स्वरूप चिंतन मंजरी
फरवरी 2026
(नाम की महिमा)
नाम (ईश्वरीय नाम या मंत्र) की महिमा भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में, विशेषकर संत-मत और भक्ति आंदोलन में, केंद्रीय विषय रही है। ऊपर दिया गया प्रसंग नाम की महिमा इसी असीम शक्ति और महत्व को बहुत ही सुंदर ढंग से उजागर करता है। यह बताता है कि कैसे नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक दिव्य औषधि है जो हमें काल (समय), माया (भ्रम) और आंतरिक शत्रुओं (जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) से मुक्ति दिला सकती है।
नाम की शक्ति—काल और माया पर विजय
प्रसंग कहता है कि ‘नाम वह अमृत है, वह औषधि है जिसके सेवन से काल-माया भी जीव से भय खाने लगते हैं।’ यह एक गहरा आध्यात्मिक सत्य है। काल का अर्थ है समय और मृत्यु, जबकि माया वह भ्रम है जो हमें इस नश्वर संसार से बांधे रखता है। आम तौर पर, मनुष्य इन दोनों के अधीन रहता है—समय उसे बुढ़ापे और मृत्यु की ओर ले जाता है और माया उसे सांसारिक इच्छाओं और बंधनों में उलझाए रखती है।
लेकिन, जब कोई व्यक्ति सच्चे हृदय से नाम का जाप या स्मरण करता है, तो वह इन दोनों से ऊपर उठने लगता है। नाम की ऊर्जा इतनी प्रबल होती है कि वह चेतना को समय और स्थान की सीमाओं से परे ले जाती है। यह व्यक्ति को अमरत्व का अनुभव करा सकती है, क्योंकि वह अपनी आत्मा के शाश्वत् स्वरूप को पहचान लेता है, जो काल से परे है। इसी तरह, नाम माया के भ्रम को चीर देता है। यह व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया की क्षणभंगुरता का एहसास कराता है और उसे वास्तविक, शाश्वत् सत्य की ओर मोड़ता है।
इसका एक उदाहरण हमें भगवान राम के नाम में मिलता है। तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में लिखा है—
कलिजुग केवल नाम अधारा ।
सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा ॥
अर्थात् कलियुग में केवल नाम ही आधार है, नाम का स्मरण करके मनुष्य भवसागर पार कर जाता है। यह नाम की उस शक्ति को दर्शाता है जो काल के प्रभाव को भी क्षीण कर देती है और व्यक्ति को आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ाती है।
आंतरिक शत्रुओं पर नियंत्रण—
प्रसंग यह भी कहता है कि ‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि शत्रु तथा सबका सरदार मन भी नाम के प्रताप से हार मानकर जीव का गुलाम बन जाता है।’ यह नाम का एक अत्यंत व्यावहारिक लाभ है। हमारी सबसे बड़ी चुनौतियाँ अक्सर बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर होती हैं। कामुकता, क्रोध, लालच, आसक्ति और अहंकार जैसे मनोविकार हमें अशांत रखते हैं और हमें सही मार्ग से भटकाते हैं। इन पर नियंत्रण पाना अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि हमारा मन अक्सर इन्हीं का गुलाम बना रहता है।
नाम का निरंतर जाप या स्मरण मन को एकाग्र करता है। जब मन किसी एक पवित्र ध्वनि या विचार पर केंद्रित होता है, तो उसे भटकने और नकारात्मक प्रवृत्तियों में लिप्त होने का अवसर नहीं मिलता। नाम की पवित्रता धीरे-धीरे मन को शुद्ध करती है। जैसे एक दर्पण पर जमी धूल को पोंछने से वह चमकने लगता है, वैसे ही नाम का जाप मन को निर्मल करता है।
उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध संत कबीर दास जी ने नाम की महिमा पर बहुत जोर दिया। उनके दोहे बताते हैं कि कैसे नाम का सुमिरन व्यक्ति को विकारों से मुक्त करता है और उसे ईश्वर से जोड़ता है।
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ॥
यह दोहा बताता है कि बाहरी जाप से ज़्यादा महत्वपूर्ण मन का जाप है, जो नाम के माध्यम से ही संभव है और जिससे आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
नाम जो रत्ती एक है, पाप जो रत्ती हज़ार ।
आध रत्ती घट संचरै, जारि करै सब छार ॥
पाप-कर्मों का नाश—‘नाम जो रत्ती एक है, पाप जो रत्ती हज़ार ।’ दोहे में नाम की जिस शक्ति का वर्णन है, वह सचमुच अविश्वसनीय है।
इसका अर्थ है कि यदि एक रत्ती नाम है और हज़ारों रत्ती पाप हैं, तब भी आधा रत्ती नाम भी शरीर में प्रवेश कर जाए तो वह सारे पापों को जलाकर राख कर देता है। करोड़ों कर्म (पाप) पल भर में कट जाते हैं, यदि थोड़ा-सा भी नाम हृदय में आ जाए। कितने ही युगों तक पुण्य कर्म किए जाएँ, परंतु संत-महापुरुषों द्वारा प्राप्त नाम रूपी मंत्र के बिना कोई ठिकाना (मोक्ष) नहीं है।
यह बताता है कि नाम की शक्ति कर्मों के बंधन को तोड़ने में अद्वितीय है। हमारे द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कर्मों का फल हमें भुगतना पड़ता है। लेकिन, नाम की भक्ति और उसका स्मरण इस कर्म-चक्र को तोड़ने की कुंजी है। यह एक प्रकार से अग्नि के समान है जो पापों के संचित ढेर को भस्म कर देती है। ऐसा नहीं है कि नाम किसी को पाप करने की छूट देता है, बल्कि यह पश्चाताप और सच्ची भक्ति के साथ नाम जपने पर व्यक्ति को कर्मों के बोझ से मुक्ति दिलाता है और उसे आध्यात्मिक रूप से शुद्ध करता है।
भक्ति आंदोलन के कई संतों ने इस बात पर जोर दिया है। महाराष्ट्र के संत नामदेव ने अपने जीवन में इसका अनुभव किया और प्रचार किया कि नाम स्मरण से ही उद्धार संभव है। उनकी कथाएँ बताती हैं कि कैसे नाम की शक्ति ने उन्हें और उनके भक्तों को कई कठिनाइयों से उबारा और उन्हें मुक्ति की ओर अग्रसर किया। यह सिद्धान्त बताता है कि बाहरी अनुष्ठानों या केवल पुण्य कर्मों से जो प्राप्त नहीं हो सकता, वह नाम के माध्यम से सहजता से प्राप्त हो जाता है, क्योंकि नाम सीधा परमात्मा से जोड़ता है।
गुरुदेव द्वारा बताए गए इस प्रसंग और दोहे का सार यही है कि नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि परमात्मा की शक्ति का साकार रूप है। यह हमें न केवल बाहरी बंधनों (काल और माया) से मुक्त करता है, बल्कि आंतरिक शत्रुओं (मनोविकारों) पर भी विजय दिलाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नाम में इतनी शक्ति है कि वह हज़ारों जन्मों के पाप-कर्मों को क्षण-भर में जलाकर राख कर देता है और हमें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाकर शाश्वत् ठिकाना (मोक्ष) प्रदान करता है। यही कारण है कि संत-महापुरुषों ने सदैव नाम की महिमा का गुणगान किया है और इसे आध्यात्मिक पथ पर सबसे सरल और शक्तिशाली साधन बताया है।
जनवरी 2026
(सच्चा नाम-सुमिरन)
संतों के प्रेरणादायक वचनों में नाम-सुमिरन की वह सही विधि बताई जाती है जो मनुष्य स्वयं अपने मन से नहीं समझ पाता है। वास्तव में सुमिरन और भक्ति बाहरी आडंबर से परे, आंतरिक और गुप्त होनी चाहिए। सच्चा सुमिरन वही है जो मन से हो, केवल होंठों से नहीं।
आंतरिक सुमिरन का फल
‘मन ही मन में सच्चे भाव से जाप करने से हृदय का दर्पण उज्ज्वल होता है।’ यह एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धांत है। जब हम भावपूर्वक मन से नाम का जाप करते हैं, तो हमारा ध्यान पूरी तरह से अंतर्मुखी होने लगता है। मन की चंचलता शांत होती है और वह एकाग्र होने लगता है। यह एकाग्रता मन और आत्मा को निर्मल करती है। मन की अशुद्धियों में क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अहंकार शामिल हैं। जैसे-जैसे हम मन से नाम जाप करते हैं, ये अशुद्धियाँ धीरे-धीरे दूर होती जाती हैं। यह प्रक्रिया एक धुंधले शीशे को साफ करने जैसी है, जो धीरे-धीरे चमकने लगता है। इसी प्रकार, मन रूपी दर्पण भी नाम जाप से उज्ज्वल हो जाता है और अपनी वास्तविक प्रकृति को प्रकट करता है।
हृदय में प्रभु का दर्शन
नाम-सुमिरन का महत्वपूर्ण भाग यह है कि जब नाम-सुमिरन करते-करते ‘हृदय का दर्पण उज्ज्वल हो जाएगा तो एक दिन समस्त सृष्टि में रमण करने वाले प्रभु राम के दर्शन उसी हृदय रूपी दर्पण में प्रकट हो जाएँगे।” यह आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम लक्ष्य है। जब मन पूरी तरह से शुद्ध और एकाग्र हो जाता है, तो हमें बाहरी दुनिया में ईश्वर को खोजने की आवश्यकता नहीं रहती। हमें यह एहसास होता है कि वह हमारे अंदर ही निवास करते हैं। चाहे यह दर्शन किसी बाहरी आकृति में हो या आंतरिक ज्योति में, इससे आंतरिक बोध प्रकट होता है। यह एहसास स्थिर होता है कि हमारी आत्मा ही परमात्मा का अंश है। यह एक गहन आध्यात्मिक अनुभव है जो हमें अद्वैत की ओर ले जाता है।
गुप्त भक्ति का महत्व
नाम-भक्ति के धन को सच्चा भक्त लोभी व्यक्ति की तरह गुप्त रखने का प्रयास रखता है। जैसे लोभी व्यक्ति धन को छिपाकर रखता है, उसी प्रकार भक्त को भी चाहिए कि वह गुप्त रूप से नाम-भक्ति का अभ्यास करता जाए। इसका कारण यह है कि भक्ति का प्रदर्शन अहंकार को जन्म दे सकता है। सच्ची भक्ति गुप्त और मौन होती है क्योंकि यह केवल साधक और उसके इष्टदेव के बीच का संबंध है। यह एक अंतरंग संवाद है जहाँ कोई तीसरा व्यक्ति नहीं होता। यह भक्ति की पवित्रता और शक्ति को बनाए रखती है।
एक उदाहरण से समझें। मीराबाई जी ने कभी किसी मंदिर में जाकर राम का दर्शन नहीं किया, बल्कि वे अपने हृदय में ही कृष्ण को देखती थीं। उनके लिए उनका कृष्ण उनके मन और प्राण में थे। उनका सुमिरन इतना गहरा था कि वह कृष्ण के साथ एकरूप हो गईं। इसी तरह, इन वचनों में बताया गया है कि गुप्त और आंतरिक सुमिरन हमें अपने भीतर ही ईश्वर के दर्शन कराता है।
दिसम्बर 2025
(समान भाव की वर्षा)
संतों के उपदेशों की तुलना अमृत की वृष्टि से की जाती है, जो सभी पर समान रूप से बरसती है—चाहे वह कोई साधारण भक्त हो या गहन साधक। उनके वचन सरल किंतु गहन होते हैं, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का मार्ग दिखाते हैं। उनकी शिक्षाओं में भेदभाव का कोई स्थान नहीं होता; वे सभी को एक समान दृष्टि से देखते हैं, जैसे सूर्य का प्रकाश जो अमीर-गरीब, ऊँच-नीच के भेद के बिना सबको आलोकित करता है।
उनके एक उपदेश में कहा गया है—
“जो मन परम तत्व को खोजे, उसे देह का भान छोड़ना होगा। जैसे समुद्र में गोता लगाने वाला जल को छूता है, वैसे ही साधक को आत्मा के सागर में डूबना होगा।”
यहाँ समुद्र की गहराई और उसमें छिपे रत्नों की बात स्पष्ट रूप से संकेत करती है कि सत्य की प्राप्ति के लिए सतत प्रयास और समर्पण आवश्यक है।
गुरु और सेवक का परिश्रम और लाभ—
आपने (श्री दूसरी पादशाही जी) अपने गुरु श्री परमहंस दयाल जी के उपदेशों को न केवल सुना, बल्कि उसे जीवन में उतारकर उसका शत-प्रतिशत लाभ उठाया। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि गुरु की कृपा सभी पर बरसती है, किंतु उसका पूरा लाभ वही ले पाता है जो उसे ग्रहण करने के लिए तैयार होता है। श्री दूसरी पादशाही जी ने ठीक वही किया—उन्होंने गुरु की आज्ञा रूपी समुद्र में गोता लगाया और उसमें से लक्ष्य रूपी अमूल्य रत्न प्राप्त किया।
यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी परमसंत श्री कबीरदास जी के संदर्भ में वर्णित है—
संत कहते हैं कि गुरु शिष्य को आकार देने के लिए कठोरता और कोमलता दोनों का प्रयोग करते हैं। अतः शिष्य को चाहिए कि वह गुरु की हर आज्ञा को सहर्ष स्वीकार करे और उसे अपने जीवन का आधार बनाए। उनका परिश्रम समुद्र में मोती खोजने वाले गोताखोर की तरह था—जहाँ साधारण मनुष्य किनारे पर बैठकर लहरों को देखता रहता है, वहीं वे गहराई में उतरे और अनमोल रत्न लेकर लौटे।
समुद्र और रत्न का अर्थ—
इस संदर्भ में समुद्र और रत्न का प्रतीक गहन आध्यात्मिक अर्थ रखता है। समुद्र यहाँ गुरु के ज्ञान और कृपा का प्रतीक है, जो असीम और गहरा है। रत्न वह आत्मिक संपदा है, जो साधना और परिश्रम से प्राप्त होती है।
श्रीमद्भगवद् गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
अर्थात् जो श्रद्धा और संयम के साथ सत् की खोज में तत्पर रहता है, वही उसे प्राप्त करता है और शांति को पाता है। अतः गुरु सेवक को चाहिए कि वह इसी श्रद्धा और संयम के साथ गुरु के उपदेशों को आत्मसात् करे।
संत नामदेव जी की कथा—
भक्तमाल में संत नामदेव जी की कथा इस संदर्भ में प्रासंगिक है। नामदेव जी एक साधारण धोबी थे, किंतु उनकी भक्ति और गुरु के प्रति समर्पण इतना प्रबल था कि वे ईश्वर के साक्षात् दर्शन के अधिकारी बने। एक बार जब उनके गुरु विसोबा खेचर ने उन्हें भगवान विट्ठल की सेवा का आदेश दिया, तो नामदेव जी ने दिन-रात एक करके उस आज्ञा को पूरा किया। उनकी यह निष्ठा देखकर स्वयं भगवान विट्ठल प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। यह कथा दर्शाती है कि गुरु की आज्ञा का पालन और परिश्रम ही भक्त को लक्ष्य तक पहुँचाता है।
संत वाणियों से उद्धरण—
संत तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में लिखा है—
अर्थात् गुरु के बिना संसार सागर को कोई पार नहीं कर सकता, चाहे वह ब्रह्मा या शिव ही क्यों न हों। श्री दूसरी पादशाही जी ने इस सत्य को आत्मसात् करते हुए गुरु की हर बात को अपने हृदय में उतारा और उसे कार्य रूप में परिणत किया।
यहाँ गुरु और ईश्वर की एकता को रेखांकित किया गया है। सेवक सदा अपने गुरु को ही अपना आधार माने और उनके मार्गदर्शन में साधना की गहराइयों को छुए। यही सत्-मार्ग है।
परिश्रम और समर्पण का महत्व—
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि केवल गुरु की कृपा ही पर्याप्त नहीं होती; उसके साथ शिष्य का परिश्रम और समर्पण भी उतना ही ज़रूरी है। जैसे समुद्र के किनारे बैठकर कोई रत्नों की आशा नहीं कर सकता, वैसे ही बिना साधना और प्रयास के आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं। गुरु सेवक की साधना का आधार है—श्रवण, मनन और निदिध्यासन। पहले आप गुरु के वचनों को सुनो, फिर उस पर गहराई से चिंतन करो और अंत में उसे अपने जीवन में उतारो।
संत एकनाथ और जल का प्रसाद—
संत एकनाथ महाराज की एक कथा इस संदर्भ में प्रेरणादायक है। एक बार उनके गुरु ने उन्हें एक मटके में जल भरकर लाने को कहा। एकनाथ जी ने वह कार्य पूरी निष्ठा से किया, किंतु जब वे जल लेकर लौटे, तो गुरु ने वह मटका तोड़ दिया और कहा, “यह जल मुझे नहीं चाहिए।” एकनाथ जी चुपचाप फिर से जल लेने गए और यह क्रम कई बार चला। अंत में गुरु ने उनसे पूछा, “तुम बार-बार जल क्यों लाते हो ?” एकनाथ जी ने उत्तर दिया, “आपकी आज्ञा ही मेरा कर्तव्य है।” उनकी यह निष्ठा देखकर गुरु प्रसन्न हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया।
श्री परमहंस दयाल जी के उपदेशामृत की वृष्टि सभी पर समान रूप से बरसी, किंतु उसका शत-प्रतिशत लाभ श्री दूसरी पादशाही जी ने अपने परिश्रम, समर्पण और एकनिष्ठता से प्राप्त किया। यह ठीक वैसा ही है जैसे समुद्र में गोता लगाकर मोती निकालने वाला ही उसकी संपदा का अधिकारी बनता है।
( गुरु दर्शनामृत पान )
जब हम किसी भी आध्यात्मिक साधना में संलग्न होते हैं, जैसे कि श्री सद् गुरुदेव जी के दर्शन करना या भजन करना, तो वह एक पवित्र और महत्वपूर्ण क्रिया होती है। यह साधना मन, बुद्धि और आत्मा को जागरूक करने की दिशा में एक कदम है। मन को एकाग्र और शांत करना आवश्यक है क्योंकि मन ही हमें संसार से जोड़ता है और मन ही हमें संसार से मुक्त कर सकता है। जब हम चित्त को एकाग्र करते हैं, तो वह मन की अशांति, इच्छाओं और विकारों से ऊपर उठ जाता है और ध्यान के सच्चे स्वरूप को प्राप्त करता है।
इन दृष्टाँतों से यह स्पष्ट होता है कि चित्त की एकाग्रता और समर्पण ही सच्ची साधना की कुंजी है। जब साधक अपने चित्त को भजनाभ्यास के समय एकाग्र कर लेता है, तभी वह अपने आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। संत चरणदास जी ने कहा है—
मिलै सच्चिदानंद में, गहै रहै जो मौन ॥
सरल अर्थ—
· जो साधक (उपासक) अपनी सुरति (चित्त) को शरीर-भाव (शारीरिक आसक्ति या अहंकार) से अलग कर लेता है, वह सच्चिदानंद (परम सत्य, चेतना और आनंद) में लीन हो जाता है। ऐसा व्यक्ति ध्यानस्थ मौन को धारण करके परम शांति का अनुभव करता है।
व्याख्या—
1. सुरत मांहि जो जप करै—सुरत का अर्थ है मन या चित्त की अवस्था। जब सुरत की एकाग्र अवस्था, जिसमें विचार और ध्यान पूरी तरह ईश्वर पर केंद्रित हो, तभी वह ध्यान में सफलता पा सकती है। इस पंक्ति में कहा गया है कि यदि साधक पूरी एकाग्रता और निष्ठा से ईश्वर के नाम का जप करता है, तो उसका मन स्थिर हो जाता है।
2. तन सूं न्यारा जौन—इसका अर्थ है शरीर-भाव से अलग होना या शरीर की पहचान से ऊपर उठना। साधक को शरीर की मायिक बाधाओं (इंद्रियों, अहंकार, सांसारिक वासनाओं) से मुक्त होकर अपनी वास्तविक चेतना में स्थित होना चाहिए।
1. मिलै सच्चिदानंद में—सच्चिदानंद ईश्वर का स्वरूप माना जाता है, जहाँ सत्य (सत्), चेतना (चित्) और आनंद (आनंद) तीनों का पूर्ण रूप है। जब मन व शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर साधक ध्यान में लीन होता है, तो उसे इसी परम आनंद का अनुभव होता है।
2. गहै रहै जो मौन—ध्यान की गहन अवस्था में साधक बाहरी शब्दों, इंद्रियों एवं विचारों से मुक्त होकर आंतरिक मौन धारण करता है, जहाँ वह स्वयं को ईश्वर से अभिन्न रूप में अनुभव करता है।
2. दीपक और उसकी लौ—जब एक दीपक जलता है, तो उसकी लौ तब तक स्थिर रहती है जब तक कोई हवा का झोंका नहीं आता। जैसे ही हवा का झोंका आता है, लौ डगमगाने लगती है। उसी तरह, हमारा चित्त भी स्थिर रहता है, जब तक कोई बाहरी या आंतरिक विकार नहीं आता। अगर हम चित्त को एकाग्र और ध्यानमग्न रखें, तो साधना में सफलता मिलती है।
इन दृष्टाँतों से यह स्पष्ट होता है कि चित्त की एकाग्रता और समर्पण ही सच्ची साधना की कुंजी है। जब साधक अपने चित्त को भजनाभ्यास के समय एकाग्र कर लेता है, तभी वह अपने आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। संत चरणदास जी ने कहा है—
मिलै सच्चिदानंद में, गहै रहै जो मौन ॥
सरल अर्थ—
· जो साधक (उपासक) अपनी सुरति (चित्त) को शरीर-भाव (शारीरिक आसक्ति या अहंकार) से अलग कर लेता है, वह सच्चिदानंद (परम सत्य, चेतना और आनंद) में लीन हो जाता है। ऐसा व्यक्ति ध्यानस्थ मौन को धारण करके परम शांति का अनुभव करता है।
व्याख्या—
1. सुरत मांहि जो जप करै—सुरत का अर्थ है मन या चित्त की अवस्था। जब सुरत की एकाग्र अवस्था, जिसमें विचार और ध्यान पूरी तरह ईश्वर पर केंद्रित हो, तभी वह ध्यान में सफलता पा सकती है। इस पंक्ति में कहा गया है कि यदि साधक पूरी एकाग्रता और निष्ठा से ईश्वर के नाम का जप करता है, तो उसका मन स्थिर हो जाता है।
2. तन सूं न्यारा जौन—इसका अर्थ है शरीर-भाव से अलग होना या शरीर की पहचान से ऊपर उठना। साधक को शरीर की मायिक बाधाओं (इंद्रियों, अहंकार, सांसारिक वासनाओं) से मुक्त होकर अपनी वास्तविक चेतना में स्थित होना चाहिए।
1. मिलै सच्चिदानंद में—सच्चिदानंद ईश्वर का स्वरूप माना जाता है, जहाँ सत्य (सत्), चेतना (चित्) और आनंद (आनंद) तीनों का पूर्ण रूप है। जब मन व शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर साधक ध्यान में लीन होता है, तो उसे इसी परम आनंद का अनुभव होता है।
2. गहै रहै जो मौन—ध्यान की गहन अवस्था में साधक बाहरी शब्दों, इंद्रियों एवं विचारों से मुक्त होकर आंतरिक मौन धारण करता है, जहाँ वह स्वयं को ईश्वर से अभिन्न रूप में अनुभव करता है।
जून 2025
(तृष्णा का अंत करो)
कथा कारूँ बादशाह की—
संसार में ऐसा कौन होगा जिसने कारूँ बादशाह का नाम न सुना हो। लोभ और तृष्णा का प्रसंग चलने पर कारूँ का नाम अनायास ही सामने घूमने लगता है। कारूँ बादशाह लोभ, तृष्णा और हवस का पुतला था। क्यों ? क्योंकि उसने अपार धन-संपदा इकट्ठी की थी और वह भी इतने अनुचित ढंग से कि जिसका प्रमाण अन्यत्र मिलना कठिन है। इसी बुराई के कारण लोग उसे आज तक घृणा से याद करते हैं। कारूँ के राज्य में उसकी प्रजा कितनी दुखी होगी, इसका अनुमान कारूँ के इस जीवन वृत्तांत से लगाया जा सकता है।
कारूँ बादशाह एक अति धनलोलुप बादशाह था। उसके मस्तिष्क में अहर्निश धन एकत्रित करने की ही धुन लगी रहती थी। वह हर समय अपने वज़ीरों से धन एकत्र करने के उपाय ही पूछता रहता था। उसने राज्य-कोष में धन-वृद्धि करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। इस कारण उसके राज्य में प्रजा अत्यंत दुखी रहती थी। पहले तो उसने साधारण तरीकों से धन एकत्रित करना शुरू किया, जैसे—भारी कर, लगान, जुर्माना आदि। परंतु इससे उसकी तृप्ति नहीं हुई, तब उसने धन बटोरने के कुछ नए तौर-तरीके अपनाने शुरू किए, जिससे अधिक से अधिक धन उसके खज़ाने में पहुँच सके। वह अपने समय का बादशाह था और प्रजा को हर तरह से उसका हुक्म मानना ही पड़ता था। परंतु कारूँ की तृष्णा अपार धन पाकर भी दावानल की तरह बढ़ती जा रही थी।
किसी कवि ने सत्य ही कहा है—
बादशाह कारूँ को धन की तृष्णा का भूत चैन नहीं लेने दे रहा था। जब साधारण तरीकों से उसकी प्रजा का पूरा धन खज़ाने में नहीं पहुँचा, तो उसने राज्य भर में यह घोषणा करवाई कि जिसके पास जितना भी धन, सोना, जेवर आदि है, वह सब शाही खज़ाने में जमा करवा दें, अन्यथा उसे भारी दंड दिया जाएगा। प्रजा ने डर के मारे अपना सारा धन राज दरबार में पहुँचा दिया और आपस में अन्न और सामान के लेन-देन से काम चलाने लगी। लेकिन इतने पर भी कारूँ को संतोष नहीं हुआ। उसने अंततः एक और घोषणा की कि यदि किसी के पास एक रुपया भी निकला, तो उस पूरे परिवार को सूली पर चढ़ा दिया जाएगा।
इस घोषणा का परिणाम यह हुआ कि जिसने भी कुछ धन छिपा रखा था, उसने भी प्राणों के भय से दिल पर पत्थर रखकर उसे राजकोष में जमा करवा दिया। वज़ीरों और संबंधियों ने कारूँ को समझाने की बहुत कोशिश की कि प्रजा को सताना उचित नहीं है। सम्पूर्ण राज्य में लोग बहुत दुखी हो गए थे। लेकिन बादशाह ने किसी की बात नहीं मानी। उस पर धन और राज्य का मद पूरी तरह छाया हुआ था। वह यह सोच रहा था कि कैसे यह सुनिश्चित किया जा सके कि लोगों ने अपना पूरा धन राज दरबार में जमा करवा दिया है। इसके लिए उसे एक नई युक्ति सूझी। उसने फिर एक तीसरी घोषणा करवाई कि जो भी एक रुपया नकद लाएगा, उसके साथ वह अपनी पुत्री का विवाह कर देगा। यह घोषणा सुनकर पहले तो जनसाधारण हतप्रभ रह गया, क्योंकि किसी के पास रुपया था ही नहीं।
एक दिन एक मनचले नौजवान लड़के ने यह सुना कि एक रुपये में बादशाह की लड़की और अपार संपत्ति मिल सकती है, तो वह मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ और अपनी माँ के पास जाकर कहने लगा, “माँ, मुझे एक रुपया दे दो। एक रुपये में कारूँ बादशाह की लड़की मिल सकती है।” माँ ने कहा, “बेटा, रुपया कहाँ से लाऊँ ? लड़की लेने के पीछे प्राण थोड़े ही गँवाने हैं।” परंतु लड़का अपने हठ पर अड़ा रहा और रुपया लेने की ज़िद्द करने लगा। माँ ने उसे समझाया, “रुपया दिखाने पर तो बादशाह हमें सूली पर चढ़ा देगा। यह तो बादशाह की एक चाल है।”
इतना समझाने पर भी लड़के ने अपनी ज़िद्द नहीं छोड़ी और कहने लगा, “माँ, चाहे कुछ भी हो, मुझे एक रुपया ज़रूर चाहिए।”
जब लड़का किसी भी प्रकार समझाने पर नहीं माना, तो माँ ने कहा, “घर में तो रुपया है नहीं। हाँ, कुछ दिन पहले जब तुम्हारे पिता का निधन हुआ था, तो उस समय यह रिवाज था कि मुर्दे के मुँह में एक चाँदी का रुपया रखकर दफ़नाया जाता था। तुम जाकर अपने पिता की कब्र पहचान लो और कब्र खोदकर वह रुपया निकाल लो।” लड़के ने ऐसा ही किया। कब्र से रुपया निकाल कर वह बादशाह के पास पहुँचा और बोला, “बादशाह सलामत ! आप यह रुपया लीजिए और अपनी लड़की का विवाह मुझसे कर दीजिए।”
बादशाह क्रोधित होकर बोला, “मेरी पहली आज्ञा के अनुसार तो तुझे सूली पर चढ़ा दिया जाना चाहिए। बता, तूने पहले यह रुपया क्यों नहीं जमा किया ?” लड़के ने सत्य बोलते हुए पिता की कब्र से रुपया निकाल लाने की सारी बात कह सुनाई। जब राजा को पता चला कि उसके राज्य की कब्रों में भी धन दबा पड़ा है, तो वह अपने आप को नहीं रोक पाया। उसने सभी कब्रों को खुदवाने का आदेश दिया और वहाँ से चांदी के सिक्के निकलवा लिए।
इतिहास में वर्णन है कि इसी प्रकार बादशाह कारूँ ने चालीस गंज खज़ाना इकट्ठा कर लिया। पंजाबी में कहावत है—
“चाली गंज इकट्ठे कीते, आख़िर फेर उजाड़ चले।”
अंत में जब वह संसार से विदा हुआ, तो उसके पास सिवाए निराशा और अपयश के कुछ नहीं था। जब वह हाथ मलता हुआ मरा, तो प्रजा ने उसके मरने पर खुशियाँ मनाईं।
इस दृष्टाँत का सार यह है कि कारूँ जैसा बादशाह, जिसने अपार नश्वर धन संचित किया, फिर भी जीवन भर तृष्णा की आग में जलता रहा और अंत में रोता-पछताता नर्क का भागी बन गया।
मनुष्य को परमात्मा की दी हुई बुद्धि से विचार करना चाहिए कि जिस वस्तु के लिए मन छटपटा रहा है, क्या वह उसे इस लोक में सुख-शांति देगी ? जिस पदार्थ के लिए मन हर समय लालायित रहता है, क्या वह परलोक में साथ जाएगा ? बादशाह कारूँ की कथा यह शिक्षा देती है कि मनुष्य की अंतरात्मा की पुकार सच्चे रस और आनंद की है और यह केवल प्रभु-भक्ति और सच्चे-नाम के सुमिरण से ही पूरी हो सकती है।
सन्तों की वाणी हमें यह सिखाती हैं कि जब मनुष्य का मन परमात्मा की भक्ति और साधना में तल्लीन हो जाता है, तब उसे संसार के दु:ख और कष्ट प्रभावित नहीं करते। क्योंकि उसका मन भौतिक संसार के सुख-दु:ख से ऊपर उठ जाता है और वह परमात्मा के साथ जुड़ जाता है। इस जुड़ाव के कारण मनुष्य का मन हमेशा शांत और संतुष्ट रहता है।
असली सुख और शांति केवल परमात्मा की भक्ति और साधना में ही मिलती है। जब मनुष्य का मन परमात्मा की भक्ति करने के लिए उत्सुक होता है, तो वह दुनियावी दुखों से प्रभावित नहीं होता और एक अद्वितीय आनंद का अनुभव करता है।

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