श्री अमरवाणी के मुक्ताकण
अप्रैल 2026
( आत्मिक दर्पण )
(श्री परमहंस सद् गुरुदेव जी श्री तृतीय पादशाही जी की पुण्य-स्मृति में उनके पावन वचन दिए जा रहे हैं।)
मनुष्य संसार में रहते हुए साधारण तौर पर इस बात से अनजान रहता है कि वह क्या है ? और उस का संसार में आना किस कारण से हुआ है ? तथा यह अनमोल शरीर उसे क्यों मिला है ? अथवा जिस कार्य विशेष के लिए उसका संसार में आना हुआ है, वह कार्य इस जीवन में हो भी रहा है या नहीं ?
यह मानुष शरीर अति उत्तम देही है। यह एक ऐसी अनमोल वस्तु है जिसका मूल्य रत्नों और मणियों से भी अधिक है। परन्तु मनुष्य अपने इस शरीर का और अपने समय का मूल्य स्वयं नहीं जानता है।
माया और शरीर के सेवन में तथा स्वार्थपरता में लगकर यह मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को बिल्कुल भूल चुका है। इसका सब समय शरीर और इन्द्रियों के सेवन में ही व्यतीत हो रहा है और यह इस शरीर सम्बन्धी व्यवहार में इस कदर अपने आप को विलीन कर चुका है कि इससे और अधिक कुछ भी उसके ध्यान में नहीं आता।
मनुष्य जीवन के समस्त पुरुषार्थ और दौड़-धूप पर एक दृष्टि डाली जाए तो जो कुछ उसका रात-दिन का कार्यक्रम है, वह सब क्या है ? शरीर के सुख, शरीर के आराम और शरीर के सेवन में दिन-रात उलझा हुआ है। यदि कुटुम्ब-परिवार का मोह है तो वह भी शरीर ही का नाता होने से है। धन-प्राप्ति की इच्छा है तो वह भी शरीर ही के हेतु और इसके अतिरिक्त जो भी उद्यम और पुरुषार्थ इस मनुष्य के द्वारा होता या हो रहा है, वह सब शरीर के निमित्त ही है। तो क्या मनुष्य संसार में यही कुछ करने के लिए आया था ? क्या जीवन का लक्ष्य और ध्येय केवल शरीर ही का सेवन मात्र है ? इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
मान लो कि इच्छानुसार शरीर के भोग भी मिल जावें, धन-पदार्थ और कुटुम्ब-परिवार का सुख भी प्राप्त हो जावे और शरीर की मान-बड़ाई व प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो जावे; परन्तु अंत में इन सब का परिणाम क्या होगा ? यही कि शरीर मिट्टी में मिल जाएगा और जीवन की समस्त कार्यवाही भी मिट्टी में मिल जाएगी तो फिर मनुष्य की विशेषता क्या हुई ? शरीर के भोग
तथा शारीरिक ज़रूरतें तो अन्य योनियाँ भी पूरी कर रही हैं, यह कौन-सी बड़ी बात हुई ? अर्थात् अन्य योनियों को भी जब भूख-प्यास सताती है तो वे भी दौड़-धूप करके किसी न किसी प्रकार अपनी भूख-प्यास की तृप्ति का साधन प्राप्त कर ही लेते हैं। यदि मनुष्य भी उसी प्रकार शरीर और इन्द्रियों के सेवनार्थ ही दौड़-धूप करता रहा तब तो इस का जीवन भी अन्य योनियों के ही समान हुआ।
यदि कोई लाखों की जायदाद भी बना लेवे और अनेकों सम्बन्धी भी मिल जावें, तब भी क्या हुआ ? इससे पहले भी तो अनेकों जन्मों में यह जीव इस प्रकार के अनेकों सगे-सम्बन्धियों को छोड़ कर आया है। ऐसे पदार्थ और ऐसे सम्बन्ध तो अनेकों बार मिल-मिल कर बिछुड़ गए, इस जन्म में भी उन की प्राप्ति कर के मनुष्य ने कौन-सा बड़ा काम कर लिया ? सहजोबाई जी का वचन है—
॥ दोहा ॥
सोचना चाहिए कि मनुष्य वास्तव में क्या है और क्या बन बैठा है ? इस की तो उसे खबर तक नहीं। यह तो वास्तव में कुल मालिक का अंश है और इसी मानुष शरीर के द्वारा उसी कुल मालिक से मिलकर मालिक का स्वरूप बन सकता है। परन्तु यह स्वयं को शरीर मानता है। शरीर तो मिट्टी का पुतला है। यदि मनुष्य अपने को शरीर समझता और मानता है, तब तो मिट्टी की ही परख और समझ रखता है।
सन्त सद्गुरु इस भूले हुए जीव को चिताते और जगाते हैं। वे बतलाते हैं कि तू तो स्वयं सब प्रकार की शक्तियों और सब प्रकार के सुखों का भण्डार है। खेद है कि सुखों का भण्डार होकर भी तू क्यों दिन-रात दुःख और कल्पना में व्यतीत कर रहा है ? तू क्यों नहीं अपने वास्तविक स्वरूप की परख करता और अपने आप को पहचानता ? तू जो कि पाक साफ़ रूह है, अपने आप को देख और समझ ! परन्तु यह मनुष्य शरीर के झंझट में इस कदर उलझ चुका है कि इसे रूह का ध्यान तक नहीं आता, जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है।
जिस प्रकार अपने ही नेत्रों से अपना मुख किसी को दिखाई नहीं दे सकता और यदि अपना मुख देखना हो तो दर्पण या दर्शनी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अपनी आत्मा का निज स्वरूप देखने के लिए भी आत्मिक-दर्पण की आवश्यकता है।
मार्च 2026
· सेवकों का धर्म ही यही है कि हमेशा अपने इष्टदेव की पूजा-आराधना करें और उनकी आज्ञा में चलें। महापुरुषों की आज्ञा में चलने से ही सेवकों का भला है, इसी से उनको सब कुछ मिलता है।
· आम दुनिया इस चीज़ को नहीं समझती कि सद्गुरु की पूजा-आराधना करने से, उनका ध्यान करने से या उनकी आज्ञा में चलने से क्या मिलता है, आम दुनिया को पता नहीं है, लेकिन आप जैसे भाग्यशाली गुरुमुखों को ही श्री आनन्दपुर दरबार में पहुँचने का शुभ अवसर मिला है। आपको महापुरुषों की शरण मिली है, सत्संग, सेवा, भजन करने का संयोग मिला है और आप गुरुमुखजन महापुरुषों की आज्ञा के अनुसार भक्ति की कमाई कर रहे हैं।
· जब-जब भी महापुरुष संसार में अवतार लेते हैं, तो जीवों के उद्धार के लिए, कल्याण के लिए ही अवतार लेते हैं। हमारे श्री परमहंस दयाल जी महाराज की जितनी भी रचना है, वह सेवकों के कल्याण के लिए ही है। तो गुरुमुख-सेवकों का भी यही फ़र्ज़ है कि वे हमेशा अपने इष्टदेव की पूजा- आराधना करते रहें और उनकी आज्ञा में चलें।
· महापुरुषों की आज्ञा में चलने में ही सेवक का कल्याण है। जिस सेवक ने इस चीज़ को समझ लिया कि मेरा कल्याण अपने इष्टदेव की आज्ञा में चलने से है, तो वही अपना असली कार्य कर लेता है।
· आम दुनिया को इस चीज़ का ज्ञान ही नहीं है कि वक़्त के महापुरुषों की राहनुमाई की इन्सान को कितनी ज़रूरत है।
· दुनिया के लोग अपने ख़्याल से भगवान् की पूजा करते हैं, अपने ख़्याल से यात्रा करते हैं, गंगा-यमुना के घाटों पर जाते हैं और भी कई तीर्थों पर जाते हैं, वह सब भी ठीक है, लेकिन उन्हें इस चीज़ का ज्ञान नहीं है कि आत्म-कल्याण के लिए भक्ति की कमाई करने की ज़रूरत है, सेवा-सत्संग की ज़रूरत है, नाम जपने की ज़रूरत है और वक़्त के सन्त-महापुरुषों की कृपा के बग़ैर इन्सान मालिक के नाम को नहीं पा सकता। जैसे कहा है—
बिनु सतिगुर हरि नामु न लभई ।
लख कोटि करम कमाउ ॥
· चाहे कोई कितने भी उपाय कर ले, लेकिन सद् गुरु के बिना मालिक का नाम नहीं मिलता। आप गुरुमुखों को वक़्त के महापुरुषों की शरण मिली है, उनसे मालिक का नाम मिला है, तो यह समझो कि ख़ुद मालिक की कृपा हुई, तभी आपको यह दात मिली है, नाम की दीक्षा मिली है। तो आप सब गुरुमुख भाग्यशाली हैं, जिन्हें वक़्त के महापुरुषों की शरण मिली है और आप उनकी आज्ञा में चल रहे हैं।
· सेवक का यही धर्म है कि महापुरुषों की आज्ञा में चले; जैसे कहा है—
अग्या सम न सुसाहिब सेवा ।
सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
· महापुरुष फ़रमाते हैं कि हे सेवक, हे गुरुमुख ! तेरे लिए आज्ञा के समान और कोई सेवा नहीं है। सद्गुरु की आज्ञा को जो कोई मानता है, वही सेवक है और उसके लिए आज्ञा को मानना ही सबसे बड़ी सेवा है। वक़्त के महापुरुषों की आज्ञा के बिना कोई कहे कि मैं यह कर लूँ, वह कर लूँ, किसी दूसरी जगह चला जाऊँ, तो मेरा कारज पूरा हो जाएगा, नहीं।
गुरु और शिष्य वचन कर नाता ।
सो सेवक जिस वचन पछाता ॥
· सद् गुरु और शिष्य में सद् गुरु के वचन का, उनकी आज्ञा का ही नाता होता है और सेवक वही है, जो उनके वचनों की पालना करता है, उनकी आज्ञा को मानता है।
· तो आप सब सेवक हैं, गुरुमुख हैं, महापुरुषों की आज्ञा में चल रहे हैं। इसी तरह सब गुरुमुख-सेवकों का यही धर्म है कि श्री गुरु महाराज जी की आज्ञा में चलें और अपना जन्म सफल करें।
· गुरुमुखों के कल्याण के लिए हमारे श्री पंचम पादशाही श्री गुरु महाराज जी ने पाँच नियम—श्री आरती-पूजा, सत्संग, सेवा, भजन-सुमिरण और दर्शन-ध्यान निर्धारित किए हैं। इन नियमों में जो भजन-सुमिरण का नियम है, ख़ास इसके लिए हमारे श्री प्रथम पादशाही श्री गुरु महाराज जी ने सब गुरुमुखों के लिए दो घण्टे भजन-अभ्यास की आज्ञा फ़रमाई है, इसे ऐसा समझो कि यह भी सेवा दी है, तो दो घण्टे भजन-अभ्यास की इस सेवा को करना भी सब गुरुमुखों का फ़र्ज़ है।
· तो महापुरुषों की आज्ञा से सब गुरुमुख इन नियमों का पालन करके महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करें और अपना जन्म सँवारें।
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फरवरी 2026
· भाग्यशाली गुरुमुखो ! महापुरुष संसार में जीवों के कल्याण के लिए ही अवतरित होते हैं; जैसे सत्पुरुषों के वचन भी हैं—
सुख देवें दुख को हरें, दूर करें अपराध ।
कह कबीर वे कब मिलें, परम स्नेही साध ॥
· गुरुमुखो ! महापुरुषों का संसार में आना ही एक महान् कृपा है। वे संसार में अवतार धारण करके जीवों के कल्याण के लिए उपदेश देते हैं, उन्हें सुख-शान्ति का रास्ता बताकर दु:खों से मुक्त होने का उपाए बताते हैं, सही रास्ता दिखाते हैं, जिस पर चलकर जीव सुख-शान्ति को तो प्राप्त करता ही है, उसका उद्धार भी हो जाता है। वक़्त के महापुरुष ही जीव का कल्याण कर सकते हैं। वे उसे दु:खों से छुड़ाकर सच्चा सुख, शान्ति, खुशी और आनन्द देते हैं; ऐसे परोपकारी महापुरुषों से मिलन हो जाना बहुत ही भाग्यों की निशानी है।
· आप सब गुरुमुखजन बहुत ही भाग्यशाली हैं, जो आपको श्री आनन्दपुर दरबार की शरण मिली है और आपका मिलन महापुरुषों से हुआ है। जैसे महापुरुष सेवकों के लिए इतना कष्ट सहकर जीवों की भलाई में दिन-रात संलग्न हैं, उनका कल्याण करना चाहते हैं, तो गुरुमुख-सेवकों का भी यही फ़र्ज़ है कि वे इस बात को सोचें और समझें कि हमें क्या करना है। गुरुमुखजन वही कार्य करें, जिससे आत्मा का निस्तार हो; उसी रास्ते पर चलें, जिस पर चलने से आत्मा का कल्याण हो और वह रास्ता है—महापुरुषों की आज्ञा में चलना, उनके उपदेशों पर अमल करना। जो नियम-साधन महापुरुष बताते हैं, जो वचन फ़रमाते हैं, उनमें गुरुमुखों का कल्याण भरा होता है। वक़्त के महापुरुष जो रास्ता दिखाते हैं, उसी पर चलने से यह मानुष-जन्म सफल होता है।
· आपको मानुष-जन्म भी मिला, महापुरुषों से मिलन भी हुआ, सत्संगति में आकर आपको आत्म-कल्याण के साधन भी मिल गए हैं, सही रास्ता मिल गया है, तो आपका यह फ़र्ज़ हो जाता है कि महापुरुषों की आज्ञा में चलकर, इस सच्ची राह पर चलकर भक्ति की कमाई करें। भक्ति का रास्ता ही कल्याण का रास्ता है, यही सही रास्ता है। भक्ति के रास्ते पर कोई मन-मर्ज़ी करके मंज़िल पर नहीं पहुँच सकता, बल्कि इस रास्ते पर क़दम रखकर महापुरुषों की आज्ञा में, उनकी राहनुमाई में चलने से ही जीव मंज़िले-मक़सूद को पा सकता है।
· महापुरुष तो सभी को हिदायत देते हैं, लेकिन कोई विचारवान् ही, कोई भाग्यशाली ही महापुरुषों की वाणी को सुनता है, समझता है और जो समझ जाता है, उनकी शरण में पहुँच जाता है, उनकी राहनुमाई में भक्ति की कमाई करता है, तो ऐसे गुरुमुख-सेवक पर महापुरुष प्रसन्न होते हैं।
· महापुरुष तो जीवों को भक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ाते हैं, आज्ञा में चलाकर उन्हें मन-माया से छुड़ाते हैं, दु:खों से बचाते हैं, उन्हें सुखी बनाते हैं। तो इसलिए उनकी राहनुमाई में चलना ही हर एक गुरुमुख-सेवक का फ़र्ज़ है। महापुरुषों ने गुरुमुखों के लिए भक्ति के जो पाँच नियम बनाए हैं, तो किसलिए हैं ? इसीलिए हैं कि इनकी पालना करके गुरुमुखों को सुख मिले। सुख को पाने के ये साधन हैं। श्री पंचम पादशाही श्री गुरु महाराज जी ने ये जो पाँच नियम—श्री आरती-पूजा, सेवा, सत्संग, सुमिरण और दर्शन-ध्यान बनाए हैं, इनसे ही गुरुमुखों को सुख-शान्ति मिलती है, उनका कल्याण होता है।
· तो गुरुमुखों की जो भावना होती है कि हमें सुख मिले; तो उनका फ़र्ज़ है कि वे पाँच नियमों की पालना करें। भक्ति के इन पाँच नियमों की पालना करते हुए महापुरुषों की प्रसन्नता का विचार हर वक़्त सेवक के दिल में रहे। दिल में ये भावना रहे कि श्री गुरु महाराज जी हमारे लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं, तो हम भी उनकी आज्ञा में चलकर अपना जन्म सफल करें।
· श्री आनन्दपुर दरबार के सभी स्थानों पर, जैसे कि श्री आनन्दपुर, श्री प्रयागधाम, श्री सन्त नगर और जहाँ-जहाँ भी सत्संग-स्थान बने हैं, सभी स्थानों पर भक्ति के नियमों की पालना कराई जाती है। गुरुमुखजन इन पवित्र स्थानों पर पहुँचकर भक्ति के साधनों को अपनाएँ, सेवा-भाव से भक्ति करें, भजन करें। इसी तरीके से इन पाँच नियमों की पालना करते हुए महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करें और अपना जन्म सफल करें।
जनवरी 2026
· संसार की भलाई के लिए, कल्याण के लिए हमेशा ही नित्य अवतार और निमित्त अवतार प्रकट होते हैं। निमित्त अवतार किसी विशेष उद्देश्य को पूरा करने के लिए होते हैं और जीवों के हित के लिए नित्य अवतार के रूप में महापुरुषों का संसार में आना होता है।
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
· महापुरुषों के वचनों के अनुसार जो गुरुमुखजन नाम की कमाई करते हैं, उनकी आज्ञा में चलते हैं, उन्हीं को मालिक की प्राप्ति होती है। मालिक और मालिक का नाम ही सच है, उनका भजन करना ही सच की कमाई करना है।
सन्तों के वचन हैं–
साध संग में चाँदना, सकल अंधेरा और ।
सहजो दुर्लभ पाइये, सतसंगत में ठौर ॥
गुरुमुखो ! सन्त-महापुरुषों की संगत में रोशनी है। बाकी सब जगह अंधकार ही अंधकार है।
सन्त-महापुरुष ही जीव को सच्चा रास्ता, रौशनी वाला रास्ता बताते हैं। आम इंसान सोचता यही है कि मैं रौशनी वाले सही रास्ते पर जाऊँ। लेकिन उसको सही रास्ता नहीं मिलता और इसलिए वह अंधकार वाले रास्ते पर चला जाता है।
रौशनी वाला रास्ता कौन-सा है ? वक्त के महापुरुष जिस रास्ते पर जीवों को चलाते हैं, वही रौशनी वाला रास्ता होता है। इस रास्ते पर इंसान खुद नहीं चल पाता।
इसलिए गुरुमुखो ! जब तक जीव को सन्त-महापुरुषों की संगत नहीं मिलती, रौशनी वाला रास्ता नहीं मिलता, जब तक उसे यह विवेक नहीं होता कि यहाँ रौशनी है और वहाँ अंधकार है, जीव चाहते हुए भी सही रास्ते पर नहीं जा पाता। सन्त-महापुरुषों की शरण जब तक जीव को नहीं मिलती, तब तक उसे सही रास्ता नहीं मिल पाता, उसे खुशी नहीं मिलती और अज्ञानता वाले रास्ते पर जाकर वह दुःखी-परेशान होता रहता है।
वक्त के सन्त-सद्गुरु ही जीव को सच्चा रास्ता और सही रास्ता बता सकते हैं और कोई भी नहीं बता सकता। इसलिए हर गुरुमुख को चाहिए कि वह उस रास्ते पर चले जो सही, अच्छा और साफ-सुथरा है, जिस पर चलकर गुरुमुखों को शांति और सुख मिले।
आप सब गुरुमुख हैं, वक्त के महापुरुषों की संगत आपको मिली हुई है, जिस रास्ते पर आप चल रहे हैं, वही सही है।
वक्त के महापुरुष ही जीव को सच्चा रास्ता, सच्ची चीज़ बता सकते हैं। दुनिया में कोई किसी को सही चीज़ नहीं बता सकता, जो चीज़ जिसके पास है ही नहीं, वह दूसरे को क्या बताएगा। वक्त के महापुरुष ही जीव को सच्ची चीज़, सही चीज़ बताते हैं और देते हैं।
महापुरुषों के वचन हैं–
नाम सत्त जग झूठ है, सुरत शब्द पहचान ॥
महापुरुष तो हमेशा नाम वाला रास्ता ही बताते हैं, यही सही रास्ता है। दुनिया तो अन्धेरे की तरफ जा रही है, वक्त के महापुरुष ही सही रास्ता, रौशनी वाला रास्ता बताते हैं।
आप सभी गुरुमुख हैं, जिन्हें हमारे श्री श्री 108 श्री परमहंस दयाल जी महाराज की शरण मिली हुई है, उन्होंने यह जो नाम-भक्ति वाला रास्ता सबको बताया है, इसी पर चलना सभी गुरुमुखों का फ़र्ज़ है।
दो घंटे भजन जो श्री गुरु महाराज जी ने बताया है, सभी गुरुमुख दो घंटे भजन किया करें। आम इंसान नाम-भक्ति के बारे में नहीं सोचता, लेकिन वक्त के सन्त-सद्गुरु ही यह बता सकते हैं कि यह रास्ता सत्य है, इसलिए गुरुमुखो ! नाम, भक्ति और प्रेम का जो रास्ता वक्त के महापुरुष बताते हैं, उसी पर चलने से कल्याण होता है।
इसलिए सभी गुरुमुखों का यही फ़र्ज़ है कि वक्त के महापुरुषों ने जो रास्ता बताया है, इसी रास्ते पर चलें और महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करें। यही सही रास्ता है और इस रास्ते में ही सही चीज़ है, जो कोई भी सच्ची चीज़ को ढूंढता है, उसे मिल जाती है और कहीं कुछ नहीं है। अगर कोई इंसान इधर-उधर डोलता रहता है, तो उसे यह सच्ची चीज़ नहीं मिलती।
सद्गुरु की रहनुमाई में, उनकी शरण में पहुँच कर ही जीव सही रास्ते को प्राप्त करता है और इस पर चल पाता है।
इसके विषय में सभी गुरुमुख ध्यान रखें कि हमारे श्री परमहंस दयाल जी महाराज ने जो रास्ता बताया है कि दो घंटे भजन करना, मालिक की याद को दिल में बसाना और मालिक की खुशी प्राप्त करना; जब तक जीव मालिक को याद नहीं करता, श्री आज्ञा में नहीं चलता, भजन-अभ्यास नहीं करता तो वह अपनी मंज़िल पर नहीं पहुँच सकता।
इसलिए सभी गुरुमुखों का फ़र्ज़ है कि दो घंटे भजन-अभ्यास करें और श्री गुरु महाराज जी की रहनुमाई में चलकर अपना जन्म सफल करें, जिससे उनकी प्रसन्नता हासिल हो।
(दुर्लभ सत्संगति)
· भाग्यशाली गुरुमुखो ! सन्तों के वचन हैं—
साध संग में चाँदना, सकल अंधेरा और ।
सहजो दुर्लभ पाइये, सतसंगत में ठौर ॥
· कि सन्त महापुरुषों की संगति में ही रोशनी है; बाकी संसार में अंधेरा ही अंधेरा है। कौन-सी रोशनी और कौन-सा अंधेरा ? नाम की, ज्ञान की, भक्ति की रोशनी सन्त-महापुरुषों की संगति में है और संसार में मोह-अज्ञान का अंधेरा छाया हुआ है। इसलिए महापुरुष फ़रमाते हैं कि सन्तों के ही संग में यानि जहाँ पर रोशनी है, इंसान को उसी में रहना चाहिए।
· हर इंसान यह सोचता है कि मैं रोशनी की तरफ जाऊँ, अंधेरे की तरफ क्यों जाऊँ ? लेकिन इसके बावजूद भी आम दुनिया का इंसान अंधेरे की तरफ जा रहा है, जबकि—‘सकल अंधेरा और’ सारे संसार में अंधेरा छाया हुआ है। जिसको सन्त महापुरुषों की संगति नहीं मिली, ऐसा इंसान अंधेरे में जा रहा है और उसी में भटक रहा है।
· हर इंसान घर-परिवार के, रिश्ते-नातों के, कार्य-व्यवहार के मोह में फँसकर दुखी तो हो रहा है, लेकिन उससे छूट भी नहीं पा रहा, बल्कि और ज़्यादा उलझ रहा है। इसी मोह-अज्ञान को ही महापुरुषों ने अंधेरा बताया है।
· आप ही बताओ कि क्या कोई चाहेगा कि वह अंधेरे में जाए ? चाहता तो कोई नहीं, लेकिन फिर भी जा रहा है। सौभाग्य से जिसे सन्त-महापुरुषों की संगति मिल जाए, उनकी चरण-शरण मिल जाए, तो कहते हैं—‘सहजो दुर्लभ पाइये’ वे भाग्यवान् गुरुमुख होते हैं, जिन्हें सन्त-महापुरुषों की संगति मिल जाती है और यह ज्ञान हो जाता है कि यहीं पर रोशनी है, हमें रोशनी में रहना है, अंधेरे की तरफ नहीं जाना।
· तो इसलिए आप जितने भी गुरुमुख यहाँ बैठे हैं या जहाँ-जहाँ भी रह रहे हैं, सब गुरुमुख भाग्यवान् हैं कि हम श्री श्री 108 श्री परमहंस दयाल जी महाराज की चरण-शरण में पहुँचे हैं।
· श्री परमहंस दयाल जी महाराज ने श्री आनन्दपुर दरबार की जो रचना की है, वह इसलिए की है, क्योंकि वे चाहते हैं कि हमारे सेवक नाम-भक्ति की रोशनी में रहें, ज्ञानवान् बनें; वे मोह-अज्ञान के अंधेरे में न जाएँ; क्योंकि अंधेरे में ठोकरें ही ठोंकरें हैं, परेशानी ही परेशानी है, दु:ख ही दु:ख है और रोशनी में सुख ही सुख है।
· आप ही विचार करो कि क्या कोई इंसान चाहता है कि उसे दु:ख मिले ? नहीं। दु:ख कोई नहीं चाहता; सभी सुख ही चाहते हैं। इसलिए आप सब गुरुमुखों को हमारे श्री परमहंस दयाल जी महाराज ने जो रास्ता बताया है, इस पर चलते रहें। आप श्री आनन्दपुर दरबार के सेवक हैं और इसी रोशनी वाले रास्ते पर सबको चलने की ज़रूरत है।
· गुरुमुखो ! जो सही रास्ते पर चलता है, उसे भटकने का डर नहीं रहता और जो अंधेरे में चलता है, उसको हर वक्त डर रहता है कि वह कहीं गिर न जाए, कुछ बुरा न हो जाए। जो रोशनी में चलता है, उसे भरोसा होता है कि वह अपनी मंज़िल पर भी पहुँच जाएगा। इसलिए जो गुरुमुख हैं, जो वक्त के महापुरुषों की शरण में पहुँच जाते हैं, वे रोशनी में चलते हैं, उन्हें यह ज्ञान हो जाता है कि यह रास्ता सही है।
· तो इसलिए आप जितने भी गुरुमुख हैं, श्री आनन्दपुर दरबार के सेवक हैं, श्री गुरु महाराज जी ने सबको सही और साफ़-सुथरे रास्ते पर लगाया है, तो सबका फ़र्ज़ हो जाता है कि इस रास्ते पर चलें, इसी पर रोशनी है।
· श्री आनन्दपुर दरबार के जो सेवक हैं, वे अन्दाज़ा लगाकर देखें कि वे कितने भाग्यशाली हैं कि श्री गुरु महाराज जी जो भी वचन फ़रमाते हैं और सत्संग में महात्माजन जो भी वर्णन करते हैं, उन वचन-उपदेशों से गुरुमुख-सेवकों को कितनी प्रेरणा मिलती है, ज्ञान मिलता है कि वाकई ये हमें सही रास्ते पर चला रहे हैं।
· तो साफ़-सुथरा रास्ता महापुरुष ही बताते हैं, दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं है, जो सही रास्ता दिखाए और सही रास्ता वही है, जिस पर चलकर जीव मालिक की तरफ जाए, मालिक के चरणों में पहुँचे।
· इसलिए सब गुरुमुखों का फ़र्ज़ है कि श्री परमहंस दयाल जी महाराज ने जो रास्ता बताया है, उसी रास्ते पर चलते हुए अपना जन्म सफल करें और महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करें।
(नाम की सम्भाल)
· महापुरुषों के वचन हैं—
कबीर आधी साखि यह, कोटि-ग्रंथ करि जान ।
नाम सत्त जग झूठ है, सुरत शबद पहचान ॥
गुरुमुखो ! परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फ़रमाते हैं कि ‘कबीर आधी साखि यह’ थोड़े ही शब्दों में इस बात को समझो कि ‘कोटि ग्रंथ करि जान’ करोड़ों ग्रन्थों का जो सार है यानी करोड़ों ग्रन्थों में कही गई बात को थोड़े ही शब्दों में इस तरह समझो कि—
नाम सत्त जग झूठ है, सुरत शबद पहचान ॥
· कि सिर्फ मालिक का नाम ही सत्य है, बाक़ी दुनिया की जितनी भी चीज़ें हैं, वे सब असत्य हैं, झूठ हैं। गुरुमुखो ! इन्सान ऐसा समझ बैठा है कि मैं जो इस दुनिया में आया हूँ, इस दुनिया की सब चीज़ें सच हैं। लेकिन महापुरुष फ़रमाते हैं कि वह सब असत्य हैं; दुनिया और दुनिया की कोई भी चीज़ सत्य नहीं है; सिर्फ मालिक का नाम ही सत्य है। इसलिए गुरुमुखो ! मालिक के नाम को समझो, इसकी सम्भाल करो और इसकी कमाई करो।
· हमारे श्री परमहंस दयाल जी महाराज ने जो सच्चा नाम दिया है, यही सत्य है और इसकी कमाई करना ही असली कमाई है; बाकी सब चीज़ें झूठी हैं। कोई भी इन्सान यह न समझे कि दुनिया की जितनी रचना है, वह सत्य है; नहीं, नहीं। वह सब असत्य है, एक न एक दिन वह छूट जाएगी। मालिक का जो नाम है, महापुरुषों ने गुरुमुखों को जो शब्द बख़्शा है, यही सत्य है।
· आप सब गुरुमुख सच्ची चीज़ को लेना चाहते हो ?—श्री गुरु महाराज जी ने पूछा। (गुरुमुखों ने विनती की—जी, स्वामी जी।) आप सब गुरुमुख विचारवान् हैं, सच्ची चीज़ को लेने के लिए ही श्री आनन्दपुर दरबार में आए हैं, तो गुरुमुखो ! आप सच्ची चीज़ को ही लेना। क्योंकि आपकी माँग सच्ची है, सच्ची चीज़ को लेना चाहते हैं आप, तो हमारे श्री परमहंस महापुरुषों ने कृपा करके आपको जो नाम दिया है, इसको आप सबने ग्रहण किया है, सब गुरुमुख इस सच्चे नाम की कमाई करें, इसी से ही सब का बेड़ा पार हो सकता है। महापुरुषों ने फ़रमाया है—
नाम सत्त जग झूठ है, सुरत शबद पहचान ॥
· एक नाम ही सत्य है, दुनिया की बाकी सब चीज़ें असत्य हैं। आम दुनिया इस बात को नहीं समझती। हर इन्सान दुनिया और दुनिया की चीज़ों को सच समझ बैठा है कि दुनिया ही सच्ची है, उसकी हर चीज़ भी सच्ची है, लेकिन सन्त-महापुरुष फ़रमाते हैं कि सच तो सिर्फ़ मालिक का नाम है। दुनिया में रहो, कार्य-व्यवहार भी करो; कार्य-व्यवहार के लिए महापुरुष मना नहीं करते, उन्हें बहुत प्रेम से करो, लेकिन यह समझ लो कि नाम के सिवा सब कुछ असत्य है और दुनिया की सब चीज़ें दुनिया में ही रह जाने वाली हैं; सत्य तो मालिक का नाम है और साथ जाने वाली चीज़ इसी नाम की कमाई है।
· गुरुमुखो ! मालिक का नाम ही इन्सान का सच्चा साथी है, जो लोक-परलोक में उसके साथ रहता है।
गुर का सबदु रखवारे ।
चउकी चउगिरद हमारे ॥
· सद् गुरु का शब्द हर समय गुरुमुख की रक्षा करता है, सब जगह हमेशा उसके साथ रहता है, लोक में भी और परलोक में भी। इसलिए गुरुमुखो ! सच की सम्भाल करनी है, असत्य चीज़ों के पीछे नहीं पड़ना। महापुरुषों ने सब गुरुमुखों को सच्चा नाम दिया है, इसकी कमाई करो और महापुरुषों की आज्ञा में चलते हुए अपना जन्म सफल करो।
अग्या सम न सुसाहिब सेवा ।
सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
· सेवक के लिए अपने इष्टदेव की आज्ञा के समान और कोई चीज़ नहीं है। जो सेवक-गुरुमुख उनकी आज्ञा मानता है, वह निश्चय ही उनकी कृपा को, ऐसा समझो कि अपने इष्टदेव को ही पा लेता है। इसलिए आप गुरुमुखों का फ़र्ज़ है कि जब आपको वक़्त के महापुरुषों की शरण मिली है और आप सब गुरुमुख उनकी आज्ञा में चल रहे हैं, तो इसी तरह उनकी आज्ञा में चलते हुए सब गुरुमुख सच्चे नाम की कमाई करें, अपना जन्म सफल करें और महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करें।
· महापुरुषों के वचन हैं—
गुरुमुख का ध्यान हमेशा अपने इष्टदेव की तरफ़ होता है। वह देखता रहता है, ख़ुद को जाँचता रहता है कि महापुरुषों की कृपा मुझ पर हो रही है या नहीं हो रही। हर वक़्त उसकी यही इच्छा होती है कि महापुरुषों की कृपा मुझ पर बनी रहे।
महापुरुष भी देखते हैं कि जिन गुरुमुखों का ध्यान अपने इष्टदेव सद् गुरु की तरफ़ है , वे किस तरह अपनी गुरुमुखता को जतलाते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि गुरुमुखजन अपना फ़र्ज़ अदा करें। तो गुरुमुखों का फ़र्ज़ क्या है ? यही है कि वे सद् गुरु की आज्ञा में चलें। महापुरुषों ने यह केवल उदाहरण दिया है कि जैसे मणि वाले सर्प का ध्यान हमेशा मणि की सम्भाल में ही लगा होता है कि मणि कहीं उससे अलग न हो जाए, खो न जाए; वह उसकी सम्भाल करना भूलता नहीं, तो इसी उदाहरण को समझते हुए गुरुमुखजन सद् गुरु की आज्ञा को कभी नहीं भूलते, हमेशा उनका यही ख़्याल होता है कि सद्गुरु की आज्ञा से बाहर हम कोई कार्य न करें, हमेशा आज्ञा में ही रहें।
· आप सब तो गुरुमुख हैं, आपको भी हर वक़्त यही ख़्याल होता है कि हम श्री गुरु महाराज जी के सेवक हैं, तो सद् गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा करें; उसी में सेवकों का कल्याण है। सेवा की लगन ही है, जो सेवक को उसके लक्ष्य तक पहुँचाती है। जिस सेवक को सेवा की, सद् गुरु के प्यार को पाने की, उनकी कृपा को पाने की लगन लगी रहती है, वह हमेशा आज्ञा में चलता है और तभी वह सच्चे मायने में गुरुमुख कहलाता है। लेकिन अगर वह आज्ञा को भूलता है, तो—
जो कोई गुरु की अज्ञा भूलै ।
फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै ॥
सन्त सहजोबाई जी ऐसा कहती हैं कि सद् गुरु की आज्ञा को जो कोई भूलता है, वह बार-बार जन्म लेकर अनेकों कष्ट उठाता है, दुखी व परेशान रहता है। महापुरुष हमेशा यही समझाते हैं कि आप गुरुमुख हैं, आपको श्री गुरु महाराज जी की शरण मिली है और सभी गुरुमुखों का फ़र्ज़ ही यही है कि सब गुरुमुखजन उनके वचनों की पालना करें, उनकी आज्ञा में चलें। सेवकों का धर्म ही यही है कि वे महापुरुषों की आज्ञा में चलकर अपना जन्म सफल करें और उनकी प्रसन्नता हासिल करें।
· गुरुमुखो ! महापुरुषों की प्रसन्नता ऐसे ही हासिल नहीं हो जाती, जब तक इन्सान अपना मन सद् गुरु के हवाले नहीं कर देता, तब तक उसको ख़ुशी नहीं मिलती, आनन्द नहीं मिलता। ख़ुशी और आनन्द तभी मिलता है, जब वह अपना सर्वस्व अपने इष्टदेव के चरणों में समर्पित कर दे, भेंट कर दे और विनती करे कि मैं आपका ही हूँ, आपका सेवक हूँ, आपका दास हूँ। जब तक वह अपने-आपको महापुरुषों के चरणों में भेंट नहीं कर देता, उनके आगे दिल से शीश नहीं झुका देता, तब तक कारज पूरा नहीं होता।
· आप सब तो गुरुमुख हैं, महापुरुषों की आज्ञा में चल रहे हैं, सेवा-भक्ति की कमाई कर रहे हैं, आप सब गुरुमुखों पर महापुरुषों की बहुत प्रसन्नता है, बहुत कृपा है, जो आपको उनकी सेवा करने का अवसर मिला हुआ है। इसलिए सब गुरुमुख निष्काम-भाव से सेवा करते रहें, जिससे—
सद् गुरु की आज्ञा से सेवा करने पर, निष्काम-भाव से सेवा करने पर सेवकों को अपने इष्टदेव की प्रसन्नता प्राप्त होती है।
· गुरुमुखो ! आप श्री प्रयागधाम में हों या श्री आनन्दपुर धाम में हों, जहाँ भी जिसकी जो सेवा लगी हुई है, सबका यही फ़र्ज़ है कि सब सज्जन आज्ञा में चलें। पहले भी कहा है कि—
यानी जब इन्सान आज्ञा को भूल जाता है, तो वह चौरासी लाख योनियों के चक्कर में पड़ जाता है, अनेकों दु:ख भोगता है। आप सब गुरुमुख वही कार्य करें, जिसमें सुख हो, ख़ुशी हो, आनन्द हो। इसलिए ज़रूरी है कि आप सब गुरुमुख सद् गुरु की आज्ञा को न भूलें, महापुरुषों के वचन हमेशा याद रखें, सेवा करें, भक्ति की कमाई करें। इसी में सुख है, ख़ुशी है, आनन्द है, इसी कार्य को करते हुए अपना जन्म सफल करना है और महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करनी है।
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अगस्त 2025
· महापुरुषों के वचन हैं—
गुरुमुख गुरु चित्त वत रहै, जैसे मणि भुवंग ।
एक पलक बिसरै नहीं, यह गुरुमुख को अंग ॥
गुरुमुख का ध्यान हमेशा अपने इष्टदेव की तरफ़ होता है। वह देखता रहता है, ख़ुद को जाँचता रहता है कि महापुरुषों की कृपा मुझ पर हो रही है या नहीं हो रही। हर वक़्त उसकी यही इच्छा होती है कि महापुरुषों की कृपा मुझ पर बनी रहे। महापुरुष भी देखते हैं कि जिन गुरुमुखों का ध्यान अपने इष्टदेव सद् गुरु की तरफ़ है, वे किस तरह अपनी गुरुमुखता को जतलाते हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि गुरुमुखजन अपना फ़र्ज़ अदा करें। तो गुरुमुखों का फ़र्ज़ क्या है ? यही है कि वे सद् गुरु की आज्ञा में चलें। महापुरुषों ने यह केवल उदाहरण दिया है कि जैसे मणि वाले सर्प का ध्यान हमेशा मणि की सम्भाल में ही लगा होता है कि मणि कहीं उससे अलग न हो जाए, खो न जाए; वह उसकी सम्भाल करना भूलता नहीं, तो इसी उदाहरण को समझते हुए गुरुमुखजन सद् गुरु की आज्ञा को कभी नहीं भूलते, हमेशा उनका यही ख़्याल होता है कि सद् गुरु की आज्ञा से बाहर हम कोई कार्य न करें, हमेशा आज्ञा में ही रहें।
· आप सब तो गुरुमुख हैं, आपको भी हर वक़्त यही ख़्याल होता है कि हम श्री गुरु महाराज जी के सेवक हैं, तो सद् गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा करें; उसी में सेवकों का कल्याण है। सेवा की लगन ही है, जो सेवक को उसके लक्ष्य तक पहुँचाती है। जिस सेवक को सेवा की, सद् गुरु के प्यार को पाने की, उनकी कृपा को पाने की लगन लगी रहती है, वह हमेशा आज्ञा में चलता है और तभी वह सच्चे मायने में गुरुमुख कहलाता है। लेकिन अगर वह आज्ञा को भूलता है, तो—
जो कोई गुरु की अज्ञा भूलै ।
फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै ॥
सन्त सहजोबाई जी का कथन है कि सद् गुरु की आज्ञा को जो कोई भूलता है, वह बार-बार जन्म लेकर अनेकों कष्ट उठाता है, दुखी-परेशान रहता है। महापुरुष हमेशा यही समझाते हैं कि आप गुरुमुख हैं, आपको श्री गुरु महाराज जी की शरण मिली है और सभी गुरुमुखों का फ़र्ज़ ही यही है कि सब गुरुमुखजन उनके वचनों की पालना करें, उनकी आज्ञा में चलें। सेवकों का धर्म ही यही है कि वे महापुरुषों की आज्ञा में चलकर अपना जन्म सफल करें और उनकी प्रसन्नता हासिल करें।
· गुरुमुखो ! महापुरुषों की प्रसन्नता ऐसे ही हासिल नहीं हो जाती, जब तक इन्सान अपना मन सद् गुरु के हवाले नहीं कर देता, तब तक उसको ख़ुशी नहीं मिलती, आनन्द नहीं मिलता। ख़ुशी और आनन्द तभी मिलता है, जब वह अपना सर्वस्व अपने इष्टदेव के चरणों में समर्पित कर दे, भेंट कर दे और विनती करे कि मैं आपका ही हूँ, आपका सेवक हूँ, आपका दास हूँ। जब तक वह अपने-आपको महापुरुषों के चरणों में भेंट नहीं कर देता, उनके आगे दिल से शीश नहीं झुका देता, तब तक कारज पूरा नहीं होता।
· आप सब तो गुरुमुख हैं, महापुरुषों की आज्ञा में चल रहे हैं, सेवा-भक्ति की कमाई कर रहे हैं, आप सब गुरुमुखों पर महापुरुषों की बहुत प्रसन्नता है, बहुत कृपा है, जो आपको उनकी सेवा करने का अवसर मिला हुआ है। इसलिए सब गुरुमुख निष्काम-भाव से सेवा करते रहें, जिससे—
सेवा करत होइ निहकामी ।
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
सद्गुरु की आज्ञा से सेवा करने पर, निष्काम-भाव से सेवा करने पर सेवकों को अपने इष्टदेव की प्रसन्नता प्राप्त होती है।
· गुरुमुखो ! आप श्री प्रयागधाम में हों या श्री आनन्दपुर धाम में हों, जहाँ भी जिसकी जो सेवा लगी हुई है, सबका यही फ़र्ज़ है कि सब सज्जन आज्ञा में चलें। पहले भी कहा है कि—
जो कोई गुरु की अज्ञा भूलै ।
फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै ॥
यानी जब इन्सान आज्ञा को भूल जाता है, तो वह चौरासी लाख योनियों के चक्कर में पड़ जाता है, अनेकों दु:ख भोगता है। आप सब गुरुमुख वही कार्य करें, जिसमें सुख हो, ख़ुशी हो, आनन्द हो। इसलिए ज़रूरी है कि आप सब गुरुमुख सद् गुरु की आज्ञा को न भूलें, महापुरुषों के वचन हमेशा याद रखें, सेवा करें, भक्ति की कमाई करें। इसी में सुख है, ख़ुशी है, आनन्द है। इसी कार्य को करते हुए अपना जन्म सफल करना है और महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करनी है।
जुलाई 2025
· जो भाग्यशाली जीव महापुरुषों की चरण-शरण में पहुँच जाते हैं और महापुरुषों के मुखारविन्द से जो वचन निकलते हैं, उनको मानते हैं, उनकी पालना करते हैं, वे जीव गुरुमुख कहलाते हैं।
· भाग्यशाली गुरुमुखो ! महापुरुष हमेशा सत्य उपदेश देते हैं, सही रास्ता दिखाते हैं, असलियत की पहचान कराते हैं।
· महापुरुष कथन करते हैं—
नानक कचड़िआ सिउ तोड़ि ढूढि सजण संत पकिआ ॥
ओइ जीवंदे विछुड़हि ओइ मुइआ न जाही छोड़ि ॥
कि गुरुमुखो ! जो कच्ची चीज़ें हैं, झूठी चीज़ें हैं, उनका त्याग करो और जो हमेशा साथ निभाने वाली है, स्थायी है, उसकी खोज करो। स्थायी चीज़ कौन-सी है ? मालिक का नाम है, अपने इष्टदेव का शब्द है और यह कहाँ से मिलता है ? सन्त-महापुरुषों से। इसलिए सन्त-महापुरुषों की चरण-शरण ग्रहण करो। वे ही गुरुमुख को सच्ची चीज़, मालिक का नाम देते हैं। संसार की सब चीज़ें इसी संसार में उससे बिछुड़ जाती हैं, कभी न कभी तो साथ छोड़ ही देती हैं, लेकिन मालिक का नाम इस लोक में भी उसका साथ निभाता है और परलोक में भी सहाई होता है।
· गुरुमुखों को रूहानी फ़ैज़ मिलता रहे, वे ऐसी कमाई करें, जो सच्ची हो, स्थाई हो; इसीलिए हमारे श्री परमहंस दयाल जी महाराज ने श्री आनन्दपुर दरबार की रचना रचाई है, जिसमें आकर गुरुमुख जन रूहानी फ़ैज़ उठा रहे हैं। श्री आनन्दपुर, श्री प्रयागधाम, जगह-जगह और भी स्थान बने हैं; ये किसलिए हैं ? ये सब गुरुमुखों के लिए हैं, जहाँ पहुँचकर गुरुमुखजन महापुरुषों के दर्शन कर रहे हैं, भक्ति की कमाई के लिए उनके बनाए हुए साधनों को अपना रहे हैं, उनकी आज्ञा में चल रहे हैं और महापुरुषों से रूहानी फ़ैज़ उठा रहे हैं।
· महापुरुष हमेशा यही चाहते हैं कि गुरुमुखजन ऐसी चीज़ को ग्रहण करें, जो हमेशा साथ निभाने वाली हो, परलोक में साथ जाने वाली हो, जो दायमी हो। वह क्या है ? वह है—वक़्त के महापुरुषों का नाम, उसकी कमाई। नाम की कमाई ही साथ निभाती है, उसके साथ परलोक में जाती है। इसीलिए महापुरुष गुरुमुखों को बार-बार फ़रमाते हैं कि नाम की कमाई करो। आप गुरुमुखों ने नाम लिया हुआ है, गुरुमुखजन हमेशा नाम की कमाई करें। गुरुमुख जब नाम की कमाई करते हैं, तो महापुरुषों को ख़ुशी होती है कि गुरुमुखजन महापुरुषों की चरण-शरण में पहुँचकर नाम की कमाई कर रहे हैं। इसी नाम की कमाई करने से ही सब कुछ मिलता है, इसी में सब सुख समाए हुए हैं और इसकी कमाई ही जीव के साथ जाती है।
· दुनिया में और कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो उसे सुख दे, हमेशा उसका साथ निभाए और परलोक में भी साथ जाए। यही नाम की कमाई ही साथ जाने वाली चीज़ है, इसकी कमाई करो, इस को अपने हृदय में दृढ़ करो। बाक़ी सब चीज़ें जो हैं, वे यहीं रह जाती हैं; बस, महापुरुषों के दिए हुए नाम की कमाई ही साथ जाती है।
साथि न चालै बिनु भजन बिखिआ सगली छारु ॥
हरि हरि नामु कमावना नानक इहु धनु सारु ॥
· गुरुमुखो ! नाम की कमाई जो है, इसके बग़ैर और कुछ भी जीव के साथ नहीं जा सकता। संसार की कोई भी चीज़ जीव के साथ नहीं जाती। नाम की कमाई ही सार धन है, साथ जाने वाला धन है, इसी को इकट्ठा करना है। इसीलिए नाम की कमाई करने के लिए गुरुमुखों को महापुरुष हमेशा हिदायत करते हैं कि भजन किया करो, श्री आरती-पूजा किया करो, सत्संग, दर्शन, सेवा किया करो; यही वे कर्म हैं, जो जीव को बन्धन से छुड़ाने वाले हैं। यही असली कमाई है, इसी को याद रखना है और महापुरुषों के वचनों के अनुसार यही असली कमाई करनी है।
· यहाँ जितने गुरुमुखजन बैठे हैं और भी संसार में जहाँ कहीं भी गुरुमुख रहते हैं, वे इसीलिए गुरुमुख हैं कि वे सद् गुरु की आज्ञा में चलते हैं। महापुरुषों के यही वचन हैं कि श्री आज्ञा की पालना करो और जो श्री गुरु-दरबार के नियम बने हुए हैं, उनकी पालना करो और महापुरुषों की प्रसन्नता हासिल करो।
जून 2025
(सेवक का फ़र्ज)
सो प्रसादु जन पावै देवा ॥
इष्टदेव की आज्ञा को मानने के समान कोई और सेवा नहीं है। जिस सेवा को करने का हुक्म हो, जब सेवक उसी सेवा को करता है, तो उसे महापुरुषों की प्रसन्नता प्राप्त होती है और वही सेवक के लिए सुखदायी भी होती है। महापुरुष ही जानते हैं कि सेवक का कल्याण कैसे हो सकता है। इसलिए सच्चे सेवक भी यही चाहते हैं कि महापुरुषों के मार्गदर्शन में चलें और जो आज्ञा हो, उसी के अनुसार सेवा करें, जिससे उनकी प्रसन्नता भी मिले।
तिस कउ होत परापति सुआमी ॥
गुरुमुखो ! सेवा तो करनी है, यह भी ख़्याल रहे कि सेवा को निष्काम-भाव से करना है। ऐसे ऊँचे विचार जब गुरुमुखों को मिलते हैं और गुरुमुखजन महापुरुषों की आज्ञा के अनुसार निष्काम-भाव से सेवा करते हैं, तो वे अपने इष्टदेव को पा लेते हैं, उनकी प्रसन्नता के पात्र बन जाते हैं; ऐसे गुरुमुख ही श्रेष्ठ होते हैं। इसलिए महापुरुष गुरुमुखों को यह हिदायत देते हैं कि अपना सेवक-धर्म निभाओ, आज्ञा में रहो, इसी में आत्मा का कल्याण है।

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