बुद्धपुरुषों के जीवन प्रसंग

  बुद्धपुरुषों के जीवन प्रसंग 

  

अप्रैल 2026

(धम्मपद विवेचन)

 

भगवान बुद्ध द्वारा उच्चारित धम्मपद श्लोकों पर व्याख्या की जा रही है—

सुभाषुजीर्विः विहरन्तः, इन्द्रियेऽपि असंयुताः
भोजनं चामतज्ञं, कुसंसीं हीनवीर्याः
तं वे पङ्कसहितं मारो, वातो रुक्षंव दुब्बलं

मन को लुभावनी लगने वाली चीज़ों को ही शुभ समझकर विहार करने वाले, इन्द्रियों में संयम न रखने वाले, भोजन की मात्रा का ध्यान रखे बिना खान-पान करने वाले अज्ञानी, आलसी और उद्योगहीन को बुरी प्रवृत्ति ऐसे सताती है जैसे दुर्बल वृक्ष को तेज पवन।

अशुभाभुजिर्विः विहरन्तः, इन्द्रियेऽपि संयुताः ।
भोजनस्निग्ध च मन्तज्ञं, सदा आरब्धवीर्यं ।
तं वे नपङ्कसहितं मारो, वातो शैलं पल्लवं ॥

अशुभ को अशुभ जान कर केवल उपयुक्त रसों का उपयोग करने वाले, इन्द्रियों में संयम रखने वाले, भोजन की मात्रा को जानकार ग्रहण करने वाले, श्रद्धावान और उद्योगरत को बुरी प्रवृत्ति उसी प्रकार नहीं डिगा सकती जैसे कि वायु शैल पर्वत को।

एक बौद्ध प्रेरक कथा

बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध राज्य में एक बोधिसत्व (जो भविष्योन्मुख बुद्ध होते हैं) राजा के रूप में जन्मे। उनका नाम शांतिवर्धन था। उनका राज्य वैभव, ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं से भरपूर था। पाँचों इन्द्रिय विषय—रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द—उनके जीवन में भरपूर मात्रा में उपलब्ध थे। राजसी भोजन, संगीत, रत्न जड़ित आभूषण, सुंदर रानियाँ और राजसी शैय्या—सब कुछ उन्हें प्राप्त था।

परंतु उनके हृदय में एक प्रश्न बार-बार उठता—क्या यही वास्तविक सुख है ? क्या ये क्षणिक विषय-वासनाएँ ही जीवन का परम उद्देश्य हैं ?

एक दिन महल के झरोखे से सहज ही बुद्ध की तरह राजा ने देखा कि एक वृद्ध रोगी रोग से तड़प रहा है। तब उनके मन में वैराग्य जगा। उन्होंने राज दरबार के विद्वानों से प्रश्न किया—क्या संसार के इस दु:ख का कोई अंत है ? एक संतसेवी विशेष विद्वान ने उत्तर दिया—राजन्, संयम, साधना और ध्यान के द्वारा मन व इन्द्रियों पर संयम कर लेने पर कुछ संभव है।

तभी राजा ने दृढ़ संकल्प कर लिया—मैं इन पाँच इन्द्रिय सुखों को छोड़कर उस परम शांति की खोज करूगा, जो नश्वर नहीं है, जो शाश्वत है।

राजा ने धीरे-धीरे मन को संसार से उपराम कर लिया और राज्यभार अपने जेष्ठ पुत्र को सौंपकर वन में भजन तप करने चले गए। वे वहाँ एक बोधिसत्व भिक्षु से मिले और उनकी आज्ञानुसार चिरकाल तक भजन तप किया। संयमित जीवन अपनाते हुए दिन में एक वृक्ष के नीचे कुटी बनाकर नियमित ध्यान करते रहे।

अंततः जब उन्होंने अपने मन, वासना और इन्द्रियों को वश में कर लिया, तब एक दिन ध्यान में उन्हें आत्म-बोध हुआ, दिव्य ज्योति दर्शन के रूप में। तब उन्होंने सबको बताया—सच्चा सुख इन्द्रिय-विषयों में नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धि, करुणा और ज्ञान में है।

इस प्रकार वह भिक्षु बोधिसत्व शांतिवर्धन बना, अब वे केवल एक त्यागी संन्यासी ही नहीं बल्कि वे सत्य के ज्ञाता बन गए थे। वे लोगों को शिक्षा देने लगे कि—

इन्द्रिय सुख वह पवन है, जो मन रूपी दीपक को डगमगाता है। संयम वह पात्र है जो दीपक को स्थिर करता है, जिससे आत्म-प्रकाश फैले।

कथा की शिक्षा

यह कथा उपनिषदों और बौद्ध-दर्शन दोनों की मूल भावना को दर्शाती है सच्चा सुख आत्म-नियंत्रण, संयम और आत्म-ज्ञान में है, न कि बाह्य सुख-साधनों में। बोधिसत्व का यह त्याग और संयम हमें भी प्रेरित करता है कि हम जीवन के असली लक्ष्य की ओर अग्रसर हों, चाहे वह निर्वाण हो या ब्रह्म-ज्ञान।

संत चरणदास जी ने उक्त शिक्षा को इस प्रकार वर्णन किया है—

 दोहा ॥

जो इन्द्रिन के बसि भयो, पावै न आनन्द ।
बार बार जग माँहि हीं, छूटै न संबंध ॥
भक्ति मांहि चित्त ना लगै, सबहि बिगड़ैं काम ।
जो इन्द्रिन के बस भयो, ताको मिलै न राम ॥
चरनदास यूं कहत हैं, इन्द्री जीतन ठान ।
जग भूलै हरि कूं मिलै, पावै पद निर्बान ॥

अर्थात् इन्द्रिय दासता का दुखद परिणाम—जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के वश में हो जाता है, वह न तो सच्चा आनन्द पाता है, न ही संसार के बार-बार के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो पाता है। उसका संसार से मोह कभी छूटता ही नहीं।

इन्द्रिय-वशीकरण के अभाव में मन भक्ति में नहीं लगता, सभी आध्यात्मिक प्रयास विफल होते हैं, और ऐसा व्यक्ति ईश्वर की प्राप्ति से वंचित रह जाता है।

संत चरनदास जी सिखाते हैं कि इन्द्रियों को जीतने का दृढ़ संकल्प करके ही संसार के मोह को भुलाया जा सकता है, इसी से ईश्वर की प्राप्ति होती है और मुक्ति (निर्वाण) का पद मिलता है।

पौराणिक काल में एक प्रतापी राजा ययाति थे, जो अपने तप और पराक्रम के लिए विख्यात थे। एक श्राप के कारण उन्हें असमय वृद्धावस्था आ गई। तब उन्होंने अपने पुत्रों से यौवन का आदान-प्रदान करने का प्रस्ताव रखा। सबसे छोटे पुत्र पुरु ने पितृ-भक्ति में अपना यौवन उन्हें दे दिया।

राजा ययाति पुनः युवा होकर वर्षों तक इन्द्रिय भोगों में डूबे रहे। उन्होंने अपार वैभव, सुख और कामनाओं की पूर्ति की। किन्तु एक दिन, जब वे स्वयं से प्रश्न करते हैं, तो पाते हैं कि इन वर्षों के भोग से भी उनकी इच्छाएँ और तृष्णाएँ बिल्कुल भी शांत नहीं हुईं, बल्कि और अधिक प्रबल हो गई हैं। वे थककर, खालीपन अनुभव करते हुए गुरु शुक्राचार्य के पास पहुँचे।

शुक्राचार्य ने उन्हें सत्य का उपदेश दिया हे राजन ! इन्द्रियाँ अतृप्त हैं। जो इनके वश में होता है, वह कभी परितृप्त नहीं होता। आनन्द तो इन्द्रियों को वश में करके, मन को हरि में लगाने से मिलता है।

उन्होंने राजा ययाति को समझाया कि इन्द्रियाँ बाहर की ओर भागती हैं और विषय-वासनाओं में फँसाती हैं, जिससे मनुष्य बार-बार जन्म-मृत्यु के बन्धन में पड़ता रहता है। भोग से तो इच्छाएँ और बढ़ती हैं, जैसे आग पर घी डालने से अग्नि और अधिक प्रज्वलित होती है।

अब ययाति को ज्ञान प्राप्त हुआ। फिर तो उन्होंने अपने पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटा दिया और स्वयं वन में तपस्या करने में लग गए। यह कथा स्पष्ट करती है कि इन्द्रिय-सुखों की पिपासा कभी नहीं बुझती। जो इन्द्रिन के बसि भयो, पावै न आनन्द—ययाति का अनुभव इसी सत्य का प्रमाण है। सच्चा सुख और ईश्वर-प्राप्ति केवल इन्द्रिय-निग्रह और मन की अंतर्मुखता से ही संभव है, जैसा कि सभी संतों का उपदेश है। जिसे भी परम शान्ति की इच्छा हो उसे प्रभु के सुमिरण में सदा संलग्न रहना चाहिए। की पूर्ति की। किन्तु एक दिन, जब वे स्वयं से प्रश्न करते हैं, तो पाते हैं कि इन हज़ारों वर्षों में उनकी इच्छाएँ और तृष्णाएँ बिल्कुल भी शांत नहीं हुईं, बल्कि और अधिक प्रबल हो गई हैं। वे थककर, खालीपन अनुभव करते हुए गुरु शुक्राचार्य के


पास पहुँचे।

शुक्राचार्य ने उन्हें वही उपदेश दिया जो चरनदास जी की 

मार्च 2026

(धम्मपद)

वैर को नहीं मिटाता वैर 

भगवान बुद्ध के वचन हैं—

न हि वेरेण वेराणि, सम्मन्तीध कुदाचन् ।
अवेरेण च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो ॥

परं च न विजानन्ति, मयमेत्थ यमामसे ।
ये च तत्त्थ विजानन्ति, ततो सम्मन्ति मेधगा ॥
                   (धम्मपद)

  बुद्ध के वचनों में जो गहराई है, वह किसी विशाल समुद्र से कम नहीं। उपरोक्त दोनों श्लोकों में केवल दो-दो पंक्तियाँ हैं, लेकिन इनके भीतर संपूर्ण जीवन-दर्शन समाया हुआ है। ये शांति, क्षमा और जागरूकता के ऐसे सूत्र हैं जो जीवन के प्रत्येक संघर्ष, द्वंद्व और दुःख का समाधान करते हैं।

वैर से वैर कभी नहीं मिटता

  प्रथम श्लोक में बुद्ध यह गूढ़ सत्य प्रकट करते हैं कि संसार में कोई भी वैर, वैर से शांत नहीं होता। यदि कोई हमें क्रोध से देखे और हम उसे क्रोध से उत्तर दें, तो यह केवल अग्नि पर घी डालने जैसा है। आग और अधिक भड़केगी, शांति तो कोसों दूर भाग जाएगी। लेकिन यदि हम उस वैर को अवैर से, अर्थात् प्रेम, क्षमा और सहानुभूति से उत्तर दें—तब वह वैर अपने आप शांत हो जाता है।

  बुद्ध का यह कथन केवल नैतिक उपदेश नहीं है, यह व्यावहारिक जीवन का मार्गदर्शन भी है। संसार में जब-जब किसी ने वैर का उत्तर वैर से दिया, परिणाम विनाश ही हुआ। रामायण में रावण ने अपने अपमान का बदला अपहरण से लिया और परिणाम स्वरूप उसका कुल नष्ट हो गया। महाभारत में दुर्योधन ने पांडवों से ईर्ष्या रखी और उस ईर्ष्या ने महायुद्ध को जन्म दिया।

वास्तविक ज्ञान—मृत्यु की स्मृति

  दूसरे श्लोक में बुद्ध एक और महत्वपूर्ण सत्य उद् घाटित करते हैं—जो लोग यह नहीं जानते कि हम मृत्यु के पथ पर हैं, वे झगड़ते रहते हैं। पर जो यह समझ लेते हैं, उनके भीतर से क्लेश मिट जाते हैं।

  यह कथन हमें जीवन की क्षणभंगुरता की याद दिलाता है। हम दिन-रात छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए लड़ते रहते हैं—घर, धन, मान-सम्मान, अहंकार  लेकिन यह सब कुछ उसी क्षण व्यर्थ हो जाता है जब मृत्यु सामने आ खड़ी होती है। वह कोई भेदभाव नहीं करती। न राजा बचता है, न रंक।

जीवन को दृष्टि दो, दृष्टिकोण बदलो

  आज के युग में, जहाँ मनुष्य तनाव, क्रोध और आत्म केंद्रित सोच में फंसा हुआ है, इस शिक्षा की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

कहानी अंतिम यात्रा की स्मृति

  राजवीर नाम का युवक एक गाँव का साधारण किसान था। वह हमेशा दूसरों की तरक्की देखकर जलता, झूठे दावों से लोगों को धोखा देता और ईर्ष्या में डूबा रहता। एक दिन, गाँव में एक साधु आए, जो हर किसी से एक ही बात कहते—यह शरीर नश्वर है, एक दिन जाना है।

  राजू ने साधु की बात को हँसी में उड़ा दिया, लेकिन रात को सोते समय वह बात उसके मन में घर कर गई। अगले दिन, जब वह खेत में काम कर रहा था, तभी अचानक आकाश में काले बादल छा गए। बिजली चमकी और एक ज़ोरदार गर्जना के साथ पेड़ का एक टुकड़ा उसके पास गिरा। राजू की साँसें थम गईं—वह मौत को इतना करीब से देखकर काँप उठा।

  उसी पल, साधु की बात उसे फिर याद आई—एक दिन जाना है। उसने सोचा, अगर आज मेरी मृत्यु हो जाती, तो मेरी ईर्ष्या, द्वेष और धोखेबाजी का क्या मतलब रह जाता ?

  उस दिन के बाद राजू बदल गया। उसने लोगों से माफ़ी माँगी, ईमानदारी से काम करना शुरू किया और दूसरों की मदद करने लगा। गाँव वाले हैरान थे, लेकिन राजू जानता था कि जीवन एक यात्रा है और इस यात्रा में प्रेम और सच्चाई ही साथ देते हैं। एक शाम, जब वह नदी किनारे बैठा था, तो उसने साधु को फिर देखा। साधु मुस्कुराए और बोले, अब तुम समझ गए हो—जो ‘जाना है’ को जान लेता है, वह हर पल को पवित्र बना लेता है।

 

 

 Q

 

फरवरी 2026

(धम्मपद विवेचन)

 

वैर की गांठ और शांति का मार्ग—

धम्मपद के निम्नलिखित दो श्लोक इस विषय पर अत्यंत मार्मिक और गूढ़ संदेश देते हैं—

अक्कोच्छं अवधिं मं, अजिनिं मं अहासि मे ।
ये च तं उपनन्दन्ति, वेरे तेसं न सम्मति

अक्कोच्छं अवधिं मं, अजिनिं मं अहासि मे ।
ये च तं न उपनन्दन्ति, वेरे तेसूपसम्मति

भावार्थ—
उसने मुझे गाली दी, उसने मुझे मारा, उसने मुझे हराया, उसने मुझे लूटा’–जो लोग इस प्रकार की बातें सोचते रहते हैं, उनका वैर कभी समाप्त नहीं होता। लेकिन जो इस प्रकार की बातों को नहीं पालते, उनके द्वेष समाप्त हो जाते हैं।

यहाँ बुद्ध कह रहे हैं कि वैर से वैर शांत नहीं होता, वैर केवल क्षमा से, समझ से और त्याग से शांत होता है। यही बौद्ध धर्म का मूल संदेश है—‘मित्तं करोथ मावेरं’—‘मैत्री करो, वैर मत पालो’।

मनुष्य के जीवन में अपमान, पीड़ा, लूट और हार जैसे अनुभव आम हैं। कोई हमें शब्दों से चोट पहुँचाता है, कोई हमारे प्रयासों को व्यर्थ कर देता है और कोई हमारे अधिकारों को छीन लेता है। ऐसे क्षणों में मन में द्वेष और प्रतिशोध का बीज अंकुरित हो जाता है। लेकिन क्या यही जीवन का मार्ग है ? क्या वैर की इस अग्नि में जलते रहना ही मनुष्य का धर्म है ? या फिर कोई और रास्ता भी है जो हमें शांति की ओर ले जाए ?

अहंकार का भार और द्वेष की गाँठ

इस संसार में जितना बड़ा किसी का अहंकार होता है, उतनी ही जल्दी वह आहत होता है। जब कोई हमें गाली देता है या अपमानित करता है, तो वह केवल शब्द होते हैं—लेकिन यदि हमारा मन उन्हें अपने ‘अहं’ पर ले लेता है, तो वे हमें भीतर से जला देते हैं। यही वैर की गाँठ बन जाती है। बुद्ध कहते हैं, यह गाँठ जितनी पुरानी होती जाती है, उतनी ही गहरी होती जाती है। यही कारण है कि कुछ लोग वर्षों पुरानी बातों को आज भी नहीं भूल पाते। वे अपने ही मन के बंदी बन जाते हैं।

मन की गाँठें और बंधन

हमारे श्लोकों में गाँठ बाँधना’ एक अत्यंत गहन प्रतीक है। जब कोई हमें अपमानित करता है और हम उस स्मृति को मन में बांध लेते हैं, तो हम असल में स्वयं को उस अपमान से बाँध रहे होते हैं। यह गाँठ हमें शांति नहीं लेने देती, हमें नींद नहीं लेने देती और न ही सच्ची करुणा को जन्म लेने देती है।

जो मन इन गाँठों को खोल देता है—क्षमा कर देता है, समझ लेता है कि संसार दु:ख से भरा है और सबकी अज्ञानता ही उनके पापों की जड़ है, वह मन मुक्त हो जाता है। वह न वैर करता है, न द्वेष पालता है।

धम्मपद के श्लोक में कहा गया है—यदि हम गाली, अपमान, हार, या पीड़ा को ग्रहण ही न करें, तो वह हमें बांध नहीं सकती।

वैर की समाप्ति—एक आंतरिक साधना

बुद्ध ने कहा—वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता। हम सोचते हैं कि अगर हमने किसी का बदला ले लिया, तो हमें शांति मिलेगी। लेकिन होता इसका उल्टा है—बदला, बदले की नई श्रृंखला को जन्म देता है। क्षणिक तुष्टि के बाद पछतावा, अकेलापन और एक नई गाँठ बन जाती है।

जो मन इन बातों को छोड़ देता है—‘मुझे मारा’, ‘मुझे लूटा’—वह हल्का हो जाता है। वह उस पंछी की तरह होता है जो आकाश में उड़ता है और अपने पीछे न कोई पद्चिन्ह छोड़ता है, न किसी बंधन को।

इन दोनों श्लोकों में बुद्ध ने जो उपदेश दिया है, वह केवल बौद्ध धर्म नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए है।

जो अपमान, पराजय और पीड़ा को हृदय में बाँधते हैं, वे कभी शांत नहीं हो सकते। लेकिन जो इन बातों को नहीं पकड़ते, जो क्षमा और करुणा को अपनाते हैं—वे ही सच्चे विजेता हैं।

बुद्ध का जीवन, उनके शिष्य और बौद्ध साहित्य इस बात के हज़ारों प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि वैर, क्रोध और द्वेष से कभी मुक्ति नहीं मिलती। मुक्ति केवल एक मार्ग से मिलती है—‘वैर त्याग कर, क्षमा अपनाकर, करुणा के पथ पर चल कर’।

 

 


 


जनवरी 2026

 

            कैवल्योपनिषद में कथन है—

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानुशः ॥

  अर्थ—न कोई कर्म से, न संतान से और न ही बहुत अधिक धन से अमृतत्व को पाता है, मुक्ति के लिए तो त्याग के अतिरिक्त अन्य कोई साधन है ही नहीं। कैवल्य पद तो केवल त्याग से ही संभव है।

  कैवल्योपनिषद में महर्षि अश्वलायन का ब्रह्मा जी से मोक्ष पर संवाद है। इस उपनिषद के उक्त वचनों का सीधा और सरल अर्थ है कि मोक्ष या अमरता को केवल त्याग से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है कि आंतरिक मुक्ति बाहरी संपदा से कहीं अधिक मूल्यवान है।

भावार्थ और व्याख्या—

  इस श्लोक में ‘अमृतत्व’ का अर्थ है अमरता, जो जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति है। इस अवस्था को ‘कैवल्य पद’ भी कहा गया है, जिसका अर्थ है परम शांति और मुक्ति का स्थान। इन वचनों में तीन प्रमुख बातों का खंडन किया गया है—

1. न कर्मणा’ (न कोई कर्म से)—इसका मतलब यह नहीं है कि हमें कर्म करना छोड़ देना चाहिए, बल्कि यह है कि केवल अच्छे कर्मों को करने से ही मोक्ष नहीं मिलता। कर्मों का फल होता है और वह हमें इस संसार से बाँधे रखता है। सच्चा साधक वही है जो फल की इच्छा से रहित होकर कर्म करता है।

2. ‘न प्रजया’ (न संतान से)—संसार में माना जाता है कि संतान से वंश चलता है और व्यक्ति अमर होता है। लेकिन उपनिषद में यह कथन है कि शारीरिक वंश की निरंतरता सच्ची अमरता नहीं है। सच्चा अमरत्व आत्मा का है, जो किसी संतान से नहीं मिलता।

3. ‘न धनेन’ (न ही बहुत अधिक धन से)—धन हमें सांसारिक सुख-सुविधाएँ दे सकता है, लेकिन यह आत्मा को संतुष्ट नहीं कर सकता। धन का संचय हमें और अधिक लोभी बनाता है और हम संसार में उलझ जाते हैं। मोक्ष की यात्रा में धन एक बाधा हो सकता है।

  इन तीनों को खंडित करने के बाद, उपनिषद में यह कथन है कि ‘त्यागेनैके अमृतत्वमानुषः यानी केवल त्याग ही वह एकमात्र साधन है जो हमें अमृतत्व तक पहुँचा सकता है। त्याग का अर्थ केवल भौतिक वस्तुओं को छोड़ना नहीं है, बल्कि अहंकार, मोह और आसक्ति को भी त्यागना है। जब हम अपनी इच्छाओं और पहचान को छोड़ देते हैं, तो हम अपने वास्तविक स्वरूप को जान पाते हैं।

  उदाहरण के लिए, बुद्ध ने राजकुमार का पद, पत्नी और संतान का मोह और राजसी सुखों का त्याग किया। उन्होंने केवल भौतिक चीज़ों का ही नहीं, बल्कि अहंकार और ज्ञान के अभिमान का भी त्याग किया और अंततः उन्हें निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हुआ। इसी तरह, भारत में कई संतों और संन्यासियों ने संसार को त्याग कर आत्म-ज्ञान प्राप्त किया।

  यह उपदेश हमें यह सिखाता है कि जीवन में हम जो कुछ भी इकट्ठा करते हैं, चाहे वह कर्म का फल हो, परिवार हो या धन हो, वह सब क्षणभंगुर है। सच्ची और स्थायी शांति केवल तभी मिलती है जब हम इन सभी से अपनी आसक्ति को त्याग देते हैं।

 


 

दिसम्बर 2025

 

(गुरु वशिष्ठोपदेश)
 
           बलि उपाख्यानएक दिन गुरु वशिष्ठ जी श्रीराम जी से बोलेप्रिय राम ! सुनोसंसार के भोगों से चित्त को कभी शान्ति नहीं मिलती। जिन भोगों को एक बार भोग लिया जाता है और यह भी अनुभव कर लिया जाता है कि उन भोगों से जिस तृप्ति और आनन्द प्राप्ति की आशा की थी वह उनके द्वारा नहीं मिली, फिर भी मनुष्य बार-बार उनकी ही इच्छा करता रहता है। इससे बड़ी और क्या मूर्खता हो सकती है ?
हे राम जी ! वत्स ! पाताल लोक में किसी समय विरोचन का पुत्र राजा बलि राज्य करता था। वह महाप्रतापी राजा था। उसने अपने बाहुबल से देवताओं और दानवों को परास्त करके अपना साम्राज्य चारों ओर फैला लिया था। जब उसको राज्य करते-करते बहुत वर्ष बीत गए तो एक दिन उसके मन में विचार आया कि मैं चिरकाल से त्रिलोकी का राज्य भोग रहा हूँ, किन्तु मेरे चित्त को कभी शान्ति नहीं मिली। बार-बार वे ही भोग भोगता हूँ, परन्तु इनसे कभी भी मुझको परम तृप्ति नहीं मिली। दिन-प्रतिदिन वे ही काम करता रहता हूँ, जिनको करने से आत्मा का कुछ भी कल्याण होता दिखाई नहीं देता। सारा जीवन इन्हीं भोगों को भोगते हुए व्यतीत हो गया, किन्तु हाथ कुछ नहीं लगा। सब जीवों की क्रियाएँ उन्मत्त-पागल व्यक्ति की चेष्टाओं जैसी हैं। राजा बलि के हृदय में ऐसा ही कभी विचार आया था फलस्वरूप उसको संसार से विरक्ति और उस विरक्ति के कारण आत्म-पद की प्राप्ति हुई थी।
राजा इस प्रकार सोचते रहे कि मेरे पिता विरोचन आत्म-ज्ञानी थे। वे कहा करते थे—“जीव को उस स्थिति को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए, जिसमें परम आनन्द और परम तृप्ति का आभास, जिसका आनन्द विषय-भोगों के द्वारा प्राप्त सुखों से कहीं अधिक उत्तम है और जिसको प्राप्त करने से विषयों के भोग की वासना नहीं रह जाती। जब मेरे पिता ऐसी बातें किया करते थे तब मुझमें उनको समझने की शक्ति नहीं थी। किन्तु अब मुझको ज्ञात हो गया है कि जब तक उस परम पद की प्राप्ति नहीं होगी, मुझको शान्ति नहीं मिलेगी। मैंने अच्छी तरह देख लिया है कि संसार के समस्त भोगों को अनन्त काल तक भोग लेने पर भी चित्त में शान्ति का अनुभव और परमानन्द की प्राप्ति नहीं होती। भोगों के द्वारा जो सुख प्राप्त होता है, वह क्षणिक और शीघ्र ही दुःख में परिणत होने वाला है
इस प्रकार का विचार जब राजा बलि के मन में उदित हुआ तो वह शीघ्र ह अपने गुरु शुक्राचार्य जी के पास गया उनको साष्टांग प्रणाम किया, तब उनसे श्रद्धापूर्वक उस परम पद की प्राप्ति का उपाय पूछा जिसके लिए उसके पिता विरोचन कहा करते थे। शुक्राचार्य ने बलि से कहात्स ! इस समय मुको अधिक कहने का अवकाश तो नहीं है, क्योंकि कार्यवश मुझको कहीं जाना है। फिर भी मैं एक बात तुमको बतलाए देता हूँ कि तुम उस परम पद का ही चिन्तन करते रहो। चिन्तन करते-करते तुम्हारी सहज में ही निर्विकल्प समाधि लग जाएगी और परम आनन्द का अनुभव हो जाएगा। कारण कि, जो कुछ संसार में है तुम में और जगत् के सभी पदार्थों में वह सब एक ही अखण्ड, शुद्ध, निर्विकार चित् तत्व है। उसके अतिरिक्त संसार में और कुछ है ही नहीं। अतएव उस परम पद में अपने आपको विचार द्वारा स्थित करना और अपने आपको वही समझ लेना सोऽहमस्मिअर्थात् मैं ही वह हूँ, यही पाना मनुष्य जीवन का ध्येय हैयह कहकर शुक्राचार्य जी चले गए।
इस प्रकार गुरु ने संकेत में ही सब कुछ समझा दिया। राजा ज्ञानी तो थे ही, उन्होंने ध्यान करना आरंभ कर दिया। तदुपरान्त उसने घर आकर विचार करना आरम्भ किया और विचार करते-करते उसको यह दृढ़ निश्चय हो गया कि संसार में जो कुछ है वह सब चित्तस्थही है इसके अतिरिक्त यहाँ पर कुछ भी नहीं है। ऐसा सोचते-सोचते उसक निर्विकल्प समाधि लग गई और उस समाधि में उसको शुद्ध परमानन्द का अनुभव हुआ। वह आनन्द ऐसा था कि जिसकी तुलना में उसके सारे जीवन के भोगों का सुख लेशमात्र भी नहीं था।
बहुत दिनों तक राजा बलि समाधि में बैठा रहा तो राज्य कार्यों में विघ्न आने लगे। यह देखकर गुरु शुक्राचार्य जी वहाँ पर आए और बलि को समाधि से जगाकर उसको अपने राज्य कार्यों को देखने के लिए उपदेश दिया और इस योगस्थ स्थिति में रहकर ही सब कर्तव्य कर्म करने का परामर्श दियाराजा बलि को जीवन्मुक्त पद की प्राप्ति तो हो चुकी थी और वह आनन्द जिसका उसको समाधि में अनुभव हुआ था वह सदा के लिए उसको प्राप्त हो गया। अतः उस आत्म-स्वरूप में स्थित होकर बलि ने बहुत दिनों तक राज्य किया और शरीरान्त होने पर निर्वाण पद की प्राप्ति की।

नवम्बर 2025

[

(जीवन की क्षणभंगुरता (अनित्यता))

 शिव पार्वती संवाद 

प्रस्तावना—

जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है—इसकी क्षणभंगुरता। हम जिस संसार में रहते हैं, वह  परिवर्तनशील है। कोई भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति स्थायी नहीं है। यही सत्य भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया था—

अनित्यं खलु संसारे, नित्यं ब्रह्म सनातनम् ।

अर्थात् यह संसार अस्थिर और नाशवान् है, लेकिन ब्रह्म ही नित्य और सनातन है। इस तथ्य को समझना ही आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में पहला कदम है।

लघु कथा—राजा और साधु

एक समय की बात है, एक शक्तिशाली राजा अपने ऐश्वर्य और वैभव पर बहुत गर्व करता था। वह सोचता था कि उसका साम्राज्य सदा रहेगा और उसकी सत्ता कभी समाप्त नहीं होगी। एक दिन एक ज्ञानी साधु उसके दरबार में आए। राजा ने अभिमान पूर्वक पूछा, क्या आप मुझे कोई ऐसी शिक्षा दे सकते हैं जो मुझे सदा याद रहे ?

साधु ने मुसकुराकर एक छोटी सी अंगूठी राजा को दी और कहा, राजन ! जब भी तुम अत्यधिक प्रसन्न या अत्यधिक दु:खी हो जाओ, इस अंगूठी को देख लेना।

राजा ने अंगूठी देखी, उस पर लिखा था— यह भी बीत जाएगा।

यह वाक्य राजा की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त था। उसे समझ में आ गया कि सुख-दु:ख, यश-अपयश, हानि-लाभ—सब कुछ नश्वर है।

क्षणभंगुरता का दार्शनिक पक्ष—

यदि हम ध्यान से देखें, तो संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है—

·  शरीर—एक दिन यह नष्ट हो जाएगा।

·  धन-संपत्ति—नष्ट हो जाती है या दूसरे के पास  चली जाती है।

·  यश-अपयश—एक दिन सब मिट जाता है।

·  संबंध—समय के साथ बदलते रहते हैं।

जब सब कुछ नश्वर है, तो हमें क्या करना चाहिए ? उत्तर है—उस अनित्य संसार में रहते हुए भी नित्य और सनातन ब्रह्म की शरण में जाना चाहिए।

निष्कर्ष—

जीवन की क्षणभंगुरता हमें सिखाती है कि हमें संसार के मोह में फसने के बजाय अपने आत्म-स्वरूप को पहचानना चाहिए। केवल ब्रह्म सत्य है, बाकी सब मिथ्या है। यह ज्ञान हमें सच्चे आनंद और शाश्वत शांति की ओर ले जाता है।

इसलिए, हमें हर परिस्थिति में सम भाव रखते हुए, भगवान शिव पार्वती के इस संदेश पर सदा मनन करते रहना चाहिए।

अनित्यं खलु संसारे, नित्यं ब्रह्म सनातनम् ।

इसका अर्थ है—यह संसार नश्वर है, परिवर्तनशील है; परंतु ब्रह्म (परम तत्व, परमात्मा) शाश्वत, नित्य और सनातन है। इस भाव पर आधारित एक प्रेरणदायक कहानी प्रस्तुत है—

कहानी—मिट्टी का घर और चांदी का दीपक

बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में एक बुद्धिमान वृद्ध संत रहा करते थे। वे एक शांत और सरल जीवन जीते थे। गाँव वाले उन्हें श्रद्धा से बाबा जी कहकर पुकारते थे। संत का एक युवा शिष्य था—नाम था अर्जुन। अर्जुन पढ़ा-लिखा था, पर उसका मन हमेशा सांसारिक सुखों और इच्छाओं की ओर खिंचता रहता।

एक दिन अर्जुन ने बाबा जी से पूछा, गुरुदेव ! आप बार-बार कहते हैं कि यह संसार नश्वर है, सब कुछ अनित्य है, केवल ब्रह्म ही नित्य है। पर मुझे तो सब कुछ स्थायी लगता है—मेरा घर, परिवार, धन, युवा शरीर... ये सब मेरे अपने हैं। ये कैसे अनित्य हो सकते हैं ?

बाबा जी मुस्कुराए और बोले—अर्जुन ! कल सुबह सूर्योदय के समय मेरे साथ चलना। मैं तुम्हें उत्तर दूँगा।

अगले दिन दोनों जंगल की ओर चल पड़े। चलते-चलते वे एक पुराने मिट्टी के घर के सामने पहुँचे। वह घर अब टूट रहा था, दीवारें झुक गई थीं, छत से घास झाँक रही थी। बाबा जी बोले, देखो ! यह घर कभी नया था, मज़बूत था। इसके भीतर जीवन था। अब देखो, समय ने इसे बदल दिया। क्या यह अब भी वैसा है ?

अर्जुन बोला, नहीं गुरुदेव ! अब तो यह जर्जर है।

बाबा जी मुस्कुराए। फिर वे एक गुफा में गए, जहाँ एक दीपक जल रहा था। वह दीपक चाँदी का था और वर्षों से वहाँ रखा था। संत ने कहा, देखो ! यह दीपक वर्षों से है। इसमें कई बार तेल डाला गया, बाती बदली गई, पर यह दीपक स्वयं वैसा ही है—अविकारी, स्थायी। यह दीपक ब्रह्म का प्रतीक है—जो न कभी बदलता है, न कभी नष्ट होता है।

अर्जुन गहराई से सोचने लगा।

बाबा जी ने कहा, ‘अनित्यं खलु संसारे’—यह संसार, इसका सौंदर्य, शरीर, संपत्ति, मान-सम्मान—सब बदलते रहते हैं। एक दिन इनका अंत निश्चित है। परंतु ‘नित्यं ब्रह्म सनातनम्’—परमात्मा, आत्मा, शुद्ध चेतना, जो इन सबके पीछे है, वह न बदलती है, न नष्ट होती है। वही सनातन सत्य है।

अर्जुन की आँखें नम हो गईं। उसने कहा, गुरुदेव, अब मैं समझ गया कि मुझे किससे प्रेम करना चाहिए। जो नश्वर है उससे नहीं, बल्कि उस ब्रह्म से जो नित्य है।

बाबा जी ने मुस्कुराकर कहा—संसार में रहो, लेकिन उसमें लिप्त मत हो। मिट्टी के घर में रहते हुए चाँदी के दीपक को पहचानो। यही जीवन की सार्थकता है।

इस कहानी से हमें यह बोध होता है कि संसार की सारी वस्तुएँ क्षणिक हैं—वे आज हैं, कल नहीं। परंतु ब्रह्म, आत्मा, सत्य—ये नित्य और सनातन हैं। सच्चा बुद्धिमान वही है जो असत्य के पीछे नहीं, बल्कि सत्य की खोज करता है। रामायण में भी कहा गया है कि—

संत मिलन का लाभ यह, मिटे मोह अज्ञान ।

सत्य पथ पर जो चले, हो जाए ब्रह्म समान

अर्थात् संतों का संग करने से मोह और अज्ञान मिटता है और जो सत्य के मार्ग पर चलता है, वह ब्रह्म के समान हो जाता है।

अक्टूबर 2025

(भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद की पौराणिक कथा)

भगवान शिव और माता पार्वती के बीच हुआ संवाद सनातन धर्म के अनेक ग्रंथों में वर्णित है, विशेष रूप से शिव पुराण, लिंग पुराण, विज्ञान भैरव तंत्र, तथा गुरु गीता में इन संवादों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। यह संवाद तब प्रारंभ हुआ जब माता पार्वती ने भगवान शिव से ब्रह्म-ज्ञान, योग और मोक्ष का मार्ग जानने की इच्छा प्रकट की।

संवाद की पृष्ठभूमि

पुराणों के अनुसार, माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। विवाह के पश्चात् माता पार्वती ने देखा कि भगवान शिव सदा ध्यान मग्न रहते हैं, वैराग्य से युक्त हैं और संसार के मोह-माया से परे हैं। एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा—

हे नाथ ! आप सदा ध्यान मग्न रहते हैं और संसार के मोह से परे हैं, कृपया मुझे बताइए कि यह संसार क्या है ? इसका मूल क्या है ? जीवन और मृत्यु का रहस्य क्या है ? और मोक्ष का वास्तविक स्वरूप क्या है ?

माता पार्वती के इस जिज्ञासा भरे प्रश्न को सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने संसार, आत्मा, ब्रह्म, तपस्या, ध्यान और भक्ति का गूढ़ ज्ञान माता पार्वती को प्रदान किया।

संवाद का प्रारंभ और प्रमुख शिक्षाएँ

जीवन की क्षणभंगुरता (अनित्य)—भगवान शिव ने माता पार्वती को बताया कि यह संसार नश्वर है, यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है।

॥ श्लोक
अनित्यं खलु संसारे, नित्यं ब्रह्म सनातनम् ।

अर्थ—यह संसार अस्थिर और नाशवान है, लेकिन ब्रह्म ही नित्य और सनातन है।

आत्मा और ब्रह्म की एकता (अद्वैत)—शिवजी ने माता पार्वती को अद्वैतवाद का सिद्धांत समझाया, जिससे ज्ञात होता है कि आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है।

॥ श्लोक

अहं ब्रह्मास्मि नित्यं, आत्मा ब्रह्मैव नापरः।

अर्थ—मैं ब्रह्म हूँ और आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं है।

तपस्या की शक्ति (तपस)—शिवजी ने तपस्या के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिना तप के ज्ञान और मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।

॥ श्लोक

तपसा किल्विषं हन्ति, तपसा विन्दते महत् ।

अर्थ—तपस्या से पापों का नाश होता है और महानता प्राप्त होती है।

आंतरिक मौन को अपनाना (मौन)—भगवान शिव ने माता पार्वती को मौन का महत्व समझाते हुए कहा कि मौन ही सर्वोच्च ध्यान है।

॥ श्लोक

मौनं  सर्वार्थसाधनम् ।

अर्थ—मौन ही सभी सिद्धियों का आधार है।

वैराग्य और त्याग (वैराग्य)—भगवान शिव ने सिखाया कि भौतिक संसार में आसक्ति दु:ख का कारण है और वैराग्य से ही आत्म-ज्ञान संभव है।

॥ श्लोक

वैराग्यमेव परमं सुखं ।

अर्थ—वैराग्य ही परम सुख है।

संवाद का समापन और फलस्वरूप ज्ञान

माता पार्वती ने जो ज्ञान प्राप्त किया, वह आगे जाकर गुरु गीता, शिव गीता, और विज्ञान भैरव तंत्र जैसे शास्त्रों का आधार बना। भगवान शिव ने इस ज्ञान को केवल माता पार्वती तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आगे इसे अपने शिष्यों और भक्तों को भी प्रदान किया, जिससे यह शाश्वत सत्य संपूर्ण मानवता के लिए उपलब्ध हो गया।

निष्कर्ष—भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद में जीवन, ब्रह्म-ज्ञान, योग, ध्यान और मोक्ष की अद्भुत शिक्षाएँ समाहित हैं। यह संवाद हमें बताता है कि सच्चा ज्ञान केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन, ध्यान और गुरु के उपदेशों से प्राप्त होता है। भगवान शिव की ये शिक्षाएँ आज भी आध्यात्मिक साधकों के लिए अमूल्य हैं।

 

सितम्बर 2025

( गुरु वशिष्ठोपदेश )

गुरु वशिष्ठ जी ने शम की महिमा का वर्णन करते हुए इसे मोक्ष का प्रथम द्वारपाल बताया है। शम का अर्थ केवल बाहरी शांति नहीं, बल्कि आंतरिक चित्त की वह अवस्था है, जहाँ जीव सभी प्रकार की भ्रांतियों, विकारों और अशांति से मुक्त हो जाता है। शम—शील, क्षमा और आत्म-संयम के गुणों का संग्रह है। यह लेख शम की महत्ता और उसके माध्यम से जीव के मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर विस्तार से प्रकाश डालता है।

शम का अर्थ है चित्त की स्थिरता और परम शांति। गुरु वशिष्ठ जी कहते हैं—

शमेनासाद्यते श्रेयः शमो हि परमं पदम्

शमः शिवः शमः शान्तिः शमो भ्रान्ति निवारणम्

अर्थात् शम से जीव कल्याण को प्राप्त करता है। शम ही परम पद है, शम ही शिव है तथा शम ही भ्रांति का निवारण है।

प्राचीन काल में एक राजा था, जिसे अपने राज्य की शक्ति और समृद्धि पर बहुत अभिमान था। एक बार, उसने सुना कि उसके राज्य में एक तपस्वी रहते हैं, जिनके शील और क्षमा के गुणों की चर्चा चारों ओर है। राजा ने उन्हें आज़माने का निश्चय किया।

एक दिन, वह अपने सैनिकों के साथ जंगल में पहुँचा, जहाँ तपस्वी एक वृक्ष के नीचे ध्यान मगन थे। राजा ने तपस्वी को परेशान करने के लिए उन्हें कठोर शब्द कहे और उनके तप की आलोचना की। लेकिन तपस्वी ने अपनी आँखें नहीं खोलीं और शांत चित्त बैठे रहे।

राजा ने सैनिकों को आदेश दिया कि तपस्वी के पास रखे उनके जल-पात्र और आसन को हटा दें। फिर भी तपस्वी के चेहरे पर कोई क्रोध या दु:ख नहीं दिखा। राजा ने और अधिक कठोर व्यवहार किया—तपस्वी को अपमानित करने के लिए उनके वस्त्रों को फाड़ने का भी प्रयास किया।

तपस्वी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं और मुसकराते हुए राजा से कहा, हे राजन ! आप जो चाहें कर सकते हैं, लेकिन मेरे चित्त को अशांत नहीं कर सकते। शम और शील मेरी शक्ति हैं, जो बाहरी आघातों से प्रभावित नहीं होते।

यह सुनकर राजा क्रोधित हो गया और बोला, क्या तुममें कोई स्वाभिमान नहीं ? क्या तुम्हें अपमान का अनुभव नहीं होता ?

तपस्वी ने उत्तर दिया, स्वाभिमान तभी आहत होता है, जब मन में अभिमान हो और अपमान तभी महसूस होता है, जब व्यक्ति दूसरों की बातों से प्रभावित हो। लेकिन जो शम को प्राप्त कर चुका है, उसका मन शांत झील के समान होता है। वहाँ कोई भी पत्थर फेंके, झील की गहराई में उसकी शांति नहीं टूटती।

राजा ने यह सुनकर अपनी भूल समझी। उसने तपस्वी से क्षमा माँगी और कहा, हे महात्मा ! आप वास्तव में महान् हैं। कृपया मुझे शील और क्षमा का महत्व सिखाएँ।

तपस्वी ने कहा, शील और क्षमा का अभ्यास वही कर सकता है, जो अपने अहंकार और क्रोध की अग्नि को बुझा सके। शम से मन शुद्ध होता है, शील से जीवन पवित्र होता है और क्षमा से हृदय विशाल बनता है। यही जीवन का सार है।

राजा ने तपस्वी के चरणों में शीश झुकाया और प्रतिज्ञा की कि वह अपने जीवन में शील, शम और क्षमा के गुणों को अपनाएगा।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शम और शील के गुण केवल साधु-संतों तक सीमित नहीं हैं। यदि हम इन्हें अपने जीवन में उतारें, तो हमारे भीतर शांति और सच्चा आनंद स्थापित हो सकता है। बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, शम और शील का अभ्यास हमें आत्मिक शांति की ओर ले जाता है।

शील और शीलवान व्यक्ति को दर्शाने के लिए कई तरह की उपमाएँ दी जाती हैं। ये उपमाएँ न केवल शील के महत्व को उजागर करती हैं बल्कि शीलवान व्यक्ति के गुणों को भी सटीक ढंग से व्यक्त करती हैं। यहाँ कुछ उपमाएँ दी गई हैं—

· शील कमल के समान है—जैसे कमल कीचड़ में रहते हुए भी निष्कलंक रहता है, वैसे ही शीलवान व्यक्ति विषम परिस्थितियों में भी अपने गुणों को नहीं खोता है।

· शीलवान व्यक्ति दीपक के समान है—जैसे दीपक अंधकार में प्रकाश फैलाता है, वैसे ही शीलवान व्यक्ति समाज में शांति का प्रकाश फैलाता है।

· शीलवान व्यक्ति चंदन के समान है—जैसे चंदन को जितना पानी के साथ अधिक घिसा जाता है, उतना ही सुगंध और रंग देता है। वैसे ही शीलवान व्यक्ति कठिन संघर्षों में और अधिक निखरता जाता है।

· शीलवान व्यक्ति वृक्ष के समान है—जैसे वृक्ष अपनी जड़ों से मज़बूती पाता है, वैसे ही शीलवान व्यक्ति अपने मूल्यों से मज़बूती पाता है।

· शीलवान व्यक्ति सूर्य के समान है—जैसे सूर्य सभी को प्रकाश और ऊर्जा देता है, वैसे ही शीलवान व्यक्ति सभी को प्रेरणा देता है।

 

D

 

जुलाई 2025
( गुरु वशिष्ठोपदेश )

 
शमः परमं सुखम्—
उक्त वचन गुरु वशिष्ठ जी के वचन हैं, वे कहते हैं कि शील ही परम सुख है। शम के साथ जुड़े हैं—शांति, संतुलन, संयम और मधुरता। अब इन वचनों का व्याख्यान पढ़िए—
1. शांति का सागर—वह सागर जिसमें शांति का जल भरा है और परम सुख की लहरें उठ रही हैं।
उपमा—जिस प्रकार अथाह सागर अपनी गहराइयों में शांत रहता है, बाहर ऊँची-ऊँची लहरें उठती-गिरती रहती हैं, फिर भी उसकी अंतरात्मा में एक स्थिरता विद्यमान होती है। उसी तरह मन की गहराई में जब शांति होती है, तो बाहरी जीवन की हलचलें हमें विचलित नहीं कर पातीं। गुरु वशिष्ठोपदेश के अनुसार, शम यानी मन की शांत और स्थिर अवस्था ही सच्चा सुख है। यदि मन अशांत हो, तो चाहे हमारे पास कितना भी वैभव और साधन हो, हमें वास्तविक आनंद नहीं मिल सकता। अतः शम के बिना जीवन में कुछ सार नहीं रह जाता। गुरु वशिष्ठ जी इसी शम में स्थित होने का उपदेश कर रहे हैं।
2.संतुलन की सरिता—अंतर्मुखी साधना का शांत प्रवाह है।
उपमा—जैसे शांत नदी धीर-गंभीर बहती है, किन्तु अपने प्रवाह में अवरोध आने पर भी वह अंततः अपने मार्ग को पा लेती है। उसी तरह मन को साधना, ध्यान, प्राणायाम और योग का आश्रय देकर अनुशासित किया जा सकता है। यह अनुशासन हमें सकारात्मक चिंतन की ओर प्रवृत्त करता है और मन को स्थिरता प्रदान करता है। साधना की ‘सरिता’ जीवन की भाग-दौड़ के बीच मन को भीतर से पोषित करती है, जिससे मानसिक शांति बनी रहती है।
3. संयम—क्षमा और मन की शीतलता है।
उपमा—यदि हम अपने मनोभावों के प्रति सजग हों, तो संयम की शीतल बूँद क्रोध आदि के अग्निकुंड की लपटों को शांत कर देती है। शांति और धैर्य के साथ विचार करने पर निर्णय अधिक कल्याणकारी सिद्ध होते हैं। इस प्रकार नकारात्मक भावों का नियंत्रण हमें शम के निकट पहुँचाता है।
4. मधुरता—सुगंधित पुष्पों की तरह कोमल भाव का प्राकट्य है।
उपमा—जिस प्रकार सुगंधित बगिया में खिले हुए फूल वातावरण को सुगंध से भर देते हैं, उसी तरह शांत मन पारस्परिक संबंधों में माधुर्य भरता है। जब मन स्थिर और सकारात्मक होता है, तो हम अपने परिवार, मित्रों और समाज से सहजता से जुड़ पाते हैं। निर्णय भी अधिक परिपक्व और सहानुभूति पूर्ण होते हैं। मन की यह ‘बगिया’ दूसरों के लिए भी उत्साह व आनंद का स्रोत बनती है, क्योंकि शांत मन से निकलने वाला प्रेम सकारात्मक होता है—वह दूसरों को भी प्रभावित करता है।
जैसे अमृत की एक बूँद सम्पूर्ण प्राणी को अमरता का अनुभव करा सकती है, वैसे ही शम और शांति की एक झलक भी हमारे समूचे अस्तित्व में आनंद भर देती है।
अमृत की एक बूँद सम्पूर्ण प्राणी को अमरता का अनुभव करा सकती है, यह उक्ति हमारे शास्त्रों और पौराणिक कथाओं में बार-बार दोहराई गई है। अमृत शब्द मात्र से ही मन में एक दिव्य रस की अनुभूति जाग उठती है, जो मृत्यु के भय से परे ले जाकर हमें एक विशेष तरह के निःशब्द आनंद से भर देती है। यही भाव, यही उत्कंठा तब और भी गहरी हो जाती है जब हम शांति और शम की महत्ता को आत्मसात करते हैं। मन को स्थिर करना, इंद्रियों को संयमित रखना और अंतर्मुखी होकर शांत-चित्त अनुभव करना ही वह सौम्य क्रिया है, जिसे शम कहा जा सकता है।
बाहरी कलह, अंतहीन इच्छाओं और भटकाव से निकलकर जब मन शम के मार्ग पर अग्रसर होता है, तभी शांति का अवतरण होता है। जिस प्रकार एक बूँद अमृत के स्पर्श से समस्त विकारों का नाश हो जाता है, उसी प्रकार शांति की एक झलक भी भीतर छिपे क्लेश, क्रोध और तनाव की परतों को ध्वस्त कर देती है।
शांति, केवल बाहरी विपरीत परिस्थितियों का अभाव भर नहीं है; वह एक आंतरिक दशा है, जिसमें मन प्रसन्न और संतुलित रहता है। जीवन के विविध संघर्षों के बीच जब हम अपने भीतरी स्वरूप से जुड़ते हैं, तब हमें समझ आता है कि हमारी वास्तविक शक्ति भौतिक संसाधनों के बजाय हमारी मानसिक और आत्मिक स्थिति में निहित है।
शम हमें यही सिखाता है कि किसी भी परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना और अपने भीतर की दिव्यता से जुड़े रहना संभव है। जैसे विकट समस्याओं का सामना करने के लिए एक छोटा-सा आश्वासन भी बड़ा संबल बन जाता है, वैसे ही शांति की अल्प उपस्थिति भी हमारा आंतरिक बल प्रबल कर देती है। इसके सहारे हम जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सहजता से टिके रहकर, सम्यक् विचारों से कार्य कर पाते हैं।
जब मन शांत हो, तो हमें अपनी ही गहराइयों में झाँककर देखने का अवसर मिलता है। यह प्रक्रिया आत्म-निरीक्षण और आत्म-परिवर्तन की राह खोलती है। भीतरी शांति का भाव जब हमारे विचारों में प्रवेश करता है, तब हर क्रिया में सौम्यता और विवेक का समावेश होने लगता है। हम अपनी प्राथमिकताओं को समझने लगते हैं तथा भौतिक आकर्षणों से परे उस वास्तविक आनंद को अनुभव करते हैं जो प्रेम, करुणा और सरलता से उत्पन्न होता है।


 

जून 2025

(गुरु वशिष्ठोपदेश)

 
राजा बलि-उपाख्यान—
राजा दशरथ के दरबार में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी और महामुनि विश्वामित्र जी तथा अनेक देवर्षि, राजर्षि व तपस्वी साधु अपने-अपने आसन पर विराजित हैं। गुरु वशिष्ठ जी श्री राम जी को उपदेश कर रहे हैं और इस ज्ञान वार्त्ता के दौरान एक दिन गुरु वशिष्ठ जी राम जी से बोले—प्रिय राम ! सुनो, संसार के भोगों से चित्त को कभी शान्ति नहीं मिलती। जिन भोगों को एक बार भोग लिया जाता है और यह भी अनुभव कर लिया जाता है कि उन भोगों से जिस तृप्ति और आनन्द प्राप्ति की आशा की थी वह उनके द्वारा नहीं मिली, फिर भी मनुष्य बार-बार उनकी ही इच्छा करता रहता है। इससे बड़ी और क्या मूर्खता हो सकती है ?
हे धर्मध्वज राम ! राजा बलि के हृदय में ऐसा ही कभी विचार आया था, फलस्वरूप उसको भी संसार से विरक्ति और उस विरक्ति के कारण आत्म-पद की प्राप्ति हुई थी। उसकी कथा इस प्रकार है—हे वत्स ! पाताल लोक में किसी समय राजा विरोचन का पुत्र राजा बलि राज्य करता था। वह महाप्रतापी राजा था। उसने अपने बाहुबल से देवताओं और दानवों को परास्त करके अपना साम्राज्य चारों ओर फैला लिया था। जब उसको राज्य करते-करते बहुत वर्ष बीत गए तो एक दिन उसके मन में विचार आया कि मैं चिरकाल से त्रिलोकी का राज्य भोग रहा हूँ, किन्तु मेरे चित्त को कभी शान्ति नहीं मिली। बार-बार वे ही भोग भोगता हूँ, परन्तु इनसे कभी भी मुझे परम तृप्ति नहीं मिली। दिन-प्रतिदिन वे ही काम करता रहता हूँ जिनको करने से आत्मा का कुछ भी कल्याण होता दिखलाई नहीं देता। सारा जीवन इन्हीं भोगों को भोगते हुए व्यतीत हो गया, किन्तु हाथ कुछ नहीं लगा।
राजा बलि ने सोचा कि सब जीवों की क्रियाएँ उन्मत्त-पागल व्यक्ति की चेष्टाओं जैसी हैं, मेरे पिता विरोचन आत्म-ज्ञानी थे। वे कहा करते थे कि जीव को उस स्थिति को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए, जिसमें परम आनन्द और परम तृप्ति स्वभाव सिद्ध है, जिसका आनन्दरूप विषय-भोगों के द्वारा प्राप्त सुखों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है और जिसको प्राप्त करने से विषयों के भोग की वासना नहीं रह जाती। जब मेरे पिता ऐसी बातें किया करते थे, तब छोटी आयु होने के कारण मुझमें उनको समझने की शक्ति नहीं थी। किन्तु अब मुझे ज्ञात हो गया है कि जब तक उस परम पद की प्राप्ति नहीं होगी, मुझे शान्ति नहीं मिलेगी। मैंने अच्छी तरह देख लिया है कि संसार के समस्त भोगों को अनन्त काल तक भोग लेने पर भी चित्त में शान्ति का अनुभव और परमानन्द की प्राप्ति नहीं होती। भोगों के द्वारा जो सुख प्राप्त होता है वह क्षणिक और शीघ्र ही दु:ख में परिणत होने वाला है।
इस प्रकार का विचार राजा बलि के मन में उदित हुआ और वह शीघ्र ही अपने गुरु शुक्राचार्य के पास गया। उनको साष्टाँग प्रणाम किया, तब उनसे श्रद्धापूर्वक उस परमपद की प्राप्ति का उपाय पूछा जिसके लिए उसके पिता विरोचन कहा करते थे। गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि से कहा—वत्स ! इस समय अधिक कहने का अवकाश तो नहीं है, क्योंकि कार्यवश मुझे कहीं जाना है। फिर भी मैं एक बात तुम्हें बतलाए देता हूँ कि तुम उस परम पद का ही चिन्तन करते रहो। चिन्तन करते-करते तुम्हें सहज में ही निर्विकल्प समाधि लग जाएगी और परम आनन्द का अनुभव हो जाएगा। कारण, जो कुछ संसार में है, तुम में और जगत् के सभी पदार्थ वह सब एक ही अखण्ड, शुद्ध, निर्विकार चित् तत्व है। उसके अतिरिक्त संसार में और कुछ है ही नहीं। अतएव उस परम पद में अपने आपको विचार द्वारा स्थित करना और अपने आपको वही समझ लेना 'सोऽहमस्मि ही मनुष्य जीवन का ध्येय है।
यह कहकर असुर गुरु शुक्राचार्य जी चले गए। तदुपरान्त राजा बलि ने घर आकर विचार करना आरम्भ किया और विचार करते-करते उसको यह दृढ़ निश्चय हो गया कि संसार में जो कुछ है वह सब चित्तथ्य ही है, इसके अतिरिक्त यहाँ पर कुछ भी नहीं है। ऐसा सोचते-सोचते उसे निर्विकल्प समाधि लग गई और उस समाधि में उसे आत्म-तत्व और शुद्ध परम आनन्द का अनुभव हुआ। वह आनन्द ऐसा था कि जिसकी तुलना में उसके सारे जीवन के भोगों का सुख भी नहीं था। बहुत दिनों तक वह समाधि में बैठा रहा तो राज्य कार्यों में विघ्न आने लगे।
राज्य की यह अवस्था देखकर गुरु शुक्राचार्य जी वहाँ पर आए और राजा बलि को समाधि से जगाकर उसे अपने राज्य कार्यों को देखने के लिए उपदेश दिया। राजा बलि को जीवन्मुक्त पद की प्राप्ति हो चुकी थी और वह आनन्द जिसका उसको समाधि में अनुभव हुआ था, वह सदा के लिए उसे प्राप्त हो गया था। उस आत्म स्वरूप में स्थित होकर राजा बलि ने बहुत दिनों तक राज्य किया और शरीरान्त होने पर  निर्वाण पद की प्राप्ति की।
राजा बलि की यह कथा सुनाकर गुरु वशिष्ठ जी राम जी से बोले, हे प्रज्ञावान् राम जी ! तुम भी इसी प्रकार आत्म चिंतन करके उस परम पद का अनुभव करो। फिर यह सम्पूर्ण जगत् और इसका प्रपंच तुम्हारे लिए एक खेलमात्र रह जाएगा और  दु:ख-सुख आदि द्वंद्वों से परे होकर संसार में विचरण करोगे और जग कल्याण करते रहोगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें