श्री परमहंस अमृत लीला



 श्री परमहंस अमृत लीला 

अप्रैल 2026

श्री द्वितीय पादशाही जी   

( भवनिधि के तारणहार )

यह प्रसंग एक भावपूर्ण कविता में है जो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा, करुणा और चमत्कारी शक्ति का स्मरण कराती है। इस कविता के अर्थ और प्रसंग के भाव आगे प्रकट किए जा रहे हैं—

एक कुटिया और भक्तों का प्रेम

भखड़े वाली कुटिया में, सतगुरु जी विराजे थे,
भक्त जन चरण पखारें, जो नित दर्शन को आते थे।

यह आश्रम जहाँ श्री सद्गुरुदेव महाराज जी विराजमान थे आत्मा को शांति देने वाला था। दूर-दूर से भक्त श्री दर्शनों को आते थे।

 एक बार सावन आया, वर्षा रिमझिम बरस रही,
संगतें लगीं पुकारने, चक पैंतालिस की आस लगी ।

सावन के पावन महीने में, भक्तों ने विनती की कि हे प्रभो जी, चक पैंतालिस (एक स्थान का नाम) की संगत को दर्शन देने आएँ। यह रचना श्री सद्गुरुदेव महाराज जी और भक्त के बीच भावनात्मक संबंध को दर्शाती है।

चनाब उफनती लहरें, जल प्रलय समान हुई,
नाविक बोले—अब जाना, यह मृत्यु की राह हुई !

चनाब नदी के पास पहुँचने पर पाया गया कि नदी उफान पर है और नाविक डर के कारण नाव चलाने को तैयार नहीं थे। परंतु संगत की श्रद्धा डगमगाई नहीं, वे सब अपने संकल्प पर अडिग रहे।

श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने करुणा दृष्टि डाली, मल्लाह भी झुक गया, बोला—तेरी रहमत से तो, यह दरिया भी थम गया !

श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने अपने सहज भाव से नाविक को आशीर्वाद दिया, जिससे वह भय मुक्त हुआ और नाव चलाने को तैयार हो गया। यह श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा दृष्टि की महिमा है। दरिया का उफान भी कम दिखने लगा।

नाव डोली बीच धार में, एक माँ बालक संग गिरी,
एक भक्त कूदा तत्क्षण, जीवन-डोरी पकड़ लई।

नाव नदी में डोलने लगी और एक महिला अपने बच्चे सहित नदी में गिर गई, तब एक भक्त ने उन्हें बचाया। साहस, समर्पण और सेवा-भावना कितनी गहरी होती है, यह दृश्य उसका साक्षात् प्रमाण था

मोटर नाव भी हारी, जब धारा ने उसको घेरा,
गुरु ने नेत्र मूँदें, और गगन थमा सवेरा।

नाव आगे बढ़ रही थी कि फिर दरिया में लहरें उठने लगी, तभी अंग्रेज़ ठेकेदार ने दूर से यह देखकर एक मोटरनाव भेजी। परंतु उसके द्वारा भेजी गई मोटर नाव भी बीच मंझधार में फँस गई। तभी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने नेत्र मूंद ध्यान लगाया तो सभी यह देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि वे सब तो सुरक्षित तट पर ही हैं। यह दृश्य पूर्णत: चमत्कारी और गुरु-कृपा से भरा हुआ था।

घोड़ों की सजती सवारी, ढोल-नगाड़ा बाजे,
पुष्पवर्षा से स्वागत करते, प्रेमीजन सब राजे।

चक पैंतालिस में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी का भव्य स्वागत हुआ। वहाँ एक नई कुटिया का निर्माण हुआ था और अब संगत को दिव्य ज्ञान की वर्षा मिलने लगी। यह दृश्य आध्यात्मिक उत्सव का प्रतीक प्रतीत हो रहा था।

जो भवसागर में डूबे, उन्हें सतगुरु पार लगाते हैं। वास्तव में जब कोई जीव माया की भटकन से थककर, सब आश्रय त्याग कर सतगुरु की शरण में आता है, तब उसकी मुक्ति की यात्रा प्रारंभ होती है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी उस नौका के नाविक समान हैं जो संसार-समुद्र के तूफ़ानों, मोह-माया की लहरों और कर्मों की गहराइयों से जीव को पार लगाते हैं।

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जून 2025

(श्री द्वितीय पादशाही जी)

एक थानेदार को शिक्षा दी

 

कविता

एक जिज्ञासु के मन में जिज्ञासा उठी एक बड़ी ।
उच्चारण करें गुरुदेव अपने मुख से यदि गुरुवाणी
तब मानूँगा ये हैं सत्पुरुष स्वयं जगतारण महान ।
अथवा पूर्ण सन्त हैं दयालु दया के सच्चे निधान
या विधि करी वंदना तब पूछ लिया श्री भगवान ।
कि होनहार युवक आप क्या करते हो काम ?

 

चकित होय आगन्तुक कहा, हे गुण शोभा धाम ।
पद है थानेदार का, वही सरकारी काम
होता जो कारज थानेदार का, काम वही मैं करता हूँ
डाकू चोर पकड़ता हूँ, झट कारागार में धरता हूँ
पूछा फिर बतलाओ यदि कर्मचारी कोई सरकारी ।
मिल जाए जो इन्ह लुटेरों से हो करि स्वेच्छाचारी

दोहा

अधिकारी हो कर स्वयं जो, दोष करे प्रचंड ।
बतलाओ तो शीघ्र तुम, क्या दोगे तब दण्ड ?
झट ही ठगे से रह गए, थानेदार सुजान ।
प्रभु ! दंड मिलेगा समान, उसे नियम अनुसार
बोले प्रभु तबआप भी, लुटेरों के आगू ।
बतलाओ कि कौन दंड, तुम पर हो लागू ?

 

सुनकर चक्कर खा गए, हे श्री जगतारण ।
मैं पक्का निज धर्म का, अनुचित दोषारोपण
देखो हम प्रकृति के, कार्यकर्ता सरकारी ।
चिताते हैं ठगन संग, करो न भागीदारी
चोरन से मिलो नहीं, वरना पाओगे दंड ।
तभी श्लोक गुरुवाणी, सुना दिए प्रचण्ड

 

श्लोक

कामि क्रोधि नगरु बहु भरिया ,
मिलि साधु खण्डल खण्डा हे

पूरब लिखत लिखे गुरु पाइआ ,
मनि हरि लिव मण्डल मण्डा हे
करि साधु अंजुली पुंनु बड्डा है ,
करि    दण्डौत    पुंनि    वड्डा   हे 

अर्थ—यह शरीर काम, क्रोध आदि से भरपूर है। संत जनों से जीव का जब मिलाप होता है तो ये चोर आपस में ही लड़ भिड़ कर, खण्ड-खण्ड हो  जाते हैं।

प्रारब्ध में लिखा होता है तो श्री सतगुरु से जीव की भेंट होती है और वह भक्ति-भाव में लवलीन हो जाता है। ऐ प्राणी तू दोनों हाथ जोड़ कर अपने सद् गुरु की वन्दना कर। यह भारी पुण्य कर्म है। तू सद् गुरु को दंड्वत वन्दना कर।

दोहा ॥

सुनि श्लोक गुरुवाणी से, भए चमत्कृत घोर
जिज्ञासा पूरी करी, जब सन्तन्ह सिरमौर
चरण-कमल गहि प्रभु कै, बोले थानेदार
हे सतगुरु बख़्शन्द जी ! विनती करो स्वीकार
तब श्री गुरुदेव ने, बख़्शा नाम का दान
अति विभोर होए कर, करि चले गुणगान

ज्योत प्रकाश घट अन्तरि, गुरु किया उजियार ।
गहे चरण रज निज मस्तक पर, तब पावै कछु सार

 

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