क्रियात्मक भजन-अभ्यास

 क्रियात्मक भजन-अभ्यास 

(गाइडिड मेडिटेशन)

     

जुलाई 2026

सुमिरन ऐसा कीजिए, दूजा लखै न कोय ।
ओंठ न फरकत देखिए, प्रेम राखिए गोय
॥

            अर्थ—परमात्मा का स्मरण इस प्रकार अत्यंत गोपनीयता से करना चाहिए कि आपके अतिरिक्त किसी दूसरे को इसका आभास भी न हो। सुमिरन की सघनता ऐसी हो कि होठों में भी कोई हलचल न दिखे। भक्ति के इस परम प्रेम को अपने अंतःकरण में छिपाकर (गोय) रखना चाहिए, क्योंकि जो रस भीतर छिपा रहता है, वही गहरा होता है।

प्रिय साधकजन !

यह अमृतवेला का शांत और दिव्य समय है, जो स्वयं से मिलने और उस परमात्मा में लीन होने के लिए सर्वोत्तम है। सभी साधक सुखासन या सिद्धासन में बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें, जैसे कोई वृक्ष अपनी जड़ों से सीधा आकाश की ओर जा रहा हो। शरीर को पत्थर की भाँति स्थिर, परंतु भीतर से रुई की भाँति कोमल और शिथिल कर लें। ‘स्थिरम् सुखम् आसनम्’—यही आपकी अवस्था हो।

अब अपनी आँखों को बहुत ही कोमलता से बंद करें, जैसे कमल की पंखुड़ियाँ शाम को सिमटती हैं। अपनी पूरी चेतना को बाहर के संसार से समेटकर अपने हृदय आकाश की ओर ले आएँ। शरीर का कोई भी अंग—हाथ, पैर या गर्दन अब हिलना नहीं चाहिए। पूर्ण स्थिरता ही अंतर्यात्रा की पहली सीढ़ी है।

मनुष्य का स्वभाव अक्सर प्रदर्शन का होता है, हम अपना भजन-अभ्यास भी दूसरों को दिखाना चाहते हैं। परंतु पूरा लाभ उठाने के लिए हमें ‘गुप्त साधना’ का अभ्यास करना है। उक्त वाणी का सार यही है कि सुमिरन होंठों से नहीं, हृदय की धड़कनों और स्वांसों की गहराई से हो। जैसे एक प्रेमी अपने प्रियतम की याद को दुनिया से छिपाकर मन में रखता है, वैसे ही आप यह सत्य-नाम या उस सत्य शब्द को अपने भीतर सहेज लें।

सुमिरन को कंठ से नीचे उतारकर हृदय के मौन में ले जाएँ। आपकी साधना इतनी शांत हो कि पास बैठे व्यक्ति को भी पता न चले कि भीतर ईश्वरीय मिलन का उत्सव चल रहा है।

            जब वाचक नाम का उच्चारण बंद होते हुए भी उसकी ध्वनि हृदय में स्वयं गूंजने लग जाती है, तभी सुमिरन अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है। अतः साधना का उद्देश्य केवल आसन में बैठकर जप करना या दूसरों को अपनी दृढ़ता दिखाना ही नहीं है, बल्कि नाम को इतनी गहराई तक उतारना है कि वह हमारे अस्तित्व का अभिन्न अंग बन जाए।

निश्चित है कि जब सुमिरन हृदय के मौन में स्थापित हो जाता है, तब साधक अकेला होते हुए भी कभी अकेला नहीं रहता—क्योंकि उसके भीतर निरंतर प्रभु की उपस्थिति का मधुर उत्सव चलने लग जाता है।

 


जून 2026

सुमिरन से मन लाइए, जैसे नाद कुरंग ।
कहै कबीर बिसरै नहीं, प्रान तजै तेहि संग ॥

            अर्थ—अपने मन को ईश्वर के स्मरण (नाम-जप) में इस प्रकार लगाना चाहिए, जैसे कोई हिरण शिकारी के बाजे (मृदंग या घंटे) की आवाज़ में इतना मग्न हो जाता है कि उसे अपने प्राणों का भी ध्यान नहीं रहता। संत कहते हैं कि उस परमात्मा के नाम को कभी मत भूलना, यहाँ तक कि जब प्राण शरीर छोड़े, तब भी उसी नाम के साथ प्राण त्यागे।

प्रिय साधकजन,

· यह अमृतवेला भजन-सुमिरन का पावन समय है। सभी सज्जन सावधान होकर सुखासन में बैठें। शरीर को पूर्णतः शिथिल व सावधान कर लें। अपने आप को रिलैक्स कर लें। रीढ़ सीधी, शरीर स्थिर, पर शिथिल। स्थिरम् सुखं आसनम्।

· अब अपनी समस्त चेतना को भीतर की ओर मोड़ें। आँखें धीरे-से मूँद लें। शरीर के सभी अंगों को अडोल रखने का प्रयास करें—हाथ, पैर, गर्दन, सिर—सब शिथिल किंतु स्थिर।

· निश्चय ही मन स्वभाव से चंचल है, बंदर के समान उछलता हुआ। परंतु यह भी सत्य है कि अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है। आज हम यही निश्चय करते हैं।

· जैसे वह हिरण उस नाद में इतना खो जाता है कि उसे अपने शरीर, अपने भय, अपने अस्तित्व का भी ध्यान नहीं रहता—वैसे ही हम भी सत्य-नाम के सुमिरण में इतने मग्न हो जाएँ कि संसार के सारे संकल्प-विकल्प विसर्जित हो जाएँ।

ॐ शांति, शांति, शांति।

 


मई 2026

ध्यान-साधना—अंतर्यात्रा का मार्ग

स्वास पलक मां जात है, पलकहि मां फिर आउ ।

दूलन ऐसी स्वांस से, सुमिर-सुमिर रट लाउ ॥

            अर्थ—यह दोहा स्वांस-साधना और नाम-सुमिरन का महत्व बताता है। स्वांस जीवन का आधार है और यदि इसे ईश्वर-स्मरण से जोड़ दिया जाए, तो हर पल भक्ति में बीतने लगता है। जैसे एक प्रेमी अपने प्रियतम का नाम बार-बार दोहराता है, वैसे ही साधक को हर स्वांस के साथ सुमिरन (ध्यान) करना चाहिए।

साधकगण ! आज हम श्री सद् गुरुदेव महाराज जी के मार्गदर्शन में अंतर्यात्रा का अभ्यास प्रारंभ करेंगे। यह कोई बाहरी साधना नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे अक्षय आनंद को खोजने की प्रक्रिया है।

ध्यान की तैयारी

· सुखासन में बैठें, रीढ़ सीधी, हाथ गोद में शांत।

· नेत्र बंद करके भौंहों के मध्य ‘दिव्य प्रकाश’ का स्मरण करें।

· स्वांस को धीमा और गहरा करें—आवाज़ें, विचार, सभी बाहरी संवेदनाओं से धीरे-धीरे विरक्त हो जाएँ।

साधना का सार

जैसे सागर की गहराई में शांति छिपी होती है, वैसे ही हमारे भीतर शाश्वत शांति विद्यमान है। इस अभ्यास में—

मौन का पालन—मन को शब्दों से मुक्त करें।

दृष्टा भाव—विचारों को आते-जाते देखें, उनसे जुड़ें नहीं।

आत्मस्मरण—बार-बार अपने इष्ट का सजगता से स्मरण करें।

अंत में, गहरी स्वांस लेकर धीरे-धीरे नेत्र खोलें। स्मरण रखें—यह अभ्यास जीवन का अंग बने। जैसे दीपक की लौ हवा में भी स्थिर रहती है, वैसे ही मन संसार में रहकर भी अंतर्मुखी बना रहे।

 

 


अप्रैल 2026

सुमिरन ऐसा कीजिए, दूजा लखै न कोए ।
ओंठ न फरकल देखिए, प्रेम राखिए गोए ॥

                                                              गुरुमुख साधकजन  ! श्री सद् गुरुदेव जी श्री परमहंस दयाल जी द्वारा प्रदत्त सत्त-नाम, सार-शब्द अथवा अजपा नाम का सुमिरण अभ्यास आरंभ हो रहा है।

· सावधान होकर, एकाग्रचित्त होकर अभ्यास करें। मन को धीरे-धीरे अंतर्मुख करके नाम के प्रवाह में स्थिर करें।

· यह नाम-सुमिरन का अभ्यास मन की चंचलता को शांत करने की अद् भुत क्रिया है। जैसे बार-बार राग का अभ्यास करने से संगीतकार स्वतः सुरों में डूब जाता है, वैसे ही निरंतर नाम-जप से सुरति (चेतना) नाम में रमने लगती है।

· प्रारंभ में मन भटकेगा, किंतु धैर्य से पुनः-पुनः नाम का साथ दें। सुमिरन की गहराई वही जानता है जिसने प्रेमपूर्वक इसे अपनाया। होंठ न हिलें, किंतु हृदय में नाम की गूँज बनी रहे—यही सच्चा अजपा जप है। जैसे प्रेमी अपने प्रियतम का नाम बिना शब्द कहे भीतर-ही-भीतर दोहराता रहता है, वैसे ही इस अभ्यास में मन को डुबो दें।

अभ्यास का सार—

दृढ़ आसन में बैठे हुए शरीर को स्थिर रखें, आँखें बंद करके अंतर्दृष्टि को जागृत करें। मन में नाम का सतत प्रवाह बनाए रखें।

 

मार्च 2026

 (बाहरी ध्वनि के पार) 

गुरुमुख प्रिय आत्माओ !

            आज हम चलें उस मौन की ओर, जो हर बाहरी ध्वनि के पार है। हम सब जीवन की कोलाहल में इतने उलझ गए कि उस मौन की पुकार को सुन ही नहीं पाए।

·  अब समय है—भीतर उतरने का।

  शरीर को सहज रखें, आँखें मूंद लें। गुरुदेव को हृदय में आमंत्रित करें—वे जिनकी उपस्थिति में ही सब शोर शांत हो जाता है।

·  सुनें—अपने भीतर की ध्वनि।

  हृदय में एक अनोखा कंपन्न हो रहा है। वह न कोई शब्द है, न भाषा—वह चेतना की थिरकन है। जब मन भटके, तो बाहरी ध्वनि के पार जाने की इच्छा जगाएँ।·  उसके पार एक विशाल मौन है—जिसमें गुरुदेव की आत्मा आपकी आत्मा से एकाकार हो रही है। यह मौन केवल खामोशी नहीं—यह सबसे ऊँची ध्वनि है।

·  यहाँ कोई विचार नहीं टिकता, कोई इच्छा नहीं बचती। बस आप हैं और गुरुदेव हैं—एक ही चैतन्य की अनुभूति में।

·  जब आप आँखें खोलें, तो वह मौन आपके शब्दों में भी गूंजे। आपका जीवन उस बाहरी ध्वनि के पार की अनुभूति से भर जाए। यही मौन की सच्ची साधना   है—यही ध्यान का सार है।

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फरवरी 2026

(प्रकाश का कमल)

सहस्त्रदल कमल में बसे, सतगुरु के दरबार ।
मन को मारि भीतर चलो, तजि दे बाहर द्वार ॥

                         (परमसंत श्री कबीर साहिब जी)

प्रिय साधकजनो !

· सुख आसन में बैठें, आँखें धीरे से मूंद लें।
गुरुदेव के श्री चरणों में मन को अर्पित करें।

· धीरे-धीरे भ्रूमध्य में ध्यान केंद्रित करें, जहाँ हज़ार पंखुड़ियों वाले कमल का पुष्प बंद अवस्था में उपस्थित है।

· पहले हमारी सुरति बाहर की दुनिया में बिखरी रही, पर अब समय है कि हम सगुण साकार ध्यान के द्वारा उस कमल को प्रकाशित देखें।

· नियमपूर्वक ध्यान के अभ्यास के द्वारा जैसे-जैसे आपका ध्यान केंद्रित होता जाएगा वैसे-वैसे एक-एक करके कमल की पंखुड़ियाँ खिलती जाएँगी।

· हर पंखुड़ी पर एक गुण है—शांति, प्रेम, करुणा, विनम्रता आदि। सद्गुरुदेव की कृपा से यह सद्गुणों का कमल भी उज्ज्वल हो रहा है।

· ध्यान के अभ्यास में जब भी कोई विचार या विकार उत्पन्न होते हैं तो उन्हें शान्त मन से दृष्टा भाव से देखते जाएँ और उन्हें जाने दें, जिससे वे विकार जलते जाएँगे। फिर आप धीरे-धीरे सहस्त्रदल कमल का प्रकाश अपने भीतर देख पाएँगे।

· सहस्त्रदल कमल में ही सद्गुरु का सच्चा दरबार है। वहाँ पहुँचने के लिए मन को जीतना होगा और अपनी सुरति की तार नाम की तार से जोड़नी होगी।

· जब मन शद्ध होता है, सारे विकार हृदय से समाप्त हो जाते हैं, तब सहस्त्रदल कमल खिलता है और  तब उस कमल में सद्गुरु विराजमान होते हैं, जोकि परम शान्ति, परम आनन्द का अत्यन्त दुर्लभ नज़ारा है। इस नज़ारे के साक्षी बनने के लिए, अपने इष्टदेव से मिलन के लिए ही हम निरन्तर भजन-अभ्यास कर रहे हैं।

· यही आपकी आंतरिक मंज़िल की ओर बढ़ने का अभ्यास है, इसमें निरंतर उन्नति होती रहे। निरंतर आगे बढ़ते हुए अपना यह सच्चा कार्य सिद्ध कर लें।

 


जनवरी 2026

‘भीतर की बाँसुरी’

गुरुमुख साधको ! आज हम उस नाद की ओर चलें जो हमारे भीतर निरंतर गूँज रहा है, परंतु हम · उसे सुन नहीं पाए हैं।

· हमारी इंद्रियाँ बाहर के शोर में उलझी रहीं, अब समय है कि हम अंतर की मौन-संगीत की बाँसुरी को सुनें।

· आइए, अपनी आँखें धीरे से मूंद लें। सांस की गति पर ध्यान केंद्रित करें।

· हर स्वांस के साथ अनुभव करें कि आप अपने ही अंतःकरण की गहराई में भीतर उतरते चले जा रहे हैं।

· अब अपने गुरुदेव को स्मरण करें—वे जो इस जीवन-राग के सच्चे संगीतज्ञ हैं। देखें कि उनके कर-कमलों में एक दिव्य बाँसुरी है—जब वे उसे बजाते हैं, तो आपके मन के सारे विकार शांत हो जाते हैं।

· उस ध्वनि को अनुभव करें, जो कोई शब्द नहीं बोलती, पर सब कह जाती है। वह बाँसुरी आपके हृदय को झंकृत कर रही है, आपके अस्तित्व को गूंज से भर रही है।

· जो विचार भटकाएँ, उन्हें बाँसुरी की मधुरता में लीन होने दें। मन को पकड़ने की चेष्टा न करें— उसे सुनने दें, उस अनहद नाद को।

· धीरे-धीरे आप देखेंगे कि आपके भीतर मौन की एक गहराई जन्म ले रही है—वहाँ कोई चिंता, कोई दुःख टिक नहीं सकता। आप गुरुदेव की उस बाँसुरी के स्वर बन जाते हैं—लयबद्ध, कोमल और दिव्य।

· अब जब आप आँखें खोलें, तो यही नाद भीतर बना रहे। जीवन के हर कार्य में यही सुर लहराए।
यही भीतर की बाँसुरी है—जिसे सुनना ही सच्चा ध्यान है।

 


दिसम्बर 2025

(गगन मंडल में अनहद नाद-ध्वनि की यात्रा)
 
प्रिय साधको !
           ध्यान और साधना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि हम अपने भीतर उस अनहद नाद (निरंतर प्रवाहित होने वाली दिव्य ध्वनि) को सुन सकें। संतों ने इसे ‘अमृत की धारा’ कहा है, जो आत्मा को गगन मंडल की ओर ले जाती है। संत रविदास जी का कथन है—
अनहद बाजे शब्द सुहावा ।
गगन मंडल में होय समाना ।
जहँ तक पहुँचे संत सुजान ।
तहाँ मिले अविनाशी धाम
गगन मंडल में होय समाना ।
जहँ तक पहुँचे संत सुजान ।
तहाँ मिले अविनाशी धाम ॥

· मौन की साधना—मौन धारण करें और मन को विचारों के भार से मुक्त करें। ध्यान एक शांत वातावरण में करें।
· आत्मिक केंद्र—अपनी चेतना को भृकुटी के मध्य में स्थिर करें। वहाँ एक विशेष कंपन का अनुभव होगा।
· आंतरिक श्रवण—बाहरी ध्वनियों से अलग, एक आंतरिक ध्वनि सुनाई देने लगेगी। यह घंटा, शंख, वीणा या किसी दिव्य संगीत जैसी प्रतीत हो सकती है।
· इस ध्वनि में विलीन होना—इस ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करने से मन सहज रूप से समाधि की ओर बढ़ता है। धीरे-धीरे आत्मा गगन मंडल के प्रकाश और ध्वनि में लीन हो जाती है।
· यह अनुभव ही वास्तविक शांति और आत्मिक जागृति का द्वार खोलता है। जो साधक इस प्रक्रिया को धैर्य और श्रद्धा के साथ अपनाते हैं, वे एक दिन उस परमधाम के निवासी बन जाते हैं।
    अतः इस साधना को जीवन का एक अनिवार्य अंग बनाइए और गगन मंडल की यात्रा को आरंभ कीजिए। आत्मा के मूल घर का द्वार खुलने की प्रतीक्षा कर रहा है !


 

नवम्बर 2025

 

गगन मंडल की ओर—अंतर्यात्रा का आमंत्रण

प्रिय साधको !

संत महात्माओं ने सदा इस शरीर को अस्थायी और आत्मा को शाश्वत बताया है। हमारी आत्मा अनंत आकाश में विचरण करने वाली चैतन्य सत्ता है, परंतु यह माया के कारण अपने मूल स्वरूप को भूल गई है। संत कबीर इसी सत्य को प्रकट करते हैं—

मन माया के फेर में, भूला निज आधार ।
गगन मंडल में जो बसे, उन पर कृपा अपार ॥

· गगन मंडल की यात्रा आत्मा की घर-वापसी है। यह बाहरी नहीं, आंतरिक यात्रा है, जहाँ साधक परम शांति और आनंद को प्राप्त करता है।

·  ध्यान की विधि—

Þ स्थिरता—सुखासन या किसी आरामदायक स्थिति में बैठें। शरीर को पूर्ण विश्रांति दें।

Þ मन को निर्मल बनाना—गहरी स्वांस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। इस प्रक्रिया से विचारों का प्रवाह मंद होने लगता है।

Þ ध्यान का केंद्र—अपने चित्त को आज्ञा चक्र (भृकुटी के मध्य) पर केंद्रित करें।

Þ नाम-सुमिरन—मन में ईश्वर के पावन नाम का स्मरण करें। यह नाम आपकी आत्मा को गगन मंडल की ऊँचाइयों तक ले जाएगा।

Þ आत्मिक दर्शन—धीरे-धीरे ध्यान के गहरे स्तरों में प्रवेश करें। जब मन एकाग्र होता है, तब आत्मा उस दिव्य प्रकाश और ध्वनि का अनुभव करती है, जो गगन मंडल में प्रवाहित हो रही है।



अक्टूबर 2025

 

गगन मंडल की यात्रा—आत्मिक शांति

॥ दोहा ॥

गगन मंडल में रमि रहा, गलताना महबूब ।
वार पार नहिं छेव है, अविचल मूरत खूब ॥

· प्रिय हमराही साधको ! संत गरीबदास जी की वाणी में वह गहरा रहस्य छिपा है जो आत्मा को उसके मूल स्रोत तक ले जाता है।

· यह गगन मंडल वह आंतरिक आकाश है, जहाँ प्रीतम प्रभु अपनी अविचल और सुंदर मूरत में विराजमान है।

· अब प्रभात की यह अमृतवेला उस आंतरिक आकाश की यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त समय है। जब सारी सृष्टि निद्रा में लीन हो, तब साधक जागृत होकर उस महबूब से मिलने का प्रयास करे।

 

ध्यान की प्रक्रिया

1. शारीरिक शिथिलता—शरीर को आराम दें। बैठने की मुद्रा ऐसी हो कि आप लंबे समय तक बिना थकान के ध्यान कर सकें।

2. मन का संतुलन—मन को शांत करने के लिए कुछ गहरे श्वास लें। फिर धीरे-धीरे अपने प्रीतम के स्वरूप का चिंतन शुरू करें।

1. नाम का आधार—उस पावन नाम को आधार बनाएँ। हर स्वांस के साथ नाम को गगन मंडल में गूँजने दें।

2. एकाग्रता का अभ्यास—यदि मन भटके, तो उसे प्रेम और धैर्य के साथ वापस लाएँ। भृकुटी मध्य पर ध्यान केंद्रित करें, जहाँ वह अविचल मूरत प्रकट होती है।

3. प्रभात में साधना करने वाले ऋषियों की ऊर्जा आपके इस प्रयास को और सशक्त बनाती है। इस अभ्यास से साधक उस शाश्वत शांति को प्राप्त करता है, जो गगन मंडल में बसी है।

 



 

सितम्बर 2025

सहजो नौका नाम है, चढ़ि के उतरौ पार ।
नाम सुमिर जान्यो नहीं, ते डूबे मंझधार ॥

संसार एक सागर के समान है, यह सागर मनुष्य के आगे मन के रूप में है। इससे पार जाने के लिए प्रभु-नाम एक नौका है, इस पर चढ़ो और पार उतर लो अन्यथा प्रभु नाम भुला देने से तो डूबना तय है। 

नाम-सुमिरण और भजन-अभ्यास के लिए प्रारंभिक निर्देश श्रवण कर मन को एकाग्र कीजिए—

· सबसे पहले एक शांत और अबाधित स्थान चुनें। सुखासन या पद्मासन में बैठें। दोनों आँखें कोमलता से बंद करें।

· सम्पूर्ण शरीर को ढीला छोड़ दें, अब अपनी स्वांसों की गति पर ध्यान केंद्रित करें।

1. दृढ़ संकल्प—प्रिय गुरमुखो ! इन अमृत पलों को नाम-सुमिरण के लिए समर्पित करें। दृढ़ संकल्प के साथ अन्य सभी विचारों को मन से दूर रखने का आदेश दें।

2. नाम मंत्र का जाप—सुजान साधको ! उक्त वाणी में वर्णित ‘नाम’ मंत्र को बार-बार दोहराना शुरू कर दें। नाम मंत्र को बार-बार दोहराना ही भजन-अभ्यास है।

3. मन की चंचलता—यह स्वाभाविक है कि मन भटकने लगेगा क्योंकि यह उसकी प्रकृति है। हमने साधना के द्वारा इस चंचल प्रकृति को बदलकर स्थिर व शांत प्रकृति बनाना है।

4. जब मन बाहर के अन्य विषय पर जाए तभी धीरे से उसे नाम मंत्र के जप में लगाएँ। बार-बार अभ्यास करते रहने से मन धीरे-धीरे एकाग्र होने लगेगा।

5. जन्म का उद्देश्य—याद रखें, यह मानव जीवन हमें नाम-जप के लिए मिला है। यह हमारा जन्मजात अधिकार और कर्तव्य भी है।

6. नाम का महत्व—नाम ही वह अमृत है जो जीवन को अर्थ देता है। यह ही वह पूंजी है जो हमारे साथ हमेशा रहेगी।

7. अंतर्मन की यात्रा—मन रूपी सागर से पार जाने अर्थात् इसे शांत व स्थिर करने के लिए नाम जपना जारी रखें। यह अपने ही अंतर्मन की यात्रा दृढ़ता से तय करनी है।

8. विचारों का प्रवाह—विचारों को आने दें, लेकिन उनमें उलझें नहीं। बस उन्हें निष्क्रिय दर्शक की तरह देखें और फिर ध्यान को नाम मंत्र पर केंद्रित करें।

9. सकारात्मक भावनाएँ—नाम जप के साथ-साथ सकारात्मक भावनाओं को भी विकसित करें। प्रेम, करुणा, क्षमा जैसे गुणों को अपने हृदय में जागृत करें।

10.  अंत—धीरे-धीरे जाप की गति को कम करें और फिर आँखें खोलें। कुछ पल शांत बैठें और इस अनुभव को महसूस करें।

अगस्त 2025

॥ दोहा ॥

सुंदर अंदर पैठि कर, दिल में गोता मार ।
तो दिल ही में पाइए, साईं सिरजनहार ॥

           संत सुंदरदास जी भजन-अभ्यास की युक्ति वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि अपने प्रियतम के दिव्य रूप का दर्शन करना है तो दिल में अर्थात् घट भीतर गोता लगाओ, तब वह सिरजनहार प्रभु अंदर ही मिल जाएँगे।

प्रिय साधको !

· इस क्रियात्मक भजन-अभ्यास में हम आत्म-चिंतन और भीतर के परमात्मा की खोज का मार्ग अपनाएंगे। संत सुंदरदास जी कहते हैं कि अपने दिल में उतरकर ही सच्चे ईश्वर का अनुभव किया जा सकता है। यह परमात्मा बाहरी जगत् में नहीं, बल्कि हमारे हृदय के भीतर विद्यमान है।

 · भीतर की ओर यात्रा आरंभ करें—प्रिय जिज्ञासु ! अपने भीतर की ओर यात्रा आरंभ करने के लिए, पहले अपने ध्यान को अंदर की ओर मोड़ें। संत रविदास जी बताते हैं कि जैसे ही हम अपने प्रियतम का दर्शन करते हैं, हमारे हृदय में अपार प्रकाश फैल जाता है और मन आनंदित हो जाता है।

· स्वांसों पर ध्यान दें—हे साधकगण ! इस दिव्य यात्रा की शुरुआत आपकी स्वांसों की गति पर ध्यान देने से होगी। अपनी स्वांसों को विशेष रूप से देखना ही विपश्यना ध्यान है। जब आप अपनी  स्वांसों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो एक प्राकृतिक मंत्र ध्वनि का अनुभव होगा। यह ध्वनि आपकी सुरति को ऊपर उठाने में सहायक होगी।

· अजपा-जप का अभ्यास—प्रिय साधकगण ! अब हम अजपा-जप का अभ्यास करेंगे। आप सब एक आरामदायक आसन में बैठ जाएँ और अपने मन को इस जप में एकाग्र करें। इस अभ्यास में स्वांस, शब्द और सुरति को एक साथ लाना होगा।

· दृढ़ संकल्प लें—प्रिय जिज्ञासुओ ! आप सब दृढ़ संकल्प लें कि इस अभ्यास को नियमित रूप से करेंगे और जीवन के अंतिम स्वांस तक इसे जारी रखेंगे। यही अभ्यास आपको भीतर के दिव्य आनंद और शांति की ओर ले जाएगा।

· निष्कर्ष—हे प्रिय साधक मंडली ! यह भजन-अभ्यास आत्म-विकास और परम शांति की प्राप्ति का मार्ग है। इसके अभ्यास से आप अपने भीतर ही परमात्मा का अनुभव कर सकेंगे। अभ्यास ही सब कुछ है। अभ्यास से ही महान् आनंद की अनुभूति प्राप्त कर सकेंगे। अब, प्रसन्नतापूर्ण मन से इस दिव्य यात्रा में आगे बढ़ने के लिए तत्पर हो जाइए और सुमिरण का अभ्यास एकाग्रता से जारी कर दीजिए।



जुलाई 2025

सकल बिआपी सुरति में, मन पवना गहि राख ।
रोम-रोम धुनि होत है, सतगुरु बोले साख ॥
                       (संत गरीबदास जी)
गुरुमुख सज्जनो ! आज हम अपनी भीतरी यात्रा का आरंभ करने जा रहे हैं।  हमारी सुरति बाहर बहुत भटक ली। अब समय आ गया है कि हम अपनी काया के भीतर वह अनमोल मणि खोजें, जिसका प्रकाश असीम आनंद दे सकता है।
· सबसे पहले हम अपने सद् गुरु को स्मरण करते हैं, जो हमारे भीतर के अंधकार को मिटाने वाले हैं।
· अपनी दोनों आँखें कोमलता से बंद कर लें और गुरुदेव को हृदय-मंदिर में विराजमान करें।
· अनुभव करें कि गुरुदेव एक दिव्य ज्योति के समान हैं, जिनकी प्रकाश-रश्मियाँ आपके अंतर्मन को प्रकाशित कर रही हैं।
· अब धीरे-धीरे अपनी चेतना को दोनों नेत्रों के मध्य, ऊपर हृदय स्थल पर ले आइए।
· मन की समस्त वृत्तियों को प्राण पवन में उठने वाली धुनि में रमण करने दें।
· जब भी कोई विचार आपको भटकाने लगे, उसे मणि–दीपक रूपी गुरुदेव की पावन छवि में देखते हुए जाने दीजिए।
· फिर से अपनी चेतना गुरुदेव के स्मरण और हृदय-कमल के प्रकाश पर ले आइए।
· भीतर का प्रकाश धीरे-धीरे संपूर्ण पिंड और ब्रह्मंड में व्याप्त होता हुआ महसूस करें।
· इस प्रकाश में आप हर प्रकार की नकारात्मकता को जलती हुई देखें और उसकी राख बाहर उड़कर लुप्त होती हुई देखें।
· कुछ समय तक इस दिव्य आनंद में डूबकर स्थिर रहें। जब आप आँखें खोलें, तो अपने भीतर की शांति और प्रकाश को बाहर भी महसूस करते रहें।
· यही भीतरी यात्रा का आरंभ है; इसे नित्य जारी रखें। धीरे-धीरे यह प्रकाश आपके जीवन को अभूतपूर्व सुख-शांति से भर देगा।



जून 2025

गगन मंडल पिअ रूप सों, कोट भान उजियार ।
रविदास मगन मनुआ भया, पिया निहार-निहार ॥

· संत रविदास जी भजन-अभ्यास की परम आनन्द अवस्था का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अपने प्रियतम के दिव्य रूप का दर्शन मैंने अपने ही घट भीतर किया है।

वह परमात्मा कहीं बाहर नहीं है, उसका निवास एकमात्र अपने ही घट भीतर अंतर्मन में है। अतः· उसकी खोज भी अंतर्मन में ही करनी चाहिए। आगे संत रविदास जी कहते हैं कि उस परम प्रियतम का दर्शन करते ही मेरे हृदय आकाश में करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान प्रकाश हो गया और उसे देखकर मन मग्न हो गया अर्थात् महान् परम आनन्द सब ओर छा गया तथा मन की समस्त व्यथा मिट गई।

· गुरुमुख साधक मंडली ! गुरु रविदास जी के द्वारा वर्णन किया गया दिव्य मंडल और दिव्य स्थान हमारे अपने भीतर घट में ही विद्यमान है, इसको पाने के लिए कहीं ऊपर के आकाश में जाने की आवश्यकता नहीं।

· अब घट भीतर के दिव्य गगन मंडल में पहुँचने की यात्रा आरंभ हो रही है। यह अति महान् और परम कल्याणकारी मंगलमय यात्रा है। अतः प्रसन्नतापूर्ण मन से इस दिव्य यात्रा के लिए तत्पर हो जाएँ।

· यह आंतरिक यात्रा हमारी काया में संचालित स्वांसों से आरंभ होती है, हमें अपनी स्वांसों की गति को विशेष रूप से देखना है, स्वांसों को विशेष रूप से देखना विपश्यना ध्यान है। यही सत्य का सीधा अनुभव कराता है।

· स्मरण रहे कि जैसे ही हम अपने स्वांसों की विशेष ध्वनि को सुनेंगे तो इसमें एक प्राकृतिक मंत्र ध्वनि उठती हुई अनुभव होगी। इस ध्वनि के सहारे अपनी सुरति को ऊपर उठाना है।  

· इस अमृतवेला में यही महान् कार्य सिद्ध करने के लिए अथवा आंतरिक यात्रा आरंभ करने के लिए सब साधक एकत्र हुए हैं। अतः स्वांस, शब्द और सुरति को एक बनाने का अजपा जाप अभ्यास करना है।

अभ्यास के लिए एक अडोल सुख आसन में बैठकर बड़ी ही रुचिपूर्वक उक्त अजपा जाप में संलग्न हो जाइए। यह अभ्यास नित्य और निरंतर करते रहें और दृढ़ संकल्प कर लें कि मैं अपने जीवन के अंतिम स्वांस तक यह अभ्यास जारी रखूँगा।  


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