अद्वैत चिंतन माला


 अद्वैत चिंतन माला 

दिसम्बर 2025

(बुद्धि और विवेक का उपयोग)

मनुष्य का अंतःकरण एक अंतरंग सभा के समान है, जिसमें चार महत्वपूर्ण सदस्य होते हैं—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। प्रत्येक सदस्य की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है। जब कोई संकल्प उठता है, तो मन उसे प्रस्तुत करता है, बुद्धि उस पर विचार करके निर्णय लेती है, चित्त उसे स्मृति में रखता है, और अंततः अहंकार उस निर्णय के अनुरूप कर्म करता है। यदि यह क्रम सही दिशा में चलता है तो जीवन में उत्तम कर्मों की प्रधानता होती है और यदि यह क्रम विपरीत दिशा में जाता है तो निकृष्ट कर्मों की उत्पत्ति होती है।

गीता और उपनिषदों में बुद्धि का महत्व

योग: कर्मसु कौशलम् ।

अर्थात् योग का अर्थ है कर्मों में कुशलता। यह कुशलता तभी आती है जब बुद्धि सही निर्णय ले। श्रीकृष्ण आगे फ़रमाते हैं कि जो व्यक्ति अपनी बुद्धि को सही मार्ग पर केंद्रित करता है, वह जीवन के उत्थान की ओर बढ़ता है। वहीं, जो बुद्धि मोह और विकारों में फँस जाती है, वह पतन का कारण बनती है।

उपनिषदों में भी बुद्धि की महत्ता को समझाया गया है। कठोपनिषद में आत्मा, बुद्धि, मन और इंद्रियों की तुलना एक रथ, सारथी और घोड़ों से की गई है। इसमें आत्मा को रथी, बुद्धि को सारथी, मन को लगाम और इंद्रियों को घोड़े बताया गया है। यदि सारथी यानी बुद्धि सजग है तो मन और इंद्रिया सही मार्ग पर चलते हैं, अन्यथा वे भटक जाते हैं।

संत भी सबको समझाते हैं कि बुद्धि को  आत्म-मंथन की ओर लगाना चाहिए। यदि हम बाहरी दोष ढूंढने के बजाए अपनी बुद्धि को परखें, तो हमें अपने ही भीतर सुधार की आवश्यकता दिखाई देगी। यही आत्म-बोध हमें श्रेष्ठ कर्मों की ओर ले जाता है।

व्यावहारिक दृष्टिकोण और उदाहरण—

एक राजा के दो पुत्र थे। एक पुत्र अपनी बुद्धि को सद्-विवेक और धर्म के मार्ग में लगाता था, जबकि दूसरा विलासिता और अहंकार में। पहला पुत्र न्यायप्रिय राजा बना और प्रजा का हितैषी रहा, जबकि दूसरा अपने अहंकार और दुर्बुद्धि के कारण पतन की ओर चला गया। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य का उत्थान और पतन उसकी बुद्धि के निर्णयों पर निर्भर करता है।

बुद्धि को सद्गुणों से परिपूर्ण करने के उपाय—

1.  सत्संग और सद्ग्रंथों का अध्ययन—सभी सत्संग ग्रंथ श्रीमद्भगवद् गीता, उपनिषद, रामायण आदि धर्मग्रंथों का अध्ययन करके उनसे सार तत्व को ग्रहण कर लेना चाहिए। इससे बुद्धि को सही दिशा दी जा सकती है।

2. ध्यान और मनन—रोज़ाना ध्यान और आत्म-चिंतन करना बुद्धि को स्थिर और सकारात्मक बनाने के लिए होता है।

3. संतों और गुरुजनों के मार्गदर्शन में रहना—संतों के वचन और उनके जीवन से प्रेरणा लेकर हम अपनी बुद्धि को उत्तम बना सकते हैं।

4. अहंकार को त्यागना—अहंकार बुद्धि को दूषित कर देता है, इसलिए विनम्रता अपनाना आवश्यक है।

मनुष्य का अंतःकरण यदि सही दिशा में संचालित होता है, तो उसका जीवन श्रेष्ठ बनता है। मन संकल्प उठाता है, बुद्धि निर्णय लेती है, चित्त उसे संजोता है और अहंकार उसके अनुसार कार्य करता है। यदि बुद्धि सत्य और धर्म के अनुरूप निर्णय ले, तो जीवन उन्नति की ओर बढ़ता है। अतः हमें अपनी बुद्धि को शुद्ध और सद्-विवेक युक्त बनाने का सतत प्रयास करना चाहिए।

बुद्धि का सदुपयोग ही जीवन का सर्वोत्तम मार्ग है।

 


 नवम्बर 2025

( संत ईश्वर रूप हैं ) 

            श्री परमहंस दयाल जी ने एक दिन वचन फ़रमाए कि भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद्गवद् गीता में यह कथन किया है कि सन्त मेरा ही रूप हैं, नित्य अवतार के रूप में सदा मैं सन्त रूप में धरती पर विद्यमान रहता हूँ। परंतु यह परख केवल संस्कारी भक्तों को ही हुआ करती है, वे उनकी श्रद्धा-भाव से सेवा करके लोक और परलोक के सभी सुख सहज ही पा लिया करते हैं।

संत रूप में श्री भगवान की उपस्थिति और श्रद्धा-भाव का महत्व—

श्री परमहंस दयाल जी के वचन अत्यंत गूढ़ और महत्वपूर्ण हैं, जो श्रीमद्भगवद् गीता के गूढ़ सिद्धांतों को हमारे समक्ष सरल रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका यह कथन है कि ‘संत मेरा ही रूप हैं’ श्रीकृष्ण के वचनों को दर्शाता है, जहाँ भगवान ने स्वयं यह प्रतिज्ञा की है कि वे सदा संत स्वरूप में इस धरती पर विद्यमान रहते हैं। इस कथन में आध्यात्मिक दर्शन का गहरा अर्थ छिपा हुआ है, जो भक्त और साधकों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है।

संत की पहचान और उनकी महिमा—

भगवान के इस कथन का सीधा अर्थ यह है कि संत ही परमात्मा का साकार रूप होते हैं। वे केवल एक साधारण व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वे ईश्वरीय ज्ञान को प्रदान करने वाले होते हैं। संत वह दीपक हैं जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्मा को प्रकाशमय बना देते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है—

संत बिना जग अंध है, संत बिना जग जाल ।
संत बिना गति न मिले, संत ही सदा प्रतिपाल ॥

इसका अर्थ है कि संतों के बिना संसार अंधकारमय है, क्योंकि वे ही सच्चे मार्गदर्शक होते हैं। संतों का संग और उनकी सेवा से जीव का लोक-परलोक सुधर जाता है। इसके कई उदाहरण हमें धर्म-ग्रंथों और इतिहास में मिलते हैं।

संत सेवा का फल और श्रद्धा-भाव—

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में फ़रमाया है कि जो श्रद्धा से भक्ति करता है, वही सच्चे आनंद को प्राप्त करता है—

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥

अर्थात जो मुझे हर जगह देखता है और जो मुझमें भगवान को देखता है, वह मुझसे कभी दूर नहीं होता और मैं भी उससे दूर नहीं होता। संत की सेवा करने से भक्त को सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उपलब्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। यह केवल धन या वस्त्र दान करना नहीं, बल्कि श्रद्धा, समर्पण और प्रेम से उनकी सेवा करना है।

श्रद्धा की शक्ति—

श्रद्धा ही वह तत्व है जो एक साधारण मनुष्य को भी भगवान के समीप पहुँचा सकती है। उदाहरण के लिए, मीरा बाई ने केवल अपनी श्रद्धा से भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त किया। उन्होंने समाज की परवाह नहीं की, केवल संतों और साधुओं के मार्गदर्शन को अपनाया। इसी प्रकार, तुलसीदास जी ने गोस्वामी नरहरि दास जी की कृपा से श्री रामचरितमानस की रचना की।

श्रद्धा से किया गया कर्म शुभ होता है, लेकिन यदि सेवा में श्रद्धा नहीं है और केवल स्वार्थ के लिए की जा रही है, तो वह फलदायी नहीं होती। यह बात श्रीमद्भगवद् गीता में भी स्पष्ट कही गई है—

सकाम कर्म शुभाय न भवति, निष्काम कर्म परम फलदायी भवति।

अर्थात् सकाम कर्म बाहरी दिखावे और लाभ के लिए किया जाता है, जिससे अंतत: दु:ख या भ्रम मिलता है। इसके विपरीत निष्काम कर्म आत्मा की शुद्धि, मन की शांति और परम आनन्द का कारण बनता है। यही सच्चा कर्मयोगी कहलाता है।

बिना श्रद्धा के कर्म का परिणाम—

यदि सेवा केवल स्वार्थ पूर्ति के लिए की जाती है, तो वह किसी भी प्रकार से फलदायी नहीं होती। उदाहरण स्वरूप, रावण ने कठोर तपस्या की और अनेक वरदान प्राप्त किए, लेकिन उसकी भक्ति श्रद्धा रहित थी। उसका उद्देश्य केवल शक्ति अर्जन करना था, न कि भगवान की कृपा प्राप्त करना। इसी कारण अंततः उसका पतन हो गया।

दूसरी ओर विदुर जी जैसे भक्तों ने केवल श्रद्धा के बल पर ही भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात्कार पाया। जब श्रीकृष्ण उनके घर पधारे, तो विदुरानी ने प्रेम और श्रद्धा से केले के छिलके ही उन्हें खिला दिए, और भगवान ने उन्हें बड़े प्रेम से स्वीकार भी किया।

संतों की पहचान केवल संस्कारी भक्तों को होती है। भगवान का यह कथन है कि संत की पहचान केवल संस्कारी भक्त ही कर सकते हैं, पूर्णतः सत्य है। यह सत्य हमें कई उदाहरणों से समझ आता है—

श्री गुरु नानक देव जी का जीवन—जब वे सत्संग करते थे, तो उनके उपदेशों को केवल सच्चे श्रद्धावान ही समझ पाते थे, जबकि अज्ञानी लोग उनकी महिमा को नहीं पहचान सके।

परमसंत श्री कबीर साहिब जी—उनके समय में कई पंडित और विद्वान् उनके वचनों का तिरस्कार करते थे, लेकिन जो सच्चे श्रद्धालु थे, उन्होंने उनकी शिक्षाओं का लाभ उठाया।

श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद—जब स्वामी विवेकानंद पहली बार श्री रामकृष्ण परमहंस के पास गए, तो वे उनकी संत महिमा को पहचानने में असमर्थ थे। लेकिन जब उन्होंने श्रद्धा-भाव से उनकी सेवा की, तो उन्हें दिव्य अनुभव प्राप्त हुए और वे महान् संत बने।

निष्कर्ष—

श्री परमहंस दयाल जी के वचन हमें यह सिखाते हैं कि संत केवल देह नहीं, बल्कि भगवान का प्रत्यक्ष रूप होते हैं। उनके प्रति श्रद्धा और सेवा से जीव को अपार सुख और शांति प्राप्त होती है। बिना श्रद्धा के कोई भी सेवा सार्थक नहीं होती और उसका परिणाम भी शुभ नहीं हो सकता। इसलिए, हमें अपने जीवन में संतों की सेवा, उनके वचनों पर विश्वास और श्रद्धा से कर्म करने का संकल्प लेना चाहिए। यही सच्ची भक्ति और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग है।

संत सेवा और श्रद्धा का चमत्कार—

संतों की सेवा और उनके प्रति श्रद्धा से व्यक्ति को न केवल आध्यात्मिक लाभ होता है, बल्कि जीवन में भी चमत्कारिक परिवर्तन आते हैं। इस संदर्भ में दो प्रसिद्ध कथाएँ प्रेरणादायक हैं।

1. एक भक्त और संत का आशीर्वाद

एक बार की बात है, एक निर्धन व्यक्ति गाँव के प्रसिद्ध संत की सेवा करता था। वह हर दिन उनके लिए भोजन लाता, उनके आश्रम की सफाई करता और उनकी वाणी को ध्यान से सुनता। लेकिन उसका जीवन अत्यंत कठिनाइयों से भरा था। एक दिन संत ने प्रसन्न होकर कहा, वत्स ! तुम्हारी श्रद्धा और सेवा का फल शीघ्र मिलेगा। कुछ ही दिनों बाद, राजा ने गाँव में एक बड़ा आयोजन किया और इस भक्त की ईमानदारी देखकर उसे अपने दरबार में उच्च पद पर नियुक्त कर दिया। संत की सेवा और श्रद्धा के कारण उसकी दरिद्रता समाप्त हो गई और उसका जीवन आनंदमय हो गया।

2. नानक जी और श्रद्धावान सेठ

गुरु नानक जी के पास एक धनिक सेठ आए, परंतु वे उन्हें केवल परीक्षा के रूप में देखते थे। गुरुजी ने उन्हें एक सिक्का देकर कहा, इसे जाकर किसी सच्चे संत को दो। सेठ ने कई साधुओं को देखा लेकिन उसे कोई पूर्ण संत नहीं लगा। अंततः वह गुरु नानक जी के पास लौटे और श्रद्धापूर्वक सिक्का उन्हीं को सौंप दिया। गुरु जी मुसकराए और कहा, सच्चे संत को पहचानना कठिन है, लेकिन जो सच्ची श्रद्धा से समर्पित होता है, उसे सच्चे संत स्वयं मिल जाते हैं।

इन कथाओं से स्पष्ट है कि संतों की सेवा और श्रद्धा से जीवन में चमत्कार होते हैं और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

अक्टूबर 2025

(आत्म-ज्ञान बिना सुख न मिले)

श्री परमहंस दयाल जी के पावन वचनों में मनुष्य की भौतिक और आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का गहन विश्लेषण मिलता है। उनके अनुसार, मनुष्य सांसारिक कार्यों में अत्यंत सावधानी और लगन से जुटा रहता है, किंतु परमार्थ के मार्ग पर चलने के लिए न तो उसके भीतर उत्साह होता है और न ही किसी योग्य गुरु की खोज करने की इच्छा होती है। आत्म-मुग्धता के कारण वह स्वयं को सर्वज्ञ समझ लेता है, जबकि वास्तविकता यह है कि बिना साधना के  आत्म-ज्ञान प्राप्त करना असंभव है।

आत्म-ज्ञान की राह—

मनुष्य-जीवन ईश्वर की अनुपम देन है। यह केवल खाने, पीने, भोगने और संग्रह करने के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को पहचानने और परम सत्य की प्राप्ति के लिए मिला है। परंतु विडंबना यह है कि मनुष्य जितनी सावधानी, बुद्धिमत्ता और लगन से सांसारिक कार्यों में जुटता है, उतनी ही लापरवाही और उपेक्षा वह आत्म-कल्याण के मार्ग में करता है। श्री परमहंस दयाल जी के पावन वचनों में इस तथ्य का अत्यंत गूढ़ विश्लेषण मिलता है। वे फ़रमाते हैं–
मनुष्य अपने लौकिक जीवन में तो गणना, योजना, लाभ-हानि और समर्पण से भरपूर रहता है; लेकिन आध्यात्मिक यात्रा में न तो उत्साह दिखाता है, न ही योग्य मार्गदर्शक की खोज करता है।

संसार के कार्यों में लगन, परमार्थ में प्रमाद—

मनुष्य यदि किसी नौकरी के लिए प्रयास करता है, तो वह प्रातः से सायं तक तैयारी करता है, कठिन परीक्षाएँ देता है, इंटरव्यू में चयन हेतु रात-दिन एक कर देता है। लेकिन आत्म-ज्ञान के लिए—

·  ना समय निकालता है,

·  ना कोई साधना करता है,

·  और ना ही किसी सत्पुरुष के सान्निध्य की खोज करता है।

संत तुलसीदास जी ने कथन किया है—

रे मन सब सों निरसि के, सरसि राम सों होहि ।
भले सिखावन देत हैं, निशिदिन तुलसी तोहि

यह सीख अपने मन को ही संत तुलसीदास जी दे रहे हैं कि हे मन ! समस्त संसार के झूठे सुखों से अपना मुँह मोड़कर प्रभु चरणों में लग जा, यह तेरे भले की बात है।

गुरु की उपेक्षा और आत्म-मुग्धता—

वर्तमान युग में ज्ञान के साधन प्रचुर हैं। पुस्तकें, यूट्यूब, गूगल–सब कुछ उपलब्ध है। परंतु क्या इनसे आत्म-बोध हो सकता है ?

श्री परमहंस दयाल जी फ़रमाते हैं—ज्ञान केवल पढ़ने से नहीं आता; वह भीतर के नेत्र खुलने से आता है और भीतर के नेत्र खोलने का यह कार्य पूर्ण सद्गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने से ही हो सकता है।

श्री रामचरितमानस में लिखा है–

बिनु हरि कृपा मिलहिं न संता ।

अर्थ—भगवान की कृपा के बिना संतों का संग नहीं मिलता। संत सद् गुरु वह दर्पण हैं जिसमें आत्मा अपना स्वरूप देखती है।

दृष्टांत (धनी व्यापारी और संत का संवाद)

एक बार एक धनी व्यापारी एक प्रसिद्ध संत के पास पहुँचा और बोला—महाराज ! मैं करोड़पति हूँ, सब कुछ है मेरे पास—परंतु शांति नहीं है।

संत मुस्कराए और बोले—क्या तुमने कभी आत्मा की  खोज की है ?

व्यापारी बोला—मैं आत्मा की खोज क्यों करूँ ? मुझे तो अभी बहुत धन कमाना है।

संत बोले—तभी तो अशांति है, तुमने बाहर की सारी चीज़ें बटोरीं, पर भीतर कुछ नहीं देखा। बाहर की दौलत अंतहीन है, जितनी मिलेगी, भूख और बढ़ेगी; पर भीतर की दौलत अनमोल है। एक बार मिल गई तो सब कुछ तृप्त हो जाएगा।

व्यापारी ने उसी दिन से साधना प्रारंभ कर दी। संयमपूर्वक जीवन जीते हुए नाम-सुमिरण करने लगा। बड़ी रुचि और शौक से अभ्यास किया। इस प्रकार जीवन जीने से कुछ ही वर्षों में उसकी आँखों में स्थायी शांति और संतोष आ गया।

भौतिकता की दौड़ और आत्मा की भूख—

आज के समय में मनुष्य ने बहुत कुछ प्राप्त कर लिया है। बड़े बंगले, महंगी गाड़ियाँ, अनेक सुख-सुविधाएँ, यश और प्रतिष्ठा—लेकिन आत्मा भीतर से तृप्त नहीं है। क्यों ? क्योंकि उसने आत्मा को पहचाना ही नहीं। आत्मा की भूख केवल आत्म-ज्ञान से मिटती है, वस्तुओं से नहीं।

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं–

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन ।
    (अध्याय 2, श्लोक 45)

अर्थ—हे अर्जुन ! वेद त्रिगुणों (सत्, रज, तम) के विषयों से सम्बंधित हैं; परंतु तू उनसे परे हो जा।

जो केवल विषयों में लिप्त है, वह आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता।

साधना के बिना आत्म-ज्ञान असंभव

श्री परमहंस दयाल जी स्पष्ट फ़रमाते हैं कि—
आत्म-ज्ञान केवल बुद्धि से नहीं, अनुभव से आता है। अनुभव साधना से आता है, और साधना योग्य गुरु के निर्देशन में ही सफल होती है।

साधना का अर्थ केवल जप-तप नहीं—

·  यह तो आत्म-निरीक्षण है,

·  विचारों की शुद्धि है,

·  क्रोध, लोभ, अहंकार का त्याग है।

श्री परमसंत कबीर साहिब जी ने कहा है—

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहे, थोथा देई उड़ाय ॥

अर्थ—सच्चा गुरु वही है जो जीवन के सार तत्व को ग्रहण कराए और व्यर्थ बातों को विलोपित कर दे।

संतवाणी में आत्म-ज्ञान की चेतना

सन्त कहते हैं—

गुरु बिनु ज्ञान न ऊपजै, गुरु बिनु मिलै न मोक्ष ।
गुरु बिनु लहि न राम पद, गुरु बिनु मिटै न दोष ॥

गुरु आत्मा के उस रहस्य को खोलते हैं, जिसे हम केवल शास्त्र पढ़कर नहीं समझ सकते।

निष्कर्ष—

· मनुष्य संसार की हर चीज़ पाने के लिए परिश्रम करता है, जबकि आत्मा की शांति के लिए भी उतने ही श्रम की आवश्यकता है।

· आत्म-ज्ञान केवल जानकारी नहीं, जागृति है।

· सच्चा गुरु वह दीपक है जो हमारे आंतरिक अंधकार को मिटाता है।

 



सितम्बर 2025

( जैसी भावना वैसा फल )

 

श्री परमहंस दयाल जी के पावन वचन हैं कि—

· संसार में बहुत से मनुष्य दूसरों को क्षमा करते हैं, परंतु धर्म के विचार से नहीं बल्कि स्वयं को ऊँचा दिखाने के कारण करते हैं।

· संसार में बहुत से मनुष्य घर क सुख-सुविधाओं को भी त्याग देते हैं, परंतु वैराग्य अथवा संतोष के कारण नहीं बल्कि व्यवहार-व्यापार के हानि-लाभ के कारण करते हैं।

· संसार में बहुत से मनुष्य सर्दी-गर्मी आदि सहन कर लेते हैं, परंतु तपस्या के तौर पर नहीं बल्कि धन-संपत्ति जोड़ने के विचार से करते हैं। 

उक्त प्रकार के बहुत से काम—दूसरों को क्षमा करना, सुख-सुविधाओं का त्याग करना और सर्दी-गर्मी या भूख-प्यास आदि सहन करना मुनियों और तपस्वियों के जैसे कर्म हैं, परंतु संसारी लोग तपस्या की भावना से ये कार्य नहीं करते बल्कि किसी न किसी प्रलोभन से करते हैं। अब ये सब कर्म—क्षमा, तप और सहनशीलता आदि मुनियों या तपस्वियों जैसे होते हुए भी उन्हें आत्मिक उन्नति का वह फल नहीं देते जो मुनियों को मिलता है। क्योंकि मुनि और तपस्वी तो आध्यात्मिक उन्नति के लिए ही क्षमा, तप और सहनशीलता का आचरण करते हैं, जबकि संसारी लोग यह कर्म किसी प्रलोभन से करते हैं। कर्म एक जैसे होते हुए भी दोनों को फल पृथक्-पृथक् मिलता है।

इससे यह निश्चित हो जाता है कि कर्म का फल सदा मन की भावना पर निर्भर है। अतः मनुष्य को अपना कर्म और साधना करते हुए आत्मिक उन्नति की ऊँची भावना रखनी चाहिए। जैसी भावना होती है, वैसा ही फल भी मिलता है। आगे प्रसंग को और अधिक स्पष्ट किया जाता है—

1. कर्म और भावना का महत्व

श्री परमहंस दयाल जी के पावन वचन हमें यह सिखाते हैं कि किसी भी कर्म का असली मूल्य उसकी भावना पर निर्भर करता है। संसार में अनेक लोग दूसरों को क्षमा करते हैं, सुख-सुविधाओं का त्याग करते हैं और सर्दी-गर्मी जैसे कष्ट सहन करते हैं, लेकिन यह सब वे प्रायः धर्म या आत्मिक उन्नति के उद्देश्य से नहीं, बल्कि अन्य सांसारिक कारणों से करते हैं। यही कारण है कि उनके कर्म उन्हें वह आत्मिक फल नहीं देते, जो एक तपस्वी या मुनि को मिलता है।

2. क्षमा का आधार

कई बार लोग दूसरों को क्षमा करते हैं, लेकिन यह क्षमा धर्म या करुणा के भाव से नहीं होती। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपनी कामनापूर्ति के लिए या स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण से किसी को क्षमा कर देता है। यह क्षमा वास्तविक क्षमा नहीं है, क्योंकि इसमें आध्यात्मिकता का अभाव होता है। दूसरी ओर, एक मुनि जब क्षमा करता है, तो वह अपने भीतर करुणा और दया का भाव रखता है। यह भाव उसे आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।

उदाहरण के लिए, रामायण में श्री राम जी की  माता कैकेयी को क्षमा और इसी प्रकार भरत जी की क्षमाशीलता का वर्णन आता है। जब कैकेयी ने उन्हें राज-गद्दी देने का प्रयास किया, तो भरत जी ने इसे न केवल ठुकरा दिया, बल्कि माता कैकेयी को क्षमा भी किया। उनकी क्षमा, करुणा और धर्म की भावना से प्रेरित थी। यही कारण है कि वे आदर्श भाई और राजा माने गए।

3. त्याग और उसका उद्देश्य—

संसार में बहुत से लोग सुख-सुविधाओं का त्याग करते हैं। लेकिन यह त्याग प्रायः वैराग्य या संतोष के लिए नहीं होता, बल्कि व्यापारिक लाभ या हानि से प्रेरित होता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यापारी अपने धन को बचाने के लिए विलासिता के साधनों का त्याग करता है। यह त्याग आत्मिक उन्नति का साधन नहीं बन सकता।

इसके विपरीत, परमसंत श्री कबीर साहिब जी और संत तुलसीदास जी का जीवन त्याग और आदर्श का उदाहरण है। उन्होंने सांसारिक सुख-सुविधाओं को त्यागकर सादा जीवन व्यतीत किया, लेकिन यह त्याग उनके वैराग्य और आत्मिक उन्नति की भावना से प्रेरित था। उनका त्याग उन्हें समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बना गया।

4. सहनशीलता की भूमिका—

संसार में कई लोग कठिनाइयों को सहन करते हैं, लेकिन यह सहनशीलता तपस्या की भावना से प्रेरित नहीं होती। यह धन-संपत्ति अर्जित करने या सांसारिक लाभ के लिए होती है। उदाहरण के लिए, एक मजदूर दिन-रात कठिन परिश्रम करता है, लेकिन उसका उद्देश्य केवल आजीविका कमाना होता है। इसमें तपस्या का भाव नहीं होता।

तपस्वी और मुनि कठिनाई को आत्मा की उन्नति के लिए सहन करते हैं। महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर आदि पांडवों की सहनशीलता इसका आदर्श उदाहरण है। उन्होंने वनवास और कठिनाइयों को सहर्ष स्वीकार किया, क्योंकि उनका उद्देश्य अपने धर्म का पालन करना था।

5. भावना और फल का अंतर—

कर्म और भावना का संबंध बहुत गहरा है। यदि एक ही कार्य अलग-अलग भावनाओं से किया जाए, तो उसका फल भी भिन्न-भिन्न होगा। मुनियों और तपस्वियों के कर्म आत्मिक उन्नति की भावना से प्रेरित होते हैं। इसके विपरीत, संसारी लोग प्रायः स्वार्थ, लोभ, और अन्य सांसारिक भावनाओं से कर्म करते हैं। यही कारण है कि उन्हें आत्मिक उन्नति का फल नहीं मिलता।

उदाहरण के लिए, गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म की महिमा का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति फल की चिंता किए बिना केवल कर्तव्य भावना से कर्म करता है, वही सच्चा योगी है।

6. आत्मिक उन्नति की भावना—

मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्म में आत्मिक उन्नति की भावना रखनी चाहिए। इसके लिए हमें अपने मन में धर्म, करुणा और वैराग्य के भाव को विकसित करना होगा। जब हमारे कर्म का उद्देश्य केवल सांसारिक लाभ नहीं होगा, तभी हम वास्तविक सुख और शांति प्राप्त कर पाएंगे।

7. व्यावहारिक दृष्टिकोण—

(क) क्षमा का अभ्यास—जब भी किसी ने हमारा अहित किया हो, तो उसे क्षमा करते समय यह सोचना चाहिए कि हम आत्मा के विकास के लिए ऐसा कर रहे हैं, न कि उस पर हसान करने के भाव से।

(ख) त्याग का महत्व—यदि हमें किसी सांसारिक सुख का त्याग करना हो, तो यह भावना रखें कि यह त्याग आत्मिक शुद्धि के लिए है।

(ग) सहनशीलता का विकास—कठिन परिस्थितियों को सहन करते समय आत्म-चिंतन करें और इसे तपस्या के रूप में स्वीकार करें।

निष्कर्ष—

श्री परमहंस दयाल जी के वचन हमें यह समझाते हैं कि कर्म का सच्चा फल तभी प्राप्त होता है, जब उसकी भावना पवित्र और आत्मिक हो। चाहे वह क्षमा हो, त्याग हो या सहनशीलता हो—इन सबका उद्देश्य आत्मा की उन्नति होना चाहिए। मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्म में उच्च भावना का समावेश करना चाहिए, क्योंकि जैसी भावना वैसा फल’। यही जीवन का सच्चा मार्ग है।

ऐतिहासिक कहानी—

आत्म-ज्ञान का पथ—सैकड़ों वर्ष पहले मगध के समृद्ध राज्य में एक राजा चंद्रसेन का शासन था। वह विलासिता और वैभव में लिप्त था। चंद्रसेन के पास हर प्रकार का ऐश्वर्य था, लेकिन फिर भी उसका मन अशांत रहता था। राजमहल में भव्य उत्सव और रत्न जड़ित वस्त्रों के बावज़ूद, उसे सच्चे सुख की अनुभूति नहीं होती थी। वह हर समय चिंतित रहता था कि उसका वैभव और सत्ता कहीं उससे छिन न जाए।

राजा की एक दिव्य संत से भेंट—एक दिन राज्य में एक साधु महर्षि आगम’ का आगमन हुआ। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी कि उनके पास    अद् भुत आध्यात्मिक ज्ञान है। चंद्रसेन ने उन्हें अपने महल में आमंत्रित किया। जब महर्षि आगम आए, तो राजा ने उन्हें अपने अशांत मन की समस्या बताई। महर्षि ने मुसकराते हुए कहा—राजन् ! तुम्हारा अशांत मन भौतिक इच्छाओं के जाल में फँसा हुआ है। इसे शांत करने के लिए आत्म-ज्ञान का पथ अपनाना होगा।

साधना की ओर पहला कदम—महर्षि आगम ने सच्चे ज्ञान की तलाश के लिए राजा के आगे अपने साथ जंगल की ओर चलने का प्रस्ताव रखा। चंद्रसेन ने अपने राजसी वस्त्र त्याग दिए और साधारण वस्त्र पहनकर महर्षि के साथ चल दिया। जंगल में महर्षि ने उन्हें ध्यान, योग, और आत्म-निरीक्षण की शिक्षा दी। शुरुआत में, राजा को यह सब कठिन और उबाऊ लगा, लेकिन महर्षि के धैर्य और सटीक मार्गदर्शन ने उसे धीरे-धीरे आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर कर दिया।

भौतिक और आत्मिक जीवन का संघर्ष—राजा के मन में कई बार महल और अपनी संपत्ति की यादें आतीं। वह सोचता कि क्या उसने सही निर्णय लिया है ? एक दिन उसने महर्षि से पूछा—गुरुदेव ! क्या मुझे राजमहल और अपनी प्रजा को छोड़ देना चाहिए ? महर्षि ने उत्तर दिया—राजन् ! आत्म-ज्ञान का अर्थ त्याग नहीं, बल्कि सच्चे कर्तव्य का पालन है। भौतिकता में लिप्त रहकर भी तुम आध्यात्मिक जीवन जी सकते हो। बस अपने मन को मोह-माया से मुक्त करना होगा।

आत्म-ज्ञान की प्राप्ति—राजा चंद्रसेन ने महर्षि की बात समझ ली। उन्होंने कई वर्षों तक साधना की और अंततः आत्म-ज्ञान प्राप्त किया। वह अपने राज्य में लौटे, लेकिन अब वह पहले जैसे राजा नहीं थे। उन्होंने प्रजा की भलाई के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। उन्होंने राजमहल के वैभव का त्याग नहीं किया, लेकिन उसे प्रजा के कल्याण के लिए उपयोग में लिया। उनके राज्य में हर ओर सुख-शांति और समृद्धि फैल गई।

उपसंहार—कहानी का सार यह है कि राजा चंद्रसेन की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान और संतोष में है। भौतिकता और आत्मिकता का सामंजस्य ही जीवन का वास्तविक अर्थ है।

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अगस्त 2025

(आत्यन्तिक सुख)

 

आनन्द के विस्तार में बाधा क्यों ?

श्री परमहंस दयाल जी के पावन वचन हैं कि परम आनन्द में यह प्राकृतिक गुण है कि वह स्वभावतः फैलना चाहता है, जिस आत्म ज्ञानी पुरुष में परम आनन्द प्रकट होगा वह एक सीमा में बंधकर नहीं रहेगा। वह आगे से आगे बढ़ेगा।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जीवात्मा सच्चिदानन्द की अंश होकर भी दुःख क्यों भोगती है ? इसके उत्तर में कहा जाएगा—

1. द्वंद्व की स्थिति—सृष्टि द्वंद्व पर आधारित है। सुख के साथ दुःख, गुण के साथ दोष, प्रकाश के साथ अंधकार स्वाभाविक रूप से मौजूद हैं।

2. स्वतंत्रता का प्रयोग—जीवात्मा को किस राह पर चलना है, यह स्वतंत्रता मिली है। यदि वह दोषों का चुनाव करती है, तो दुःख और अशांति उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

3. पुरुषार्थ की अनिवार्यता—सद् गुणों को धारण करने के लिए भी पुरुषार्थ करना पड़ता है। यदि व्यक्ति आलस्य या प्रमाद के वशीभूत होकर पुरुषार्थ नहीं करता, तो वह उच्च गुणों से वंचित रह जाता है। परिणामतः दुःख भोगना पड़ता है।

अतः यदि हम स्व-परिवर्तन का प्रयास करें, सद् गुणों को अपनाएँ, दोषों से बचें और जो सत्संग  या वचन हम सुनते हैं, उन पर आचरण करें व ध्यान-साधना से आत्म-बोध की ओर अग्रसर हों, तो यही परम आनन्द हमारे भीतर स्थायी रूप से प्रस्फुटित हो सकता है।

एक दृष्टांत राजा जनक का वैराग्य—

 

आत्म-बोध प्राप्त पुरुष कैसे परम आनन्द को जगत् में बाँटना चाहते हैं, इसका सुंदर उदाहरण राजा जनक की कथा में मिलता है। राजा जनक को विदेह पुरुष कहा जाता था, क्योंकि उन्हें देह अभिमान नहीं था। वे राज-काज करते हुए भी आत्म-तत्व में स्थित रहते थे।

कहा जाता है—एक बार राजा जनक से ज्ञानवार्ता करने और आत्म-बोध का उपदेश पाने के लिए मुनि शुकदेव जी आए। उनकी परीक्षा हेतु योगमाया से उनके नगर में भयानक आग लग गई। सभासद और सेवक सभी घबरा गए, किंतु राजा जनक पूर्ण स्थिर चित्त होकर वहीं बैठे रहे। उनके मुख पर न तो चिंता थी, न भय। उन्होंने कहा—अग्नि केवल नगर को जला सकती है, किंतु मेरे भीतर की परम शांति और आनन्द को स्पर्श नहीं कर सकती।

इस घटना से यह सिद्ध होता है कि आत्म ज्ञानी का आनन्द किसी बाहरी परिस्थिति पर निर्भर नहीं रहता। ऐसा पुरुष किसी आपदा में भी आनंदित रह सकता है और चाह रखता है कि सबको इसी आनंद का अनुभव हो।

निष्कर्ष—परम आनन्द की प्राप्ति का पथ—

1. द्वंद्व का स्वीकार—सबसे पहले स्वीकारें कि सृष्टि द्वंद्वमय है—सुख-दुःख, राग-द्वेष, लाभ-हानि आदि जोड़ीदार भाव, इसमें स्वाभाविक हैं और आत्मा इनसे पृथक् तत्व है।

2. उचित चयन—गुण और दोष दोनों उपलब्ध हैं; यदि सुख चाहते हैं, तो शुभ गुणों का चयन करें—सत्य, प्रेम, दया, करुणा, सेवा, सत्संग, भक्ति इत्यादि अपनाएँ।

3. निरंतर पुरुषार्थ—शुभ गुणों को हृदय में बिठाने के लिए अभ्यास व पुरुषार्थ करें। चाहे प्रारंभ में कुछ कठिनाई आए, परंतु ये कष्ट ही आगे चलकर स्थायी सुख का मार्ग बनाते हैं।

4. सद् गुरु एवं सत्संग का महत्व—गुरुजन हमें दुर्गुणों का त्याग कर सद् गुणों की ओर प्रेरित करते हैं। सत्संग वह प्रकाश है, जिसमें हम अपने अपराधों, कमज़ोरियों और कर्तव्य को भलीभाँति देख पाते हैं।

5. अनुभूति का विस्तार—आत्म-बोध होने पर हृदय स्वाभाविक रूप से प्रेम, शांति और आनन्द से भर जाता है और इस दिव्य आनंद को सबमें बाँटने की सहज इच्छा जाग जाती है।

श्री परमहंस दयाल जी के वचनों के सार को यदि हम जीवन में उतारें, तो पाएँगे कि परम आनन्द कोई दूर की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे ही भीतर छिपा स्वाभाविक गुण है। हमें केवल इतना करना है कि  द्वैत-जगत् में रहते हुए भी दोषों की ओर जाने से स्वयं को रोकना है और गुणों के मार्ग पर पुरुषार्थ पूर्वक आगे बढ़ते रहना है। इस प्रकार दिन में किए हुए सत्कर्मों के प्रभाव से हम रात को चैन की नींद सो पाएँगे अर्थात् इस लोक में जीवनपर्यंत की हुई साधना और सत्कर्मों से परलोक में भी हमें पूर्ण सुख और शांति का अनुभव होगा।

 



जून 2025

(सत्य-नाम जपा करो)


सद्ग्रंथों में कहा गया है—

अज्ञेभ्यः ग्रन्थिनः श्रेष्ठाः, ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः ।
धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठाः, ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः ॥

अर्थ—अज्ञानी (मूर्ख) व्यक्ति की तुलना में ग्रंथ पढ़ने वाले श्रेष्ठ होते हैं, ग्रंथ पढ़ने वालों से उन्हें धारण करने वाले (स्मरण करने वाले) श्रेष्ठ होते हैं, स्मरण करने वालों की अपेक्षा उन्हें समझने वाले ज्ञानी श्रेष्ठ होते हैं और ज्ञानियों की अपेक्षा उनके अनुसार आचरण करने वाले श्रेष्ठ होते हैं।

इन वचनों के अनुसार अज्ञानी और सुविज्ञ (ज्ञानी) व्यक्ति के बीच का अंतर और उनके महत्व को समझना अत्यंत आवश्यक है। अज्ञ का अर्थ है, जो ज्ञान से वंचित हो, जबकि सुविज्ञ का अर्थ है, जो ज्ञान और जानकारी से परिपूर्ण हो।

अज्ञ और सुविज्ञ व्यक्ति के बीच अंतर—

अज्ञ व्यक्ति—

· ज्ञान की कमी—अज्ञ व्यक्ति में ज्ञान की कमी होती है, जिससे उसे सही निर्णय लेने और समझने में कठिनाई होती है।

· संदेह और भ्रम—अज्ञानता के कारण व्यक्ति संदेह और भ्रम में रहता है, जिससे उसका आत्मविश्वास कमज़ोर होता है।

· सीखने की आवश्यकता—अज्ञ व्यक्ति को शिक्षा और मार्गदर्शन की अधिक आवश्यकता होती है। समाज और शिक्षकों की ज़िम्मेदारी होती है कि वे उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करें।

· विकास में बाधा—अज्ञानता व्यक्ति के व्यक्तिगत और सामाजिक विकास में बाधा बनती है।

सुविज्ञ व्यक्ति—

· ज्ञान का स्रोत—सुविज्ञ व्यक्ति निरंतर ज्ञानार्जन के माध्यम से एक ज्ञान का स्रोत बन जाता है। वह अपने अनुभव और समझ से दूसरों की सहायता कर सकता है। यदि वह अपने ज्ञान का सही उपयोग करे, तो समाज के लिए अत्यंत लाभकारी हो सकता है।

· निर्णय लेने की क्षमता—सुविज्ञ व्यक्ति सही और गलत का भेद जानता है और सही निर्णय लेने में सक्षम होता है।

· विकास की दिशा—सुविज्ञ व्यक्ति अपने और समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, क्योंकि वह सही दिशा में मार्गदर्शन करने में सक्षम होता है।

· सृजनात्मकता—सुविज्ञ व्यक्ति अपनी सृजनात्मकता और नवाचार के माध्यम से नए विचार और समाधान प्रदान कर सकता है।

सत्संग का महत्व

स्मरण रखना चाहिए कि सुविज्ञ व्यक्ति द्वारा दिया गया ज्ञान ही सर्वाधिक प्रभावी होता है। एक बार श्री परमहंस दयाल जी ने एक प्रसंग सुनाया—

एक जिज्ञासु ने एक संत के पास जाकर अपने कल्याण का मार्ग पूछा। संत ने उसे कुछ समय तक सेवा करने के लिए कहा। उसने श्रद्धा से कई वर्षों तक सेवा की, जिसके बाद संत ने उसे सत्य-नाम की दीक्षा दी और कहा कि इस नाम का नियमित जाप करो।

कुछ समय बाद, एक दिन उस जिज्ञासु के घर एक भिखारी बाबा आया और भिक्षा माँगी। जिज्ञासु ने उसे आटा दिया और भिखारी ने उसे वही सत्य-नाम सुनाकर कहा कि इस नाम का जाप करो, तुम्हारा कल्याण होगा। यह देखकर जिज्ञासु के मन में भ्रम पैदा हुआ कि जो नाम उसे संतों ने वर्षों की सेवा के बाद दिया था, वही नाम एक भिखारी ने उसे मात्र एक मुट्ठी आटे के बदले दे दिया। वह सोचने लगा, भिखारी और संत में क्या अंतर रह गया ?

इस शंका को लेकर वह जिज्ञासु फिर से संतों  के पास गया और अपनी समस्या बताई। संतों ने कहा, सामने अलमारी में एक लोहे की डिब्बी है, उसमें पारस पत्थर रखा है, उसे उठा लाओ। जिज्ञासु सोचने लगा, यह कैसा पारस पत्थर है जो लोहे की डिब्बी को सोना नहीं बना सका ? फिर भी, वह डिब्बी लाया और गुरुजी को दी।

गुरुजी ने डिब्बी खोली और उसमें कपड़े की कई तहों में लिपटा पारस पत्थर दिखाया। फिर उन्होंने एक लोहे के टुकड़े को पारस से छुआकर सोना बना दिया। उन्होंने जिज्ञासु से कहा, यह पारस पत्थर बाज़ार में ले जाओ और इसकी कीमत पूछो, मगर बेचना मत।

पहले वह जिज्ञासु पारस लेकर एक सब्जी बेचने वाले के पास गया। उसने पारस के बदले थोड़ी सी सब्जी देने की पेशकश की। फिर वह एक हलवाई के पास गया, जिसने मिठाई देने की बात की। अंततः वह एक जौहरी के पास पहुँचा। जौहरी ने पारस की चमक देखी और उसकी कीमत एक लाख रुपये बताई। जिज्ञासु वह पारस पत्थर लेकर वापस गुरुजी के पास आया और उन्हें सब कुछ बताया।

गुरुजी ने कहा—देख लिया, एक साधारण से पत्थर की कीमत किसी ने कुछ बताई और किसी ने कुछ। जैसी जिसकी समझ थी, उसने वैसी ही परख की।

इस प्रसंग से समझा जा सकता है कि सत्य-नाम के असली पारखी केवल संतजन होते हैं। वे ही इसकी सच्ची कीमत जानते हैं और इसे अपनाकर पूरा लाभ उठाने का तरीका भी जानते हैं। भिखारी बाबा भला क्या जानेगा सत्य-नाम का भेद ? जो सत्य-नाम हमने तुम्हें दिया है, वह सत्य है और इसके जाप से तुम्हें पूर्ण लाभ प्राप्त होगा।

कबीर शब्द शरीर में, बिन गुन बाजै तांत ।
बाहर भीतर रमि रहा, ताते छूटी भ्रांत

अर्थ—वह सत्य शब्द शरीर में बिना तार के बज रहा है और बिना पैरों के बाहर और भीतर व्याप्त हो रहा है। ऐसा ज्ञान होते ही चित्त की भ्रांतियाँ मिट जाती हैं। इस शब्द भेद को जानने वाले को ही सुविज्ञ या सुजान व्यक्ति कहते हैं।

गहन चिंतन और मनन के द्वारा सुविज्ञ संतजन अपने क्षेत्र में गहन अनुभव प्राप्त करते हैं। उनकी जानकारी केवल पुस्तकीय नहीं होती, बल्कि व्यावहारिक अनुभव पर आधारित होती है, जो उन्हें अधिक प्रभावी और सटीक बनाती है।

सुविज्ञ गुरु द्वारा दिया गया ज्ञान वास्तव में सबसे अधिक फलदायी होता है। ऐसा गुरु अपने ज्ञान, अनुभव, और समझ के माध्यम से शिष्य को सही दिशा दिखा सकता है। वह न केवल शैक्षिक उन्नति में सहायक होता है, बल्कि शिष्य के जीवन को भी दिशा प्रदान करता है। सुविज्ञ गुरु शिष्य को नैतिक और सामाजिक मूल्यों का महत्व सिखाने के साथ-साथ उनके सम्पूर्ण विकास में सहायक होते हैं।

सत्य-नाम—
सत्य-नाम का अर्थ है वह नाम, जो सत्य के सार को व्यक्त करता है। यह वह पवित्र ध्वनि है, जिसे हर प्राणी में उपस्थित दिव्यता का स्मरण कराने के लिए जपा जाता है। जब एक साधक सत्य-नाम का जाप करता है, तो वह अपने आंतरिक स्वभाव और आत्मा के परम सत्य से जुड़ जाता है।

सत्य-नाम का जाप केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक साधना है, जो साधक को उसके आत्म-स्वरूप से जोड़ता है। यह जाप न केवल मन की शुद्धि करता है, बल्कि उसे गहरे चिंतन और आत्म-मंथन की दिशा की ओर भी प्रेरित करता है। सत्संगति और गुरु-कृपा के माध्यम से जब साधक सत्य-नाम का जाप करता है, तो उसे अपने अंदर एक अद्वितीय शांति और संतोष का अनुभव होता है। वह अपने जीवन में एक नई रोशनी और ऊर्जा का अनुभव करता है।

इसलिए, प्रत्येक साधक को सत्य-नाम का जाप और अद्वैत चिंतन की साधना को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना चाहिए। यह साधना न केवल आत्मिक शांति प्रदान करेगी, बल्कि साधक को उसके वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार भी कराएगी।

 



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