैं। जैसे अमृत, चन्द्रमा, गंगाजी और साधु ये सब पवित्र माने जाते हैं एवं विष, अग्नि, कलियुग के पापों की नदी अर्थात् कर्मनाश और हिंसा करने वाला व्याध, रोग ये सब विनाशकारी हैं। किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है।
॥ दोहा ॥
भावार्थ—भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किए रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में।
संत और असंत का तुलनात्मक विवेचन
गोस्वामी तुलसीदास जी की यह पंक्तियाँ संत और असंत के स्वभाव का गहन विवेचन प्रस्तुत करती हैं। कवि यहाँ संतों और असंतों के बीच मूल अंतर को बताते हुए उनके संग के प्रभाव का वर्णन करते हैं।
संत और असंत—उनके संग का प्रभाव
तुलसीदास जी पहले ही दोहे में कहते हैं कि संत और असंत दोनों के चरणों की वंदना करनी चाहिए। वे दोनों दु:खदायी तो होते हैं, परंतु दोनों में मूल अंतर यह है कि संतों का बिछुड़ना प्राण हर लेने के समान दुःखद होता है। इसके विपरीत असंतों का मिलना स्वयं में दारुण दुःखदायी होता है, क्योंकि वे जब मिलते हैं तो बुरा बर्ताव करते हैं।
यह उपमा वास्तव में हमारे जीवन में सम्मुख आती रहती है। जब हमें किसी सच्चे मार्गदर्शक, संत, या सद्गुरु का साथ मिलता है, तो उनका ज्ञान, प्रेम, और आशीर्वाद हमारे जीवन को एक नई दिशा देता है अतः सुखकारी होता है। लेकिन जब ऐसे संतों का सान्निध्य छूट जाता है, तो हमें अपार दुःख होता है। इसीलिए उनका बिछुड़ना दु:खदायी कहा गया है। दूसरी ओर, असत्संग भी हमें दु:ख देता है, परंतु यह मोह, पाप और संकट में डालने वाला है। इसका अर्थ यह है कि यदि हम बुरी संगति में पड़ते हैं, तो हमें मानसिक, शारीरिक और आत्मिक कष्टों का सामना करना पड़ता है।
कमल और जोंक की उपमा—
संत तुलसीदास जी आगे संत और असंत को कमल और जोंक की उपमा देते हैं। दोनों एक ही स्थान पर उत्पन्न होते हैं, परंतु उनके गुण एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत होते हैं। कमल जल में रहकर भी अपनी पवित्रता बनाए रखता है और सभी के लिए आनंददायक होता है, जबकि जोंक जल में रहकर दूसरों का रक्त चूसती है। यह उपमा यह दर्शाती है कि व्यक्ति का मूल स्थान चाहे जैसा भी हो, उसका स्वभाव और कर्म ही उसे महान् या पतित बनाते हैं।
उदाहरण के लिए, कई महान् संत सांसारिक परिवारों में जन्म लेकर भी समाज को सत्य, प्रेम और करुणा का संदेश देते हैं, जबकि कुछ लोग उच्च कुल में जन्म लेकर भी अपने बुरे कर्मों के कारण समाज के लिए घातक सिद्ध होते हैं।
अमृत और विष की तुलना—
संत तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि संत अमृत के समान होते हैं जो आत्मा के कल्याण के लिए कार्य करते हैं, जबकि असंत विष के समान होते हैं जो नष्ट करने का कार्य करते हैं। अमृत और विष दोनों समुद्र मन्थन से उत्पन्न हुए, परंतु एक जीवनदायी है और दूसरा प्राण घातक। यह उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि संसार में अच्छाई और बुराई साथ-साथ उत्पन्न होती हैं, परंतु जो व्यक्ति विवेकपूर्ण होता है, वह अमृत (संतों की संगति) ग्रहण करता है और जो मोह में पड़ता है, वह विष (असंगति) का सेवन करता है।
कर्म और उसकी प्राप्ति—
संत और असंत अपनी-अपनी करनी के अनुसार यश और अपयश प्राप्त करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे चंद्रमा अपनी शीतलता के कारण पूजनीय होता है और अग्नि अपनी दाहकता के कारण भयप्रद। अच्छे कर्मों का फल भी अच्छा होता है और बुरे कर्मों का परिणाम भी बुरा ही होता है। यही कारण है कि साधु, चंद्रमा और गंगा जी की तुलना अमृत से की गई है और असाधु, अग्नि और विष की तुलना पाप से।
सत्संग और कुसंग का प्रभाव—
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि व्यक्ति वही ग्रहण करता है जो उसके मन को प्रिय होता है। यदि किसी को सत्संग में आनंद आता है, तो वह ज्ञान, भक्ति और प्रेम की ओर अग्रसर होगा। परंतु यदि कोई कुसंगति में अधिक रुचि रखता है, तो वह पाप और पतन की ओर जाएगा।
निष्कर्ष—
तुलसीदास जी के इन दोहों से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में सदैव सत्संग का चुनाव करना चाहिए और बुरी संगत से बचना चाहिए। संतों का संग हमारे जीवन में अमृत के समान होता है, जो आत्मा को शुद्ध और परम आनंद की ओर ले जाता है। दूसरी ओर, असंतों का संग विष के समान होता है, जो मोह, पाप और दु:ख को जन्म देता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारा संग ही हमारे जीवन की दिशा तय करता है।
(बालकाण्ड)
संतों की समदर्शिता
आध्यात्मिक संतुलन की श्रेष्ठ स्थिति—
समदर्शी अवस्था का तात्पर्य उस मानसिक और आत्मिक स्थिति से है, जहाँ व्यक्ति समता, संतुलन और निष्पक्षता का अनुभव करता है। यह वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, मान-अपमान आदि द्वंद्वों में समान भाव रखता है।
भावार्थ—मैं उन संतों को प्रणाम करता हूँ, जिनका चित्त समान है, जो न किसी को मित्र मानते हैं और न शत्रु। जैसे अंजलि में रखे हुए पुष्प दोनों हाथों को समान रूप से सुगंधित करते हैं, वैसे ही संत सभी का कल्याण करते हैं, चाहे वह उनका मित्र हो या शत्रु।
भावार्थ—संतों का स्वभाव सरल और जगत् के हित में समर्पित होता है। उनके ऐसे दिव्य स्वभाव और प्रेम को समझते हुए मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरी इस बाल-विनय को सुनकर वे कृपा करें और मुझे श्रीराम जी के चरण-कमलों का प्रेम प्रदान करें।
समदर्शी अवस्था प्राप्त करने के उपाय
समदर्शिता, जिसे समभाव या निष्पक्षता भी कहते हैं, एक ऐसी मानसिक और आध्यात्मिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति सभी जीवों और परिस्थितियों के प्रति समान दृष्टि रखता है। इसे प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय सहायक हो सकते हैं—
1. स्वाध्याय और ज्ञान अर्जन
· विभिन्न सत्संग ग्रंथों का अध्ययन करें।
· संतों, गुरुओं और आध्यात्मिक शिक्षकों के प्रवचन सुनें, जो समभाव को अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
2. ध्यान और साधना
· ध्यान—नियमित रूप से ध्यान करें, विशेष रूप से विपश्यना (गहराई से देखना) या अनापानसति(स्वांसों पर ध्यान देना), जो मानसिक शांति और समता को विकसित करता है।
· प्राणायाम—श्वास-प्रश्वास की साधना से मन की चंचलता नियंत्रित होती है।
· नाम-जप साधना—गुरु मंत्र का निरंतर जप करने से मन एकाग्र और विकारों से मुक्त होता है।
3. वैराग्य और संतोष का विकास
· वैराग्य—सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान को केवल अनुभव के रूप में स्वीकार करना।
· संतोष (Contentment)—संतोष की भावना से मन स्थिर रहता है और समभाव विकसित होता है।
4. सेवा और परोपकार
· निःस्वार्थ सेवा—सेवा करते समय अहंकार और अपेक्षा से मुक्त रहें।
· करुणा और प्रेम—सभी जीवों के प्रति समान करुणा और प्रेम का भाव रखें।
5. विचारों का निरीक्षण (Mindfulness)
· जब भी क्रोध, द्वेष या नकारात्मक विचार आएँ, उन्हें पहचानें और सकारात्मक विचारों में बदलें।
· किसी भी परिस्थिति में मन को शांत रखना और तत्काल प्रतिक्रिया देने से बचना।
6. समता का अभ्यास
· सुख-दुःख में समान रहना, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्थिर बुद्धि’ की अवस्था कही गई है।
· द्वेष और आसक्ति का त्याग कर सभी अनुभवों को तटस्थ भाव से देखना।
7. सद्गुरु की शरण में जाना
· आत्मज्ञानी सद्गुरु के मार्गदर्शन में रहकर उनके उपदेशों का पालन करना।
8. आत्म-साक्षात्कार
· जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि सभी जीवों में एक ही आत्मा का वास है, तब स्वाभाविक रूप से समभाव उत्पन्न होता है।
निष्कर्ष—
समदर्शी अवस्था कोई एक दिन में प्राप्त करने योग्य वस्तु नहीं है, बल्कि यह निरंतर साधना और आत्म-अवलोकन का परिणाम है। इसके लिए स्वाध्याय, ध्यान, सेवा, वैराग्य और संतोष का अभ्यास आवश्यक है। गुरु की कृपा और दृढ़ निश्चय से यह अवस्था प्राप्त की जा सकती है, जो जीवन को शांति और संतुलन प्रदान करती है।
समदर्शी व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता, बल्कि अपने भीतर स्थिरता बनाए रखता है। यह अवस्था अहंकार, मोह और आसक्ति से परे होती है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए ध्यान, योग, स्वाध्याय और आत्म विश्लेषण आवश्यक हैं। जब व्यक्ति सभी जीवों में एक समान आत्मा का दर्शन करता है, तब वह सच्चे समदर्शन को प्राप्त करता है।
समदर्शी अवस्था केवल एक आध्यात्मिक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि समाज में शांति और सद् भाव बनाए रखने का भी आधार है। जो व्यक्ति इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह क्रोध, घृणा और भेदभाव से मुक्त होकर करुणा और प्रेम का संचार करता है। यही वास्तविक आनंद और आत्म-ज्ञान की स्थिति है।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में समदर्शिता को उच्च आध्यात्मिक अवस्था माना गया है, जहाँ व्यक्ति सभी प्राणियों में समानता का भाव रखता है और किसी से द्वेष नहीं करता। इस संबंध में एक महत्त्वपूर्ण शबद है—
जो नर दुख में दुख नहीं मानै ॥
सुख सनेह अरु भय नहिं जाकै कंचन माटी मानै ॥
शब्द का अर्थ और व्याख्या—
इस पंक्ति में गुरु अर्जुन देव जी समदर्शी व्यक्ति की विशेषताओं का वर्णन करते हैं—
· जो व्यक्ति दुःख में दुखी नहीं होता और सुख में आसक्त नहीं होता।
· जिसे न ही किसी से मोह होता है और न ही किसी का भय।
· जो मिट्टी और सोने को एक समान मानता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में ‘स्थितप्रज्ञ’ वह व्यक्ति कहा गया है जो सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजय जैसे जीवन के द्वंद्वों से परे होकर आत्मा में स्थित रहता है। श्री गुरु महाराज जी समझाते हैं कि समता का अर्थ केवल उदासीनता या वैराग्य नहीं है, बल्कि यह एक आंतरिक परिपक्वता है, जहाँ व्यक्ति प्रेम, करुणा और निष्काम सेवा भाव से युक्त होता है।
दृष्टांत—कुम्हार और घड़े की शिक्षा
एक गाँव में एक वृद्ध कुम्हार रहता था। वह वर्षों से मिट्टी के सुंदर और मज़बूत घड़े बनाता आया था। एक दिन एक उत्साही युवक उसके पास आया और बोला—बाबा ! आप इतने सालों से यही काम कर रहे हैं, क्या आपको कभी ऊब या निराशा नहीं होती ?
कुम्हार मुस्कुराया और कहा—आओ ! मैं तुम्हें कुछ दिखाता हूँ। वह युवक को अपने कार्यशाला में ले गया, जहाँ कुछ घड़े पकने के लिए धूप में रखे थे, कुछ आग में तप रहे थे और कुछ बनकर तैयार थे। उसने कहा, “देखो, ये घड़े तीन अवस्थाओं में हैं—कच्चे, पक रहे और पूर्ण।”
फिर उसने एक बात कही, मिट्टी को मैं कैसे भी आकार दूँ, यदि वह भीतर से संतुलित नहीं है, तो चूल्हे की अग्नि उसे फोड़ देगी। पर जो घड़ा भीतर से संतुलित होता है, वह न केवल अग्नि सह लेता है, बल्कि उपयोगी भी बनता है। यही जीवन है, परिस्थितियाँ सब को तपाती हैं, पर जो भीतर से सम है, वही पूर्ण होता है। युवक यह सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने समझा कि जीवन की परिस्थितियाँ हमारी परीक्षा अवश्य लेती हैं, पर जो भीतर से स्थिर होता है, वही उनसे विजयी होकर निकलता है।
॥ चौपाई ॥
॥ दोहा ॥
भावार्थ —वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है एवं तत्काल फल देने वाला है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है। जो मनुष्य इस संत समाज रूपी तीर्थराज का प्रभाव प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों फल पा जाते हैं।
भावार्थ—इस तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल ऐसा देखने में आता है कि कौए कोयल बन जाते हैं और बगुले हंस। यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है।
श्री रामायण मंथन—प्रसंग आरंभ
तीर्थराज प्रयाग और सत्संग महिमा—
श्री रामचरितमानस के अरण्य कांड में गोस्वामी तुलसीदास जी ने सत्संग की महिमा को तीर्थराज प्रयाग के माध्यम से अलौकिक रूप में प्रकट किया है। इस प्रसंग में तुलसीदास जी ने तीर्थराज प्रयाग को संत समाज के प्रतीक रूप में स्थापित किया है। यहाँ यह बताया गया है कि संत समाज का संग ही वह अलौकिक तीर्थ है, जहाँ साधारण मनुष्य भी असाधारण आत्मिक उपलब्धियों को प्राप्त कर सकता है। प्रस्तुत व्याख्यान में हम इस प्रसंग को अंगों में विभाजित कर इसकी गहराई और महत्व को समझने का प्रयास करेंगे।
1. तीर्थराज का अलौकिक स्वरूप—
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि संत समाज रूपी तीर्थ अलौकिक और अकथनीय है। इसका प्रभाव तत्काल दृष्टिगोचर होता है। जैसे गंगा में स्नान करने से बाह्य शुद्धि होती है, वैसे ही संत समाज में प्रवेश करने मात्र से अंतःकरण पवित्र हो जाता है।
संत समाज को ‘तीर्थराज’ कहने का कारण यह है कि जैसे तीर्थराज प्रयाग तीन नदियों (गंगा, यमुना और सरस्वती) का संगम है, वैसे ही संत समाज तीन गुणों (सत, रज, तम) का समन्वय कर आत्मा को शुद्ध करता है। यह तीर्थ न केवल बाहरी जीवन को बल्कि आंतरिक चेतना को भी शुद्ध करता है।
उदाहरण के लिए, परमसंत श्री कबीर साहिब जी ने भी कहा है—
2. संत समाज में प्रवेश का फल—
जो व्यक्ति संत समाज रूपी तीर्थ का महत्व समझते हैं और इसमें भावपूर्वक डुबकी लगाते हैं, वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं। संतों की संगति से मनुष्य के मन की अशांति समाप्त हो जाती है और उसे अपने जीवन का उद्देश्य स्पष्ट दिखने लगता है।
संत समाज में प्रविष्ट होकर मनुष्य को जो चार फल प्राप्त होते हैं, उन्हें हम इस प्रकार समझ सकते हैं—
1. धर्म—मनुष्य सत्य, अहिंसा, करुणा और अन्य नैतिक गुणों को अपनाता है।
2. अर्थ—सही मार्ग से संपत्ति अर्जित करता है।
3. काम—अपनी इच्छाओं को नियंत्रित कर उन्हें सही दिशा देता है और उचित इच्छा की पूर्ति करता है।
4. मोक्ष—जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर परम शांति प्राप्त करता है।
उदाहरण स्वरूप, राजा परीक्षित ने शुकदेव जी के सत्संग के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया। उनके जीवन में सत्संग ही तीर्थराज बनकर आया।
3. सत्संग और कौए का कोयल बनना—
संत समाज में डुबकी लगाने का फल तुरंत मिलता है। जैसे कौआ कोयल बन जाता है और बगुला हंस बन जाता है, वैसे ही साधारण मनुष्य संतों की संगति में असाधारण बन जाता है। यह बदलाव केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होता है।
सत्संग को आत्मा का दर्पण कहा गया है। जब आत्मा इस दर्पण में झाँकती है, तो अपने असली स्वरूप को पहचानती है। कौआ और कोयल का उदाहरण यह समझाने के लिए दिया गया है कि सत्संग से आंतरिक परिवर्तन होता है, जो देखने में चमत्कारी प्रतीत होता है।
उदाहरण के लिए, वाल्मीकि जी को संत नारद जी का सत्संग प्राप्त हुआ, जिससे एक साधारण वनवासी ब्रह्मनिष्ठ महर्षि बन गया।
4. सत्संग की महिमा छिपी नहीं है—
यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे कि संत समाज में प्रवेश करने से इतने चमत्कारिक परिवर्तन होते हैं। सत्संग की महिमा तो सनातन सत्य है, जिसे प्रत्येक युग में स्वीकारा गया है।
संत समाज की सूर्य की किरणों से तुलना की जा सकती है। सूर्य की किरणें जैसे अंधकार को दूर करती हैं, वैसे ही सत्संग अज्ञानता का नाश करता है।
एक अन्य उदाहरण में ध्रुव का नाम आता है, जो महर्षि नारद के मार्गदर्शन से बालक से महान् तपस्वी बन गया। यह सत्संग का ही प्रभाव था।
5. व्यावहारिक शिक्षा और वर्तमान समय में सत्संग का महत्व—
यह प्रसंग वाणी हमें यह सिखाती है कि तीर्थ केवल भौतिक स्थानों पर जाने से प्राप्त नहीं होता। सच्चा तीर्थ संत समाज है, जहाँ मनुष्य को आत्मिक मार्गदर्शन मिलता है।
वर्तमान समय में सत्संग—
आज के युग में, जब मनुष्य भौतिकता और अशांति में फंसा हुआ है, सत्संग की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। सत्संग से ही मनुष्य अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है।
उदाहरण के लिए, विभिन्न योग शिविरों और आध्यात्मिक संगठनों द्वारा सत्संग के माध्यम से लाखों लोगों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन किए हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा इस प्रसंग में संत समाज को तीर्थराज की उपमा देना अद् भुत है। यह प्रसंग हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि सच्चा सुख और शांति केवल संतों की संगति में ही संभव है। संत समाज रूपी तीर्थ में डुबकी लगाने से व्यक्ति का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है और वह जीवन के चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार, यह प्रसंग हमें सत्संग की महिमा और उसके अद् भुत प्रभावों का बोध कराता है। ‘सत्संग’ वह अमूल्य खज़ाना है, जो जीवन के अंधकार को प्रकाश में बदल सकता है।
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मुद मंगलमय संत समाजू ।
जो जग जंगम तीरथराजू ॥
श्री रामचरितमानस की यह चौपाई संतों के समाज की महिमा का वर्णन करती है। इसमें संत समाज को आनंद और कल्याण का स्रोत बताया गया है। संतों का समाज वह पवित्र स्थल है, जो जगत् में चलते-फिरते तीर्थराज प्रयाग के समान है, जो सदैव सुख-शान्ति प्रदान करने वाले पवित्र विचारों को सब ओर फैलाता है।
प्राचीन भारतीय संस्कृति में तीर्थराज प्रयाग को पवित्रतम स्थान माना गया है, जहाँ तीन नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। इसी तरह, संतों का समाज भी तीन महत्वपूर्ण गुणों—ज्ञान, भक्ति और सेवा का संगम स्थल है।
संत समाज को ‘जंगम तीर्थराज’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि यह तीर्थ किसी एक स्थान पर सीमित नहीं है, बल्कि जहाँ-जहाँ संतगण जाते हैं, वहाँ पवित्रता और आनन्ददायक भावनाओं का संचार करते हैं। संतों का आचरण, वचन और उनके विचार समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत होते हैं। अतः उनके द्वारा सदा जीवों का कल्याण होता है।
तीर्थराज प्रयाग की इस उपमा के माध्यम से, सन्त तुलसीदास जी ने यह बताया है कि संतों का संग समाज को उसी प्रकार शुद्ध और पवित्र बनाता है, जैसे तीर्थ यात्रा से व्यक्ति के पापों का नाश होता है। संत समाज में प्रेम, शांति और आनंद का वातावरण होता है, जो मानव जीवन को मंगलमय बनाता है। इस प्रकार, संत समाज को चलायमान तीर्थराज के रूप में सम्मानित किया गया है, जो हर जगह पवित्रता और कल्याण का संदेश फैलाता है।
॥ चौपाई ॥
भावार्थ—संत समाज रूपी प्रयागराज में राम- भक्ति रूपी गंगा जी की धारा है और ब्रह्म विचार का प्रचार सरस्वती जी हैं। विधि और निषेध कर्म कथा (करने योग्य और न करने योग्य कर्मों का वर्णन) कलियुग के पापों को हरने वाली सूर्य पुत्री यमुना जी हैं और भगवान की कथाएँ त्रिवेणी के रूप में सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनंद और कल्याण को देने वाली हैं।
॥ चौपाई ॥
भावार्थ—संत समाज रूपी प्रयागराज का वर्णन चल रहा है। संत तुलसीदास जी आगे फ़रमाते हैं कि अपने धर्म में जो अटल विश्वास है, वह अक्षयवट है और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज है। वह (संत समाज रूपी प्रयागराज) सब देशों में, हर समय सभी को सहज ही में प्राप्त हो जाता है, इसका आदरपूर्वक सेवन करने से सभी क्लेश नष्ट हो जाते हैं।
संसार में तीन प्रकार के तीर्थ कहे गए हैं—
1. मुकामी तीर्थ (स्थायी तीर्थ)—मुकामी तीर्थ उन स्थलों को कहते हैं जो स्थानिक रूप से पवित्र माने जाते हैं। ये स्थल ब्रह्मर्षियों अथवा सन्त महापुरुषों द्वारा स्थापित किए गए किसी विशेष भू-भाग, नदी, पर्वत या अन्य प्राकृतिक स्थान पर स्थित होते हैं, जैसे हरिद्वार, वाराणसी, प्रयाग आदि। इन तीर्थों का महत्व धार्मिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से होता है। लोग इन स्थलों पर तीर्थ यात्रा करने जाते हैं और पवित्र स्नान, पूजा-पाठ, सत्संग कथाएँ एवं अन्य धार्मिक क्रियाएँ करते हैं ताकि वे अपने पापों को नष्ट कर सकें और मोक्ष प्राप्त कर सकें। यह ‘स्थायी’ तीर्थ इसलिए कहे जाते हैं, क्योंकि ये एक निश्चित स्थान पर स्थित होते हैं और सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहे हैं।
2. जंगम तीर्थ (चलता फिरता तीर्थ)—जंगम तीर्थ का अर्थ है—‘चलता-फिरता तीर्थ’। इस अवधारणा का तात्पर्य है कि सच्चे साधक या महापुरुष जहाँ भी जाते हैं, वहाँ एक तीर्थ की स्थापना होती है। ऐसे संत, महात्मा या गुरुओं का जीवन और उपस्थिति स्वयं में एक तीर्थ मानी जाती है। जंगम तीर्थ का दर्शन करने का लाभ यह है कि हमें आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी विशेष स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं होती; बल्कि ऐसे महापुरुषों के सान्निध्य में ही वह पवित्रता, शांति और ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है, जो किसी स्थायी तीर्थ स्थल पर होती है।
3. यौगिक तीर्थ—सन्त महापुरुष अथवा ब्रह्मनिष्ठ योगी पुरुषों द्वारा बताई गई साधना से मनुष्य के घट में यह तीर्थ प्रकट होता है। यह यौगिक तीर्थ एक आंतरिक अवस्था है, जो योग और ध्यान के माध्यम से प्राप्त होती है। यह अवस्था वह अवस्था है, जब साधक अपनी साधना के माध्यम से अपने भीतर की ऊर्जा और चेतना को एक केंद्र बिंदु पर एकत्रित करता है। योगी के लिए, शरीर ही उसका तीर्थ होता है और उसकी साधना उस तीर्थ की यात्रा। इस यात्रा के दौरान साधक अपनी इड़ा (चंद्र नाड़ी), पिंगला (सूर्य नाड़ी) और सुषुम्ना (मध्य नाड़ी) नाड़ियों को सक्रिय करता है और उनमें सामंजस्य स्थापित करता है। जब इन तीनों नाड़ियों का संगम होता है, तो साधक को अपने भीतर ही दिव्यता का अनुभव होता है।
घट तीर्थ (ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम)—उक्त यौगिक तीर्थ ही घट तीर्थ है। इसका तात्पर्य भी हमारे शरीर के भीतर का वह पवित्र स्थल है; जहाँ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों का मिलन होता है। ये तीनों नाड़ियाँ योग शास्त्र के अनुसार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इड़ा नाड़ी चंद्र ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है और मन की शांति, शीतलता और विश्राम का प्रतीक है। पिंगला नाड़ी सूर्य ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती है और शरीर की सक्रियता, ऊर्जा और जागरुकता का प्रतीक है। सुषुम्ना नाड़ी इन दोनों नाड़ियों के बीच स्थित होती है जो चेतना की ऊर्ध्वगामी यात्रा का मार्ग है।
जब साधक अपने सुमिरण-ध्यान के अभ्यास द्वारा इन तीनों नाड़ियों को संतुलित कर लेता है, तो उसे घट (शरीर) के भीतर ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अनुभव होता है, जो कि परमात्मा का साक्षात्कार है।
इन सभी तीर्थों की अवधारणाएँ हमें यह बताती हैं कि सच्चे अर्थ में तीर्थों की यात्रा केवल बाहरी यात्रा नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर की यात्रा है, आत्मा की यात्रा है और अपने आप को जानने का माध्यम है। उक्त प्रसंग में अवलोकन कीजिए—
संत समाज तीर्थ—
सन्त तुलसीदास जी ने संत समाज को चलते-फिरते तीर्थराज प्रयाग के रूप में वर्णित किया है।
राम-भक्ति रूपी गंगा—
संत समाज में राम-भक्ति गंगा की धारा के समान है, जो निर्मलता और पवित्रता प्रदान करती है।
ब्रह्म विचार का प्रचार—
सरस्वती जी की तरह, संत समाज में ज्ञान और विचार का प्रचार-प्रसार होता है। संत समाज में ब्रह्म विचार की महिमा को प्रमुखता से रखा जाता है।
कलियुग के पापों का नाश—
सूर्य की पुत्री यमुना की तरह संत समाज में करने योग्य कर्मों की कथा वर्णित होती है, जो कलियुग के पापों का नाश करती है।
अक्षयवट—
धर्म निष्ठा का प्रतीक है। भक्त का धर्म में अचल विश्वास ही अक्षयवट के समान है, जो कभी समाप्त नहीं होता।
अब हम मुख्य मुद्दे पर आते हैं—मुद मंगल। यह मुद मंगल हर प्राणी मांगता है। यह हर किसी की सहज स्वाभाविक इच्छा है कि वह आनंद और कल्याण सदा ग्रहण करता रहे। यह शब्द हमें जीवन में सुख, शांति और समृद्धि के मूल तत्वों की ओर इशारा करता है।
इसे और गहराई से समझें तो ‘मुद’ का तात्पर्य है आनंद, हर्ष और खुशी। यह वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति आंतरिक और बाह्य रूप से प्रसन्न रहता है। जब मनुष्य के भीतर आनंद होता है, तो वह अपने आसपास के वातावरण को भी सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है।
‘मंगल’ का अर्थ है कल्याण। यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति का जीवन सुखी, शांतिपूर्ण और समृद्ध होता है। मंगलमय जीवन का मतलब है हर कार्य में सफलता, परिवार में शांति और समाज में समृद्धि का वास।
जब ‘मुद’ और ‘मंगल’ एक साथ आते हैं, तो यह जीवन की उस आदर्श स्थिति को दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में खुश रहता है, बल्कि समाज और संसार के लिए भी कल्याणकारी कार्य करता है। संत समाज को ‘मुद मंगलमय’ कहा गया है क्योंकि संतों की संगति से व्यक्ति को आंतरिक शांति और बाहरी कल्याण दोनों प्राप्त होते हैं।
कहानी (मुद मंगलमय संत की संगति)—
एक छोटे से गाँव में रामदास नाम का एक किसान रहता था। उसकी खेती अच्छी चल रही थी, परिवार भी सुखी था, परंतु उसे हमेशा एक खालीपन महसूस होता था। एक दिन उसने सुना कि पास के जंगल में एक संत पधारे हैं, जिन्हें लोग ‘मुद मंगलमय संत’ कहते थे। अपनी आन्तरिक जिज्ञासा से प्रेरित होकर वह उनके दर्शन के लिए गया।
संत ने उसे देखकर मुसकराते हुए कहा, ‘बेटा, केवल अपनी खुशी में ही मग्न मत रहो, जीवन का असली आनंद दूसरों की सेवा और कल्याण में है।’ रामदास ने संत के विचारों को गहराई से सुना।
संत की संगति में कुछ दिन बिताने के बाद, रामदास ने गाँव लौटकर निर्धन किसानों की सहायता करना शुरु किया। उसने अपनी फसल का एक भाग गरीबों को दान दिया और उनकी समस्याओं को सुलझाने में मदद की। धीरे-धीरे, रामदास के मन की समस्त इच्छाएँ शान्त हो गईं।
रामदास अब न केवल स्वयं खुश था, बल्कि दूसरों के लिए भी मंगलकारी बन गया था। संत का संदेश उसके जीवन का मार्गदर्शन बन गया। वास्तव में ‘मुद मंगलमय’ का अर्थ उसने अपने जीवन में अनुभव कर लिया था।
अगस्त 2025
( साधक की तितिक्षा )
॥ चौपाई ॥
साधु चरित सुभ चरित कपासू ।
निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा ।
बंदनीय जेहिं जग जस पावा ॥
भावार्थ—संतों का चरित्र कपास के समान उज्ज्वल होता है, जिसका फल नीरस, विशद और गुणमय होता है। कपास की डोडी नीरस होती है, संतों के चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं होती, इसलिए वे भी नीरस होते हैं, कपास उज्ज्वल होता है, संतों का हृदय भी अज्ञान और पाप रूपी अन्धकार से रहित होता है, इसलिए वह विशद है और कपास में गुण (तंतु) होते हैं, इसी प्रकार संतों का चरित्र भी सद् गुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय है। जैसे कपास का धागा सुई में किए हुए छेद को अपना तन देकर ढक देता है अथवा कपास जैसे लोढ़े जाने, काते जाने और बुने जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढकता है, उसी प्रकार संत भी स्वयं दुःख सहकर दूसरों के दोषों को ढकते हैं, जिसके कारण उन्हें जगत् में वंदनीय यश प्राप्त हुआ है।
इस लेख में संतों के चरित्र, समाज और उनके आचरण की महिमा का वर्णन किया गया है, जो जनमानस के लिए प्रेरणादायक और अनुकरणीय है।
संतों का समाज में महत्व—
संतों का चरित्र समाज के लिए सदैव आदर्श रहा है। उनके जीवन की सादगी, सेवा और सत्यनिष्ठा मानवता को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है। तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ में संतों की महिमा को अत्यधिक महत्व दिया है। उनके अनुसार, संतों का चरित्र कपास की भाँति पवित्र और समाज के लिए कल्याणकारी होता है।
संतों का चरित्र—(कपास का प्रतीक)
संत तुलसीदास जी संतों के चरित्र की तुलना कपास के साथ करते हैं। कपास की भाँति, संतों का जीवन भी नीरस, विशद और गुणमय होता है।
· नीरसता का अर्थ—जैसे कपास का फल नीरस होता है, वैसे ही संतों का जीवन भौतिक इच्छाओं और तृष्णाओं से रहित होता है। वे विषयासक्ति से दूर रहते हैं और उनका उद्देश्य केवल आत्मिक उन्नति और दूसरों की सेवा होता है।
· विशदता का अर्थ—संतों का हृदय अज्ञान और पाप से रहित होता है, जैसे कपास की सफेदी। उनका जीवन सादगी और पवित्रता का प्रतीक है।
· गुणमयता का अर्थ—कपास में गुण होते हैं (तंतु) जिनसे वस्त्र बनते हैं। उसी प्रकार, संतों के जीवन में अनेकों सद् गुण होते हैं, जो समाज के लिए उपयोगी और कल्याणकारी हैं।
· संतों की विशेषता—दूसरों के दोषों को ढकना संतों का सबसे बड़ा गुण है। जैसे कपास अपने मूल रूप को त्यागकर, काट पीट सहन कर सुई के द्वारा किए हुए छेद से वस्त्र बनकर मनुष्य के तन को ढक देता है, वैसे ही संत अपने व्यक्तिगत दुखों को सहकर भी दूसरों के दोषों को माफ करते हैं और उन्हें उभारने के बजाय सुधारने का प्रयास करते हैं।
उपसंहार—(जीवन का सार)
संत समाज से प्राप्त उपदेश, सत्संग और साधना का फल जगत् के किसी भी अन्य आनंद या सुख से बढ़कर होता है। संतों का संग जीवन को सही दिशा में ले जाने वाला है। संतों का चरित्र और समाज सदैव अनुकरणीय है और उनका सान्निध्य जीवन को पवित्रता और शांति से भर देता है।
दृष्टांतों द्वारा स्पष्टता—
संत तुलसीदास जी का जीवन एक महान् प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने रामायण को अवधी भाषा में ‘रामचरितमानस’ के रूप में लिखा, जो आम जनता के लिए भगवान राम की कथा को सुलभ और सहज रूप में प्रस्तुत करता है। तुलसीदास जी के जीवन से हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं—
1. धैर्य और दृढ़ संकल्प—
तुलसीदास जी का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। वे बालपन में ही अनाथ हो गए थे। यौवनकाल में पत्नी रत्नावली के कथन से वे वैराग्य की ओर प्रेरित हुए और उन्होंने अपना जीवन भगवान राम की भक्ति में समर्पित कर दिया। उनकी साधना, तपस्या और रामभक्ति ने उन्हें समाज के लिए एक आदर्श संत बना दिया।
2. भक्ति और समर्पण—
तुलसीदास जी की भक्ति का आदर्श यह है कि उन्होंने भगवान राम को अपना सर्वस्व मान लिया। उनकी लेखनी में भक्ति की गहराई और प्रेम की तीव्रता झलकती है, जो हमें यह सिखाती है कि ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति और समर्पण से ही मनुष्य को आंतरिक शांति और आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।
3. निरहंकारिता और विनम्रता—
तुलसीदास जी ने अपनी कृतियों में स्वयं को एक साधारण भक्त के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान या लेखन का अहंकार नहीं किया। उनकी रचनाओं में विनम्रता और निष्ठा का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो हमें यही सिखाता है कि सच्चा ज्ञान और भक्ति विनम्रता से ही पूर्ण होती है।
4. सहिष्णुता और समानता का भाव—
तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ में निषादराज भील, केवट का प्रेम, वनवासी भील समाज, शबरी भीलनी आदि के प्रसंगों में सामाजिक समानता और मानवता के मूल्यों पर ज़ोर दिया। उन्होंने जाति-पाति, ऊँच-नीच के भेद भाव को समाप्त करने की बात कही। उनके विचार हमें सिखाते हैं कि सभी मनुष्यों को समान दृष्टि से देखना चाहिए और समाज में प्रेम, भाईचारे और एकता को बढ़ावा देना चाहिए।
5. निरंतर साधना का महत्व—
तुलसीदास जी ने अपने जीवन में निरंतर साधना और अभ्यास किया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी साधना नहीं छोड़ी। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास, धैर्य और समर्पण आवश्यक है।
संत तुलसीदास जी के जीवन से हमें सीख मिलती है कि ईश्वर की भक्ति में ही सच्चा सुख और शांति है और इसके लिए हमें अपने अहंकार को त्यागकर प्रेम, विनम्रता और समानता के मार्ग पर चलना चाहिए। उनका जीवन एक प्रकाश स्तम्भ के समान है, जो हमें सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है।
निष्कर्ष—
संतों का जीवन, उनका चरित्र और समाज हमेशा से प्रेरणादायक रहे हैं। तुलसीदास जी द्वारा ‘रामचरितमानस’ में किया गया संतों का वर्णन हमारे लिए एक मार्गदर्शक है। हमें संतों के गुणों को अपने जीवन में अपनाकर समाज को एक नई दिशा प्रदान करनी चाहिए।
इस लेख से हम यह सीख सकते हैं कि संतों का चरित्र, समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है और उनका संग हमेशा से सुख और शांति का कारण रहा है।

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