श्री परमहंस अमृत लीला
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श्री द्वितीय पादशाही जी
( भवनिधि के तारणहार )
यह प्रसंग एक भावपूर्ण कविता में है जो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा, करुणा और चमत्कारी शक्ति का स्मरण कराती है। इस कविता के अर्थ और प्रसंग के भाव आगे प्रकट किए जा रहे हैं—
एक कुटिया और भक्तों का प्रेम
यह आश्रम जहाँ श्री सद्गुरुदेव महाराज जी विराजमान थे आत्मा को शांति देने वाला था। दूर-दूर से भक्त श्री दर्शनों को आते थे।
सावन के पावन महीने में, भक्तों ने विनती की कि हे प्रभो जी, चक पैंतालिस (एक स्थान का नाम) की संगत को दर्शन देने आएँ। यह रचना श्री सद्गुरुदेव महाराज जी और भक्त के बीच भावनात्मक संबंध को दर्शाती है।
चनाब नदी के पास पहुँचने पर पाया गया कि नदी उफान पर है और नाविक डर के कारण नाव चलाने को तैयार नहीं थे। परंतु संगत की श्रद्धा डगमगाई नहीं, वे सब अपने संकल्प पर अडिग रहे।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने करुणा दृष्टि डाली, मल्लाह भी झुक गया, बोला—“तेरी रहमत से तो, यह दरिया भी थम गया !”
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने अपने सहज भाव से नाविक को आशीर्वाद दिया, जिससे वह भय मुक्त हुआ और नाव चलाने को तैयार हो गया। यह श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा दृष्टि की महिमा है। दरिया का उफान भी कम दिखने लगा।
नाव नदी में डोलने लगी और एक महिला अपने बच्चे सहित नदी में गिर गई, तब एक भक्त ने उन्हें बचाया। साहस, समर्पण और सेवा-भावना कितनी गहरी होती है, यह दृश्य उसका साक्षात् प्रमाण था।
नाव आगे बढ़ रही थी कि फिर दरिया में लहरें उठने लगीं, तभी अंग्रेज़ ठेकेदार ने दूर से यह देखकर एक मोटरनाव भेजी। परंतु उसके द्वारा भेजी गई मोटर नाव भी बीच मंझधार में फँस गई। तभी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने नेत्र मूंद ध्यान लगाया तो सभी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि वे सब तो सुरक्षित तट पर ही हैं। यह दृश्य पूर्णत: चमत्कारी और गुरु-कृपा से भरा हुआ था।
चक पैंतालिस में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी का भव्य स्वागत हुआ। वहाँ एक नई कुटिया का निर्माण हुआ था और अब संगत को दिव्य ज्ञान की वर्षा मिलने लगी। यह दृश्य आध्यात्मिक उत्सव का प्रतीक प्रतीत हो रहा था।
जो भवसागर में डूबे, उन्हें सतगुरु पार लगाते हैं। वास्तव में जब कोई जीव माया की भटकन से थककर, सब आश्रय त्याग कर सतगुरु की शरण में आता है, तब उसकी मुक्ति की यात्रा प्रारंभ होती है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी उस नौका के नाविक समान हैं जो संसार-समुद्र के तूफ़ानों, मोह-माया की लहरों और कर्मों की गहराइयों से जीव को पार लगाते हैं।
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जून 2025
(श्री द्वितीय पादशाही जी)
॥ एक थानेदार को शिक्षा दी ॥
॥ कविता ॥
॥ दोहा ॥
॥ श्लोक ॥
अर्थ—यह शरीर काम, क्रोध आदि से भरपूर है। संत जनों से जीव का जब मिलाप होता है तो ये चोर आपस में ही लड़ भिड़ कर, खण्ड-खण्ड हो जाते हैं।
प्रारब्ध में लिखा होता है तो श्री सतगुरु से जीव की भेंट होती है और वह भक्ति-भाव में लवलीन हो जाता है। ऐ प्राणी तू दोनों हाथ जोड़ कर अपने सद् गुरु की वन्दना कर। यह भारी पुण्य कर्म है। तू सद् गुरु को दंड्वत वन्दना कर।
॥ दोहा ॥
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